बुधवार, 24 दिसंबर 2008

"OM" Parvat(Himalayas)Uttaranchal/Uttarakhand-INDIA "OM" Parvat(Himalayas)Uttaranchal/Uttarakhand-INDI

"OM" Parvat(Himalayas)Uttaranchal/Uttarakhand-INDIA by Spring999.

Om Parvat or Adi Kailash or Chhota Kailash or Baba Kailash or Jonglingkong, is an ancient holy Hindu Himalayan mountain peak at an altitude of 6191 m, in the Himalayan Range lying in the Pithoragarh district of Uttaranchal/Uttarakhand, India near Sinla pass, similar to Mount Kailash in Tibet. The snow deposition pattern gives the impression of 'AUM' (ॐ) written over it, which is sacred Hindu Mantra or chant. Near Om Parvat, beautiful 'Parvati lake' and 'Jonglingkong lake' is situated. The Jonglingkong lake is sacred like Mansarovar to the Hindus. The opposite to this peak there is a mountain called Parwati Muhar is situated , snow over it shines like crown in sun.This peak was climbed for the first time by an Indo-British team including Martin Moran, T. Rankin, M. Singh, S. Ward, A. Williams and R. Ausden. Climbers did not climb above 6,000 M, due to sacred nature of the peak.

भगवान शिव को सर्वाधिक प्रिय

• अखण्ड बिल्वपत्र भगवान शिव को अत्यन्त प्रिय है। जो श्रध्दापूर्वक नम: शिवाय मंत्र जाप करते हुए शिव लिंग पर बेलपत्र अर्पित करता है वह सभी पापों से मुक्त हो शिव के परमधाम में स्थान पाता है। यहाँ तक कि बिल्वपत्र के दर्शन, स्पर्श व वंदना से ही दिन-रात के किये पापों से छुटकारा मिल जाता है।
• इसके अलावा भगवन् भोलेनाथ को आक-धतूरा विजया भांग आदि भी अति प्रिय हैं।
• पत्र, पुष्प, फल अथवा स्वच्छ जल तथा कनेर से भी भगवान् शिव की पूजा करके मनुष्य उन्हीं के समान हो जाता है। आक (मदार) का फूल कनेर से दसगुना श्रेष्ठ माना गया है।
• आक के फूल से भी दस गुना श्रेष्ठ है धतूरे आदि का फल। नील कमल एक हजार कह्लार (कचनार) से भी श्रेष्ठ माना गया है।
• शिवरात्रि व्रत करते हुए शिवोपासना से मनुष्य के त्रिविध तापों का शमन हो जाता है, संकटव कष्ट के बादल छंट जाते हैं, कर्मज व्याधियों व ग्रह बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है। इससे अकाल मृत्यु को टाला जा सकता है, मोक्ष प्राप्ति होती है। इस पर्व पर मनुष्य जिस मनोकामना से जिस रूप में शिव की आराधना करता है वह पूरी होती है और भोले शंकर उसी रूप में प्रसन्न होकर फल भी प्रदान करते हैं।
• जो व्यक्ति रोग ग्रस्त होकर बिस्तर पर पड़ा है, वह भी महामृत्युंजय के जाप से अपने को स्वस्थ अनुभव करने लगता है।
• घर में कलह, व्यापार में मंदी, कुसंतान, रोग, भाग्य में रूकावट, भाइयों में मतभेद आदि हो तब भी मनुष्य को शिवरात्रि के दिन कालसर्प शांति अवश्य करवा लेनी चाहिए। इस प्रकार की बाधाओं से मुक्ति के लिए शिवरात्रि से बढ़कर दूसरा उत्तम मुहूर्त नहीं।
• जिन व्यक्तियों को ‘शनि की साढेसाती’ प्रतिकूलता का संकेत दे रही हो उसका शमन शिव आराधना के द्वारा बड़ी सरलता से किया जा सकता है, उसके अलावा और कोई दूसरी आराधना उसे सरलता से शांत नहीं कर सकती।
• शिव गृहस्थ जीवन के आदर्श है जो अनासक्त रहते हुए भी पूर्ण गृहस्थ स्वरूप हैं। इनकी आराधना से मनुष्य के गृहस्थ जीवन में अनुकूलता प्राप्त होती है और वह सुखमय गृहस्थी का स्वामी बनता है।
• भगवान शिव सौभाग्य दायक हैं। अत: इस रात्रि में कुंवारी कन्या द्वारा इनकी आराधना करने से उसे मनोवांछित वर की प्राप्ति होती है।
• जो स्त्री संतान सुख की कामना से शिवरात्रि पर शिव की पूजा अर्चना करती है उसे शिव कृपा से संतान की भी प्राप्ति होती है, क्योंकि शिव पुत्र प्रदान करने वाले देवता हैं।
• भगवान शिव परमपिता परमात्मा के सम्पूर्ण स्वरूप है इसलिए इनकी आराधना जीवन पर्यन्त की जाती है और विशेषकर शिवरात्रि पर इनकी आराधना से व्यक्ति अपने इष्ट के दर्शन पाकर धन्य हो जाता है एवं उसके समस्त मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।

