- शिव - कल्याण स्वरूप
- महेश्वर - माया के अधीश्वर
- शम्भू - आनंद स्स्वरूप वाले
- पिनाकी - पिनाक धनुष धारण करने वाले
- शशिशेखर - सिर पर चंद्रमा धारण करने वाले
- वामदेव - अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले
- विरूपाक्ष - भौंडी आँख वाले
- कपर्दी - जटाजूट धारण करने वाले
- नीललोहित - नीले और लाल रंग वाले
- शंकर - सबका कल्याण करने वाले
- शूलपाणी - हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले
- खटवांगी - खटिया का एक पाया रखने वाले
- विष्णुवल्लभ - भगवान विष्णु के अतिप्रेमी
- शिपिविष्ट - सितुहा में प्रवेश करने वाले
- अंबिकानाथ - भगवति के पति
- श्रीकण्ठ - सुंदर कण्ठ वाले
- भक्तवत्सल - भक्तों को अत्यंत स्नेह करने वाले
- भव - संसार के रूप में प्रकट होने वाले
- शर्व - कष्टों को नष्ट करने वाले
- त्रिलोकेश - तीनों लोकों के स्वामी
- शितिकण्ठ - सफेद कण्ठ वाले
- शिवाप्रिय - पार्वती के प्रिय
- उग्र - अत्यंत उग्र रूप वाले
- कपाली - कपाल धारण करने वाले
- कामारी - कामदेव के शत्रु
- अंधकारसुरसूदन - अंधक दैत्य को मारने वाले
- गंगाधर - गंगा जी को धारण करने वाले
- ललाटाक्ष - ललाट में आँख वाले
- कालकाल - काल के भी काल
- कृपानिधि - करूणा की खान
- भीम - भयंकर रूप वाले
- परशुहस्त - हाथ में फरसा धारण करने वाले
- मृगपाणी - हाथ में हिरण धारण करने वाले
- जटाधर - जटा रखने वाले
- कैलाशवासी - कैलाश के निवासी
- कवची - कवच धारण करने वाले
- कठोर - अत्यन्त मजबूत देह वाले
- त्रिपुरांतक - त्रिपुरासुर को मारने वाले
- वृषांक - बैल के चिह्न वाली झंडा वाले
- वृषभारूढ़ - बैल की सवारी वाले
- भस्मोद्धूलितविग्रह - सारे शरीर में भस्म लगाने वाले
- सामप्रिय - सामगान से प्रेम करने वाले
- स्वरमयी - सातों स्वरों में निवास करने वाले
- त्रयीमूर्ति - वेदरूपी विग्रह करने वाले
- अनीश्वर - जिसका और कोई मालिक नहीं है
- सर्वज्ञ - सब कुछ जानने वाले
- परमात्मा - सबका अपना आपा
- सोमसूर्याग्निलोचन - चंद्र, सूर्य और अग्निरूपी आँख वाले
- हवि - आहूति रूपी द्रव्य वाले
- यज्ञमय - यज्ञस्वरूप वाले
- सोम - उमा के सहित रूप वाले
- पंचवक्त्र - पांच मुख वाले
- सदाशिव - नित्य कल्याण रूप वाले
- विश्वेश्वर - सारे विश्व के ईश्वर
- वीरभद्र - बहादुर होते हुए भी शांत रूप वाले
- गणनाथ - गणों के स्वामी
- प्रजापति - प्रजाओं का पालन करने वाले
- हिरण्यरेता - स्वर्ण तेज वाले
- दुर्धुर्ष - किसी से नहीं दबने वाले
- गिरीश - पहाड़ों के मालिक
- गिरिश - कैलाश पर्वत पर सोने वाले
- अनघ - पापरहित
- भुजंगभूषण - साँप के आभूषण वाले
- भर्ग - पापों को भूंज देने वाले
- गिरिधन्वा - मेरू पर्वत को धनुष बनाने वाले
- गिरिप्रिय - पर्वत प्रेमी
- कृत्तिवासा - गजचर्म पहनने वाले
- पुराराति - पुरों का नाश करने वाले
- भगवान् - सर्वसमर्थ षड्ऐश्वर्य संपन्न
- प्रमथाधिप - प्रमथगणों के अधिपति
- मृत्युंजय - मृत्यु को जीतने वाले
- सूक्ष्मतनु - सूक्ष्म शरीर वाले
- जगद्व्यापी - जगत् में व्याप्त होकर रहने वाले
- जगद्गुरू - जगत् के गुरू
- व्योमकेश - आकाश रूपी बाल वाले
- महासेनजनक - कार्तिकेय के पिता
- चारुविक्रम - सुन्दर पराक्रम वाले
- रूद्र - भक्तों के दुख देखकर रोने वाले
- भूतपति - भूतप्रेत या पंचभूतों के स्वामी
- स्थाणु - स्पंदन रहित कूटस्थ रूप वाले
- अहिर्बुध्न्य - कुण्डलिनी को धारण करने वाले
- दिगम्बर - नग्न, आकाशरूपी वस्त्र वाले
- अष्टमूर्ति - आठ रूप वाले
- अनेकात्मा - अनेक रूप धारण करने वाले
- सात्त्विक - सत्व गुण वाले
- शुद्धविग्रह - शुद्धमूर्ति वाले
- शाश्वत - नित्य रहने वाले
- खण्डपरशु - टूटा हुआ फरसा धारण करने वाले
- अज - जन्म रहित
- पाशविमोचन - बंधन से छुड़ाने वाले
- मृड - सुखस्वरूप वाले
- पशुपति - पशुओं के मालिक
- देव - स्वयं प्रकाश रूप
- महादेव - देवों के भी देव
- अव्यय - खर्च होने पर भी न घटने वाले
- हरि - विष्णुस्वरूप
- पूषदन्तभित् - पूषा के दांत उखाड़ने वाले
- अव्यग्र - कभी भी व्यथित न होने वाले
- दक्षाध्वरहर - दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले
- हर - पापों व तापों को हरने वाले
- भगनेत्रभिद् - भग देवता की आंख फोड़ने वाले
- अव्यक्त - इंद्रियों के सामने प्रकट न होने वाले
- सहस्राक्ष - अनंत आँख वाले
- सहस्रपाद - अनंत पैर वाले
- अपवर्गप्रद - कैवल्य मोक्ष देने वाले
- अनंत - देशकालवस्तुरूपी परिछेद से रहित
- तारक - सबको तारने वाला
- परमेश्वर - सबसे परे ईश्वर
सोमवार, 27 अप्रैल 2009
भगवान शिव के १०८ नाम
बुधवार, 22 अप्रैल 2009
नर्मदा का हर कंकर शंकर
पुण्याकनखलेगंगा कुरुक्षेत्रेसरस्वती।
ग्रामेवायदि वारण्येपुण्यासर्वत्र नर्मदा।
त्रिभि:सारस्वतंपुण्यंसप्ताहेनतुयामुनम्।
सद्य:पुनातिगाङ्गेयंदर्शनादेवनर्मदाम्।
गंगा हरिद्वार तथा सरस्वती कुरुक्षेत्र में अत्यंत पुण्यमयीकही गयी है, किंतु नर्मदा चाहें गांव के बगल से बह रही हो या जंगल के बीच, वे सर्वत्र पुण्यमयीहैं। सरस्वती का जल तीन दिनों में, यमुनाजीका एक सप्ताह में तथा गंगाजीका जल स्पर्श करते ही पवित्र कर देता है किन्तु नर्मदा का जल केवल दर्शन मात्र से पावन कर देता है।
पुराणों में पुरुरवातथा हिरण्यतेजाके तप से नर्मदा जी के पृथ्वी पर पधारने की कथा का विस्तार से वर्णन है। भूलोक में भगवती नर्मदा का आगमन इनकी कठोर तपस्या के फलस्वरूप ही हुआ। स्कन्दपुराणका रेवाखण्डइस संदर्भ में पर्याप्त प्रकाश डालता है। वह स्थान अतिपवित्रहै, जहां नर्मदा जी विद्यमान हैं। नर्मदा के तट पर जहां कहीं भी स्नान, दान, जप, होम, वेद-पाठ, पितृ-तर्पण, देवाराधन, मंत्रोपदेश, सन्यास-ग्रहण और देह-त्याग आदि जो कुछ भी किया जाता है, उसका अनंत फल होता है। माघ, वैशाख अथवा कार्तिक की पूर्णिमा, विषुवयोग, संक्रान्तिकाल, व्यतिपातएवं वैधृतियोग, तिथि की वृद्धि अथवा क्षय (हानि), मन्वादि, युगादि, कल्पादितिथियों में नर्मदा का सेवन अक्षय पुण्य प्रदान करता है। नर्मदा में स्नान से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और अश्वमेध जो यज्ञ का फल प्राप्त होता है। प्रात:काल उठकर नर्मदा का कीर्तन करता है, उसका सात जन्मों का किया हुआ पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है। नर्मदा के जल से तर्पण करने पर पितरोंको तृप्ति और सद्गति प्राप्त होती है।
स्कन्दपुराणके अनुसार नर्मदा का पहला अवतरण आदिकल्पके सत्ययुग में हुआ था। दूसरा अवतरण दक्षसावर्णिमन्वन्तर में हुआ। तीसरा अवतरण राजा पुरुरवाद्वारा वैष्णव मन्वन्तर में हुआ। नर्मदा में स्नान करने, गोता लगाने, उसका जल पीने तथा नर्मदा का स्मरण एवं कीर्तन करने से अनेक जन्मों के घोर पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। नर्मदा समस्त सरिताओं में श्रेष्ठ है। वे सम्पूर्ण जगत् को तारने के लिये ही धरा पर अवतीर्ण हुई हैं। इनकी कृपा से भोग और मोक्ष, दोनो सुलभ हो जाते हैं।
