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सोमवार, 18 जुलाई 2011

सबसे ऊँचा शिव मंदिर ( बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का विश्वनाथ मंदिर)

भारत का सबसे ऊँचा (करीब 252 फुट) शिव मंदिर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के मध्य में स्थित श्री विश्वनाथ मंदिर है। मंदिर का शिखर दक्षिण भारत के तंजावुर स्थित वृहदेश्वर मंदिर की ऊँचाई से ज्यादा है। इसमें मुख्य शिखर के अलावा दो अन्य शिखर भी हैं। मंदिर की अंदर की दीवारों पर श्रीमद्भगवतगीता के श्लोक अंकित हैं।

इसके अलावा दीवारों पर संतों के अनमोल वचन भी संगमरमर पर उकेरे गए हैं। मंदिर के दोनों तरफ खूबसूरत मूर्तियाँ बनी हैं। मंदिर तथा आस-पास का परिसर इतना सुंदर है कि फिल्म बनाने वाले भी यहाँ आकर्षित होते हैं। हरे-भरे आमों के पेड़ मंदिर की शोभा में चार चाँद लगाते हैं। कई फिल्मों की यहाँ पर शूटिंग भी हो चुकी है। मंदिर की साफ-सफाई इतनी अच्छी है कि कहीं पर एक तिनका नजर नहीं आता। इस मंदिर को अगर हिंदू विश्वविद्यालय का आध्यात्मिक केंद्र कहा जाए तो गलत नहीं होगा।

यहाँ बाबा भोलेनाथ की आरती में इलेक्ट्रॉनिक घंटा-घड़ियाल लयबद्ध ताल में गूँजते हैं। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदनमोहन मालवीय की कल्पना की परिणति है यह भव्य और अलौकिक सौंदर्य से भरा मंदिर। मंदिर के चढ़ावे से विश्वविद्यालय के 22 छात्रों को 'अन्न सुख' भी मिलता है।

मदनमोहन मालवीय की मंशा के अनुरूप इसे आकार देने का श्रेय उद्योगपति युगल किशोर बिरला को जाता है। मंदिर का शिलान्यास 11 मार्च 1931 को हुआ और 17 फरवरी 1958 को महाशिवरात्रि पर मंदिर के गर्भगृह में भगवान विश्वनाथ प्रतिष्ठित हुए। जीवन के अंतिम समय में बिस्तर पर पड़े मदनमोहन मालवीय की आँखें नम देख जाने-माने उद्योगपति युगल किशोर बिरला ने मंदिर के बारे में पूछा तो वे मौन रहे।

मदनमोहन मालवीय को मौन देख बिरला बोले, आप मंदिर के बारे में चिंता न करें, मैं वचन देता हूँ कि पूरी तत्परता के साथ मंदिर के निर्माण कार्य में लगूँगा। तब मदनमोहन मालवीय निश्चिंत हुए और कुछ दिन बाद ही उनका देहाँत हो गया। मंदिर की अन्नदान योजना के तहत अभी 22 छात्रों और कुलपति के विवेकाधीन कोष से 16 छात्रों को भोजन कराया जाता है। मंदिर के कोष से इसका रख-रखाव होता है। विश्वविद्यालय की ओर से यहाँ छह पुजारी, तीन चौकीदार, दो गायक, एक तबला वादक, एक अधिकारी समेत अन्य कर्मचारी मंदिर की देखरेख एवं सेवा में तैनात हैं।

वैसे तो मंदिर में बाबा का दर्शन करने वाले हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन आते हैं लेकिन सावन के महीने में भक्तों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है। मंदिर में लगी देवी-देवताओं की भव्य मूर्तियों का दर्शन कर लोग जहाँ अपने को कृतार्थ करते हैं वहीं मंदिर के आस-पास आम कुंजों की हरियाली एवं मोरों की 'पीकों' की आवाज से भक्त भावविभोर हो जाते हैं।

पूरे सावन माह और माह के प्रत्येक सोमवार को देश-विदेश से श्रद्धालु यहाँ भक्तिभाव से जुटते हैं। मंदिर के मानद व्यवस्थापक ज्योतिषाचार्य पंडित चंद्रमौलि उपाध्याय के अनुसार इस भव्य मंदिर के शिखर की सर्वोच्चता के साथ ही यहाँ का आध्यात्मिक, धार्मिक, पर्यावरणीय माहौल दुनिया भर के आस्थावान श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। खासकर युवा पीढ़ी के लिए यह मंदिर विशेष आकर्षण का केंद्र बन चुका है, जहाँ उनके जीवन में सात्विक मूल्यों का बीजारोपण होता है।

सोमवार, 27 अप्रैल 2009

भगवान शिव का विरूपाक्ष मंदिर हंपी

हंपी, भगवान शिव का विरूपाक्ष मंदिर अथवा पंपापति का स्थान है जोकि विजयनगर के राजाओं के पारंपरिक एवं पारिवारिक भगवान थे। यह मंदिर बेलारी जिले में तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित है और यह कर्नाटक में होसपेट शहर से नौ मील की दूरी पर है। यह विजयनगर का सबसे पुराना और पवित्र मंदिर है। यह मंदिर 1565 ईसवी में तालीकोटा के युद्व में विनाश से अद्भुत तरीके से बच गया था।

आरंभ में इस महान एवं प्राचीन मंदिर के आसपास एक छोटा सा गांव हुआ करता था। विजयनगर साम्राज्य स्थापित होने से पहले यहां प्रकृति ने अपनी विस्तृत चादर बिछा रखी थी। यहां पर एक तरफ तो एक विशाल चट्टान एवं विस्तृत पहाड़ियां थी तो दूसरी तरफ हरे भरे पेड़ और पौधे थे। पास ही से तुंगभद्रा नदी बहती थी।

यहां की विशाल चट्टानों, नदी, एकांत और प्रकृति ने अनेक बुद्विमानों एवं ऋषि-मुनियों को यहां आने के लिए आकर्षित किया है। विद्यारण्य ने इस स्थान को अपनी तपस्या के लिए चुना था। तुगंभद्रा नदी का दूसरा नाम पंपा भी है। पंपादेवी को ब्रहमा की पुत्री माना गया है और उसने हैमकूट पहाड़ी पर तपस्या की थी। भगवान विश्वेश्वर उसके सामने प्रकट हो गये और उसे अपनी संगनी बना लिया। विद्वानों और दार्शनिकों से प्रभावित हो कर 1336 ईसवीं में माधव, हरिहर, और बुक्का ने इस शहर की नींव ड़ाली और इसका नाम विजयनगर हरिहर और बुक्का ने अपने गुरू विद्यारण्य के नाम पर रखा। हरिहर और बुक्का संगम के पांच पुत्रों में से दो थे। इन्होंने पंपापति अथवा विरूपाक्ष को अपना कुल देवता माना। नदी के उत्तरी छोर पर अनेगुंडी का किला था और दक्षिणाी छोर पर विजयनगर को बसाया गया था। लगभग तीन सौ वर्षों तक विजयनगर बाहरी संस्कृति एवं विचारों से बचा रहा और देश की पारंपरिक संस्कृति तथा धर्म के समर्थन में खड़ा रहा। अब विजयनगर दक्षिण की कांशी बन गया था और विरूपाक्ष भारत के 108 दिव्य क्षेत्रों में से एक हो गया। विजयनगर साम्राज्य का पहला वंश संगम के नाम पर पड़ा था। संगम हरिहर और बुक्का का पिता था। बुक्का प्रथम के बाद हरिहर द्वितीय ने यहां की सत्ता संभाली। करनूल से लेकर कुंबाकोणम के बीच स्थित मंदिरों को इसने सोलह बड़े उपहार दिये थे जिसके लिए इसकी प्रशंसा की जाती है। इसने पूरे दक्षिण में अपने राज्य का विस्तार कर लिया। हांलाकि वह भगवान विरूपाक्ष का अनुयायी था परंतु वह अन्य धर्मों के प्रति भी उदार था। विजयनगर साम्राज्य और बादामी साम्राज्य के बीच लगातार युद्व होते रहते थे। संगम वंश में नौ राजा हुए थे जो यादवों और होयसेलों के पतन के बाद सत्ता में आये थे और ये 1336 ईसवीं से 1486 ईसवीे तक सत्ता में रहे।

सालुव वंश के अंतिम राजा को तालुव वंश के वीर नरसिंह ने सत्ता से हटा दिया। वीर नरसिंह के बाद उसके रिश्ते के छोटे भाई कृष्णदेव राय ने सत्ता संभाली जो विजयनगर साम्राज्य का सबसे महान एवं भारत का अनूठा राजा हुआ।

कृष्णदेव राय के राज में विजयनगर साम्राज्य अपने वैभव और खुशहाली के चरम उत्कर्ष पर पहुंच गया था। वह संस्कृत और तेलगु साहित्य का महान संरक्षक था। उसने स्वयं भी तेलगु में ''अमुक्तमल्यद'' नाम का एक ग्रंथ लिखा था जिसमें उसने स्वयं के द्वारा संस्कृत में लिखे पांच साहित्यों का वर्णन किया है। इसके दरबार में आठ मशहूर कवि आश्रय पाते थे जिन्हें '' अष्टदिग्गज'' कहा जाता था और इनमें सबसे अधिक पेद्दना मशहूर था। धुर्जती कवि भी मशहूर था। ऐसा कहा जाता है कि कृष्णदेव राय धुर्जती कवि के बारे में यह जानना चाहते थे कि उनकी कविताओं में इतनी मीठास कैसे आती है तो तेनालीराम जोकि एक प्रतिभाशली विद्वान एवं हंसौड़ा था और उसने ''पंडुरंग महात्यम'' नामक ग्रंथ की रचना की थी, उसने बताया कि इसका कारण धर्जती की संगनी के सुंदर होंठ है। कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई अच्युत राय गद्दी पर बैठा। इसके बाद वैंकट राय प्रथम और इसके बाद सदाशिव राय ने गद्दी संभाली। परंतु सारी शक्ति उसके मंत्री रामराय के हाथों में थी। वह वास्तविक शासक तो था ही साथ ही उसमें अपार क्षमता भी थी। परंतु अब वह दंभी और अति आत्मविश्वासी हो गया और उसने अपना गठबंधन भी बदल लिया जिसके कारण उसके पडौसी राज्य की प्रजा का वह घृणा पात्र बन गया। चार मुस्लिम राज्यों बीजापुर, गोलकुंडा, अहमद नगर और बीदर ने अपना एक अलग गठबंधन बनाया और इसने मिलकर विजयनगर पर हमला कर दिया। 23 जनवरी, 1665 ईसवीं में राक्षस और तगडी गांव के पास तालीकोटा में एक भयंकर युद्व हुआ जिसमें विजयनगर की पराजय हुई और हुसैन निज़ाम शाह ने रामराय की हत्या कर दी। विजयी सेना ने नगर में लूट मचा दी। बेहतरीन तरीके से बसे नगर को हमलावर सेना ने बर्बाद कर दिया। युद्व के तीन बाद से लेकर अगले पांच महीनों के दौरान लगातार विनाश चलता रहा और यह नगर पूरी तरह से नष्ट हो गया। ऐसा विश्व इतिहास में कभी नहीं हुआ जो एक दिन पहले शानदार और वैभवशाली राज्य था और अचानक ही अगले ही दिन उसका इस तरह से पतन हो जाये।

यूनेस्को की रिपोर्ट में भारतीय प्राचीन स्थापत्य, महलों मंदिरों, सुरक्षा मचानों, स्नानगृहाें और जगह-जगह फैले पडे बड़ी संख्या पत्थरों को स्थान दिया है। इसकी पूरी तस्वीर तुंगभद्रा नदी है जो यह महसूस कराती है कि लंबे समय से इसने बहुत कुछ छिपा रखा है। विजयनगर की राजधानी के रूप में हंपी में वो सारे तत्व मौजूद है जो उसे किसी भी राज परिवार के रहने के लिए गौरव दिलाते है। यहां हाथी, घोड़े, नृतकियां, पर्वत गुफाएं संगीतमय स्तंभ, कमल की आकृति के फव्वारे, सीढ़िदार तालाब आदि दृष्टिगोचर होते है। लगभग 25 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में जगह-जगह दबे अवशेष अद्भुत दिखाई देते है। विरूपाक्ष मंदिर का गोपुरम् पचास मीटर लंबा-चौड़ा और नौ मंजिला है। विट्ठल मंदिर में पत्थर से बने हुए छप्पन स्तंभ है जो एक क्रम में देखने पर संगीतमय आभास उत्पन्न करते है। यहीं पर 6.7 मीटर की एक विशाल शिला है जिसको नरसिंह कहते है। बेशक विजयनगर के हीरे-जवाहरात को लूट लिया गया हो और नगर पूरी तरह से खाली हो गया हो परंतु आज भी इस अंतिम नगर की महानता, महत्ता और वैभवता को महसूस किया जा सकता है।

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

एक और बदरीनाथ (हिमाचल)