महाकाल को प्रिय है महाशिवरात्रि व्रत

ब्रह्माजी ने जब सम् पूर्ण जगत् की सृष्टि की, तब राशियों से कालचक्र उत्पन्न हुआ। उस काल चक्र में सब कार्यों की सिद्धि के लिए बारह राशियों और सत्ताईस नक्षत्र मुख्य हैं। इन बारह राशियों और सत्ताईस नक्षत्रों के साथ क्रीड़ा करता हुआ कालचक्र सहित काल जगत् को उत्पन्न करता है। ब्रह्मा से लेकर कीटपर्यन्त सबको काल ही उत्पन्न करता, वही पालन करता और वही संहार करता है। एक मात्र काल से ही यह सारा जगत् बंधा हुआ है। अकेला काल ही इस लोक में बलवान् है, दूसरा नहीं। अत: यह सब प्रपंच कालात्मक है। सबसे पहले काल हुआ। काल से ही स्वर्गलोक के अधिनायक उत्पन्न हुए। तदनन्तर लोकों की उत्पत्ति हुई। उसके बाद त्रुटि हुई। त्रुटि से लव हुआ। लव से क्षण हुआ। क्षण से निमिष हुआ जो प्राणियों में निरंतर देखा जाता है। साठ निमिष का एक पल कहा जाता है। साठ पलों की एक घड़ी होती है। साठ घड़ी का एक दिन होता है। पंद्रह दिन-रात का एक पक्ष माना जाता है। दो पक्ष का एक मास और बारह महीनों का एक वर्ष होता है। काल को जानने की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान् पुरुषों को इन सब बातों का ज्ञान रखना चाहिए। प्रतिपदा से लेकर पूर्णमासी तक पक्ष पूरा होता है। उस दिन पक्ष पूर्ण होने के कारण ही उसे पूर्णिमा कहते हैं। जिस तिथि को पूर्ण चन्द्रमा का उदय होता है, वह पूर्णमासी देवताओं को प्रिय है तथा जिस तिथि को चन्द्रमा लुप्त हो जाते हैं, उसे विद्वानों ने अमावस्या कहा है। अगि्ध्वात्त आदि पितरों को वह अधिक प्रिय है। ये तीस दिन पुण्यकाल से संयुक्त होते हैं। इनमें जो विशेषता है उसे सुनें। योगों में व्यतीपात, नक्षत्रों में श्रवण, तिथियों में अमावस्या और पूर्णिमा तथा संक्रान्ति-काल-ये सब दान-कर्म में पवित्र माने गये हैं। भगवान शंकर को अष्टमी प्रिय है। गणेशजी को चतुर्थी, नागराज को पंचमी, कुमार कार्तिकेय को षष्ठी, सूर्यदेव को सप्तमी, दुर्गाजी को नवमी, ब्रह्माजी को दशमी, रुद्रदेव को एकादशी, भगवान् विष्णु को द्वादशी, कामदेव को त्रयोदशी तथा भगवान् शंकर को चतुर्दशी विशेष प्रिय है। कृष्ण पक्ष में जो चतुर्दशी अर्धरात्रिव्यापिनी हो, उसमें सबको उपवास करना चाहिए। वह भगवान् शिव का सायुज्य प्रदान करने वाली है। वही शिवरात्रि के नाम से विख्यात है। वह सब पापों का नाश करने वाली है। इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं। पूर्वकाल में कोई विधवा ब्राह्मणी थी, जिसकी प्रकृति बड़ी चंचल थी। वह काम भोग में आसक्त रहती थी। अत: किसी कामी चाण्डाल के साथ उसका संबंध हो गया। उसके गर्भ से दुरात्मा चाण्डाल के एक पुत्र हुआ, जिसका नाम दुस्सह था। दुस्सह बड़ा ही दुष्टात्मा था। वह सब धर्मों के विपरीत ही आचरण करता था। महान् पापपूर्ण प्रयोगों के द्वारा वह सदा नये-नये पाप प्रारम्भ करता था। वह जुआरी, शराबी, चोर, गुरुस्त्रीगामी, वधिक, दुष्टात्मा