धर्मग्रन्थों में नर्मदा में प्राप्त होने वाले बाणलिंग (नर्मदेश्वर)की बडी महिमा बतायी गई है। नर्मदेश्वर (बाणलिंग) को स्वयंसिद्ध शिवलिंगमाना गया है। इनकी प्राण-प्रतिष्ठा नहीं होती। आवाहन किए बिना इनका पूजन सीधे किया जा सकता है। कल्याण के शिवपुराणांक में वर्तमान श्रीविश्वेश्वर-लिंगको बाणलिङ्गबताया गया है। मेरुतंत्रके चतुर्दश पटल में स्पष्ट लिखा है कि नर्मदेश्वरके ऊपर चढे हुए सामान को ग्रहण किया जा सकता है। शिव-निर्माल्य के रूप उसका परित्याग नहीं किया जाता। बाणलिङ्ग (नर्मदेश्वर) के ऊपर निवेदित नैवेद्य को प्रसाद की तरह खाया जा सकता है। इस प्रकार नर्मदेश्वरगृहस्थोंके लिए सर्वश्रेष्ठ शिवलिंगहै। नर्मदा का बाणलिङ्गभुक्ति और मुक्ति, दोनों देता है।
आचार्यो का निर्देश है कि नर्मदा से बाणलिङ्गप्राप्त करने के उपरांत पहले उसकी ग्राह्यताकी परीक्षा करें। सर्वप्रथम बाणलिङ्गको चावल से ठीक प्रकार से तौलें। हाथ में लेने के बाद दोबारा पुन:तौलने पर यदि बाणलिङ्गहलका ठहरे तो वह गृहस्थोंके लिए पूजनीय होगा। कई बार तौलने पर भी यदि वजन बिल्कुल बराबर निकले तो उस लिङ्गको नर्मदा जी में विसर्जितकर दें। यदि बाणलिङ्गतौल में भारी सिद्ध हो तो वह उदासीनोंके लिए उपयुक्त रहेगा। तौल में कमी-बेशी ही बाणलिङ्गकी प्रमुख पहचान है। नर्मदा के नर्मदेश्वरअपने विशिष्ट गुणों के कारण शिव-भक्तों के परम आराध्य हैं।
भगवती नर्मदा की उपासना युगों से होती आ रही हैं। मेरुतंत्रमें नर्मदा देवी के निम्न मंत्र का उल्लेख है-
ऐं श्रींमेकल-कन्यायैसोमोद्भवायैदेवापगायैनम:।
इस मंत्र के ऋषि भृगु, छन्द अमित और देवता नर्मदा हैं। उनके अधिदैविक स्वरूप का ध्यान इस प्रकार करें-
कनकाभांकच्छपस्थांत्रिनेत्रांबहुभूषणां।
पद्माभय:सुधाकुम्भ:वराद्यान्विभ्रतींकरै:।
मंत्र के पुरश्चरण में एक लाख जप करने का विधान निर्दिष्ट है। तत्पश्चात् दशांश होम, तर्पणादिसविधि करें। इस मंत्र की साधना से विद्यार्थी विद्या और ज्ञान, धनार्थी सुख-समृद्धि रोगी स्वास्थ्य, पुत्रार्थी पुत्र तथा मोक्षार्थीभव-बंधन से मुक्ति पा जाता है।
पद्मपुराणके स्वर्गखण्डमें देवर्षिनारद भगवती नर्मदा की स्तुति करते हुए कहते हैं-
नम: पुण्यजलेआद्येनम: सागरगामिनि।
नमोऽस्तुतेऋषिगणै:शंकरदेहनि:सृते।
नमोऽस्तुतेधर्मभृतेवराननेनमोऽस्तुतेदेवगणैकवन्दिते।
नमोऽस्तुतेसर्वपवित्रपावनेनमोऽस्तुतेसर्वजगत्सुपूजिते।
पुण्यसलिला नर्मदा तुम सब नदियों में प्रधान हो, तुम्हें नमस्कार है। सागरगामिनीतुमको प्रणाम है। ऋषि-मुनियों द्वारा पूजित तथा भगवान शंकर की देह से प्रकट हुई नर्मदेतुम्हें बारंबार नमस्कार है। सुमुखितुम धर्म को धारण करने वाली हो, तुम्हें प्रणाम है। देवगण तुम्हारे समक्ष मस्तक झुकाते हैं, तुम्हें नमस्कार है। देवि तुम समस्त पवित्र वस्तुओं को भी परम पावन बनाने वाली हो, सारा संसार तुम्हारी पूजा करता है, तुम्हें बारंबार नमस्कार है।
नर्मदा जी का जितना भी गुण-गान किया जाए कम ही होगा। इनका हर कंकर शंकर की तरह पूजा जाता है। नर्मदा का स्वच्छ निर्मल जल पृथ्वी का मानों अमृत ही है। माघ मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को शास्त्रों में नर्मदा जयंती कहा गया है।
साभार : डा. अतुल टण्डन
साक्षात् ब्रह्म का प्रतीक है शिवलिङ्ग
शिवलिंगकी अर्चना अनादिकालसे जगद्व्यापकहै। संसार के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में लिंगोपासना की चर्चा मिलती है। शुक्लयजुर्वेदकी रुद्राष्टाध्यायीके द्वारा शिवार्चन एवं रुद्राभिषेक करने से समस्त कामनाएं पूर्ण होती हैं तथा अन्त में सद्गति भी प्राप्त होती है। रुद्रहृदयोपनिषद्का स्पष्ट कथन है-
सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका:।
अर्थात् शिव और रुद्र सर्वदेवमयहोने से ब्रह्म के ही पर्यायवाची शब्द हैं। प्राय: सभी पुराणों में शिवलिंगके पूजन का उल्लेख और माहात्म्य मिलता है। हिन्दू साहित्य में जहाँ कहीं भी शिवोपासनाका वर्णन है, वहाँ शिवलिंगकी महिमा का गुण-गान अवश्य हुआ है।
लिंग शब्द का साधारण अर्थ चिह्न अथवा लक्षण है। सांख्य दर्शन में प्रकृति को, प्रकृति से विकृति को भी लिंग कहते हैं। देव-चिह्न के अर्थ में लिंग शब्द भगवान सदाशिवके निर्गुण- निराकार रूप शिवलिंग के संदर्भ में ही प्रयुक्त होता है। स्कन्दपुराणमें लिंग की ब्रह्मपरकव्याख्या इस प्रकार की गई है-
आकाशं लिङ्गमित्याहु:पृथ्वी तस्यपीठिका।
आलय: सर्वदेवानांलयनाल्लिङ्गमुच्यते॥
आकाश लिंग है और पृथ्वी उसकी पीठिका है। इस लिंग में समस्त देवताओं का वास है। सम्पूर्ण सृष्टि का इसमें लय होता है, इसीलिए इसे लिंग कहते हैं।
शिवपुराणमें लिंग शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए कहा गया है-
लिङ्गमर्थ हि पुरुषंशिवंगमयतीत्यद:।
शिव-शक्त्योश्च चिह्नस्यमेलनंलिङ्गमुच्यते॥
अर्थात् शिव-शक्ति के चिह्नोंका सम्मिलित स्वरूप ही शिवलिंगहै। इस प्रकार लिंग में सृष्टि के जनक की अर्चना होती है। लिंग परमपुरुष सदाशिवका बोधक है। इस प्रकार यह विदित होता है कि लिंग का प्रथम अर्थ ज्ञापकअर्थात् प्रकट करने वाला हुआ, क्योंकि इसी के व्यक्त होने से सृष्टि की उत्पत्ति हुई। दूसरा अर्थ आलय है अर्थात् यह प्राणियों का परम कारण है और निवास-स्थान है। तीसरा अर्थ यह है कि प्रलय के समय सब कुछ जिसमें लय हो जाए वह लिंग है। समस्त देवताओं का वास होने से यह लिंग सर्वदेवमयहै। लिंग के आधार रूप में जो तीन मेखलायुक्तवेदिका है, वह भग रूप में कही जाने वाली जगद्धात्री महाशक्ति है। अत:आधार सहित लिंग जगत् का कारण है, उमा-महेश स्वरूप लिंग और वेदी के समायोग में भगवान शंकर के अर्धनारीश्वररूप के ही दर्शन होते हैं। सृष्टि के समय परमपुरुष सदाशिवअपने ही अर्धागसे प्रकृति (शक्ति) को पृथक कर उसके माध्यम से समस्त सृष्टि की उत्पत्ति करते हैं। इस प्रकार शिव- शक्ति का लिंग-योनिभाव और अर्द्धनारीश्वर भाव मूलत:एक ही है। सृष्टि के बीज को देने वाले परमलिंगरूपश्रीशिवजब अपनी प्रकृतिरूपाशक्ति (योनि) से आधार-आधेय की भाँति संयुक्त होते हैं, तभी सृष्टि की उत्पत्ति होती है, अन्यथा नहीं। श्रीमद्भगवद्गीताके 14वें अध्याय के तीसरे श्लोक से इस तथ्य की पुष्टि होती है-
मम योनिर्महद्ब्रह्मतस्मिन्गर्भदधाम्यहम्।
ंभवत:सर्वभूतानांततोभवतिभारत॥
भगवान कहते हैं- महद्ब्रह्म(महान प्रकृति) मेरी योनि है, जिसमें मैं बीज देकर गर्भ का संचार करता हूँ और इसी से सम्पूर्ण सृष्टि (सब भूतों) की उत्पत्ति होती है। वस्तुत:अनादि सदाशिव-लिंगऔर अनादि प्रकृति-योनि के संयोग से ही सारी सृष्टि उत्पन्न होती है। इस दोनों के बिना सृष्टि की संरचना संभव नहीं है। शिवलिंग (परमपुरुष) जगदम्बारूपीजलहरीसे वेष्टित होने से प्रकृतिसंस्पृष्टपुरुषोत्तम है-