हिमालय की गोद में बहुत से ऐसे स्थल हैं, जिनके साथ धार्मिक आस्थाएं तो जुडी ही हैं, साथ ही इन स्थलों की यात्रा रोमांचकारी पर्यटन का पर्याय भी मानी जाती हैं। मीलों लम्बा और दुर्गम सफर तय करके जब श्रद्धालु या पर्यटक इन स्थलों पर पहुंचते हैं, तो प्रकृति के बीच धार्मिक गीतों की स्वर लहरियां सुनकर अभिभूत हो उठते हैं। किन्नर कैलाश भी ऐसा ही एक स्थल है।

तिब्बत स्थित मानसरोवर कैलाश के बाद किन्नर कैलाश को ही दूसरा बडा कैलाश पर्वत माना जाता है। समुद्र तल से 18,168फुट की ऊंचाई पर स्थित किन्नर कैलाश भगवान शिव की साधना स्थली रहा है, शैव मतावलंबियों की ऐसी आस्था है और धर्म-ग्रन्थों में भी इस बात का जिक्र आया है। किन्नर कैलाश के बारे में अनेक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। कुछ विद्वानों के विचार में महाभारत काल में इस कैलाश का नाम इन्द्रकीलपर्वत था, जहां भगवान शंकर और अर्जुन का युद्ध हुआ था और अर्जुन को पासुपातास्त्रकी प्राप्ति हुई थी। यह भी मान्यता है कि पाण्डवों ने अपने बनवास काल का अन्तिम समय यहीं पर गुजारा था। किन्नर कैलाश को वाणासुर का कैलाश भी कहा जाता है। क्योंकि वाणासुरशोणितपुरनगरी का शासक था जो कि इसी क्षेत्र में पडती थी। कुछ विद्वान रामपुर बुशैहररियासत की गर्मियों की राजधानी सराहन को शोणितपुरनगरी करार देते हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि किन्नर कैलाश के आगोश में ही भगवान कृष्ण के पोते अनिरुधका विवाह ऊषा से हुआ था। इसी पर्वत श्रृंखला के सिरे पर करीब साठ फुट ऊंचा तिकोना पत्थर का शिवलिंगबना है, जिसके दर्शन किन्नौरघाटी के कल्पानगरसे भी किए जा सकते हैं। यह शिवलिंग21हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित है और इस शिवलिंगकी एक चमत्कारी बात यह है कि दिन में कई बार यह रंग बदलता है। सूर्योदय से पूर्व सफेद, सूर्योदय होने पर पीला, मध्याह्न काल में यह लाल हो जाता है और फिर क्रमश:पीला, सफेद होते हुए संध्या काल में काला हो जाता है। क्यों होता है ऐसा, इस रहस्य को अभी तक कोई नहीं समझ सका है। किन्नौरवासी इस शिवलिंगके रंग बदलने को किसी दैविक शक्ति का चमत्कार मानते हैं, कुछ बुद्धिजीवियों का मत है कि यह एक स्फटिकीयरचना है और सूर्य की किरणों के विभिन्न कोणों में पडने के साथ ही यह चट्टान रंग बदलती नजर आती है। बुद्धिजीवियों का दलील है कि यदि आसमान मेघों से आच्छादित हो तो यह चट्टान रंग नहीं बदलती और अपने सामान्य स्वरूप में ही रहती है। कुछ विद्वानों की यह भी मान्यता है कि पाण्डवों ने अपने गुप्तवासके दौरान यहां इस पवित्र शिवलिंगकी स्थापना करके भगवान शिव की आराधना की थी।

इस शिवलिंगकी परिक्रमा करना बडे साहस और जोखिम का कार्य है। कई शिव भक्त जोखिम उठाते हुए स्वयं को रस्सियों से बांध कर यह परिक्रमा पूरी करते हैं। पूरे पर्वत का चक्कर लगाने में एक सप्ताह से दस दिन का समय लगता है और भगवान शिव की जय-जयकार करते हुए श्रद्धालु यह परिक्रमा पूरी करते हैं। चूंकि आस-पास कोई आबादी नहीं, इसलिए श्रद्धालुओं को खुले आकाश तले भी रात बितानी पडती है और कुछ श्रद्धालु गुफाओं में जा घुसते हैं। ऐसी मान्यता भी है कि किन्नर कैलाश की यात्रा से मनोकामनाएं तो पूरी होती ही हैं, साथ ही आत्म शुद्धि भी होती है। किन्नौरी लोगों की यह भी मान्यता है कि किन्नर कैलाश ही वास्तव में स्वर्ग लोक है और यही बैठकर इन्द्र अन्य देवताओं पर राज्य करते हैं।

किन्नर कैलाश की यात्रा सतलुजऔर वास्पानदी के संगम स्थल कदछाम से आरंभ होती है। किन्नर पहुंचने का पहला पडाव पंगीगांव है। यहां तक तो किसी भी वाहन से पहुंचा जा सकता है। इसके बाद अगला पडाव है-चरंग गांव, जोकि साढे चौदह हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां से दो किलोमीटर आगे रेंगरिकटुगमा में एक बौद्ध मंदिर है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण एक लामा द्वारा एक ही रात में किया गया था। इस बौद्ध मंदिर को रांगरिक शुमाभी कहा जाता है। यहां लोग मृत आत्माओं की शान्ति के लिए दीप जलाते हैं। यह मंदिर बौद्ध व हिन्दू धर्म का संगम भी है। भगवान बुद्ध की अनेक छोटी-बडी मूर्तियों के बीच दुर्गा मां की भव्य मूर्ति भी स्थित है। तिब्बती ग्रन्थों की पाण्डु लिपियों का भी यहां अवलोकन किया जा सकता है। मंदिर की ऊपरी मंजिल में प्रागैतिहासिक काल के प्राचीन अस्त्र, शस्त्र भी सुरक्षित हैं। किन्नर कैलाश यात्रा पर निकले श्रद्धालु चरंगगांव में ही रात्रि पडाव डालते हैं। चरंगके बाद अगला पडाव लालान्ती दर्रा है, जो कि सोलह हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित है। लालान्ती दर्रा पहुंचने से पूर्व रास्ते में कई मनोहारी स्थल आते हैं और कई बेशकीमती जडी- बूटियां देखने को मिलती हैं। लालान्ती दर्रा के निकट एक झील भी है, जहां स्नान करना श्रद्धालु पुण्य समझते हैं। लालान्ती दर्रे से चरंगऔर छितकुल घाटियों का सौंदर्यवलोकन भी किया जा सकता है। यहां से आगे की यात्रा काफी थका देने वाली है। दुर्गम रास्ते में कई हिमखंड लांघने पडते हैं। कदम-कदम पर प्रकृति हमारे धैर्य की परीक्षा लेती प्रतीत होती है। किन्नर कैलाश पहुंचने से पूर्व पार्वती कुंड और एक गुफाभी आती है। यहां से शिवलिंग तक पहुंचने के लिए सीधी चढाई है।

किन्नर कैलाश को हिमाचल का बदरीनाथभी कहा जाता है और इसे रॉक कैसलके नाम से भी जाना जाता है। सर्वेक्षण मानचित्रों में भी इसका नाम रोकाकैसल अंकित किया गया है।

प्रसिद्ध भैरव मंदिर

भूतभावनभगवान भैरव की महत्ता असंदिग्ध है। भैरव आपत्तिविनाशकएवं मनोकामना पूर्ति के देवता हैं। भूत-प्रेत बाधा से मुक्ति में भी उनकी उपासना फलदायीहोती है। भैरव की लोकप्रियता का अनुमान उसी से लग सकता है कि प्राय: हर गांव के पूर्व में स्थित देवी-मंदिर में स्थापित सात पीढियों के पास में आठवीं भैरव-पिंडी भी अवश्य होती है। नगरों के देवी-मंदिरों में भी भैरव विराजमान रहते हैं। देवी प्रसन्न होने पर भैरव को आदेश देकर ही भक्तों की कार्यसिद्धि करा देती हैं। भैरव को शिव का अवतार माना गया है, अत:वे शिव-स्वरूप ही हैं-

भैरव: पूर्णरूपोहि शंकरस्यपरात्मन:।

मूढास्तेवैन जानन्तिमोहिता:शिवमायया॥

भैरव पूर्ण रूप से परात्पर शंकर ही हैं। भगवान शंकर की माया से ग्रस्त होने के फलस्वरूप मूर्ख, इस तथ्य को नहीं जान पाते। भैरव के कई रूप प्रसिद्ध हैं। उनमें विशेषत:दो अत्यंत ख्यात हैं-काल भैरव एवं बटुकभैरव या आनंद भैरव।

काल के सदृश भीषण होने के कारण इन्हें कालभैरवनाम मिला। ये कालों के काल हैं। हर प्रकार के संकट से रक्षा करने में यह सक्षम हैं। काशी का कालभैरवमंदिर सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। काशी विश्वनाथ मंदिर से कोई डेढ-दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस मंदिर का स्थापत्य ही इसकी प्राचीनता को प्रमाणित करता है। गर्भ-गृह के अंदर काल भैरव की मूर्ति स्थापित है, जिसे सदा वस्त्र से आवेष्टित रखा जाता है। मूर्ति के मूल रूप के दर्शन किसी-किसी को ही होते हैं। गर्भ-गृह से पहले बरामदे के दाहिनी ओर दोनों तरफ कुछ तांत्रिक अपने-अपने आसन पर विराजमान रहते हैं। दर्शनार्थियोंके हाथों में ये उनके रक्षार्थकाले डोरे बांधते हैं और उन्हें विशेष झाडू से आपाद मस्तक झाडते हैं। काशी के कालभैरव की महत्ता इतनी अधिक है कि जो काशी विश्वनाथ के दर्शनोपरान्त कालभैरव के दर्शन नहीं करता उसको भगवान विश्वनाथ के दर्शन का सुफल नहीं मिलता। नई दिल्ली के विनय मार्ग पर नेहरू पार्क में बटुकभैरव का पांडवकालीन मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है। यह सर्वकामानापूरक सर्वापदानाशाकहाई । रविवार भैरव का दिन है। इस दिन यहां सामान्य और विशिष्ट जनों की अपार भीड होती है। मंदिर के सामने की लम्बी सडक पर कारों की लम्बी पंक्तियां लग जाती हैं। संध्या से शाम अपितु देर रात तक पुजारी इन दर्शनार्थियोंसे निपटते रहते हैं। ऐसी भीड देश के किसी भैरव मंदिर में नहीं लगती। यह प्राचीन मूर्ति इस तरह ऊर्जावान है कि भक्तों की यहां हर सम्भव इच्छा पूर्ण होती है। इस भीड का कारण यही है। इस मूर्ति की एक विशेषता है कि यह एक कुएं के ऊपर स्थापित है। न जाने कब से, एक क्षिद्रके माध्यम से पूजा-पाठ एवं भैरव स्नान का सारा जल कुएं में जाता रहा है पर कुंआ अभी तक नहीं भरा। पुराणों के अनुसार भैरव की मिट्टी की मूर्ति बनाकर भी किसी कुएं के पास उसकी पूजा की जाय तो वह बहुत फलदायीहोती है। यही कारण है कि कुएं पर स्थापित यह भैरव उतने ऊर्जावान हैं। इन्हें भीमसेन द्वारा स्थापित बताया जाता है। नीलम की आंखों वाली यह मूर्ति जिसके पा‌र्श्व में त्रिशूल और सिर के ऊपर सत्र सुशोभित है, उतनी भारी है कि साधारण व्यक्ति उसे उठा भी नहीं सकता। पांडव-किला की रक्षा के लिए भीमसेन इस मूर्ति को काशी से ला रहे थे। भैरव ने शर्त लगा दी कि जहां जमीन पर रखे कि मैं वहां से उठूंगा ही नहीं एवं वहीं मेरा मंदिर बना कर मेरी स्थापना करनी होगी। इस स्थान पर आते-आते भीमसेन ने थक कर मूर्ति जमीन पर रख दी और फिर वह लाख प्रयासों के बावजूद उठी ही नहीं। अत:बटुकभैरव को यहीं स्थापित करना पडा।

पांडव-किला (नई दिल्ली) के भैरव भी बहुत प्रसिद्ध हैं। यहां भी खूब भीड लगती है। माना जाता है कि भैरव जब नेहरू पार्क में ही रह गए तो पांडवों की चिंता देख उन्होंने अपनी दो जटाएं दे दी। उन्हीं के ऊपर पांडव किला की भैरव मूर्ति स्थापित हुई जो आज तक वहां पूजित है।

ऊं ह्रींबटुकायआपदुद्धारणाय

कुरु कुरु बटुकायह्रीं

यही है बटुक-भैरवका मंत्र जिसका जप कहीं भी किया जा सकता है और बटुकभैरव की प्रसन्नता प्राप्त की जा सकती है। नैनीताल के समीप घोडा खाड का बटुकभैरव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है। यहां गोलू देवता के नाम से भैरव की प्रसिद्धि है। पहाडी पर स्थित एक विस्तृत प्रांगण में एक मंदिर में स्थापित इस सफेद गोल मूर्ति की पूजा के लिए नित्य अनेक भक्त आते हैं। यहां महाकाली का भी मंदिर है। भक्तों की मनोकामनाओंके साक्षी, मंदिर की लम्बी सीढियों एवं मंदिर प्रांगण में यत्र-तत्र लटके पीतल के छोटे-बडे घंटे हैं जिनकी गणना कठिन है। मंदिर के नीचे और सीढियों की बगल में पूजा-पाठ की सामग्रियां और घंटों की अनेक दुकानें हैं। बटुकभैरव की ताम्बे की अश्वारोही, छोटी-बडी मूर्तियां भी बिकती हैं जिनकी पूजा भक्त अपने घरों में करते हैं। उज्जैनके प्रसिद्ध भैरव मंदिर की चर्चा आवश्यक है। यह मनोवांक्षापूरक हैं और दूर-दूर से लोग इनके पूजन को आते हैं। उनकी एक विशेषता उल्लेखनीय है। मनोकामना पूर्ति के पश्चात् भक्त इन्हें शराब की बोतल चढाते हैं। पुजारी बोतल खोल कर उनके मुख से लगाता है और बात की बात में भक्त के समीप ही मूर्ति बोतल को खाली कर देती है। यह चमत्कार है।