तथा चाण्डालोचित कर्म करने वाला था। एक दिन वह अधर्मी मन में कोई बुरी वृत्ति लेकर ही किसी शिवालय में गया। उस दिन शिवरात्रि थी। वह रात में भगवान् शिव के पास उपवासपूर्वक रहा और वहां पास ही देव योग से होती हुई शैवशास्त्र की कथा सुनता रहा। वहां उसे लिङ्गस्वरूप भगवान् शिव का दर्शन हुआ। दुष्ट होते हुए भी उसने एक रात व्रत किया और शिवरात्रि में जागता रहा। उसी शुभ कर्म के परिणाम से उसने पुण्ययोनि प्राप्त करके बहुत वर्षों तक पुण्यात्माओं के लोक में सुख-भोग किया। तदनन्तर वह राजा चित्राङ्गद का पुत्र हुआ। उसमें राजराजेश्वरी के लक्षण थे। वहां वह विचित्रवीर्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसका रूप सुंदर था। उसे सुंदरी स्त्रियां प्यार करती थीं। उसने बहुत बड़ा राज्य प्राप्त करके भी अपने मन में अहंकार नहीं आने दिया। भगवान् शिव की भक्ति करते हुए वह सदा शिवधर्म के पालन में ही तत्पर रहा। शिवसंबंधी शास्त्रों को मान्यता देकर वह उन्हीं के अनुसार शिव की पूजा किया करता था। भगवान् शिव के समीप यत्नपूर्वक रात्रि में जागरण करके भगवान् शिव की गाथा का गान करता और रोमांचित होकर नेत्रों से आनन्द के अश्रुकण बहाया करता था। भगवान् शिव की कथा सुनने से उसमें प्रेम के सभी लक्षण प्रकट हो जाते थे। उसे देवाधिदेव शिव की प्रेमलक्षणा भक्ति प्राप्त हुई। भगवान् शिव के ध्यान में निरंतर संलग् रहने के कारण उसकी सारी आयु व्रत में ही बीती। भगवान् शिव इस संसार में पशुओं (अज्ञानियों) तथा ज्ञानीजनों को समान रूप से सुलभ हैं। अत: सुख की प्राप्ति के लिए एकमात्र सदाशिव का ही सेवन करना चाहिए। शिवरात्रि के उपवास से राजा को उत्तम ज्ञान प्राप्त हुआ। उस ज्ञान से राजा को सब प्राणियों में निरंतर समभाव का अनुभव हुआ। फिर, एकमात्र भगवान् सदाशिव ही सब भूतों के आत्मारूप हैं, इस ज्ञान का साक्षात्कार हुआ। तत्पश्चात यह अनुभव हुआ कि इस संसार में कहीं कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जो भगवान् शिव से रहित हो। इस प्रकार उन्होंने अत्यन्त दुर्लभ एवं पूर्ण प्रपंचातीत ज्ञान प्राप्त कर लिया। वह ज्ञान विज्ञ पुरुषों के लिए भी अत्यन्त दुर्लभ है, फिर औरों की तो बात ही क्या है। राजा विचित्रवीर्य वह ज्ञान प्राप्त करके भगवान् शिव के अत्यन्त प्रिय भक्त हो गये। शिवरात्रि के उपवास से उन्होंने सामुज्य मुक्ति प्राप्त कर ली। उसी पुण्य के प्रभाव से उन्होंने शिवजी की लीला में योग देने के लिए शिवजी से ही दिव्य जन्म प्राप्त किया। दक्ष-कन्या सती से जब शिवजी का वियोग हुआ तब उनके जटा फटकारने के शब्द से उन्हीं के मस्तक से जो वीरभद्र नामक वीर उत्पन्न हुआ, वह राजा विचित्रवीर्य ही है। वही दक्ष-यज्ञ का विनाश करने वाला हुआ।इसी प्रकार अन्य बहुत-से मनुष्य भी शिवरात्रि-व्रत के प्रभाव से पूर्वकाल में सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं।