पीठमम्बामयं सर्वशिवलिङ्गंचचिन्मयम्।
अत: इसे जड समझना उचित न होगा। लिंगपुराणमें लिंगोद्भवकी कथा है। सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा और विष्णु के मध्य एक बार यह विवाद हो गया कि उन दोनों में कौन श्रेष्ठ है? इतने में उन्हें एक वृहत् ज्योतिर्लिगदिखाई दिया। उसके मूल और परिमाण का पता लगाने के लिए ब्रह्मा ऊपर गए और विष्णु नीचे, किंतु दोनों को उस लिंग के आदि-अन्त का पता न चला। तभी वेद ने प्रकट होकर उन्हें समझाया कि प्रणव (ॐ) में अ कार ब्रह्मा है, उ कार विष्णु है और म कार महेश है। म कार ही बीज है और वही बीज लिंगरूपसे सबका परम कारण है। लिंगपुराणशिवलिंगको त्रिदेवमयऔर शिव-शक्ति का संयुक्त स्वरूप घोषित करता है-
मूले ब्रह्मा तथा मध्येविष्णुस्त्रिभुवनेश्वर:।
रुद्रोपरिमहादेव: प्रणवाख्य:सदाशिव:॥
लिङ्गवेदीमहादेवी लिङ्गसाक्षान्महेश्वर:।
तयो:सम्पूजनान्नित्यंदेवी देवश्चपूजितो॥
शिवलिंगके मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा शीर्ष में शंकर हैं। प्रणव (ॐ) स्वरूप होने से सदाशिवमहादेव कहलाते हैं। शिवलिंगप्रणव का रूप होने से साक्षात् ब्रह्म ही है। लिंग महेश्वर और उसकी वेदी महादेवी होने से लिगांचर्नके द्वारा शिव-शिक्त दोनों की पूजा स्वत:सम्पन्न हो जाती है। भगवान सदाशिवस्वयं लिंगार्चन की प्रशंसा करते हैं-
लोकं लिङ्गात्मकंज्ञात्वालिङ्गेयोऽर्चयतेहि माम्।
न मेतस्मात्प्रियतर:प्रियोवाविद्यतेक्वचित्॥
जो भक्त संसार के मूल कारण महाचैतन्यलिंग की अर्चना करता है तथा लोक को लिंगात्मकजानकर लिंग-पूजा में तत्पर रहता है, मुझे उससे अधिक प्रिय अन्य कोई नर नहीं है।
वस्तुत:शिवलिंगसाक्षात् ब्रह्म का ही प्रतिरूप है। इस तथ्य को जान लेने पर साधक को शिवलिंगमें ब्रह्म का साक्षात्कार अवश्य होता है।
मंगलवार, 21 अप्रैल 2009
जय जगदीश्वर जय परमेश्वर
गौरी सुताय ॐ नम ॐ
लम्बोदराय ॐ नम ॐ ( गौरी)
विघ्नेश्वराय ॐ नम ॐ
विश्वेश्वराय ॐ नम ॐ
शंकर गुरु जय शंकर गुरु
शंकर भगवत्पद शंकर गुरु ( शंकर)
अपार महिमा शंकर गुरु
दया सागर शंकर गुरु
गुरुदेव गुरुदेव सद्गुरु नाथ गुरु देव
लिंगोत्भवकर लिंगेश्वर
परमेश्वर मम पाहि प्रभो
पाहि प्रभो मम पाहि विभो
बोलो बोलो सब मिल बोलो ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
जूट जटा में गंगा धारी
त्रिशूल धारी डमरू बजावे
डम डम डम डमरू बाजे
गूंज उठा, ॐ नमः शिवाय
ॐ नम शिवाय, ॐ नमः शिवाय, ॐ नम शिवाय
गंगा धर शिव गौरी शिव
शम्भो शंकर साम्ब शिव ( गंगा)
जय जगदीश्वर जय परमेश्वर
जगदाधार जगदीश्वर
विश्वाधर विश्वेश्वर
शम्भो शंकर साम्ब शिव
चंद्र शेखराय नम ॐ
गंगाधराय नम ॐ
ॐ नम शिवाय नम ॐ
हर हर हराय नम ॐ
शिव शिव शिवाय नम ॐ
सायीश्वराय नम ॐ
शिव शम्भो शम्भो शिव शम्भो महादेव
हरि ॐ नमः शिवाय
हरि ॐ नमः शिवाय( हरि ॐ)
हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ नमः शिवाय
हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ नमः शिवाय
शंकर शिव शंकर शिव शंकर शम्भो
शंकर शिव शंकर शिव शम्भो महादेव ( शंकर)
डम डम डमरु बाजे शंकर घन घन घंटा बाजे
हर भोले नाथ शम्भो शंकर साईं नाथ शम्भो
शंकर साम्ब शिव हर हर
शंकर साम्ब शिव जय जय ( शंकर)
गंगा जटाधर गौरी महेश
चंद्र कलाधर हे परमेश
कैलासवास काशी पते
करुणा सागर गौरी पते
गंगा जटाधर गौरी शंकर गिरिजा मनरमण
जय मृत्युंजय महादेव महेश्वर मनग शुभ चरण
नंदी वाहन नाग भूषण
निरुपम गुणसदन
नटनमनोहर नील कण्ठ हर
नीरजदल नयन
ॐ शिव ॐ शिव परात्पर शिव ओंकार शिव तव शरणं
नमामि शंकर भजामि शंकर
उमामहेश्वर तव शरणं ( ॐ)
गौरी शंकर शम्भो शंकर साम्ब सदाशिव तव शरणं
शिव शंकर पार्वती रमण
गंगाधर भुवन धारण
शरणागत वंदित शरण
करुणाकर भवभय हरण
नन्दीश्वर हे नटराज
नंदात्मज हरि नारायण
नागभरण नमः शिवाय
नादस्वरूप नमो नमो
शम्भो महादेव मल्लिकार्जुन
मंगल चरण त्रिलोचन
शुभ मंगल चरण त्रिलोचन
पिनाकधारी पार्वतीरमण
भवभय हरण सनातन
पार्वतीरमण पतितपावन
शिव शम्भो शम्भो शिव शम्भो महादेव
हर हर महादेव शिव शम्भो महादेव
हल हल धर शम्भो अनाथ नाथ शम्भो
हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ नमः शिवाय
गंगाधर शिव गौरी शिव
शम्भो शंकर साम्ब शिव ( गंगा)
जय जगदीश्वर जय परमेश्वर
हे जगदीश जगदीश्वर
विश्वाधार विश्वेश्वर
शम्भो शंकर साम्ब शिव
भोले नाथ का विराट स्वरूप
शिव भारतीय धर्म, संस्कृति, दर्शन ज्ञान को संजीवनी प्रदान करने वाले हैं। इसी कारण अनादि काल से भारतीय धर्म साधना में निराकार रूप में शिवलिंग की व साकार रूप में शिवमूर्ति की पूजा होती है। शिवलिंग को सृष्टि की सर्वव्यापकता का प्रतीक माना जाता है। भारत में भगवान शिव के अनेक ज्योतिलिंग सोमनाथ, विश्वनाथ, त्र्यम्बकेश्वर, वैधनाथस नागेश्वर, रामेश्वर, घुवमेश्वर हैं। ये देश के विभिन्न हिस्सों उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम में स्थित हैं, जो महादेव की व्यापकता को प्रकट करते हैं शिव को उदार ह्रदय अर्थात् भोले भंडारी कहा जाता है। कहते हैं ये थोङी सी पूजा-अर्चना से ही प्रसन्न हो जाते हैं। अतः इनके भक्तों की संख्या भारत ही नहीं विदेशों तक फैली है। यूनानी, रोमन, चीनी, जापानी संस्कृतियों में भी शिव की पूजा व शिवलिंगों के प्रमाण मिले हैं। भगवान शिव का महामृत्जुंजय मंत्र पृथ्वी के प्रत्येक प्राणी को दीर्घायु, समृद्धि, शांति, सुख प्रदान करता रहा है और चिरकाल तक करता रहेगा। भगवान शिव की महिमा प्रत्येक भारतीय से जूङा है। मानव जाति की उत्पत्ति भी भगवान शिव से मानी जाती है। अतः भगवान शिव के स्वरूप को जानना प्रत्येक मानव के लिए जरूरी है।
जटाएं- शिव को अंतरिक्ष का देवता कहते हैं, अतः आकाश उनकी जटा का स्वरूप है, जटाएं वायुमंडल का प्रतीक हैं।
1चंद्र- चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन भोला, निर्मल, पवित्र, सशक्त है, उनका विवेक सदा जाग्रत रहता है। शिव का चंद्रमा उज्जवल है।
त्रिनेत्र- शिव को त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव के ये तीन नेत्र सत्व, रज, तम तीन गुणों, भूत, वर्तमान, भविष्य, तीन कालों स्वर्ग, मृत्यु पाताल तीन लोकों का प्रतीक है।
सर्पों का हार- सर्प जैसा क्रूर व हिसंक जीव महाकाल के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक वृत्ति का जीव है, जिसे शिव ने अपने अधीन कर रखा है।
त्रिशूल- शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशुल सृष्टि में मानव भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है।
डमरू- शिव के एक हाथ में डमरू है जिसे वे तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्म रुप है।
मुंडमाला- शिव के गले में मुंडमाला है जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में कर रखा है।