हरिद्वार में भगवती मायादेवी के निकट आनंद भैरव का प्रसिद्ध मंदिर है। यहां सबकी मनोकामना पूर्ण होती है। भैरव जयंती पर यहां बहुत बडा उत्सव होता है। लोकप्रिय है भैरवकायह स्तुति गान-

कंकाल: कालशमन:कला काष्ठातनु:कवि:।

त्रिनेत्रोबहुनेत्रश्यतथा पिङ्गललोचन:।

शूलपाणि:खड्गपाणि:कंकाली धू्रमलोचन:।

अमीरुभैरवी नाथोभूतयोयोगिनी पति:।

साभार : डा. भगवती शरण मिश्र

हजारों साल पुरानी परंपरा आज भी जारी (बद्रीनाथ धाम)

दुनियाभरमें मशहूर हजारों साल पुरानी उत्तराखंडकी ऐतिहासिक और धार्मिक गाडूघडी तेल कलश शोभा यात्रा की अनोखी परंपरा आज भी परंपरागत तरीके से चल रही है। उत्तराखंडके टिहरी के नरेश के राजमहल नरेन्द्र नगर में इस कार्यक्रम की शुरुआत होती है।

सर्वप्रथम विश्व ख्याति प्राप्त बद्रीनाथ धाम के कपाट खोलने की तिथि राजमहल के राजा वर्तमान में मनुजेन्द्रशाह द्वारा घोषित की जाती है। तिथि घोषित होने के बाद महारानी वर्तमान में माला राजलक्ष्मीऔर राजमहल की कुंवारी राज कन्याओं द्वारा तिल का तेल निकालकर गाडूघडे में रखा जाता है। इस गाडूघडे को सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित किया जाता है।

भगवान् बद्री विशाल के कपाट खुलने से सोलह दिन पहले बद्रीनाथ धाम के पुजारियों का एक जत्था उनके मूल गांव डिम्मर[सिमली] से गाजेबाजे के साथ राजमहल नरेन्द्र नगर, टिहरी के लिए रवाना होता है। राजमहल पहुंचने पर पुजारियों का भव्य स्वागत एवं आदर सत्कार किया जाता है। इस जत्थे की अगुवाई डिम्मरउमट्ठापंचायत के अध्यक्ष करते हैं। इस तेल कलश शोभा यात्रा का प्रतिनिधित्व डिम्मर, उमट्ठा, रविग्राम, जोशीमठ, सिरतोली, पाखी, जयकण्डी, नाकोट, कोला डुंग्री, राइखो, मज्याणीतथा लंगासूसे आए पुजारी करते हैं।

तेल कलश यात्रा का प्रथम चरण टिहरी के राजदरबारनरेन्द्र नगर से शुरू होकर ऋषिकेश, शिवपुरी, देवप्रयागतथा कर्णप्रयागहोते हुए पुजारियों के मूलग्रामडिम्मरमें समाप्त होता है। यहां पर स्थानीय पुजारी की देखरेख में नित्य पूजा एवं भोग के विधि-विधान के साथ चौरी नामक स्थान पर तेल कलश को श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ रखा जाता है। यहीं पर 27अप्रैल तक नित्य पूजा एवं भोग की परंपरा चलती है। गाडूघडी तेल कलश यात्रा के दूसरे चरण में 28अप्रैल को डिम्मर,कर्णप्रयागके लक्ष्मी नारायण एवं खाडूदेवता के मंदिर से सुबह आठ बजे बद्रीनाथ धाम के लिए रवाना होती है।

दूसरे चरण की यात्रा प्रारंभ होकर शिमलीबाजार पहुंचने पर इस यात्रा का भव्य स्वागत एवं पूजा-अर्चना श्रृद्धालुओं द्वारा की जाती है। यहां पर से तेल कलश शोभा यात्रा कर्णप्रयागकालेश्वर, लंगासू, नन्दाप्रयागा में ठाणा, चमोली, विरही, पीपलकोटी, पाखीतथा तन्गानों आदि स्थानों से होते हुए रात्रि विश्राम के लिए जोशीमठके नृसिंह मंदिर में पहुंचती है। मार्ग में यात्रा को अल्प समय के लिए भक्तों के दर्शनार्थ रोका जाता है तथा रात में पूजा-अर्चना की जाती है।

अगले दिन प्रात:तेल कलश शोभा यात्रा श्री बद्रीनाथ जी के मुख्य पुजारी श्री रावल जी तथा शंकराचार्य की गद्दी पांडुकेशरके लिए रवाना होती है। पांडुकेशरमें रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन ३० अप्रैल को सुबह तेल कलश रावल जी शंकराचार्य की गद्दी एवं उद्धव जी की डोली के साथ अपने अंतिम पडाव भगवान् बद्री विशाल जी के लिए रवाना हो जाती है। जहां पर भगवान् बद्री विशाल के कपाट खुलने तक रात भर पूजा-अर्चना की जाती है। अगले दिन अर्थात् एक मई को भोर में भगवान् बद्रीनाथ जी के कपाट खुलने पर बद्रीनाथ जी के अभिषेक पर प्रतिदिन यह तिल का तेल उपयोग में लाया जाता है।

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

विश्व का विशालतम शिव

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रावण शिव जी का परम भक्त था। एक बार रावण ने खूब तपस्या करी और शिव जी को प्रसन्न कर दिया. वरदान स्वरुप रावण ने शिव जी से “अत्मलिंग” की मांग रखी. शिव जी ने कहा ठीक है लेकिन इसे जमीन पर मत रखना नहीं तो फ़िर वह वहां से नहीं उठेगा. रावण “अत्मलिंग” को हाथ में लिए लंका के लिए निकल पड़ा. इस लिंग के प्राप्ति पर रावण अमर और अदृश्य हो सकता था. नारद मुनि को इसकी भनक लग गई थी. वे सीधे विष्णु जी के पास पहुंचे और कहा नारायण अनर्थ होने जा रहा है.

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दुष्ट रावण भूलोक ही नहीं बल्कि देवलोक में भी हाहाकार मचायेगा. उसे रोकिये. तब तक तो रावण गोकर्ण तक पहुँच ही गया था. विष्णु ने अपना करतब दिखाया. मध्याह्न में ही सूर्य को ढँक कर संध्या का भ्रम निर्मित किया. रावण शिव जी की सांध्य पूजा किया करता था. अब वह धर्म संकट में पड़ गया. इस बीच नारद ने गणेश जी को भी पटा लिया था जिसके कारण गणेश जी स्वयं ब्राह्मण के वेश में रावण के समीप प्रकट हो गए. रावण ने उस ब्राह्मण स्वरुप गणेश जी से आग्रह किया कि वह उस अत्मलिंग को अपने हाथों में रखे ताकि वह सांध्य पूजा कर सके. ब्राह्मण ने बात मान ली परन्तु कह भी दिया कि आवश्यकता पड़ने पर तीन बार ही पुकारेगा और फ़िर उस लिंग को छोड़ कर चलता बनेगा. रावण ने “अत्मलिंग” को ब्राह्मण के हवाले कर पूजा करने निकल पड़ा. रावण के जाते ही गणेश जी ने उस लिंग को वहीं (गोकर्ण) रख दिया और अंतर्ध्यान हो गए. रावण अपनी पूजा से निपट कर जब वापस आया तो अत्मलिंग को जड़वत पाया. उसने उठाने कि भरसक कोशिश की पर सफल न हो सका. फ़िर क्रोध में आकर अत्मलिंग के अलग अलग भागों को उखाड़ कर इधर उधर फेंकने लगा. जिस वस्त्र से लिंग ढंका हुआ था वह आकर मुरुदेश्वर में गिरा और तब से एक महत्वपूर्ण शिव क्षेत्र के रूप में प्रसिद्द हुआ.

यहाँ का प्राचीन शिव मन्दिर समुद्र के किनारे कंदुकागिरी पर बना है और उसकी बनावट, शिल्प आदि से चालुक्य - कदम्ब शैलियों का मिश्रित प्रभाव परिलक्षित होता है. मन्दिर के अन्दर के शिल्प और कलात्मकता लुभावनी है. इस मन्दिर की देखरेख के लिए प्रबंधक के रूप में श्री मंजुनाथ शेट्टी अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होने स्वेच्छा से सिंडिकेट बैंक के अपने अधिकारी पद से सेवा निवृत्ति ले ली थी. यहाँ की एक विशेषता यह है कि इस मन्दिर के आस पास भीख मांगने वाले नहीं दिखेंगे. कोई भी दूकानदार पूजा सामग्री खरीदने के लिए भी आपके पीछे नहीं पड़ेगा. कुछ बच्चे जरूर घूम रहे होते हैं जो वहां के चित्रों को बेचने में लगे हैं. पाँच रुपये के दस. मन्दिर के पीछे एक पुराना किला भी है और कहा जाता है कि टीपू सुलतान ने इस किले का जीर्णोद्धार कराया था.

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मुरुदेश्वर की आज कल की प्रसिद्धि तो यहाँ के विशाल शिव जी के कारण हो गई है. यह प्रतिमा उसी कंदुका गिरी के शीर्ष पर बनी है, पुराने मन्दिर के ऊपर कुछ दायीं ओर. मूर्ति की ऊँचाई १२३ फीट है जिसके कारण दूर दूर से ही दिखाई भी देती है. शिव जी के एकदम नीचे पैरों तले एक सुरंग नुमा हाल है. यहाँ पर पौराणिक कथाओं के आधार पर झांकिया बनी हैं. रावण, गणेश जी ब्राह्मण के वेश में और ऐसी ही कथाओं से सम्बंधित अन्य प्रतिमाएँ रखी है. इनके बारे में कन्नड़ और हिन्दी में कमेंट्री चलती है. अतिरिक्त शुल्क देकर अंग्रेजी का केसेट भी लगवाया जा सकता है. यह सब अभी अभी ही किया गया है. जहाँ एक तरफ़ शिव जी की यह प्रतिमा विशालतम है वहीं इन तक आने के लिए सिंह द्वार पर राजगोपुरम जो बना है वह भी बेमिसाल है. इसकी ऊँचाई २४९ फीट है और इसके मुकाबले कोई दूसरा गोपुरम नहीं है. गोपुरम के दरवाजे पर ही दो विशाल हाथी द्वारपाल के रूप में बनाये गए हैं. इस पहाडी के तीन ओर समुद्र है जो अपेक्षाकृत शांत है. लगा हुआ बीच भी है जो साफ़ सुथरी और मनमोहक है. यहाँ नग्न या अर्ध नग्नावस्था में रेत पर लेटे रहना निषिद्ध है हलाकि विदेशी पर्यटकों की यहाँ कोई कमी नहीं है. कुछ दूरी पर रेत पर ही कई नौकाएं दिखेंगी. शाम होते होते समुद्र से आखेट कर नौकाएं वापस आती दिखती हैं. उनके वापसी पर वहां मछलियों की बिक्री भी होती देख सकते हैं.

यहाँ आस पास ही ४ होटल हैं. बगीचे से लगा हुआ एक रेस्ट हाउस है जहाँ रहने का किराया जेब पर भारी नहीं पड़ता. मन्दिर की ओर जाते समय समुद्र से सटा हुआ ‘नवीन बीच रेस्टोरेंट’ बड़ी अच्छी जगह बना है. अन्दर नाश्ता करते हुए समुद्र का नज़ारा बड़ी संतुष्टि दायक होती है.

मुरुदेश्वर में इस विश्व के सबसे ऊंचे शिव जी, भव्य राज गोपुरम, पर्यटकों के लिए सुविधाएँ आदि की व्यवस्था करने के लिए पूरा का पूरा श्रेय श्री आर.एन. शेट्टी, को जाता है जो यहाँ के एक प्रमुख उद्योगपति हैं. उन्होंने मुर्देश्वर को एक बड़े पर्यटन केन्द्र के रूप में विकासित करने के लिए ५० करोड़ रुपये की राशि लगायी थी. इन सबके आलावा मुरुदेश्वर में कुछ बहुत ही सुंदर थीम पार्क भी हैं..