क्या है महाशिवरात्रि-व्रत

महाशिवरात्रि-व्रत के रहस्य को जानने के लिए यह आवश्यक है कि उसका पदच्छेद करके उसके अंगीभूत प्रत्येक शब्द पर विचार किया जाय। देखा जाय कि ‘शिव’ किसे कहते हैं, ‘रात्रि’ क्या चीज है और ‘व्रत’ का क्या अर्थ है। साथ ही, इसका साधन क्या है और इसे करने से किस फल की प्राप्ति होती है, आदि। शिव- ‘शिव क्या है’ इसकी जानकारी प्राप्त कर लेना शिव कृपा पर ही अवलम्बित है। वस्तुत: इसे जानना ही शिव का साक्षात्कार कर लेना है, जो बहुत दूर की बात है, फिर भी साधारण ज्ञान के लिए इतना जान लेना आवश्यक है -
शेते तिष्ठति सर्वं जगत् यस्मिन् स: शिव: शम्भु: विकाररहित: …।
अर्थात ‘जिसमें सारा जगत् शयन करता है, जो विकार रहित है वह ‘शिव’ है, अथवा जो अमंगल का ह्रास करते हैं, वे ही सुखमय, मंगलरूप भगवान् शिव हैं। जो सारे जगत् को अपने अंदर लीन कर लेते हैं वे ही करुणा सागर भगवान् शिव हैं। जो भगवान् नित्य, सत्य, जगदाधार, विकाररहित, साक्षीस्वरूप हैं, वे ही शिव हैं।’महासमुद्र रूपी शिवजी ही एक अखण्ड पर तत्व हैं, इन्हीं की अनेक विभूतियां अनेक नामों से पूजी जाती हैं, यही सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान् हैं, यही व्यक्त-अव्यक्त रूप से क्रमश: ‘सगुण ईश्वर’ और ‘निर्गुण ब्रह्म’ कहे जाते हैं तथा यही ‘परमानंद’, ‘जगदात्मा’, ‘शम्भव’, ‘मयोभव’, ‘शंकर’, ‘मयस्कर’, ‘शिव’, ‘रुद्र’ आदि नामों से संबोधित किये जाते हैं। भगवान शिव वर्णनातीत होते हुए भी अनुभवगम्य हैं, यही आशुतोष भक्तों को अपनी गोद में रखते हैं, यही त्रिविधि तापों का शमन करने वाले हैं। इन्हीं से समस्त विद्याएं एवं कलाएं निकली हैं, ये ही वेद तथा प्रणव के उद्गम हैं। इन्हीं को वेदों ने ‘नेति-नेति’ कहा है। यही नित्याश्रय और अनन्ताश्रय हैं और यही दयासागर एवं करुणावतार हैं। इनकी महिमा का वर्णन करना मनुष्य की शक्ति के बाहर है।रात्रि ‘रा’ दानार्थक धातु से ‘रात्रि’ शब्द बनता है, अर्थात् जो सुखादि प्रदान करती है - वह ‘रात्रि’ है।
रात्रि सदा आनन्ददायिनी है, अत: सबकी आश्रयदात्री होने के कारण धर्मग्रंथों में उसकी स्तुति की गयी है और यहां रात्रि की स्तुति से प्रकृतिदेवी, दुर्गादेवी अथवा शिवादेवी की ही स्तुति समझनी चाहिए। इस प्रकार शिवरात्रि का अर्थ होता है ‘वह रात्रि जो आनन्द देने वाली है और जिसका शिव के नाम के साथ विशेष संबंध है।’ ऐसी रात्रि माघ फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की है, जिसमें शिवपूजा, उपवास और जागरण होता है। उक्त फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को शिवपूजा करना एक महाव्रत है। अत: उसका नाम महाशिवरात्रि-व्रत पड़ा। शिव के भावुक भक्तों के लिए इस संबंध में कुछ आवश्यक उद्धरण दिये जाते हैं -
परात् परत्तरं नास्ति शिवरात्रिपरात् परम्।न पूजयति भक्त्येशं रुद्रं
भ्रमते नात्र संशय:॥
(स्कन्दपुराण)
सौरो वा वैष्णवो वान्यो देवतान्तरपूजक:
पूजाफलमान्नोति शिवरात्रिबहिर्मुख:॥
(नृसिंह-परिचर्या और पद्मपुराण)
इसका आशय यह है कि शिवरात्रि-व्रत परात्पर है। जो जीव इस शिवरात्रि में महादेव की भक्तिपूर्वक पूजा नहीं करता, वह अवश्य सहस्रों वर्षों तक घूमता रहता है। चाहे सूर्यदेव का उपासक हो, चाहे विष्णु तथा अन्य किसी देव का, जो शिवरात्रि का व्रत नहीं करता, उसको फल की प्राप्ति नहीं होती। स्कन्दपुराण के अनुसार -
शिवं तु पूजयित्वा यो जागर्ति च चतुर्दशीम्।
मातु: पयोधररसं न पिवेत् स कदाचन॥
जो शिव-चतुर्दशी में शिव की पूजा करके जागता रहता है, उसको फिर किसी जन्म में अपनी माता का दूध नहीं पीना पड़ता अर्थात वह मुक्त हो जाता है। ‘चाहे सागर सूख जाय, हिमालय भी क्षय को प्राप्त हो जाय, मन्दर, विन्ध्यादि पर्वत भी विचलित हो जाये, पर शिव-व्रत कभी विचलित (निष्फल) नहीं हो सकता।’ इसका फल अवश्य मिलता है। जो मनुष्य ‘कालतत्व’ का भाव जानते हैं, उन्हें विदित है कि समय पर कार्य करने से इष्ट पदार्थों की प्राप्ति होती है। फाल्गुन के पश्चात् नये वर्ष चक्र का प्रारम्भ होता है। रात्रि के पश्चात् दिन और दिन के पश्चात् रात्रि होती है अथवा लय के बाद सृष्टि और सृष्टि के बाद लय होता है। इस प्रकार लय के बाद सृष्टि और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के बाद वर्षचक्र की पुनरावृत्ति एक ही बात है। वर्ष चक्र की पुनरावृत्ति के समय मुमुक्षु जीव परम तत्व शिव के पास पहुंचना चाहता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कृष्ण चतुर्दशी में चन्द्रमा सूर्य के समीप होते हैं। अत: उसी समय में जीवरूपी चन्द्र का शिवरूपी सूर्य के साथ योग होता है। अतएव फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिव पूजा करने से जीव को इष्ट पदार्थ की प्राप्ति होती है।
शिवरात्रि-व्रतअब यह समझना है कि शिवरात्रि-व्रत क्या है? इस व्रत में उपवास, जागरण और शिव-पूजा करने की परंपरा है। इन सबका तात्विक अर्थ समझना चाहिए। इसके पहले ‘व्रत’ क्या है, यह समझना आवश्यक है। वैदिक साहित्य में व्रत का अर्थ वेदबोधित, इष्टप्रापक कर्म है। दार्शनिक काल में ‘अभ्युदय’ और ‘नि:श्रेयस’ कर्मों का हेतु-पदार्थ ही ‘व्रत’ शब्द का अर्थ समझा जाता था। अमरकोष में ‘व्रत’ का अर्थ नियम है। पुराणों में व्रत ‘धर्म’ का वाचक हैँ निष्कर्ष यह है कि वेदबोधित अगि्होत्रादि कर्म, शास्त्रविहित नियमादि अथवा साधारण तथा असाधारण धर्म को ही ‘व्रत’ कहते हैं अथवा थोड़े में यों समझिये कि जिस कर्म द्वारा भगवान का सान्निध्य होता है वही व्रत है। उपवास क्या है? जीवात्मा का शिव के समीप वास ही ‘उपवास’ कहा जाता है।
उप-समीपे यो वास: जीवात्मपरमात्मनो: : स विज्ञेयो न तु कायस्य शोषणम्॥(वराहोपनिशद्)देवीपुराण में कहा गया है - ‘भगवान् (शिव) का ध्यान, उनका जप, स्नान, भगवान् की कथा का श्रवण आदि - इन गुणाें के साथ वास अर्थात् इन क्रियाओं को करते हुए काल-यापन करना ही उपवासकर्ता का लक्षण है। व्रती के अन्दर ये लक्षण अवश्य होने चाहिए। व्रती के लिए सब प्रकार के विषय-भोगों का वर्जन आवश्यक है। केवल अनशन करने से उपवास या व्रत नहीं होता।’ जागरण-मुमुक्षु जीवात्मा के लिए ‘जागरण’ आवश्यक है-