छाल- शिव के शरीर पर व्याघ्र चर्म है, व्याघ्र हिंसा व अंहकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा व अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है।
भस्म- शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से करते हैं। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है शरीर नश्वरता का प्रतीक है।
वृषभ- शिव का वाहन वृषभ है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ का अर्थ है, धर्म महादेव इस चार पैर वाले बैल की सवारी करते है अर्थात् धर्म, अर्थ, काम मोक्ष उनके अधीन है। सार रूप में शिव का रूप विराट और अनंत है, शिव की महिमा अपरम्पार है। ओंकार में ही सारी सृष्टि समायी हुई है।
सोमवार, 29 दिसंबर 2008
हम क्यों मानते हैं ईश्वर को
वास्तव में, भिन्न-भिन्न नामों से पुकारे जाने वाले ईश्वर एक ही हैं, जिनकी उपस्थिति के प्रति हम अपना विश्वास प्रकट करने के लिए उनकी वंदना करते हैं। उनकी वंदना करने का एक माध्यम अध्यात्म भी है। सच तो यह है कि परमात्मा तक पहुंचने का बाहरी मार्ग धर्म यानी भक्ति है। वहीं ध्यान के जरिए परमात्मा तक पहुंचने का भीतरी मार्ग अध्यात्म है। हम ईश्वर तक कैसे, किस मार्ग से पहुंचते हैं यह मुख्य नहीं, मुख्य है उन तक पहुंचना। लेकिन सवाल यह उठता है कि मनुष्य ईश्वर को क्यों मानता है? क्या ईश्वर को मानना उसकी जरूरत है या मजबूरी? उसका भय है या विश्वास? उसकी श्रद्धा है या लोभ? व्यक्ति के ईश्वर के प्रति आस्था के पीछे कौन-सी मनोवैज्ञानिक वजह अधिक प्रभावी होती है, यह शोध का विषय है। ईश्वर का स्वरूप
अलग-अलग व्यक्तियों के लिए ईश्वर का स्वरूप भी अलग-अलग ही होता है।
कोई ईश्वर को साकार रूप में मानता है, तो कोई निराकार रूप में। किसी के लिए ईश्वर मंदिरों एवं मूर्तियों में बसते हैं, तो किसी के लिए मन-मंदिर एवं दूसरों की सेवा में।
किसी के लिए जीवन ही परमात्मा है, तो किसी के लिए आस-पास मौजूद प्रकृति परमात्मा के समान है। कोई उन तक पहुंचने के लिए भजन-कीर्तन या धार्मिक कर्मकांडों का सहारा लेता है, तो कोई ध्यान एवं योग का। कारण और ढंग भले ही अलग-अलग हो, लेकिन यह सच है कि लोग ईश्वर को किसी न किसी रूप में मानते जरूर हैं। ईश्वर को मानने का चलन सदियों नहीं, युगों पुराना है। ईश्वर एक रहस्य
ईश्वर को मानने के पीछे न केवल धार्मिक कारण हैं, बल्कि कई मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं। आज मनुष्य चाहे जितनी भी तरक्की कर ले, वह ईश्वर के रहस्यों को नहीं जान पाया है। वे इनसान के लिए आज भी एक चुनौती के समान हैं।
इनसान का विज्ञान आज भी आत्मा-परमात्मा, जन्म-मृत्यु के रहस्यों को लांघ नहीं पाया है। लेकिन यह सौ प्रतिशत सही नहीं है कि ईश्वर को मानने के पीछे उसका शक्तिशाली होना या रहस्यमयी होना ही एकमात्र कारण है। कुछ लोग भगवान को प्रेम वश भी चाहते हैं। वे ईश्वर को मानते ही इसीलिए हैं, क्योंकि वे उन्हें जान गए हैं। ईश्वर अब उनके लिए कोई रहस्य नहीं रहे। सरल है ईश्वर को मानना
इनसान ईश्वर को क्यों मानता है? क्योंकि मानने के अलावा, इनसान के पास और कोई चारा भी नहीं है। जब हम किसी चीज को मान लेते हैं, तो खोज करने के श्रम से खुद-ब-खुद बच जाते हैं। व्यक्ति सदा मेहनत से बचता रहा है। वह इस बात को भी जानने का प्रयास नहीं करना चाहता कि यह जीवन क्या है? क्यों है? यह सृष्टि किसने बनाई? वह बस मान लेता है, क्योंकि यही उसके लिए सरल है। ईश्वर को जानना या अनुभव में लाना आसान नहीं है।
दरअसल, ईश्वर को जान लेने का अर्थ है- स्वयं को मिटा देना और इनसान स्वयं को मिटाना नहीं चाहता है। इसीलिए वह मान लेता है कि ईश्वर का अस्तित्व है। विश्वास से उपजी श्रद्धा
यदि हम ईश्वर को मानते हैं, तो उसके पीछे संपूर्ण सृष्टि के संचालक की शक्ति को मानना या उसके प्रति श्रद्धा व्यक्त करना तर्कसंगत है। दरअसल, ईश्वर के प्रति श्रद्धा की वजह है हमारा विश्वास। हम यह मानते हैं कि हमारे पास जो कुछ भी है, वह ईश्वर की ही देन है। यहां तक कि हमें जीवन भी उन्होंने ही दिया है, यानी वे दाता हैं। इसलिए उनके प्रति आभार प्रकट करना लाजिमी है। फल प्राप्ति का माध्यम
ईश्वर को मानने का एक कारण भय भी हो सकता है। कुछ लोगों के मन में यह भय होता है कि जीवन में आने वाली विपत्तियां ईश्वर के क्रोधित होने के कारण ही आती हैं। इसलिए यदि वे ईश्वर की पूजा-अर्चना नहीं करेंगे, तो जीवन में कष्ट और तकलीफों का अंबार लग जाएगा। वहीं दूसरी ओर, यदि हम उनकी वंदना करते हैं, तो हमारे ऊपर अच्छे स्वास्थ्य, आयु, धन आदि की कृपा बनी रहेगी।
कुछ लोगों के लिए ईश्वर उनके द्वारा संपन्न किए गए कर्मो के लिए फल प्राप्ति का माध्यम है। सच तो यह है कि उनकी पूजा-अर्चना, धार्मिक कर्मकांड कुछ और नहीं, बल्कि उन्हें प्रसन्न कर मनोवांछित फल प्राप्त करने का माध्यम भर है।
कुछ लोग न केवल ज्योतिषीयगणना को ईश्वर की कृपा प्राप्ति का आधार मानते हैं, बल्कि कुछ लोग दान-पुण्य में ही ईश्वर की प्राप्ति करते हैं। परंपरा का पालन
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो केवल दूसरों की देखा-देखी में ईश्वर को मानने लगते हैं। उन्हें नफा-नुकसान और सच-झूठ किसी से कोई मतलब नहीं होता है। वे ईश्वर को मानते हैं, क्योंकि उनका परिवार मान रहा है या संपूर्ण दुनिया मान रही है। इसलिए वे भी उस भीड का हिस्सा बने रहना चाहते हैं। भीड से अलग चलना उन्हें समाज से अलग चलने के समान प्रतीत होता है।
सदियों से पीढी-दर-पीढी उनके घर-परिवार के लोग ईश्वर को मानते चले आ रहे हैं। कुछ लोग अपनी परंपरा को निभाने के कारण ईश्वर को पूजतेव मानते आए हैं। वे उसे तोडना नहीं चाहते, बल्कि उसे बरकरार रखना चाहते हैं। संभव है कि वे कुल देवी या कुल पूजन के रूप में इस प्रथा को निभाते आ रहे हों। धार्मिकताका पालन
अधिकतर लोगों का यही मानना है कि ईश्वर को मानना ही धार्मिक होने की परिभाषा है। जो लोग ईश्वर को नहीं मानते हैं, उन्हें नास्तिक समझा जाता है। उनका विचार होता है कि धार्मिक आदमी सीधा, सच्चा, साफ और सात्विक होता है। इस छवि को बनाए रखने के लिए स्वयं को धार्मिक या आस्तिक कहलवाने के लिए लोग ईश्वर के प्रति श्रद्धा रखते हैं या उनकी पूजा-अर्चना करते रहते हैं। ध्यान का माध्यम
ईश्वर को ध्यान एवं योग साधना का सबसे सशक्त माध्यम माना जाता है। दरअसल, हम सभी स्थान से अपना ध्यान हटाकर ईश्वर को याद करते हैं। ऐसे लोगों का मानना यही है कि यदि मन को एकाग्रचित्त करना है, तो उस सर्वशक्तिमान को सच्चे मन से याद करना चाहिए। इससे न केवल हमारे मन के विकार दूर होते हैं, बल्कि हम अपने इंद्रियों को वश में करने में भी सामर्थवानहो जाते हैं।
श्रावण और शिवोपासना
गोकोटिभि:स्वर्ण सहस्त्रदानात्।
नृणांभवेत्सूतकदर्शनेन