मुरुदेश्वर कर्णाटक के भटकल तहसील में मुंबई - थिरुवनन्थपुरम रेल मार्ग पर पड़ता है और गाडियां यहाँ रूकती भी हैं. बीकानेर और जोधपुर से भी रेलगाडियां मिलती हैं. दिल्ली की ओर से आने के लिए कोंकण मार्ग पर जानेवाली गाड़ियों को चुना जा सकता है. गोवा से मुर्देश्वर की दूरी मात्र १६० किलोमीटर है. यहाँ से उडुपी भी नीचे १०० किलोमीटर की दूरी पर है. मुरुदेश्वर स्टेशन से मन्दिर या बीच तक के लिए ऑटोवाले २० रुपये लेते हैं। हुबली में उतरकर भी यहाँ आया जा सकता है.

साभार :
पा.ना. सुब्रमणियन

तालागाँव का रुद्र शिव (छत्तीसगढ़)

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छत्तीसगढ़ में बिलासपुर से
रायपुर जाने वाले राज मार्ग पर दक्षिण की ओर 25 कि.मी.चलने के बाद एक गाँव पड़ता है - भोजपुर. यहाँ से अमेरीकापा के लिए बाईं ओर मार्ग बना हुआ है. इसी मार्ग पर 4 कि.मी. की दूरी पर मनियारी नदी के तट पर 6वीं सदी के देवरानी जेठानी मंदिरों का भग्नावशेष है. सन 1984 के लगभग यहाँ मलवा सफाई के नाम पर उत्खनन कार्य संपन्न हुआ था. इस अभियान में एक तो जेठानी मंदिर का पूरा स्थल विन्यास प्रकट हुआ और साथ ही कई अभूतपूर्व पुरा संपदा धरती के गर्भ से प्रकट हुई थी. स्थल से प्राप्त हुए मूर्तियों के विलक्षण सौंदर्य ने संपूर्ण भारत एवं विदेशी पुरावेत्ताओं को मोहित कर लिया था. देवरानी जेठानी मंदिरों के सामने, हालाकी वे भग्नावस्था में हैं, पूरे भारत में कोई दूसरी मिसाल नहीं है.

देवरानी मंदिर के अग्र भाग में बाईं ओर से एक विलक्षण भव्य प्रतिमा प्राप्त हुई जो भारतीय शिल्पशास्त्र के लिए भी एक चुनौती बनी हुई है. किसी पुराण में भी ऐसे किसी देव या दानव का उल्लेख नहीं मिलता और ना ही ऐसी कोई प्रतिमा भारत या विदेशों में पाई गयी है. सभी विद्वान केवल अटकलें लगा रहे हैं. कुछ नाम तो इस प्रतिमा को देना ही था इसलिए रुद्र शिव कहकर संबोधित किया जा रहा है.

Devrani Temple, Talagaon

देवरानी मंदिर, तालागाँव - भग्नावशेष
इस प्रतिमा को देखने पर लगता है कि शिल्पी ने विधाता की सृष्टि में पाए जाने वाले सभी प्राणियों को मानव अवयवों में समाहित कर एक अद्भुत परिकल्पना को मूर्त रूप दिया हो. इस प्रकार की शारीरिक संरचना तो किसी राक्षस की भी नही थी. यह दैत्याकार मूर्ति लगभग ८ फीट ऊँची और ६ टन वजन की बलुआ पत्थर से निर्मित है. हमने इस प्रतिमा को सहलाकर महसूस ही नहीं किया बल्कि उसकी ऊर्जा को कुछ अंश तक ग्रहण करने का भी प्रयास किया था.
चलिए अब एक नज़र उन अवयवों पर भी डाल लें जिस के कारण यह प्रतिमा विशिष्ट बनी. सर पर देखें तो सर्पों का बोल बाला है. जैसे हम अपने कॉलर में ‘बो’ लगाते हैं वैसे ही माथे के ऊपर दो सर्पों को पगड़ी के रूप मे प्रयोग कर फनो को आपस में बाँध दिया गया है. दो बड़े बड़े नाग फन उठाए दोनो कंधों के ऊपर दिख रहे हैं. पता नहीं पूंछ का क्या हुआ. इसका चेहरा तो देखो. आँखों के ऊपर, भौं, छिपकिलियों से बनी है और एक बड़ी छिपकिली नाक की जगह है. पलकों और आँख की पुतलियों में भी लोगों को कुछ कुछ दिखाई पड़ता है. हमने घूर कर नहीं देखा, डर लगता है ना. ऊपर की ओंठ और मूछे दो मछलियों, और नीचे की ओंठ सहित ठुड्डी केकड़े से निर्मित है. दोनो भुजाएँ मगर के मुह के अंदर से निकली है या यों कहें कि कंधों की जगह मकर मुख बना है. हाथ की उंगलियों का छोर सर्प मुख से बना है.

जब शरीर के निचले ओर चलते हैं तो मानव मुखों की बहुतायत पाते हैं. छाती में स्तनो की तरह दो मूछ वाले मानव मुख हैं. पेट की जगह एक बड़ा मूछ वाला मानव मुख है. जंघाओं पर सामने की ओर दो मुस्कुराते अंजलि बद्ध मुद्रा में मानव मुख सुशोभित हैं. जंघा के अगल बगल भी दो चेहरे दिखते हैं. वहीं, और नीचे जाते हैं तो घुटनों में शेर का चेहरा बना है. क्या आपको कछुआ दिखा? दोनो पैरों के बीच देखें कछुए के मुह को लिंग की जगह स्थापित कर दिया गया है और अंडकोष की जगह दो घंटे! लटक रहे हैं. मूर्ति के बाएँ पैर की तरफ एक फन उठाया हुआ सर्प तथा ऊपर एक मानव चेहरा और दिखता है. दाहिनी ओर भी ऐसा ही रहा होगा, मूर्ति के उस तरफ का हिस्सा खंडित हो जाने के कारण गायब हो गया. कुछ विद्वानों का मत है कि पैर का निचला हिस्सा हाथी के पैरों जैसा रहा होगा जो अब खंडित हो चला है.Jethani Temple Ruins at Talagaon

जेठानी मंदिर के भग्नावशेष

क्या आपको नहीं लगता कि सृष्टि का रचयिता भी अपना सर पटक रहा होगा और कहता होगा कि हे मानव तू मुझसे भी श्रेष्ट है. लेकिन सवाल उठता है कि ऐसी प्रतिमा बनाने के पीछे शिल्पी का क्या उद्देश्य रहा होगा.

यहाँ यह बता देना आवश्यक है कि उस मूर्ति को किस अवस्था में प्राप्त किया गया था. खुदाई के समय हमने अपनी इन छोटी छोटी आँखों से देखा है कि यह भारी भरकम प्रतिमा को बक़ायदा 10 x 4 का गड्ढा खोद, नीचे पत्थर बिछा कर, दफ़नाया गया था. वह अपने आप गिर कर मिट्टी के नीचे दबी नहीं थी. गिरी होती तो अपने भार के कारण खंडित हो जाती. इसका मतलब यह हुआ कि उसे जान बूझ कर ही दफ़ना दिया गया था. पर प्रश्न उठता है क्यों? संभवतः उस मूर्ति की आवश्यकता ही नहीं रही होगी!. उन अति सुंदर मंदिरों के बनाते समय हमारे इस तथाकथित रुद्र शिव को पहरेदार की तरह खड़ा रखा गया होगा ताकि लोगों की दृष्टि ना पड़े. जब मंदिर बन गया और उद्‍घाटन भी हो गया तो फिर उस दैत्य रूपी रुद्र शिव को अलविदा कर दिया. हमारे एक मित्र जो एक वरिष्ट पुरावेत्ता हैं, का मानना है कि ऐसी एक नहीं, दो प्रतिमाएँ रही होंगी. एक अभी कहीं दबी पड़ी है.

शिवपुराण ( 6-9-14) में बताया गया है कि:

रूर दुखं दुखः हेतुम व
तद द्रवयति याः प्रुभुह
रुद्र इत्युच्यते तस्मात्
शिवः परम कारणम्

सारांश में: “रूर का तात्पर्य दुःख से है या फ़िर उसका जो कारक है. इसे नाश करने वाला ही रुद्र है जो शिव ही है”

जो बातें शिवपुराण में कही गई है उसे देख कर आभास होता है कि रुद्र में निश्चित ही वीभस्वता तो कदापि नहीं हो सकती. इसलिए जिस मूर्ति कि चर्चा हम कर रहे हैं वह रुद्र शिव तो नहीं ही है.

इस अति विशालकाय रुद्र शिव की अनुकृति को राज्य संग्रहालय, भोपाल के मुख्य द्वार पर स्थापित किया गया है

गुरुवार, 26 मार्च 2009

विश्व का एकमात्र अर्धनारीश्वर काठगढ़ महादेव

महाशिवरात्रि पर विशेष शिव पुराण की विधेश्वर संहिता के अनुसार पद्म कल्प के प्रारंभ में एक बार ब्रrा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठता का विवाद उत्पन्न हो गया और दोनों दिव्यास्त्र लेकर युद्ध हेतु उन्मुख हो उठे। यह भयंकर स्थिति देख शिव सहसा वहां आदि अनंत ज्योतिर्मय स्तंभ के रूप में प्रकट हो गए, जिससे दोनों देवताओं के दिव्यास्त्र स्वत: ही शांत हो गए।
ब्रrा और विष्णु दोनों उस स्तंभ के आदि-अंत का मूल जानने के लिए जुट गए। विष्णु शुक्र का रूप धरकर पाताल गए, मगर अंत न पा सके। ब्रrा आकाश से केतकी का फूल लेकर विष्णु के पास पहुंचे और बोले- ‘मैं स्तंभ का अंत खोज आया हूं, जिसके ऊपर यह केतकी का फूल है।’
ब्रrा का यह छल देखकर शंकर वहां प्रकट हो गए और विष्णु ने उनके चरण पकड़ लिए। तब शंकर ने कहा कि आप दोनों समान हैं। यही अग्नि तुल्य स्तंभ, काठगढ़ के रूप में जाना जाने लगा। ईशान संहिता के अनुसार इस शिवलिंग का प्रादुर्भाव फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात्रि को हुआ था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
विश्वविजेता सिकंदर ईसा से 326 वर्ष पूर्व जब पंजाब पहुंचा, तो प्रवेश से पूर्व मीरथल नामक गांव में पांच हÊार सैनिकों को खुले मैदान में विश्राम की सलाह दी। इस स्थान पर उसने देखा कि एक फ़कीर शिवलिंग की पूजा व्यस्त था।
उसने फ़कीर से कहा- ‘आप मेरे साथ यूनान चलें। मैं आपको दुनिया का हर ऐश्वर्य दूंगा।’ फ़कीर ने सिकंदर की बात को अनसुना करते हुए कहा- ‘आप थोड़ा पीछे हट जाएं और सूर्य का प्रकाश मेरे तक आने दें।’ फ़कीर की इस बात से प्रभावित होकर सिकंदर ने टीले पर काठगढ़ महादेव का मंदिर बनाने के लिए भूमि को समतल करवाया और चारदीवारी बनवाई। इस चारदीवारी के ब्यास नदी की ओर अष्टकोणीय चबूतरे बनवाए, जो आज भी यहां हैं।
रणजीत सिंह ने किया पुनरुद्धार
कहते हैं, महाराजा रणजीत सिंह ने जब गद्दी संभाली, तो पूरे राज्य के धार्मिक स्थलों का भ्रमण किया। वह जब काठगढ़ पहुंचे, तो इतना आनंदित हुए कि उन्होंने आदि शिवलिंग पर तुरंत सुंदर मंदिर बनवाया और वहां पूजा करके आगे निकले। मंदिर के पास ही बने एक कुएं का जल उन्हें इतना पसंद था कि वह हर शुभकार्य के लिए यहीं से जल मंगवाते थे।
अर्धनारीश्वर का रूप
दो भागों में विभाजित आदि शिवलिंग का अंतर ग्रहों एवं नक्षत्रों के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है और शिवरात्रि पर दोनों का ‘मिलन’ हो जाता है। यह पावन शिवलिंग अष्टकोणीय है तथा काले-भूरे रंग का है। शिव रूप में पूजे जाते शिवलिंग की ऊंचाई 7-8 फुट है जबकि पार्वती के रूप में अराध्य हिस्सा 5-6 फुट ऊंचा है।
भरत की प्रिय पूजा-स्थली
मान्यता है, त्रेता युग में भगवान राम के भाई भरत जब भी अपने ननिहाल कैकेय देश (कश्मीर) जाते थे, तो काठगढ़ में शिवलिंग की पूजा किया करते थे।
कब जाएं?
काठगढ़ महादेव के दर्शनों के लिए साल भर में कभी भी जाया जा सकता है, मगर शिवरात्रि व सावन माह में लगने वाले मेलों में जाने का विशेष महत्व है।
कैसे जाएं?
मंदिर को जाने के दो मार्ग हैं। एक मार्ग पंजाब की जम्मू-कश्मीर को लगती सीमा का प्रवेश द्वार कहे जाते पठानकोट-इंदौरा जाता है। पठानकोट से यह मंदिर छह किमी दूर है। जबकि दूसरा मार्ग जालंधर-पठानकोट राजकीय मार्ग पर मीरथल क़स्बे से चार किमी दूर है। पठानकोट रेल से भी जुड़ा हुआ है। निकटतम हवाई अड्डा राजा सांसी (अमृतसर) है।
कहां ठहरें?
काठगढ़ महादेव में ठहरने के लिए भव्य धर्मशाला है, जबकि निकटवर्ती नगर पठानकोट में होटलों व धर्मशालाओं की भरपूर व्यवस्था है।