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:॥
‘सर्व प्राणियों की अर्थात् विषयासक्त संसारी जनों की जो निशा है, उसमें संयमी जगे रहते हैं। आत्मदर्शन विमुख प्राणिगण जिस जगदवस्था में जागते हैं, वह मनीषी, आत्मदर्शननिरत योगी के लिए निशा है।’ अत: सिद्ध है कि विषयासक्त जिसमें निद्रित हैं उसमें संयमी प्रबुद्ध हैं। अत: शिवरात्रि में जागरण करना आवश्यक है। शिवपूजा का अर्थ पुष्प-चन्दन-बिल्बपत्र अर्पितकर शिवनाम का जप-ध्यान करना एवं चित्तवृत्ति का निरोध कर जीवात्मा का परमात्मा ‘शिव’ के साथ योग करना है।योगशास्त्र के शब्दों में इन्द्रियों का प्रत्याहार, चित्तवृत्ति का निरोध और महाशिव रात्रि व्रत वास्तव में एक ही पदार्थ हैं। पंच ज्ञानेन्द्रियां, पंच कर्मेन्द्रियां तथा मन, अहंकार, चित्त और बुद्धि-इन चतुर्दश का समुचित निरोध ही सच्ची ‘शिव-पूजा’ या ‘शिवरात्रि-व्रत’ है। चाहे शिव-पूजा ज्ञान योग द्वारा कीजिये अथवा कर्मयोग द्वारा, भक्ति का सम्मिश्रण दोनों में रहेगा। ज्ञानप्रधान भक्ति अथवा कर्मप्रधान भक्ति द्वारा फाल्गुन-कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि-व्रत करने से मुक्ति मिलेगी।जो लोग शिव-भक्ति से प्रेरित होकर सच्चे पवित्र मन से अनशनव्रतकर परतत्व शिव की पूजा बिल्व-पत्र, दुग्ध व पुष्पादि से करते हैं, उन्हें भी अपनी भक्ति के अनुसार फल मिलता है। क्योंकि वास्तव में महाशिवरात्रि-व्रत का उद्देश्य जीवात्मा का परमात्मा के साथ सहयोग ही है। अपनी-अपनी भक्ति के अनुसार समस्त भूमण्डल के भावुकजन वैज्ञानिक महाशिवरात्र-व्रत का अनुष्ठान कर सकते हैं। भगवान् भूतनाथ की दया से उन्हें सिद्धि अवश्य मिलेगी। अज्ञानवश एक व्याध ने महाशिवरात्रि-व्रत का अनुष्ठान किया था, जिससे शिव के गणों ने उसके लिए भी एक विमान भेजकर उसे शिवलोक में पहुंचा दिया। यम ने भगवान् शिव के पास जाकर उस व्याध की इन शब्दों में शिकायत की -निषादो जीवघाती च सर्वधर्मबहिष्कृत:।न धर्मोऽप्यर्जितस्तेन निर्गतं यमशासनम्॥
आदि। भगवान शिव ने यमदेय को उस व्याध की कहानी कह सुनायी कि कैसे उसने बिल्वपत्र द्वारा शिवलिंग की उपासना की और कैसे अनशन-व्रत द्वारा ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने यमदेव को आध्यात्मिक घटनाओं का तारतम्य भी समझा दिया। अनशन द्वारा भक्तिपूर्वक शिव की बिल्वपत्र, पुष्प, चन्दन, दुग्ध, दधि द्वारा पूजा से बहुत बड़ा आध्यात्मिक लाभ और सांसारिक अभ्युदय प्रारम्भ में होगा। आज ईश्वर के नाम पर जगह-जगह झगड़े हो रहे हैं। शैव-पदार्थों की अवहेलना है। यद्यपि अनेक व्रतों तथा साधनों द्वारा शान्ति की चेष्टा की जा रही है तथापि महाशिवरात्रि-व्रत द्वारा ही इस ओर विशेष सफलता मिल सकती है।