यत्सर्वतीर्थेषुकृताभिषेकात्॥
सैकडों अश्वमेध यज्ञ करने अथवा करोडों गौओंके दान करने और हजारों मन सोने का दान करने तथा सभी तीर्थोमें स्नान-पूजा करने से जो पुण्य फल प्राप्त होता है, वहीं पुण्य फल मनुष्य को केवल पारद के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है।
ॐनम: शिवाय
श्रावण का महीना एवं देवाधिदेव महादेव का दर्शन पूजन रुद्राभिषेक इनमें नैसर्गिक अन्योन्याश्रित संबंध है। बोल बम करता हुआ कांवरियोंका समूह नास्तिकोंके मन में भी आस्था का संचार करता है। विशेषकर सोमवार के दिन भगवान शिव का पूजन। प्रश्न उठता है कि शिव की अर्चना के लिए श्रावण मास ही क्यों? इस प्रश्न के उत्तर में ऋग्वेद कहता है-
संवत्सरंशशमानाब्रह्मणाव्रतचारिण:।
वाचंपर्जन्यानिन्वितांप्रमण्डूकाअवादिषु॥
(सप्तम मंडल 763का प्रथम श्लोक)
अर्थात् वृष्टिकालमें ब्राह्मण वेद पाठ का व्रत करते हैं और उस समय में प्राय: उन सूक्तोंको पढते हैं, जो तृप्तिदायक हैं। इसका यह भी अर्थ है कि वर्षा ऋतु के मंडन करनेवाले जीव वर्षा ऋतु में इस प्रकार ध्वनि करते हैं, मानो एक वर्ष के अंतराल में उन्होंने मौन व्रत धारण रखा हो और इस ऋतु में बोलना प्रारंभ कर दिया हो। इस मंत्र में परमात्मा ने यह उपदेश दिया है कि जिस प्रकार क्षुद्र जंतु भी वर्षा काल में आह्लादजनकध्वनि करते हैं अथवा परमात्मा का यशोगान करते हैं, तुम भी उसी प्रकार परमात्मा का यशोगान करो।
गोमायुरदादबमायुरदात्पृष्नरदाद्धरितोनो वसूनि।
गवां मंडूकादक्ष: शतानिसहस्त्रसावेप्रतिरंतआयु:॥
अर्थात् अनंत प्रकार की औषधियां, जिसमें उत्पन्न होती हैं, उस वर्षा काल अथवा श्रावण मास को सहस्त्रासापकहते हैं। उस काल में परमात्मा हमको अनंत प्रकार का शिक्षा-लाभ कराएं और हमारे ऐश्वर्य और आयु को बढाएं। शिव पूजन से संतान, धन-धान्य, ज्ञान और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। शिव को जलधारा प्रिय है। विशेष कर सोमवार को अनजाने में भी किया गया शिवव्रतमोक्ष को देनेवालाहोता है। अनजाने में शिवरात्रि व्रत करने से एक भील पर भगवान शंकर की कृपा हुई। एक दिन एक भील के मातापिताएवं पत्नी भूख से पीडित होकर उससे याचना की-हे वनचर, हमें कुछ खाने को दो। इस प्रकार की याचना सुनकर वह भील मृगों के शिकार के लिए वन में निकल गया। वह सारे वन में घूमने लगा। दैवयोग से उसे उस दिन कुछ भी नहीं मिला तथा सूर्यास्त हो गया। उसने मन में यह निश्चय किया कि बिना कुछ लिए घर जाना बेकार है। वह शिकार की प्रतीक्षा में भूखा-प्यासा वहीं वन में ठहर गया। रात्रि के प्रथम प्रहर में वह एक बिल्व वृक्ष पर चढकर जलाशय के समीप बैठा था। एक प्यासी हिरणीवहां आ गई। उसे देखकर व्याध को बडा हर्ष हुआ। तुरंत उसने अपने धनुष पर एक वाण संधान किया। उसके हाथ के धक्के से थोडा सा जल तथा बिल्वपत्रनीचे गिर पडा। उस वृक्ष के नीचे शिवलिंगथा। उक्त जल और बिल्वपत्रसे प्रथम प्रहर में ही शिव की पूजा संपन्न हो गई। उस पूजा के महात्म्यसे उस व्याध का सारा पातक तत्काल नष्ट हो गया। तब जो मनुष्य पूरी चेतना में जानबूझ कर पूरी श्रद्धा भक्ति के साथ भगवान शिव की पूजा जल, अक्षत, चंदन, फूल, बिल्वपत्रआदि से करेगा, उस पर भला शिव की विशेष अनुकंपा कैसे नहीं होगी?
सर्वव्यापक और मंगलमय
स्तुत्वाचवाग्भिरमलाभिरतंद्रिताभि:।
दीप्तैस्तमासिनुदतेस्वकरैर्विवस्वां
तंशंकरंशरणदंशरणंव्रजामि॥
जिन वरदायक भगवान के चरणों में भक्तिपूर्वकप्रणाम करने तथा आलस्य रहित निर्मल वाणी द्वारा जिनकी स्तुति करके सूर्य देव अपनी उद्दीप्त किरणों से जगत का अंधकार दूर करते हैं, उन शरणदाताभगवान शंकर की शरण ग्रहण करता हूं।
ॐनम: शिवाय
भगवान शिव सर्वव्यापक हैं। सर्वोपरि हैं। सर्वश्रेष्ठ भी हैं। न तो उनके नामों का अंत है और न ही विशेषणों का। वही प्रभु हैं। अपने हाथ में त्रिशूल धारण करने के कारण त्रिशूलधारीया शूलपाणिकहलाते हैं। वह विभु हैं। वह विश्वनाथ हैं अर्थात् समस्त संसार के मालिक हैं। इस अर्थ में सभी प्राणियों के रक्षक हैं। शिव महादेव हैं अर्थात् देवों के देव के रूप में पूज्य हैं। वह शंभु हैं, ईशोंमें महान हैं। उनसे बडा कोई नहीं है। उनके तीन नेत्र हैं, इसलिए वह त्रिनेत्रधारीकहे जाते हैं। वह मां पार्वती के कांतस्वरूपहैं। पार्वती के प्राणबल्लभहैं। वह अचल, अविनाशी होने के कारण शांत हैं। रतिपतिकामदेव के एकमात्र संहारक भी शिव ही हैं। अपने अत्याचार से संसार में त्राहि-त्राहि मचा देनेवाले, त्रिपुर दैत्य का अंत करनेवाले यही भगवान शिव त्रिपुरारि हैं। अजन्मा, नित्य, समस्त कारणों के भी कारण, अनादि, अनंत शिव के अतिरिक्त न तो कोई श्रेष्ठ है, न माननीय है और न ही गणनीयहै। सभी गुणों का सार शिवत्व ही है। इसलिए उनकी स्तुति में कहा गया है-
प्रभोशूल पाणे,विभोविश्वनाथ:,
महादेव शंभोमहेश: त्रिनेत्र:।
शिवाकान्त शान्त स्मरारेपुरारे
त्वदन्योवरेण्योन मान्योन गण्य:॥
शिव सर्व कल्याणकारी हैं। यह जल्द प्रसन्न होनेवाले देवता हैं। बाबा भोले शंकर सर्वसुलभ भी हैं। इनकी पूजा-अर्चना भी अत्यंत सरल है। यह तो जल की एक धारा से भी प्रसन्न हो जाते हैं। अगर गंगा जल से भगवान शिव का अभिषेक किया जाए तब तो कहना ही क्या? कभी भी जाने अनजाने एक विल्वपत्रभी चढाना महान फलदायक होता है।
अकाल मृत्यु से बचाता है मृत्युंजय
भगवान शंकर की उपासना अनेक रूपों में होती है। अकाल मृत्यु के भय-नाश तथा पूर्णायु की प्राप्ति के उद्देश्य से शिवजी के मृत्युंजय रूप की आराधना की जाती है। मृत्युंजय अपने भक्त की अपमृत्यु और दुर्गति से रक्षा करने में पूर्ण समर्थ हैं। भगवान मृत्युंजय के ध्यान एवं उनके मंत्र के जप से निíमत सुरक्षा-चक्र को भेदने की क्षमता यमराज में भी नहीं है। अकाल मृत्यु पर विजय पाने के लिए मानव सदा से प्रयत्नशील रहा है। मनुष्य पूर्णायु का सुख तभी भोग सकता है, जब वह अकाल मृत्यु का ग्रास न बने।
मंत्रशास्त्रमें वेदोक्त
˜यम्बकं यजामहेसुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्उर्वारुकमिवबन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमामृतात्
को ही मृत्युंजय मंत्र माना गया है। तंत्रविद्याके ग्रंथों में मृत्युंजय मंत्र के अनेक स्वरूपों तथा प्रयोगों का वर्णन मिलता है। आयुर्वेद में भी मृत्युंजय-योग मिलते हैं जिनके सेवन से प्राणी दीर्घायु होता है। ज्योतिषशास्त्र में जन्मकुण्डली में मारकेशकी दशा के समय मृत्युंजय मंत्र का अनुष्ठान निíदष्ट है।
मृत्युंजय मंत्र के साधक के लिए महादेव के मृत्युंजय रूप की जानकारी परमावश्यक है। मृत्युंजय देव का ध्यान इस प्रकार करें-
हस्ताभ्याम्कलशद्वयामृत-रसैराप्लावयन्तंशिरोद्वाभ्यांतौदधतंमृगाक्षवलयेद्वाभ्यांवहन्तंपरम्।
अङ्कन्यस्तकरद्वयामृतघटंकैलासकान्तंशिवंस्वच्छाम्भोजगतंनवेन्दुमुकुटं
देवंत्रिनेत्रंभजे॥