साभार -डॉ. जवाहर धीर

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2009

आस्था का प्रतीक है महादेव शिवमंदिर [जम्मू]

रिसासी कस्बा स्थित प्राचीन महादेव शिव मंदिर के प्रति यहां के लोगों के दिलों में विशेष आस्था व अटूट विश्वास है। यहां के प्राकृतिक शिवलिंग में पड़े हुए दरार व यहां लगने वाले बैसाखी मेले की दिलचस्प कहानी है।
यहां के लोगों की मान्यता है कि इस प्राकृतिक शिवलिंग में साक्षात भगवान शंकर विराजमान हैं। शिवलिंग कितना पुराना है? इसके बारे में स्पष्ट रूप से तो कुछ नहीं कहा जा सकता है, लेकिन इस बारे में यहां एक दंत कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि इस शिवलिंग को क्षेत्र के ही गांव अगार वलिया के एक जमींदार ने सबसे पहले तब देखा था, जब इस इलाके में कोई आबादी न थी। उस समय इस इलाके में घना जंगल हुआ करता था। जमींदार ने अपने मवेशियों को चराने के लिए एक ग्वाला रखा था। जमींदार की एक गाय दूध नहीं दे रही थी, इसलिए जमींदार को ग्वाले पर शक हुआ। इसकी जांच के लिए एक दिन जमींदार ने छुपते-छुपाते ग्वाले का उस समय पीछा किया जब वह मवेशियों को चराने जा रहा था। वहां जमींदार ने देखा कि उक्त गाय अन्य मवेशियों से अलग होकर एक तरफ बढ़ गई। गाय का पीछा करने पर जमींदार ने देखा कि गाय जमीन पर उभरे एक शिवलिंग के पास खड़ी हो गई और अपने-आप उसके थन से दूध की धारा निकलकर शिवलिंग पर गिरने लगी। सारा दूध शिवलिंग पर चढ़ाने के बाद गाय वहां से वापस लौट आई। उस शाम को गाय ने जमींदार के घर इतना दूध दिया कि मानों कई दिनों का दूध एक ही समय में उतर आया। इसके बाद जमींदार रोजाना गाय का दूध ले जाकर उस शिवलिंग पर चढ़ाने लगा। शिवरात्रि के दिन वहां नीवं पत्थर रखकर जमींदार ने मंदिर का निर्माण शुरू कराया। चूना व माश की दाल के मिश्रण से दीवारें तैयार की गई। तभी एक अदभुत घटना घटी। मंदिर की दीवारें दरवाजे तक पहुंचते ही गिर जाती थी। एक रात भगवान शंकर ने उसे स्वप्न में मंदिर का मुख उत्तर दिशा की तरफ रखने को कहा। जमींदार ने ऐसा ही किया और उसके बाद काम पूरा करने में कोई अड़चन नहीं आई और पहली बैसाखी को मंदिर का निर्माण पूरा हुआ। तब से प्रत्येक वर्ष वहा पहली बैसाखी को प्रसाद बांटा जाने लगा। आहिस्ता-आहिस्ता वह मेले में रूप में बदल गया। आज भी वहां प्रत्येक वर्ष पहली बैसाखी को मेला लगता है।
बताते चले कि वजीर जोरावर सिंह के मन में विचार आया कि महादेव मंदिर की बजाय बैसाखी मेला रियासी के विजयपुर स्थित उनके किले के नजदीक लगना चाहिए। इसलिए उन्होंने बैसाखी मेला विजयपुर में लगाने के लिए इलाके में ढिंढ़ोरा पिटवा दिया। उस वर्ष मेला विजयपुर में लगा। बैसाखी की सुबह जब महादेव मंदिर में लोग पूजा-अर्चना करने पहुंचे तो यह देख हैरान रह गए कि शिवलिंग में दरार आ गई है और उसमें से खून बह रहा था। मेले की कोई रौनक यहां न दिखने पर जब उन्होंने यहां के पुजारियों से बात कि तो पुजारियों ने शिवलिंग की दरार पर मक्खन का लेप किया और आशंका जताई कि शायद यहां से मेला उठा लिए जाने के कारण भगवान शंकर को अच्छा नहीं लगा और शिवलिंग में दरार आ गई। उसी दिन वजीर के साथ कुछ अनहोनी घटनाएं होने लगी। उन्हे जब शिवलिंग में दरार आने व वहां से खून बहने की जानकारी मिली तो उन्होंने तुरंत विजयपुर से मेला उठवा कर ढोल-नगाढ़ों के साथ वापस महादेव मंदिर में मेला लगवाया। उन्होंने नंगे पांव मंदिर में जाकर क्षमा याचना की। वजीर ने चिनाब से लाए एक पत्थर को शिवलिंग से स्पर्श करा कर उसे अपने किले में शिवलिंग के रूप में स्थापित किया और उसकी पूजा-अर्चना करते रहे। इसके बाद वजीर का यश चारों ओर फैलने लगा और उन्होंने कई इलाकों पर विजय पाई। वजीर जोरावर सिंह प्रत्येक वर्ष बैसाखी के दिन महादेव मंदिर में शिवलिंग पर मक्खन का लेप कर पूजा-अर्चना में शामिल हुआ करते थे। महादेव मंदिर के शिवलिंग में आई दरार को आज भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
जुड़ी है कई चमत्कारी घटनाएं-स्थानीय महादेव मंदिर से जुड़ी कई चमत्कारी बातें सुनने को मिलती हैं। बताते है कि इस मंदिर के साथ स्थित पीपल के एक वृक्ष ने मंदिर को अपनी शाखाओं से लपेट रखा था। वृक्ष के गिरने से मंदिर को नुकसान पहुंचने की आशंका थी। अचरज की बात यह है कि एक सुबह लोग यह देख हैरान रह गए कि पीपल का वृक्ष मंदिर के समीप वाले सरोवर में ऐसे पड़ा था की मानों किसी ने बड़ी सावधानी से उठाकर उसे सरोवर में रख दिया हो।
लगभग तीन दशक पहले पुंछ के एक शिवभक्त ने मंदिर में कुछ मरम्मत कार्य कराया। उसके मन में विचार आया कि इस पवित्र शिवलिंग को उसकी सतह सहित उठा कर शिवलिंग को जमीन की सतह से कुछ ऊंचा किया जाए। इस विचार से उसने शिवलिंग के ईद-गिर्द खुदाई करानी शुरू कराई। लेकिन शिवलिंग की सतह का शायद कोई अंत नहीं था, इसलिए उसने अपना विचार छोड़कर खोदे गए स्थान को दोबारा भरवा दिया। करीब चार वर्ष पहले ग्राउंड वाटर विभाग द्वारा हैडपंप लगाने के लिए मंदिर के समीप मशीन से गहरी ड्रिलिंग की गई। इसके बाद भी पानी न मिलने से हताश कर्मियों ने जब लोगों की सलाह पर मंदिर में पूजा-अर्चना की तो थोड़े से प्रयास के बाद ही जमीन पानी निकल पड़ा। स्थानीय लोगों ने उस हैडपंप से निकलने वाले पानी को शिवगंगा नाम दिया। मंदिर के समीप स्थित कई बट वृक्ष भी लोगों के लिए पूज्यनीय है। स्थानीय लोगों का मानना है कि किसी भी कारणवश जब किसी बट वृक्ष की कोई टहनी टूटती है तो चंद रोज में ही इलाके में कोई न कोई स्वर्ग सिधार जाता है। लोगाें का यह भी कयास है कि यह स्थान योगी महात्माओं की तपोस्थली रही होगी। मंदिर के ईद-गिर्द कई योगी महात्माओं ने समाधियां ले रखी है। इसका अदभुत दृश्य कुछ वर्ष पहले तब देखने को मिला जब मंदिर को इसकी ख्याति के अनुसार बनाए जाने के लिए इसे श्राइन बोर्ड के अधीन कर दिया गया। बोर्ड द्वारा मंदिर का डीजानइन तैयार कर पीडब्ल्यूडी विभाग को इसके निर्माण का जिम्मा सौंपा गया। नए मंदिर का निर्माण शुरू हुआ तो मंदिर के इर्द-गिर्द हुई खुदाई में जमीन के भीतर बैठे हुए मुद्रा में योगी महात्माओं की कई समाधियां नजर आई। इसे वहां कई मुलाजिमों के अलावा अन्य लोगों ने भी देखा। उन्होंने कानों में बड़े-बड़े बावली कुंडल पहन रखे थे। उन समाधियों से बिना कोई छेड़छाड़ किए मंदिर के नींव व पिलर बनाने का काम पूरा कर लिया गया। लेकिन मंदिर के मुख्य द्वार के दाएं और बाएं के दो पिलर इसलिए नहीं बन पाए, क्योंकि वहां दो योगियों की समाधियां थी। इसलिए मंदिर के डिजाइन में हल्का फेरबदल कर वहां पिलर नहीं बनाए गए। उन दो समाधियों में एक की ऊपरी जमीन को कच्चा छोड़ दिया गया। वहां आज भी पूजा की जाती है ।

रविवार, 4 जनवरी 2009

बासुकीनाथ धाम (दुमका)


बासुकीनाथ
दुमका-देवघर राजमार्ग पर दुमका जिला से उत्तर पश्चिम में लगभग 25 कि0मी0 की दूरी पर अवस्थित है।यह हिन्दुओं का बड़ा ही पवित्र तीर्थस्थल है जो बासुकीनाथ प्रखंड में पड़ता है। प्रतिवर्ष श्रावण मास में देश के विभिन्न प्रदेशों से लाखों श्रद्धालु आकर भगवान शिव को जल अर्पित कर पूजा करते हैं। यह तीर्थस्थल जसीडीह जंक्शन एवं जामताड़ा स्टेशन से रेल मार्ग से जुड़ा है। वायुमार्ग द्वारा राँची या कोलकाता हवाईअड्डा से भी यहाँ पहुँचा जा सकता है।
आकर्षण का केन्द्र मसानजोर

मयुराक्षी नदी पर निर्मित मसानजोर डैम और यहां आस पास का प्राकृतिक सौन्दर्य पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र हैं। झारखंड, बिहार और प.बंगाल सहित कई राज्यों से सैलानी यहां भ्रमण करने एवं पिकनिक के उद्देश्य से आते हैं। दुमका जिला मुख्यालय से 30 कि.मी. की दूरी पर मसानजोर, दुमका-कोलकता सड़क मार्ग पर पड़ता हैं। क्षेत्र में पनबिजली एवं सिंचाई के उद्देश्य से 1951 में कनाडा सरकार द्वारा निर्मित इस डैम का शिलान्यास भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के हाथों किया गया था। डैम बनने के बाद इस क्षेत्र के लोगों को बिजली एवं सिंचाई की सुविधा मिलती हैं।

बासुकीनाथ

हरे भरे जंगलों, अनगिनत छोटी-बड़ी पहाड़ियों से भरे झारखंड प्रांत के उप राजधानी दुमका से सटे जरमुंडी प्रखंड अंतर्गत बासुकीनाथ धाम भक्तों के बीच फौजदारी दरबार के रुप में प्रसिद्ध हैं। आम तौर पर सालों भर इस अदालत में विभिन्न प्रकार के कष्टों के निवारण एवं मंगल कामना के लिए भक्तों का ताँता लगा रहता हैं। लेकिन प्रत्येक वर्ष सावन माह में यह नगरी केसरीया चोलाधारी लाखों काँवरियों से केसरीया मय रहती हैं। यहां भारत के विभिन्न प्रांतों के अलावे पड़ोसी हिन्दू धर्मावलंबी देशों नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मारीशस के अलावे पश्चिम देशों से अप्रवासी भारतीय एवं अन्य धर्मों के भी लोग पहुंचते हैं। सावन मास में तो वसुधैव कुटुम्बकम, राष्ट्रीय एकता, प्रेम, सहिष्णुता, सहयोग, सदभाव की चरम स्थिति यहां दिखती हैं।

सुम्मेश्वरनाथ मंदिर में हैं। दुर्लभ शिवलिंग

दुमका जिले के सरैयाहाट प्रखंड मुख्यालय से 11 किमी दूर धौनी गांव स्थित बाबा सुम्मेश्वर नाथ मंदिर हैं। ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्वों को संजोये इस मंदिर में शिवलिंग की पूजा होती हैं। इस मंदिर की पौराणिक कहानी महाभारत काल से संबंधित है। यह स्थल अपने प्राकृतिक खूबसूरती में बसे होने के कारण श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। घने जंगल में बसे इस मंदिर से जुड़े कई ऐतिहासिक तथ्य हैं। अति प्राचीन काल में यहां घनघोर जंगल में शुम्भ व निशुम्भ दो राक्षस भाईयों का वर्चस्व कायम था। दोनों ही शिवभक्त थे। दोनों भाईयों द्वारा ही यहां अलग- अलग शिवलिंग की स्थापना की गयी है। यह शिवलिंग आज भी जुड़वा शिवलिंग से जाना जाता है। यह पूरे देश में दुर्लभ शिवलिंग के नाम से प्रसिद्ध है।