मंगलवार, 23 दिसंबर 2008

गेपरनाथ महादेव (कोटा)

कोटा से 22 किलोमीटर दूर चम्बल नदी की कराई में स्थित गेपरनाथ महादेव मन्दिर है। सीढ़ियाँ वहाँ आने जानेका एक मात्र रास्ता है । यह एक मनोरम स्थान है। चम्बल के किनारे नदी से कोई आधा से एक किलोमीटर दूर एक सड़क कोटा से रावतभाटा जाती है। रतकाँकरा गांव के पास इसी सड़क से कोई आधाकिलोमीटर चम्बल की ओर चलने पर यकायक गहराई में एक घाटी नजर आती है। जिस में तीन सौ फीट नीचे एक झरना, झरने के गिरने से बना प्राकृतिक कुंड है। वहीं एक प्राचीन शिव मंदिर है। बरसात में यह स्थान मनोरम हो उठता है और हर अवकाश के दिन वहाँ दिन भर कम से कम दो से तीन हजार लोग पिकनिक मनाने पहुँचते हैं। पानी कुंड से निकल कर चम्बल की ओर बहता है और बीच में तीन-चार झरने और बनाता है मगर वहाँ तक पहुँचना दुर्गम है। दुस्साहस कर के ही वहाँ जाया जा सकता है।
ऊपर भूमि से नीचे कुंड, झरने और मंदिर तक पहुँचने के लिए सीधे उतार पर तंग लगभग चार सौ सीढ़ियाँ हैं।