भगवान मृत्युंजय ऊपर के दोनों हाथों में स्थित दो कलशों के द्वारा अपने सिर को अमृतरससे सींच रहे हैं। वे अन्य दो हाथों में मृगमुद्रातथा वलयाकार रुद्राक्षमालाधारण किए हुए हैं। नीचे के दो हाथों में वे अमृत-कलश (घट) लिए हुए हैं। इस प्रकार आठ हाथों वाले, कैलास पर्वत पर स्थित स्वच्छ कमल पर विराजमान, ललाट पर बालचंद्र को मुकुट रूप में धारण किए, त्रिनेत्र, मृत्युंजयदेवका मैं ध्यान करता हूं।
पूर्वोक्त मृत्युंजय मंत्र का जप शुरू करने से पूर्व दाहिने हाथ में जल लेकर यह विनियोग पढें-
ॐअस्यश्री˜यम्बकमन्त्रस्यवशिष्ठ-ऋषि: अनुष्टुप्छन्द: ˜यम्बक-पार्वतीपतिर्देवता ˜यंबीजम्,बंशक्ति:, कंकीलकम्,मम सर्वरोगनिवृत्तये जपे विनियोग:। विनियोग का जल पृथ्वी पर छोडने के बाद ऋष्यादिन्यासमें मंत्र पढते हुए दाहिने हाथ से सम्बन्धित अंगों को छुएं-वशिष्ठऋषयेनम:-शिरसि (सिर), अनुष्टुप्छन्दसेनम:-मुखे (मुंह), ˜यम्बकदेवतायैनम:-हृदये (हृदय), ˜यंबीजायनम:-गुह्ये (गुह्यांग), बंशक्तयेनम: -पादयो: (पैर), कंकीलकायनम:- नाभौ(नाभि), विनियोगायनम:- सर्वागे(संपूर्ण शरीर)।
मृत्युंजय मंत्र को 6भागों में विभक्त करके उनसे क्रमश:करन्यासऔर हृदयादिन्यासइस प्रकार करें-ॐ ˜यम्बकं-अंगुष्ठाभ्याम्नम:दोनोंहाथों की तर्जनी अंगुलियों से दोनों अंगूठोंका स्पर्श, यजामहे-तर्जनीभ्याम्नम: दोनों हाथों के अंगूठोंसे दोनों तर्जनी अंगुलियों का स्पर्श , सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्-मध्यमाभ्याम्नम:अंगूठोंसे मध्यमा अंगुलियों का स्पर्श, उर्वारुकमिवबन्धनान्-अनामिकाभ्याम्नम: अनामिका अंगुलियों का स्पर्श, मृत्योर्मुक्षीय-कनिष्ठिकाभ्याम्नम: कनिष्ठिका अंगुलियों का स्पर्श, मामृतात्-करतलकरपृष्ठाभ्याम्नम:हथेलियोंऔर उनके पृष्ठभागों का परस्पर स्पर्श।
ॐ˜यम्बकं-हृदयायनम: दाहिने हाथ की अंगुलियों से हृदय का स्पर्श, यजामहे-शिरसेस्वाहा सिर का स्पर्श, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्-शिखायैवषद्शिखा का स्पर्श, उर्वारुकमिवबन्धनान्-कवचायहुम्दाहिने हाथ की अंगुलियों से बाएं कंधे का और बाएं हाथ की अंगुलियों से दाहिने कंधे का एक साथ स्पर्श करें, मृत्योर्मुक्षीय-नेत्रत्रयायवौषट्दाहिने हाथ की तर्जनी,मध्यमा,अनामिका अंगुलियों के अग्रभाग से दोनों नेत्रों और ललाट के मध्यभाग का स्पर्श, मामृतात्-अस्त्रायफट् यह पढकर दाहिने हाथ को सिर के ऊपर से दाहिनी तरफ पीछे की ओर ले जाकर बायीं तरफ से आगे की ओर लाएं और दाहिने हाथ की तर्जनी तथा मध्यमा अंगुलियों से बाएं हाथ की हथेली पर ताली बजाएं।
मंत्र के जप से पूर्व उसका विनियोग करने से साधक का उद्देश्य सफल होता है तथा अंगन्यास करने से शरीर साधना के उपयुक्त बनता है। यह प्रक्रिया जटिल नहीं है, बस जरूरत है इसे एक बार समझने की। विनियोग एवं अंगन्यास के बिना जप करने से मंत्र की शक्ति क्षीण होती है। मृत्युंजयदेवके शास्त्रोक्त स्वरूप का ध्यान करने के उपरांत रुद्राक्ष की माला पर मृत्युंजय मंत्र को जपें। मंत्र जपने वाले को मृत्युंजय मंत्र का अर्थ भी मालूम होना चाहिए। इस मंत्र का अर्थ है-दिव्यसुगन्ध से युक्त, मृत्युरहित,पुष्टिवर्धक,त्रिनेत्र रुद्र की हम पूजा करते हैं। वे रुद्र हमें अकाल मृत्यु के भय तथा भव-बन्धन से मुक्त करें। जिस प्रकार ककडी (फूट) का फल पक जाने पर अपने डंठल से छूट जाता है, उसी तरह हम भी अपमृत्यु से दूर हो जाएं किन्तु अमृत से हमारा संबंध छूटने न पाए।
˜यम्बक मंत्र में कई प्रकार के सम्पुट लगाकर भी उसे जपा जा सकता है। ˜यम्बक (मृत्युंजय) मंत्र के पुरश्चरण में इसका एक लाख जप करके,उसकी दशांश संख्या में (दस हजार)हवन करें। बेल, तिल, खीर, घी, दूध, दही, दूर्वा तथा बरगद, पलाश एवं खैर की समिधा- इन दस वस्तुओं से होम करें।
एतत्पश्चात्होम (दस हजार) की क्रमश:उत्तरोत्तर दशांश संख्या में तर्पण (एक हजार), मार्जन (सौ) करके दस विद्वानों को भोजन कराएं। इस प्रकार सविधि पुरश्चरण करने से मंत्र सिद्ध हो जाएगा और तब साधक मंत्र का प्रयोग अपना अभीष्ट सिद्ध करने केलिएकर सकता है।
संपत्ति की प्राप्ति हेतु मृत्युंजय मंत्र पढकर बेल की समिधा से दस हजार आहुतियां दें। ब्रह्मतेजके लिए पलाश की समिधा, पापों केनाशहेतु तिल से, अकाल मृत्यु एवं शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए पीली सरसों से, श्री एवं कीíत हेतु खीर से, दूसरे के द्वारा किए गए कृत्या आदि अभिचार कर्मो (तांत्रिक प्रयोगों) को नष्ट करने के लिए दूध में भीगे अन्न से दस हजार आहुतियां दें। जो व्यक्ति अपने जन्मदिवस के दिन गाय के दूध से भीगी दूब और गोदुग्धसे निíमत घी द्वारा दो हजार आहुतियां देगा, वह समस्त रोगों से मुक्त होकर शतायु होगा। प्रदोष व्रत करते हुए प्रदोषकालमें घी और दूध से सिक्त अन्न से होम करने वाले का आर्थिक संकट छह मास में दूर हो जाएगा। जो साधक स्नान करने के बाद सूर्यनारायण की ओर मुख करके मृत्युंजय मंत्र का नित्य एक हजार जप करेगा, वह सब आधि-व्याधि से मुक्त होकर दीर्घायु होगा।
स्त्रियां एवं यज्ञोपवीत धारण न करने वाले पुरुष पूर्वोक्त ˜यम्बक मंत्र के बजाय इस पौराणिक मृत्युंजय मंत्र को जपें-
मृत्युंजयायरुद्रायनीलकण्ठायशम्भवे।
अमृतेशायशर्वायमहादेवायतेनम:॥
यह सब करने में असमर्थ रोगी आरोग्यताहेतु यह सरल लघु मृत्युंजय मंत्र जप सकते हैं-
ॐजूँ स:माम्पालयपालयस:जँू ॐ।यदि आप किसी दूसरे व्यक्ति के लिए जप करना चाहते हों तो मंत्र में माम् के स्थान उसके नाम का उच्चारण करें।
मृत्युंजय मंत्र में लोगों का सदा से ही बडा विश्वास रहा है। युग बदला-समय बदला पर इस महामंत्र के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था कभी नहीं डिगी। इस महामंत्र ने कभी भी अपने साधक को निराश नहीं किया। मृत्युंजय मंत्र अपने नाम के अनुरूप फल देने वाला है। लोगों की यह दृढ मान्यता है कि मृत्युंजयदेवकी शरण में रहने वाले की कभी अकाल मृत्यु नहीं होती।
साभार : डा. अतुल टण्डन
समन्वयकारी देवता भगवान शिव
यस्यप्रणम्य चरणौवरदस्यस्तुत्वा
चवाग्भिरमलमभितंद्रिताभि:।
दीप्तैस्तमासिनुदतेस्वकरैर्विवस्वां
तंशंकरंशरणदंशरणंव्रजामि॥
जिन वरदायक भगवान के चरणों में भक्तिपूर्वकप्रणाम करके तथा आलस्य रहित निर्मल वाणी द्वारा जिनकी स्तुति कर के सूर्य देव अपनी उद्दीप्त किरणों से जगत का अंधकार दूर करते हैं, उन शरणदाताभगवान शंकर की शरण ग्रहण करता हूं।
ॐनम: शिवाय
अनंत है भगवान शिव की महिमा। इसलिए तो वेदों, पुराणों और श्रुतियों ने भी उनकी महिमा का गुणगान नेति-नेति कह कर किया है। सामान्य तौर हम जितना भगवान शिव को जान पाते हैं, उसके अनुसार वे समन्वयकारीदेवता है। वे सभी देवताओं में सर्वाधिक कृपालु और थोडी सी भक्ति से प्रसन्न हो कर मनवांछितवरदान देने को हमेशा तैयार रहते हैं। इस संबंध में शास्त्रों का कहना है-
शिवेतिद्वयक्षरंनाम