शिव पहाड़ का नाग मंदिर

दुमका के शिव मंदिरों में शिवपहाड़ का एक विशेष ही महत्व हैं। शिवपहाड़ यहां के मनोरम स्थलों में भी एक विशेष स्थान रखता हैं। शहर के बीचो बीच स्थित पहाड़ के उपरी हिस्से में भगवान शिव का यह मंदिर लगभग सौ साल पुराना बताया जाता हैं। यहां सालों भर शिवभक्तों को बड़ी श्रद्धा के साश भगवान भोलेनाथ की पूजा अर्चना करते देखा जाता है। भगवान शिव की पूजा अर्चना के लिए सावन महीने में खासकर सोमवार के दिन तो यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती हैं।

दुमका जिले के महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल

सिरसानाथ

सिरसानाथ दुमका से महज 15 किमी की दूरी पर बारापलासी के निकट मयूराक्षी नदी के किनीरे बसा है। यहां शिव-पार्वदी जी का मंदिर है। इस मंदिर का शिवलिंग जमीन के भीतर से सर्प के रुप में बनकर बाहर निकला हैं। यहां दुमका एवं आसपास क्षेत्रों से सैकड़ो श्रद्धालु पहुंचते है।

पंचवाहिनी

यह स्थान शिकारीपाड़ा प्रखंड़ मुख्यालय के निकट ब्राह्मणी नदी से सटे जंगल में स्थित है। यहां की विशेषता यह है कि यहां एक अति प्राचीन शिव मंदिर का अवशेष मिला है, जो देखने लायक है। मंदिर अर्धनिर्मित है। पुरातत्व के दृष्टिकोण से यह स्थान काफी महत्वपूर्ण है।

गुरुवार, 1 जनवरी 2009

चमत्कारिक प्राचीन गुप्तेश्वर मंदिर (चारूवा, मध्यप्रदेश)

चारूवा स्थित चमत्कारिक प्राचीन गुप्तेश्वर मंदिर महाशिवरात्रि पर 1934 में प्रारंभ हुआ था यहाँ का विशाल मेला
भगवान भोलेनाथ की महिमा अपरंपार है। हिन्दू धर्म में माना जाता है कि भोलेनाथ कैलास पर्वत पर विराजित हैं। कैलास के स्वामी होने के कारण उनका नाम कैलासपति पड़ा। देश के प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंगों के अलावा भी अनेक स्थानों पर भगवान भोलेशंकर की आराधना पूरी श्रद्धा-भक्ति के साथ होती है। प्राचीनकाल से ही अनेक मंदिर इसके साक्षात उदाहरण हैं। भगवान शिव की आराधना भक्त अपने-अपने तरीके से करते हैं। भूतनाथ भगवान को लोग धतूरा, बिल्वपत्र, अकाव के फूल चढ़ाकर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं। कहते हैं कि भगवान भक्त की पुकार बहुत जल्द स्वीकार करते हैं। भक्त कोशिश करते हैं कि पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ भी शिवलिंग स्थापित हैं, सबके दर्शन करें और अपना जीवन पुण्यमय बनाएँ। ऐसे में भक्तों का रुझान प्राचीनकाल में स्थापित शिवमंदिरों की ओर अधिक रहता है।
ऐसा ही एक प्राचीन मंदिर है हरिपुरा में स्थापित भगवान गुप्तेश्वर का शिवलिंग। मध्यप्रदेश के हरदा जिले के ग्राम चारूवा में स्थित इस शिवमंदिर की महिमा दूर-दूर तक विख्यात है। भव्य पुरातन शैली में पत्थरों से निर्मित इस मंदिर में शिवलिंग चमत्कारिक माना जाता है। महाशिवरात्रि के अवसर पर प्रतिवर्ष यहाँ मेला लगता है। मध्यप्रदेश ही नहीं महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तरप्रदेश से यहाँ श्रद्धालु बड़ी संख्या में आते हैं। यहाँ के विशाल मंदिर के गर्भगृह में स्थापित भगवान शिव की आराधना करते हैं। महाशिवरात्रि के दिन यहाँ ज्योतिर्लिंग मंदिरों की भाँति दिनभर विशेष अभिषेक-पूजा होती है। भक्तों का ताँता सुबह से लगना शुरू हो जाता है। मंदिर प्रांगण में पीछे की ओर प्राचीन पत्थरों से निर्मित वर्गाकार भूलभुलैया संरचना भी बनी है। माना जाता है कि यह सरंचना महाभारत युद्ध के चक्रव्यूव की भाँति है। इसमें स्थित विचित्र गुत्थी को सुलझाने वाला तीव्र बुद्धिमान होता है।
उधर मेले में भी दूर-दूर से छोटे-बड़े दुकानदार भगवान भोलेनाथ के इस स्थल पर बड़ी आशा के साथ व्यापार करने आते हैं। भगवान गुप्तेश्वर का यह मेला इस वर्ष 6 मार्च से प्रारंभ हो रहा है। यह 26 मार्च तक चलेगा। मेला समिति के अध्यक्ष श्री बसंतराव शिंदे तथा गुप्तेश्वर मंदिर प्रबंध समि‍ति के अध्यक्ष श्री माँगीलाल नाहर ने बताया कि मेले में दुकानों के लिए आवंटन प्रारंभ हो गया है। मेले में विभिन्न दुकानों के अलावा दर्शकों के मनोरंजन के लिए झूले, टूरिंग टॉकीज, सर्कस, जादू के खेल आदि आते हैं। मंदिर के पीछे विशाल पशु मेला भी लगता है।
भव्य पालकी
महाशिवरात्रि पर्व पर यहाँ श्रद्धालुओं की अपार भीड़ रहती है। पावन पर्व के अवसर पर भगवान भोलेनाथ की भव्य पालकी निकाली जाती है। इस वर्ष 7 मार्च को यह पालकी निकाली जाएगी। साथ ही आकर्षक आतिशबाजी भी की जाएगी। पालकी को निहारने के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ता है। ऐसा लगता है मानो दर्शन करने की होड़ सी मची है।
1934 से जारी है मेले की परंपरा
ग्रामीण पृष्ठभूमि में लगने वाला यह मेला सन 1934 में प्रारंभ हुआ था। प्रारंभ में मात्र तीन दिनों का लगता था किंतु कालांतर में जैसे-जैसे इसकी प्रसिद्धि बढ़ती गई, मेला अवधि भी बढ़ती गई और अब 21 दिन हो गई है।
कैसे जाएँ हरिपुरा का गुप्तेश्वर मंदिर ग्राम चारूवा में स्थित है। यहाँ जाने के लिए मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से खंडवा जाने वाली बड़ी रेललाइन पर हरदा के आगे खिरकिया स्टेशन उतरना पड़ता है। खिरकिया से मात्र 8 किलोमीटर दूर स्थित गुप्तेश्वर मंदिर जाने के लिए अनेक साधन टेम्पो, टैक्सी, बसें उपलब्ध हैं। सड़क मार्ग से जाने के लिए खंडवा-होशंगाबाद रोड पर स्थित छीपाबड़ (खिरकिया) से मात्र 7 किलोमीटर है। जिला मुख्यालय हरदा से इसकी दूरी करीब 36 किलोमीटर है।

सोमवार, 29 दिसंबर 2008

महाशिवरात्रि पर सात रंग बदलता है शिवलिंग (खटीमा, ऊधमसिंहनगर)

चकरपुर स्थित ऐतिहासिक बनखंडी महादेव शिवमंदिर का शिवलिंग महाशिवरात्रि पर्व पर सात रंग बदलता है। इसके दर्शन से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती है। इसी आस्था व विश्वास के चलते ही शिवरात्रि पर मंदिर में मत्था टेकने वालों भक्तों का सैलाब उमड़ता है। आसपास क्षेत्रों के साथ ही पड़ोसी देश नेपाल के लोग भी जलाभिषेक करने यहां पहुंचते है।

इस शिव मंदिर के बारे में कई मान्यताएं प्रचलित है। बताया जाता है कि इस मंदिर की स्थापना थारु जनजाति द्वारा वर्ष 1830 में की गई थी। शिव भक्तों द्वारा एक शिवलिंग को नर्मदा से चकरपुर क्षेत्र के गांव नौगंवनाथ में स्थापित करने के लिए ले जाया जा रहा था। इसी दौरान यह शिवलिंग जंगल के रास्ते में गिर गया। जब लोग नौगांवनाथ गांव पहुंचे तो शिवलिंग को न पाकर भौचक्के रह गए। बताते हैं कि बाद में गांव वासियों ने शिवलिंग की खोजबीन शुरू कर दी। जिस जगह पर शिव मंदिर स्थापित है। वहां गांव वालों को शिवलिंग पड़ा हुआ मिला। लोगों ने जब शिवलिंग को उठाने की कोशिश की तो वह उठने के बजाए जमीन में और धंसने लगा। नौगंवानाथ में जहां शिवलिंग को स्थापित करने के लिए भूमि चयन की गई थी। वहां गुरु गोरखनाथ मंदिर की स्थापना की गई। इस मंदिर के बारे में यह बताया जाता है कि चकरपुर क्षेत्र में रहने वाले थारु जनजाति के एक किसान की गाय पास के ही जंगल में चरने जाती थी। एक स्थान पर खड़ी होकर वह खुद ही दूध देने लगती थी। यह विचित्र समाचार पाते ही एक दिन लोगाें ने गाय का पीछा किया तो वह यह नजारा देखकर हैरत में पड़ गए। उस स्थान की सफाई करने पर वहां एक शिवलिंग दिखाई पड़ा। धीरे-धीरे लोगों ने इस शिवलिंग की पूजा शुरू कर दी। महाशिवरात्रि पर लाखों लोग यहां शीश नवांने आते है। बताया जाता है कि जब रोहिणी नक्षत्र में शिवरात्रि पड़ती है तो यह शिवलिंग सात रंग बदलता है। मंदिर के पुजारी बाबा पुष्कर गिरी बताते है कि उन्होंने स्वयं शिवलिंग के तीन रूप देखे है।

पौराणिक मान्यताओ के विपरीत पूर्ण खण्डित गोतमेश्वर महादेव की होती है पूजा

रतलाम से लगभग सौ किमी दूर राजस्थान सीमा मे अरनोद नामक स्थान पर एक ऐसा अति प्राचीन धार्मिक स्थल है जिसके बारे मे बहुत कम लोग जानते है। वह है गौतमेश्वर महादेव का मदिर | हिन्दू धर्म शास्त्रो मे खण्डित देवी देवताओ की प्रतिमाओं, खंडित शिवलिंगों एवं तस्वीरों का पूजन वर्जित माना गया है पौराणिक मान्यताओं के अनुसार खंडित देवी देवताओं की प्रतिमाओं को विसर्जित कर प्रथा है | किन्तु संभवतः विश्व मे एक मात्र ऐसी जगह सिर्फ गौतमेश्वर महादेव है जिनके दो भागों मे विभाजित एवं पूर्ण रुप से खण्डित शिवलिंग की पूजा अर्चना होती है आराधना होती है। दूर दूर से यहाँ भक्तों का तांता लगा रहता है | इस पूजा अर्चना के पीछे छिपे तथ्यो एवं रोचक जानकारी को जानने के पहले हम आपकों बताना चाहेंगे कि राजस्थान की सीमा मे प्रतापगढ रोड पर खतरनाक घाटीयों में लगभग एक हजार से ग्यारह सो फीट नीचे, सुरम्य प्राकृतिक हरीयाली के बीच विराजित हैं, गौतमेश्वर महादेव | इस मंदिर के बारे मे मान्यता है कि गौहत्या के साथ अन्य जीव हत्या का पाप लगने पर यदि समाज द्वारा किसी व्यक्ति को समाज या जाति से अलग कर दिया जाता है तो यहां स्थित मोक्षदायीनी कुण्ड मे स्नान करने के पश्चात उस व्यक्ति को मंदिर के पुजारी द्वारा पाप मुक्ति का प्रमाण पत्र दिया जाता है क्योंकि सप्तऋषियों में से एक गौतम ऋषी पर लगा गौहत्या का कलंक भी यही मिटा था। यह भी मान्यता है कि इस कुण्ड मे स्नान करने पर यदि आपके शरीर से लाल पानी टपके तो मान लें कि आपके पाप धुल गये है |