यहाँ दिया गया चित्र झरने का है। झरने के बायें मन्दिर है और उस के साथ ही सीढ़ियाँ बनी हैं जो नीचे झरने की और जाने आने का एक मात्र साधन हैं।

ॐ नमः शिवाय

१०८ मंत्र
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
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ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय

रविवार, 21 दिसंबर 2008

उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर


मध्य परदेस में स्थित उज्जैन नगर के दर्शनीय स्थलों में महाकालेश्वर का मंदिर प्रमुख है। यह देश के 12 ज्योतिर्लिगों में से एक है। पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है। स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यंत पुण्यदायी महत्ता है। इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, ऐसी मान्यता है। महाकवि कालिदास ने मेघदूत में उज्जयिनी की चर्चा करते हुए इस मंदिर की प्रशंसा की है। 1235 ई. में अलतमस के द्वारा इस प्राचीन मंदिर का विध्वंश करने के बाद से यहां जो भी शासक रहे, उन्होंने इस मंदिर का जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण की ओर विशेष ध्यान दिया है इसीलिए मंदिर अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त कर सका है। प्रतिवर्ष और सिंहस्थ के पूर्व इस मंदिर को सुसज्जित किया जाता है।

इतिहास

इतिहास से पता चलता है कि उज्जैन में सन् 1107 से 1728 ई। तक यवनों का शासन था। इनके शासनकाल में अवंति की लगभग 4500 वर्षों में स्थापित हिन्दुओं की प्राचीन धार्मिक परंपराएं प्राय: नष्ट हो चुकी थी। लेकिन 1690 ई। में मराठों ने मालवा क्षेत्र में आक्रमण कर दिया और 28 नवम्बर 1728 को मराठा शासकों ने मालवा क्षेत्र में अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया। इसके बाद उज्जैन का खोया हुआ गौरव पुनः लौटा और सन 1731 से 1809 तक यह नगरी मालवा की राजधानी बनी रही। मराठों के शासनकाल में यहां दो महत्वपूर्ण घटनाएं घटी- पहला, महाकालेश्वर मंदिर का पुनिर्नर्माण और ज्योतिर्लिंग की पुनर्प्रतिष्ठा तथा सिंहस्थ पर्व स्नान की स्थापना, जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। आगे चलकर राजा भोज ने इस मंदिर का विस्तार कराया।

स्थिति

मंदिर एक परकोटे के भीतर स्थित है। गर्भगृह तक पहुंचने के लिए एक सीढ़ीदार रास्ता है। इसके ठीक उपर एक दूसरा कक्ष है जिसमें ओंकारेश्वर िशवलिंग स्थापित है। मंदिर का क्षेत्रफल ७०.77 x १० वर्गमीटर और ऊंचाई 28.71 मीटर है। महाशिवरात्रि एवं श्रावण मास में हर सोमवार को इस मंदिर में अपार भीड़ होती है। मंदिर से लगा एक छोटा सा जलस्रोत है जिसे ``कोटितीर्थ`` कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि अलतमस ने जब मंदिर को तुड़वाया तो शिवलिंग को इसी कोटितीर्थ में फिकवा दिया था। बाद में इसकी पुनर्प्रतिष्ठा करायी गयी। सन 1968 के सिंहस्थ महापर्व के पूर्व मुख्य द्वार का विस्तार कर सुसज्जित कर लिया गया है। इसके अलावा निकासी के लिए एक अन्य द्वार का निर्माण भी कराया गया है। लेकिन दर्शनार्थियों की अपार भीड़ को दृष्टिगत रखते हुए बिड़ला उद्योग समूह के द्वारा 1980 के सिंहस्थ के पूर्व एक विशाल सभा मंडप का निर्माण कराया गया है। महाकालेश्वर मंदिर की व्यवस्था के लिए एक प्रशासनिक समिति का गठन किया गया है जिसके निर्देशन में यहाँ की व्यवस्था सुचारू रूप से चल रही है।