व्याहरिष्यन्तिये जना:।
तेषांस्वर्गश्चमोक्षश्च
भविष्यतिन चान्यथा॥
अर्थात् जो लोग दो अक्षरवालेशिव के नाम का उच्चारण करेंगे, उन्हें स्वर्ग और मोक्ष दोनों प्राप्त होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है। पुराणों के अनुसार संसार में सर्वाधिक भक्त भगवान शिव के ही हैं। इसलिए की उनकी उपासना अन्य देवताओं की अपेक्षा अत्यंत सहज है। कोई भी व्यक्ति शुद्ध हृदय से कम से कम पूजन सामग्री से भगवान शिव की पूजा कर उन्हें प्रसन्न कर सकता है। उन्हें प्रसन्न करने के लिए एक रुद्रीयानी ग्यारह बेलपत्रऔर जल ही काफी होता है। भगवान शिव ऐसे देवता हैं, जिनकी भक्ति कोई भी बिना किसी भेदभाव के कर सकता है। वह सबके लिए मंगल स्वरूप हैं और सबका मंगल करते हैं।
थोड़ी सी भक्ति से प्रसन्न होते महादेव
त्रयी साख्यंयोग: पशुपतिमतंवैष्णवमिति
प्रभिन्नेप्रस्थानेपरिमिदमद:पथ्यमितिच।
रुचीनांवैचि˜यादृजुकुटिलनानापथजुषां,
नृणामेकोगंतस्त्वमपिपथसामर्णवइव।।
हे देव, जिस प्रकार सभी नदियां समुद्र में मिलती हैं, उसी प्रकार आपको प्राप्त करने के लिए वेद-शास्त्र, भक्ति आदि अनेक मार्ग हैं, लेकिन सभी प्राणी विभिन्न मतों और पंथों का अनुसरण करते हुए आपकी ही शरण में चले जाते हैं।
भगवान शिव ऐसे देवाधिदेव महादेव हैं, जो थोडी सी भक्ति से ही प्रसन्न हो जाते हैं। यही कारण है कि इनके भक्तों की संख्या विश्व में सर्वाधिक है। श्रावण माह में तो इनके भक्तों की संख्या को सहज ही महसूस किया जा सकता है। भगवान शिव की सबसे बडी विशेषता तो यह है कि कोई व्यक्ति यदि अनजाने में भी कुछ ऐसा कार्य करता है, जिसमें भक्ति का आभास हो तो भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं तथा अवलंब वरद मुद्रा में आ जाते हैं। इस समय भक्त जो भी मांग दे, वह उसे प्रदान कर देते हैं। अपने इसी स्वभाव के कारण भगवान शिव ने कई बार तो वरदान दे कर स्वयं को भी संकट में डाल लिया। भस्मासुर का प्रसंग उनके इसी स्वभाव का उदाहरण है। वैसे तो भगवान शिव की आराधना सकाम और निष्काम दोनों प्रकार की होती है, लेकिन सकाम भक्तों की संख्या अधिक होती है। सामान्य जीवन में धन के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। इसके लिए हमारे शास्त्रों में सिद्ध मनीषियोंने भगवान शिव की उपयुक्त आराधना के उपाय बताये हैं। उनके अनुसार श्रावण मास में प्रतिदिन एक सौ आठ बिल्व पत्रों पर चंदन से पंचाक्षर मंत्र यानी ॐ नम: शिवायलिखें। उस बिल्वपत्रको वही मंत्र बोलते हुए भगवान शिव पर चढाते जायें। ऐसा इकतीस दिनों तक किया जाना चाहिए। शास्त्रों के मत के अनुसार जो श्रद्धालु इस विधि से भगवान शिव की पूजा-अर्चना करता है, उसपरभगवान शिव अवश्य ही प्रसन्न हो जाते हैं और उसे धन-धान्य प्रदान करते हैं। साथ ही सभी मनोकामनाएंपूर्ण कर देते हैं। इसलिए गृहस्थ आश्रम में रहने वाले भक्तों को सावन महीने में शिव की आराधना अवश्य ही करनी चाहिए।
ब्रह्म के पर्याय हैं शिव और रुद्र
कृपाललितर्वाक्षणंस्मितमनोक्षवक्त्राम्बुजं
शशांकलयो”वलंशामितधोरतापत्रयम्।
करोतुकिमपिस्फुदत्परमसौरण्यसात्रिचद्-
वेषुर्धराधरसुताभुजोद्वलयितमहोमंगलम्॥
जिनका कृपापूर्ण चितवन अत्यंत सुन्दर है, जिनका मुखारविन्दमन्द मुस्कान की छटा से अत्यंत मनोहर दिखायी देता है। जो चंद्रमा की कला से परम उज्जवल हैं, जो तीनों तापों को शांत कर देने में समर्थ हैं। जिनका स्वरूप सच्चिन्मयएवं परमानन्द रूप से प्रकाशमान है तथा जो गिरिराज नन्दिनी पार्वती के भुजपाश से आवेष्टित हैं, वह अनिर्वचनीयतेजोपुंजभगवान शिव सबका मंगल करें।
ॐनम: शिवाय
शिव और रुद्र ब्रह्म के ही पर्यायवाची शब्द हैं। शिव को रुद्र इसलिए कहा जाता है कि ये रुत् अर्थात् दुख को विनष्ट कर देते हैं। यथा-रुतं दुखंद्रावयति-नाशयतीतिरुद्र:। रुद्राष्टाध्यायीका विशेष महात्म्यहै। शिवपुराणमें सनकादिऋषियों के प्रश्न पर स्वयं शिवजी ने रुद्राष्टाध्यायीके मंत्रों द्वारा अभिषेक का महात्म्यबताते हुए कहा है कि मन, कर्म तथा वाणी से परम पवित्र तथा सभी प्रकार की असशक्तियोंसे रहित हो कर भगवान शूलपाणिकी प्रसन्नता के लिए रुद्राभिषेक करना चाहिए। इससे वह भगवान शिव की कृपा से सभी कामनाओं को प्राप्त करता है और अंत में परम गति को प्राप्त होता है। रुद्राभिषेक से मनुष्यों की कुलपरंपराको भी आनंद की प्राप्ति होती है-
मनसा वाचा कर्मणा शुचि: संगविवर्जित:
कुर्याद्रुद्रभिषेकंचप्रीतयेशूलपाणिन:॥
सर्वान्कामायवाप्नोतिलभतेपरमांगतिम्।
नन्दतेचकुलंपुंसांश्रीमच्छंभुप्रसादत:॥
अत:इसका जाप करने से मनुष्य की सभी कामनाएं पूर्ण होती है।
ध्यायेन्नित्यंमहेशंरजतगिरिनिभंचारुचंद्रावतंसं।
रत्नाकल्पो”वलांगंपरशुमृगवरैर्भीतिहस्तंप्रसन्नम्।
ध्यानार्थेअक्षत पुष्पाणिसमर्पयामिऊंशिवायनम:।
चांदी के पर्वत के समान जिनकी श्वेत कांति है, जो सुंदर चंद्रमा को आभूषण रूप में धारण करते हैं, रत्नमयअलंकारों से जिनका शरीर उज्जवल है। देवतागणजिनकीचारोंओर खडे हो कर स्तुति करते हैं, जो ब्रह्माण्ड के आदि, जगत की उत्पत्ति के बीज और समस्त भयों को हरने वाले भव स्वरूप महेश्वर का प्रतिदिन ध्यान करना चाहिए। भगवान शंकर की पूजा के समय शुद्ध आसन पर बैठकर पहले आचमन, पवित्री धारण, शरीर शुद्धि और आसन शुद्धि कर लेनी चाहिए। तत्पश्चात् पूजन सामग्री को यथास्थान रख कर दीप प्र”वलित कर लें। इसके बाद स्वस्ति पाठ करें और गणेश तथा गौरी का स्मरण पूर्वक पूजन करना चाहिए। रुद्राभिषेक, लघुरुद्र,नवग्रह पूजन, कलश स्थापन, षोडषमातृकाका पूजन करना चाहिए। इस प्रकार के पूजन से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों की कामनाएं पूर्ण कर देते हैं। भगवान शिव पर पुष्प चढाने का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार तपोशील,सर्वगुणसंपन्नऔर वेदों में निष्णात किसी विप्र को सौ बार सुवर्ण दान करने पर जो फल की प्राप्ति होती है, वही फल भगवान शिव को सौ फूल अर्पित कर देने मात्र से प्राप्त हो जाता है। भगवान शिव पर धतूरा और नीलकमलका फूल चढाया जाना सबसे अच्छा माना गया है। इसके अलावा मौलसिरी,बक और बकुल फूलों का भी अत्यधिक महत्व है। कनेर, बेलपत्र,चिचिडा,कुश के फूल एवं शमी का पत्ता भी चढाया जाता है। शिव को कदंब, केवडा, शिरीष,गाजर, पत्रकंटक,जूही और दोपहरिया के फूल नहीं चढाया जाना चाहिए।
शिवत्व के बिना सुंदरता मूल्यहीन
मूल्यशास्त्रका महावाक्य है सत्यं शिवंसुन्दरं।मानव जीवन के यही तीन मूल्य हैं। जो सत्य है वही शिव है और जो शिव है वहीं सुंदर है। पश्चिम का सौंदर्यशास्त्रीयह मानकर चलता है कि सुंदरता द्रष्टा की दृष्टि में है। यानी सौंदर्य बोध नितांत व्यक्तिनिष्ठ है। परंतु भारतीय मनीषा सुंदरता की इस परिभाषा को खारिज कर देती है। वह सत्य-शिव-सुन्दर को सर्वथा वस्तुनिष्ठ मानती है। मूल्य सापेक्ष न होकर निरपेक्ष हैं। मनुष्य इसलिए मनुष्य है, क्योंकि वह मूल्यों के अधीन है। मूल्य उसकी विशिष्ट संपत्ति है। सुन्दर क्या है? जो शिव है वही सुंदर है। अर्थात जिसमें शिवत्व नहीं है, उसमें सौंदर्य भी नहीं है।