क्या है गोतमेश्वर महादेव का इतिहास और क्या है खण्डित शिवलिंग से जुडी कथा :- वेसे तो गोतमेश्वर महादेव के साथ कई कहानियां जुडी हुई है सप्तऋषियों मे एक ऋषी गौतम ऋषी थे, उन्हे वरदान था कि वे कभी किसी को भूखा नही मरने देंगे। एक बार नासिक त्र्यंबकेश्वर मे घनघोर अकाल पडा इस दौरान 88 हजार के करीब साधु संतो को भोजन कराने की जबाबदारी गौतम ऋषी पर आयी वे एक मुठ्ठी अनाज रोज उगाते और उससे साधु संतो सहित पूरे क्षेत्र के लोगो का पेट भरने योग्य अन्न उत्पन्न हो जाता था, यह अकाल 12 साल तक चला तत्पश्चात वहां पर बारीश हुई और खुशहाली छा गई। एक समय सभी साधु संतो ने वहां से जाने का मन बनाया किंतु वे गौतम ऋषी को छोडकर जाये तो केसे जाये गौतम ऋषी ने उनकी मंशा के समझते हुए एक मायावी गाय की रचना की और उसे लहलहाते खेतों मे छोड दिया सुबह जब गाय फसलों को नष्ट करते हुए विचर रही थी तब गौतम ऋषी ने एक कंकर उठाकर उस गाय को मारा मायावी गाय तुरंत मर गई। तत्पश्चात गौतम ऋषी पर गौहत्या का पाप लगा और यह आरोप लगाते हुए सभी साधु संत वहां से चले गये। गौतम ऋषी गौहत्या के कलंक को लेकर पूर्व से पश्चिम इस स्थान पर आये यहां पर उन्होने घनघोर तपस्या की और जब शिवजी प्रकट हुए तो उन्होने उनसे वरदान मांगा कि उन पर लगा गौहत्या का पाप तो हटे ही साथ ही भोलेनाथ स्वयं यहां पर विराजित हो जाएँ और पापियों को मोक्ष प्रदान करें । जिसके बाद भगवान् शंकर यहां पर विराजित हुए और गोतमेश्वर के नाम से जाने गये। गौतम ऋषी पर गौहत्या के पाप के चलते यह शाप था कि वे सूर्य को नही देख पाते थे भोलेनाथ के आर्शीवाद से यहां एक मोक्षदायी कुण्ड उत्पन्न हुआ जिसमें स्नान करते ही गौतम ऋषी पर लगा गौहत्या का कलंक धुल गया और आकाश मे से उन्हे सूर्य की रोशनी दिखाई देने लगी और उनको दिखने वाला अंधेरा वहां से हट गया। तभी से इस स्थान गौतमेश्वर महादेव के नाम से जाना जाने लगा और तभी से यहाँ विशेष् रुप से पूजा अर्चना की जाती है |
प्राचीनकाल की परम्पराओं के अनुसार गौह्त्या के दोषियों को धर्म, जात और समाज से बेदखल कर दिया जाता था | और यदि गौहत्या का दोषी यहाँ के कुण्ड में स्नान कर लेते तो उन्हें समाज में पुनः स्थान मिल जाता | इन्ही पौराणिक मान्यताओं के अनुसार आज भी सैकडों लोग यहां अपने पापों को धोकर मोक्ष प्राप्ति की कामना के लिए आते है आज भी गौहत्या सहित जीव हत्या आदि के आरोपों से मुक्ति के लिए दर्शनार्थियों को यहाँ स्थित कुण्ड मे स्नान के पश्चात एक प्रमाण पत्र दिया जाता है जो इस बात का प्रमाण होता है कि वे पापमुक्त हो गये है इसके अलावा चट्टानों मे स्थापित गोतमेश्वर महादेव का गुम्बदनुमा शिखर है जिसे गदा कहा जाता है और ऐसी मान्यता है कि इस गदा के चारों और लोट लगाने से सभी असाध्य रोग ठीक हो जाते है।
क्या है खण्डित शिवलिंग की कहानी :- मोहम्मद गजनबी जब सभी हिन्दू मंदिरों पर आक्रमण करते हुए यहां पहुंचा तो उसने गोतमेश्वर महादेव शिवलिंग को भी खंडित करने का प्रयास किया । प्राचीन कथाओं के अनुसार शिवलिंग पर प्रहार करने पर भोलेनाथ ने अपना चमत्कार दिखाने के लिए पहले तो शिवलिंग से दूध की धारा छोडी, दुसरे प्रहार पर उसमे से दही की धारा निकली और जब गजनवी ने तीसरा प्रहार शिवलिंग पर किया तो भोलेनाथ क्रुध हो गये इसके पश्चात शिवलिंग से एक आंधी की तरह मधुमखियों का झुंड निकला जिसने गजनवी सहित उसकी पुरी सेना को परास्त किया। यहां पर गजनवी ने भोले की शक्ति का स्वीकारते हुए शीश नवाया मंदिर का पुन: निर्माण करवाया और एक शिलालेख भी लगाया कि यदि कोई मुसलमान हमला करेगा या बुरी नजर से देखेगा तो वह सुअर की हत्या का दोषी होगा, इसी प्रकार यदि कोई हिन्दू इस मंदिर पर बुरी नजर डालेगा या नुकसान पहुंचाने की कोशीश करेगा तो वह गौहत्या का भागी बनेगा। आज भी यह शिलालेख यहाँ मौजूद है और उस पर सुअर तथा गाय का चित्र भी बना हुआ है।

साभार : अमित निगम, रतलाम

गुफाओं में मिले अद्भुत शिवलिंग (ऊधमपुर)

इन दिनों भोले के भक्तों को शहर से करीब 60 किलोमीटर दूर मजालता तहसील की खून पंचायत में भगवान शिव का वह रूप देखने को मिल रहा है, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। खून पंचायत के गांव जखैन स्थित तीन गुफाओं में भगवान शंकर की मुखाकृति वाले चार अनोखे शिवलिंग व चार मूर्तियों वाली एक शिला मिली है। लोग इसे मौजूदा हालात में भोले शंकर की कृपा बता रहे हैं। इन अद्भुत शिवलिंगों की पूजा-अर्चना करने के लिए अब यहां लोगों की भीड़ जुटने लगी है।

गांववासियों ने बताया कि करीब तीन महीने पहले थैयाल गांव में रहने वाले शिवभक्त मास्टर अनिल को सपने में भोले शंकर ने दर्शन देकर कहा था कि वह जखैन गांव कीएक पहाड़ी पर जाकर वहां मिट्टी की खुदाई कराए तो वहां उसे भगवान की सौगात मिलेगी। अनिल ने दूसरे दिन ही गांववासियों के साथ जाकर वहां खुदाई का काम शुरू कर दिया।

खुदाई के दौरान सबसे पहले एक गुफा मिली जिसमें भगवान शिव का चार मुख वाला शिवलिंग रखा हुआ था। इसके बाद उन्होंने वहां लगातार एक महीने तक खुदाई जारी रखी। इस दौरान मिली कुल तीन गुफाओं में उन्हें चार मुख वाले तीन और एक मुख वाला एक शिवलिंग मिला। इसके अलावा एक शिला पर चार मूर्तियां भी मिलीं। एक मुख वाले शिवलिंग की ऊंचाई करीब ढाई फीट है जबकि अन्य तीनों शिवलिंगों की ऊंचाई लगभग एक फुट है। जुगल सिंह, अजय सिंह, राहुल सम्याल व केवल सिंह ने बताया कि उन्होंने कभी भी अपने पुरखों के मुंह से यहां इस तरह के शिवलिंगों के बारे में नहीं सुना था। उनका मानना है कि यहां शायद पांडवों के समय के शिवलिंग व गुफाएं हैं। उन्होंने बताया कि शिवलिंग मिलने की जानकारी फैलने के बाद से यहां काफी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। गांववासियों ने प्रशासन से यहां पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की है।

महाभारत कालीन शिवलिंग (चम्‍बल)

चम्‍बल की विरासत-महाभारत कालीन शिवलिंग by SANJAY GUPTA (MANDIL) GWALIOR TIMES MORENA BUREAU.
मुरैना जिला में स्थित यह दुर्लभ एंतिहासिक महाभारत कालीन शिवलिंग है । इसी शिवलिंग की पूजा पाण्‍डवों की मॉं महारानी कुन्‍ती और कुन्‍तलपुर का राजपरिवार करता था । इसी स्‍थान पर सूर्य का रथ उतरा था, इस मन्दिर के ठीक नीचे आसन नदी बह रही है, जिसमें कर्ण को प्रवाहित किया गया था । यह असल शिवलिंग बनवाट और आकृति में भी विलक्षण व अदभुत है, लिंग पर स्थित सभी चिहन इस पर स्‍पष्‍ट होकर यह अपनी कहानी खुद ही बयां करता है । यह मन्दिर मुगलों के हमले से भी और खण्‍डन से भी अछूता रहा है ।

दहताल के बीचोबीच पानी में सैदनाथ का अद्भुत शिवलिंग (बलिया उत्तर प्रदेश)

भगवान सैदनाथ के अद्भुत शिवलिंग के दर्शन पूजन से लोगों की मनोकामनायें पूर्ण होती हैं। यह शिवलिंग तहसील मुख्यालय से पश्चिम व उत्तर में दहताल के उस पार सैदपुरा शिवालय में स्थित है। इस सम्बंध में यहां के बुजुर्गो का कहना है कि दहताल पर पुल नहीं होने के कारण इस क्षेत्र में लोगों का आने का एक मात्र साधन नाव से दहताल को पार करके ही आना पड़ता था और यह क्षेत्र वनों से आक्षादित था बहुत पहले इस क्षेत्र के जमींदार ब्राह्माण परिवार के मुखिया ने इस शिवलिंग को बनों के बीच देखा और अद्भुत लगने वाले पत्थर के शिवलिंग को खोदवाकर कहीं अन्यत्र स्थापित कराने के विचार से खोदवाना शुरू कर दिया। खुदाई होती रही लेकिन उसका मूल नहीं पता लगा। एक रात जमींदार ब्राह्माण को रात में स्वप्न में आया कि बेकार परेशान न हों हमें इसी बन में ही रहने दो। तब से अबतक छोटा सा मंदिर बनाकर सैदनाथ मंदिर पर श्रद्धालु पूजा करते आ रहे हैं। धीरे-धीरे भगवान शिव के मंदिर पर आस्था भारी पड़ी और आस्थावानों की भीड़ लगी रहती है। जो भी मन्नत मानी जाती है सैदनाथ महादेव पूर्ण भी करते हैं। यहां माह में पूर्ण होने वालों का हरिकीर्तन होता रहता है। इसका ताजा उदाहरण कोड़र निवासी कैलाश मल्लाह है। किसी बात को लेकर सैदनाथ महादेव मंदिर में गये जहां वह मंदिर की दीवार से चिपक रहे वहीं 30 जुलाई 1990 को मंदिर के पास असंख्य सर्प दिखे जो मंदिर की परिक्रमा कर फिर अंतरध्यान हो गये।

इस क्षेत्र में शिवालयों की अधिकता है और सरयू एवं गंगा के मध्य जाने वाले मार्गो पर नाथ मंदिरों की एक लम्बी श्रृंखला है उन्हीं श्रृंखला में सैदनाथ मंदिर, मझोस में मझोसनाथ, राजपुर में अवनीनाथ, दिउली में बालखण्डीनाथ, छितौनी में छितेश्वरनाथ, असेगा शोकहरण नाथ जो नाथ मंदिरों के घेरा में स्थापित हैं। यहां सावन में पूजन करने से लोगों की मनोकामना पूर्ण होती है। सैदनाथ मंदिर के क्षेत्र को रमणीक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की बात भी स्थानीय लोगों द्वारा उठायी जाती रही है, कारण कि प्रसिद्ध ताल दहताल इस मंदिर के चारों तरफ घेरे है और इस दहताल के सम्बंध में जानकार लोगों का कहना है कि गोखर जैसा ताल है जिसका पानी कभी प्रदूषित अब तक नहीं हुआ।

रविवार, 28 दिसंबर 2008

पांच कोस की काशी है ज्योतिर्लिग

काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी है। काशी के अधिपति भगवान विश्वनाथ कहते हैं-इदं मम प्रियंक्षेत्रं पञ्चक्रोशीपरीमितम्। पांच कोस तक विस्तृत यह क्षेत्र (काशी) मुझे अत्यंत प्रिय है। पतितपावनीकाशी में स्थित विश्वेश्वर (विश्वनाथ) ज्योतिर्लिगसनातनकाल से हिंदुओं के लिए परम आराध्य है, किंतु जनसाधारण इस तथ्य से प्राय: अनभिज्ञ ही है कि यह ज्योतिर्लिगपांच कोस तक विस्तार लिए हुए है- पञ्चक्रोशात्मकं लिङ्गंज्योतिरूपंसनातनम्।ज्ञानरूपा पञ्चक्रोशात् मकयह पुण्यक्षेत्र काशी के नाम से भी जाना जाता है-ज्ञानरूपा तुकाशीयं पञ्चक्रोशपरिमिता। पद्मपुराणमें लिखा है कि सृष्टि के प्रारंभ में जिस ज्योतिर्लिगका ब्रह्मा और विष्णुजीने दर्शन किया, उसे ही वेद और संसार में काशी नाम से पुकारा गया-

यल्लिङ्गंदृष्टवन्तौहि नारायणपितामहौ।

तदेवलोकेवेदेचकाशीतिपरिगीयते॥

पांच कोस की काशी चैतन्यरूपहै। इसलिए यह प्रलय के समय भी नष्ट नहीं होती। प्राचीन ब्रह्मवैक्‌र्त्तपुराणमें इस संदर्भ में स्पष्ट उल्लेख है कि अमर ऋषिगण प्रलयकालमें श्री सनातन महाविष्णुसे पूछते हैं-हे भगवन्!वह छत्र के आकार की ज्योति जल के ऊपर कैसे प्रकाशित है, जो प्रलय के समय पृथ्वी के डूबने पर भी नहीं डूबती? महाविष्णुजी बोले-हे ऋषियों! लिंगरूपधारीसदाशिवमहादेव का हमने (सृष्टि के आरम्भ में) तीनों लोकों के कल्याण के लिए जब स्मरण किया, तब वे शम्भु एक बित्ता परिमाण के लिंग-रूप में हमारे हृदय से बाहर आए और फिर वे बढते हुए अतिशय वृद्धि के साथ पांच कोस के हो गए-

लिङ्गरूपधर:शम्भुहर्दयाद्बहिरागत:।

महतींवृद्धिमासाद्य पञ्चक्रोशात्मकोऽभवत्॥

यह काशी वही पंचक्रोशात्मकज्योतिर्लिगहै। काशीरहस्य के दूसरे अध्याय में यह कथानक मिलता है।

स्कन्दपुराणके काशीखण्डमें स्वयं भगवान शिव यह घोषणा करते हैं-अविमुक्तं महत्क्षेत्रं पञ्चक्रोशपरिमितम्।

ज्योतिर्लिङ्गम्तदेकंहि ज्ञेयंविश्वेश्वराऽभिधम्।।

पांच कोस परिमाण का अविमुक्त (काशी) नामक जो महाक्षेत्रहै, उस सम्पूर्ण पंचक्रोशात्मकक्षेत्र को विश्वेश्वर नामक एक ज्योतिर्लिङ्गही मानें। इसी कारण काशी प्रलय होने पर भी नष्ट नहीं होती। काशीखण्डमें भगवान शंकर पांच कोस की पूरी काशी में बाबा विश्वनाथ का वास बताते हैं-

एकदेशस्थितमपियथा मार्तण्डमण्डलम्।

दृश्यतेसवर्गसर्वै:काश्यांविश्वेश्वरस्तथा॥

जैसे सूर्यदेव एक जगह स्थित होने पर भी सबको दिखाई देते हैं, वैसे ही संपूर्ण काशी में सर्वत्र बाबा विश्वनाथ का ही दर्शन होता है।

स्वयं विश्वेश्वर (विश्वनाथ) भी पांच कोस की अपनी पुरी (काशी) को अपना ही रूप कहते हैं- पञ्चक्रोश्या परिमितातनुरेषापुरी मम। काशी की सीमा के विषय में शास्त्रों का कथन है-असी- वरणयोर्मध्ये पञ्चक्रोशमहत्तरम। असी और वरुणा नदियों के मध्य स्थित पांच कोस के क्षेत्र (काशी) की बडी महिमा है। महादेव माता पार्वती से काशी का इस प्रकार गुणगान करते हैं-सर्वक्षेत्रेषु भूपृष्ठेकाशीक्षेत्रंचमेवपु:।

भूलोक के समस्त क्षेत्रों में काशी साक्षात् मेरा शरीर है।

पञ्चक्रोशात् मकज्योतिर्लिग-स्वरूपाकाशी सम्पूर्ण विश्व के स्वामी श्री विश्वनाथ का निवास-स्थान होने से भव-बंधन से मुक्तिदायिनीहै। धर्मग्रन्थों में कहा भी गया है-काशी मरणान्मुक्ति:।काशी की परिक्रमा करने से सम्पूर्ण पृथ्वी की प्रदक्षिणा का पुण्यफलप्राप्त होता है। भक्त सब पापों से मुक्त होकर पवित्र हो जाता है। तीन पंचक्रोशी-परिक्रमाकरने वाले के जन्म-जन्मान्तर के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। काशीवासियोंको कम से कम वर्ष में एक बार पंचकोसी-परिक्रमाअवश्य करनी चाहिए क्योंकि अन्य स्थानों पर किए गए पाप तो काशी की तीर्थयात्रा से उत्पन्न पुण्याग्निमें भस्म हो जाते हैं, परन्तु काशी में हुए पाप का नाश केवल पंचकोसी-प्रदक्षिणा से ही संभव है। काशी में सदाचार-संयम के साथ धर्म का पालन करना चाहिए। यह पर्यटन की नहीं वरन् तीर्थाटन की पावन स्थली है।

वस्तुत:काशी और विश्वेश्वर ज्योतिर्लिगमें तत्त्‍‌वत:कोई भेद नहीं है। नि:संदेह सम्पूर्ण काशी ही बाबा विश्वनाथ का स्वरूप है। काशी-महात्म्य में ऋषियों का उद्घोष है-काशी सर्वाऽपिविश्वेशरूपिणीनात्रसंशय:। अतएव काशी को विश्वनाथजीका रूप मानने में कोई संशय न करें और भक्ति-भाव से नित्य जप करें-शिव: काशी शिव: काशी, काशी काशी शिव: शिव:।

ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी तिथि (निर्जला एकादशी) के दिन श्री काशीविश्वनाथकी वार्षिक कलश-यात्रा वाराणसी में बडी धूमधाम एवं श्रद्धा के साथ आयोजित होती है, जिसमें बाबा का पंचमहानदियोंके जल से अभिषेक होता है।

जागेश्वर धाम के प्राचीन मंदिर हैं अध्यात्म का संगम (देहरादून)

उत्तराखंड के अल्मोडा से 35किलोमीटर दूर स्थित केंद्र जागेश्वर धाम के प्राचीन मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस क्षेत्र को सदियों से आध्यात्मिक जीवंतताप्रदान कर रहे हैं। यहां लगभग 250मंदिर हैं जिनमें से एक ही स्थान पर छोटे-बडे 224मंदिर स्थित हैं।

उत्तर भारत में गुप्त साम्राज्य के दौरान हिमालय की पहाडियोंके कुमाऊं क्षेत्र में कत्यूरीराजा थे। जागेश्वर मंदिरों का निर्माण भी उसी काल में हुआ। इसी कारण मंदिरों में गुप्त साम्राज्य की झलक भी दिखलाई पडती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार इन मंदिरों के निर्माण की अवधि को तीन कालों में बांटा गया है। कत्यरीकाल, उत्तर कत्यूरीकाल एवं चंद्र काल। बर्फानी आंचल पर बसे हुए कुमाऊं के इन साहसी राजाओं ने अपनी अनूठी कृतियों से देवदार के घने जंगल के मध्य बसे जागेश्वर में ही नहीं वरन् पूरे अल्मोडा जिले में चार सौ से अधिक मंदिरों का निर्माण किया जिसमें से जागेश्वर में ही लगभग 250छोटे-बडे मंदिर हैं। मंदिरों का निर्माण लकडी तथा सीमेंट की जगह पत्थर की बडी-बडी स्लैबों से किया गया है। दरवाजों की चौखटें देवी देवताओं की प्रतिमाओं से अलंकृत हैं। मंदिरों के निर्माण में तांबे की चादरों और देवदार की लकडी का भी प्रयोग किया गया है।

जागेश्वर को पुराणों में हाटकेश्वरऔर भू-राजस्व लेखा में पट्टी पारूणके नाम से जाना जाता है। पतित पावन जटागंगाके तट पर समुद्रतल से लगभग पांच हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित पवित्र जागेश्वर की नैसर्गिक सुंदरता अतुलनीय है। कुदरत ने इस स्थल पर अपने अनमोल खजाने से खूबसूरती जी भर कर लुटाई है। लोक विश्वास और लिंग पुराण के अनुसार जागेश्वर संसार के पालनहारभगवान विष्णु द्वारा स्थापित बारह ज्योतिर्लिगोंमें से एक है।

पुराणों के अनुसार शिवजी तथा सप्तऋषियोंने यहां तपस्या की थी। कहा जाता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई मन्नतें उसी रूप में स्वीकार हो जाती थीं जिसका भारी दुरुपयोग हो रहा था। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य जागेश्वर आए और उन्होंने महामृत्युंजयमें स्थापित शिवलिंगको कीलित करके इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। शंकराचार्य जी द्वारा कीलित किए जाने के बाद से अब यहां दूसरों के लिए बुरी कामना करने वालों की मनोकामनाएंपूरी नहीं होती केवल यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएंही पूरी हो सकती हैं।

नागचंद्रेश्वर मंदिर में सर्पशैय्या पर आसीन है शिव परिवार उज्जैन।देश के बारह ज्योतिर्लिगोंमें प्रमुख प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर के शीर्ष पर स्थित नागच

उज्जैन।देश के बारह ज्योतिर्लिगोंमें प्रमुख प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर के शीर्ष पर स्थित नागचंद्रेश्वरमंदिर में देवाधिदेव भगवान शिव की एक ऐसी विलक्षण प्रतिमा है, जिसमें वह अपने पूरे परिवार के साथ सर्प सिंहासन पर आसीन है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार सर्प भगवान शिव का कंठाहारऔर भगवान विष्णु का आसन है लेकिन यह विश्व का संभवत:एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान शिव, माता पार्वती एवं उनके पुत्र गणेशजीको सर्प सिंहासन पर आसीन दर्शाया गया है। वर्ष में केवल एक दिन नागपंचमी पर इस मंदिर के पट 24घंटे के लिए खुलते है और इस दौरान दूरदराज से आने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड उमड पडती है। शनिवार को नागपंचमी का पर्व होने की वजह से शुक्रवार की मध्यरात्रि से ही इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शनों के लिए भक्तों की कतार लगने का सिलसिला आरंभ हो जाएगा।

महाकाल भक्त मंडल के अध्यक्ष एवं महाकालेश्वर मंदिर के पुजारी पंडित रमण त्रिवेदी ने बताया कि पौराणिक मान्यता के अनुसार सर्पोके राजा तक्षक ने भगवान शंकर की यहां घनघोर तपस्या की थी। तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए और तक्षक को अमरत्व का वरदान दिया। ऐसा माना जाता है कि उसके बाद से तक्षक नाग यहां विराजितहै, जिस पर शिव और उनका परिवार आसीन है। एकादशमुखीनाग सिंहासन पर बैठे भगवान शिव के हाथ-पांव और गले में सर्प लिपटे हुए है।

इस अत्यंत प्राचीन मंदिर का परमार राजा भोज ने एक हजार और 1050ईस्वी के बीच पुनर्निर्माण कराया था। 1732में तत्कालीन ग्वालियर रियासत के राणाजीसिंधिया ने उज्जयिनीके धार्मिक वैभव को पुन:स्थापित करने के भागीरथी प्रयास के तहत महाकालेश्वर मंदिर का जीर्णाेद्धार कराया। प्रतिवर्ष श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी के दिन नागपंचमी का पर्व पडता है और इस दिन नाग की पूजा की जाती है।

इस दिन कालसर्पयोग की शांति के लिए यहां विशेष पूजा के आयोजन भी होते है। श्री महाकाल ज्योतिष अनुसंधान केंद्र के संचालक और ज्योतिषाचार्य पंडित कृपाशंकर व्यास ने बताया कि नागचन्द्रेश्वरमंदिर दुनिया में अपनी तरह का एक ही मंदिर है।उन्होने कहा कि यहां पूजा-पाठ का विशेष महत्व है।

शिवलिंग के दो हिस्सों की पूजा

द्राक्षारामम, आंध्र प्रदेश। ये वो ही जगह है जहां शिवलिंग के दो हिस्सों की पूजा होती है। यहां शिवलिंग के एक हिस्से की पूजा पहली मंजिल पर होती है और दूसरे हिस्से की पूजा दूसरी मंजिल पर। ये शिवलिंग दो भागों में कैसे बंटा इसके पीछे भी एक बड़ी कहानी है। महाभारत काल में इस जगह पर वेद व्यास ने भी महाशिवलिंग की पूजा की थी। इस जगह पर शिव की पूजा का फल उतना ही होता है जितना वाराणसी के विश्वनाथ की पूजा से।कहते हैं कि किसी वजह से शिव पूजा के लिए वेद व्यास वाराणसी नहीं जा सके इसलिए वो पूजा के लिए इस जगह पर चले आए।

सामर्लकोटा में भी है ऐसा शिवलिंग

सामर्लकोटा। द्राक्षारामम, आंध्र प्रदेश से थोड़ी ही दूरी पर ईस्ट गोदावरी में ही सामर्लकोटा नाम की एक जगह है जहां ठीक ऐसे ही शिवलिंग की पूजा होती है। वहां भी शिवलिंग की दो भागों में पूजा होती है। पांच जगहों पर गिरे शिव का ये दूसरा लिंग है। लेकिन द्राक्षारामा वाले शिवलिंग की विशेषता ये है कि वहां पर सभी देवताओं ने पूजा अर्चना की थी। सभी सूर्य और चंद्रमा समेत सभी देवगण इस जगह पर शिवलिंग की पूजा के लिए आए थे और तब जाकर इस शिवलिंग की वृद्धि रुकी थी। सभी देवगणों की पूजा के बाद शांत होने वाला शिवलिंग का ये इकलौता मंदिर है। सामर्लकोटा का शिवलिंग की पूजा भी दो भागों में होती है। लेकिन इसे शांत करने के लिए खुद शिव के पुत्र कार्तिकेय ने पूजा की थी। दरअसल, हुआ ये कि द्राक्षाराम का शिवलिंग देव पूजा के बाद तो शांत हो गया लेकिन इसके बाद सामर्लकोटा के ये लिंग बढ़ने लगा। इसे शांत करने के लिए कार्तिकेय यहां आए और शिवलिंग की विधिवत पूजा की।