यस्मिन् शिवत्वंनास्तितस्मिनसुन्दरंअपिनास्तिएव।
हमारे मन को सुख देने वाली चीज सुंदर है-यह सुंदरता की बचकानी परिभाषा है। सुख और दु:ख संस्कारगत होने के नाते व्यक्तिनिष्ठ हैं। अनुकूल वेदना का नाम सुख है और प्रतिकूल वेदना का नाम दु:ख है। एक ही चीज किसी को सुख देती है और किसी को दु:ख। परंतु सुंदरता तो वस्तुनिष्ठ ही है। हमारा शास्त्र बोलता है कि जो कल्याणकारी है वही सुंदर है। यह जरूरी नहीं है कि सुखद चीज सुंदर भी हो।
गीता कहती है कि भोग का सुख भ्रामक है और अंतत:दु:खवर्धकहै।
ये हि संस्पर्शजाभोगा दु:खयोनयएवते।
ऐसा सुख भी होता है जो शुरू में अमृत जैसा लगता है, किंतु उसका परिणाम विषतुल्यहोता है। यदि क्षणिक सौंदर्यबोध आगे चलकर दीर्घकालीन दु:ख का कारण बने तो वह कतई सुंदर नहीं है। कष्टकर होने के नाते वर्तमान में साधना भले ही असुंदर लगे, किंतु प्रगति में सहायक होने के नाते अंतत:वही सुन्दर है।
गीता भी कहती है: यत्तदग्रे विषामिवपरिणामेमृतोपमम्।यहां यह सवाल उठ सकता है कि जो कष्ट देने वाला है वह सुंदर कैसे हो सकता है? यदि कोई कष्टकर अभ्यास दीर्घकालीन सौन्दर्य का बोध कराने में समर्थ है तो वह तप है और इसलिए सुंदर है। प्रमादजनितसुख सुंदर हो ही नहीं सकता। चूंकि तप विकास में हेतु है,अत: सुन्दर है।
इस प्रकार सुन्दरं की परिभाषा निश्चित हुई । यत् शिवंतत् सुन्दरम्।शिव का अर्थ है मंगल। मंगल शब्द मग् धातु से बना है, जिसका अर्थ है कल्याण। इस प्रकार शिव में उत्कर्ष है; विकास है; प्रगति है। शास्त्र बाहरी प्रगति का तिरस्कार नहीं करता है, अपितु सम्मान से उसे अभ्युदय कहता है। अशिक्षा से शिक्षा की ओर, दरिद्रता से समृद्धि की ओर, अपयश से यश की ओर, निस्तेज से तेजस्विता की ओर बढना प्रगति है। समृद्धि के पीछे कर्मकौशल होता है। प्रतिष्ठा किसी को उपहार में नहीं मिल जाती। विद्वान ही विद्वान के श्रम को जानता है: विद्वान जानातिविद्वज्जन परिश्रम:। श्रम तो स्वयं सुंदर है,क्योंकि वह तप है।
भीतरी प्रगति का भी प्रस्थान बिंदु जीवन मूल्य है। जीवत्व से ब्रह्मत्व की ओर जाना ही आध्यात्मिक प्रगति है। सत्व में स्थित होना प्रगति है; विनम्रता में अवस्थितहोना प्रगति है; भक्ति में प्रतिष्ठित होना प्रगति है। शिवत्व का अर्थ ही है प्रगति या कल्याण। अत:यह मानकर चलें कि जो शिव है वही सुंदर है। यह जीवन दर्शन की प्रमाणित मंगलमयी कसौटी है।
आखिर शिवं का हेतु क्या है। भारतीय ऋषि बोलता है सत्यं। वेदान्त की भाषा में सत्य-शिव-सुन्दर में हेतुफलात्मकसम्बंध है। इसका अर्थ हुआ: यत् सत्यं तत् शिवं,यत् शिवंतत् सुंदरं। शास्त्र को समझना हमारी बुद्धि की जिम्मेदारी है। शास्त्र को समझने के साथ-साथ उससे हमारे अनुभव का भी तालमेल बैठना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो काम बिगडने लगता है। गांधी जी की तरह हमें भी सत्य की गहराई में प्रवेश करना चाहिए। वह कहा करते थे कि सत्य को छोडने का मतलब है ईश्वर को छोडना। गांधी जी ने सत्य को केवल समझा ही नहीं, अपितु जीवन में उसका भरपूर प्रयोग भी किया। यही कारण है कि वह सत्यनिष्ठ से भी आगे प्रयोगनिष्ठबन गए।
रामायण और महाभारत हमारे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ हैं। जहां रामायण पारिवारिक सौहार्द का पर्याय है, वहीं महाभारत पारिवारिक कलह का। नीति को लेकर दोनों में अंतर है। नीति कहती है कि अपंग को राजा नहीं बनाया जा सकता। इसीलिए बडे भाई होने के बावजूद जन्मांध धृतराष्ट्र को राजा नहीं बनाया गया और पाण्डु को राजा बना दिया गया। बाद में धृतराष्ट्र को हस्तिनापुर का प्रतिनिधि बनाकर पाण्डु वन चले गए। इस सत्य को धृतराष्ट्र ने कभी नहीं स्वीकार किया और इसे अपने खिलाफ षड्यंत्र मानता रहा। यदि वे इस सत्य को स्वीकार कर लिए होते कि राजवंश पाण्डु का चलना चाहिए तो महाभारत होने का प्रश्न ही न उठता। धृतराष्ट्र शिवत्व की तलाश जीवनभरअसत्य में करता रहा। उसकी इस उलटी चाल से कौरव वंश का नाश हो गया।
इधर मर्यादा पुरुष भरत ने कभी भी सत्य को नहीं छोडा। उन्होंने भरी सभा में घोषणा की कि सब सम्पत्ति रघुपति कै आहीऔर आगे विनम्रता दिखाते हुए कहा कि हित हमारसियपतिसेवकाई।सर्वसम्मति से राजा घोषित होने के बाद भी श्रीराम के आदेश पर वे अयोध्या के प्रतिनिधि ही बने रहे। इस प्रकार भरत के सत्याग्रह से रामायण निकली और धृतराष्ट्र के असत्याग्रहसे महाभारत। जिस सुंदरता से शिव न प्रकट हो वह छलावा है और जिस शिव से सत्य न प्रकट हो वह अमंगलकारीहै।
साभार : डॉ. दुर्गादत्त पाण्डेय
रुद्राभिषेक से सब पाप-ताप का निवारण
| शिव और रुद्र परस्पर पर्यायवाची शब्द हैं। शिव को रुद्र इसलिए कहा जाता है-रुतम्-दु:खम्, द्रावयति-नाशयतीतिरुद्र: ये दु:खों को नष्ट कर देते हैं। सब धर्मग्रंथों का यह साफ-साफ कहना है कि हमारे द्वारा किए गए पाप ही हमारे दु:खों के कारण हैं। रुद्रार्चनऔर रुद्राभिषेक से पातक भस्म हो जाते हैं और साधक में शिवत्व का उदय होता है। रुद्र के पूजन से सब देवताओं की पूजा स्वत:सम्पन्न हो जाती है। रुद्रहृदयोपनिषद्में लिखा है-सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका:। प्राचीनकाल से ही रुद्र की उपासना शुक्लयजुर्वेदीयरुद्राष्टाध्यायीके द्वारा होती आ रही है। इसके साथ रुद्राभिषेक का विधान युगों से वांछाकल्पतरुबना हुआ है। साम्बसदाशिवअभिषेक से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। इसीलिए कहा भी गया है-शिव: अभिषेकप्रिय:।शिव जी को पूजा में अभिषेक सर्वाधिक प्रिय है। शास्त्रों में विविध कामनाओं की पूíत के लिए रुद्राभिषेक के निमित्त अनेक द्रव्यों का निर्देश किया गया है। जल से अभिषेक करने पर वर्षा होती है। असाध्य रोगों को शांत करने के लिए कुशोदकसे रुद्राभिषेक करें। भवन-वाहन प्राप्त करने की इच्छा से दही तथा लक्ष्मी-प्राप्ति का उद्देश्य होने पर गन्ने के रस से अभिषेक करें। धन-वृद्धि के लिए शहद एवं घी से अभिषेक करें। तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। पुत्र की इच्छा करनेवालादूध के द्वारा रुद्राभिषेक करे। वन्ध्या,काकवन्ध्या(मात्र एक संतान उत्पन्न करनेवाली) अथवा मृतवत्सा(जिसकी संतानें पैदा होते ही मर जायं)गोदुग्धसे अभिषेक करे। ज्वर की शांति हेतु शीतल जल से रुद्राभिषेक करें। सहस्रनाम-मंत्रोंका उच्चारण करते हुए घृत की धारा से रुद्राभिषेक करने पर वंश का विस्तार होता है। प्रमेह रोग की शांति भी दुग्धाभिषेकसे हो जाती है। शक्कर मिले दूध से अभिषेक करने पर जडबुद्धि वाला भी विद्वान हो जाता है। सरसों के तेल से अभिषेक करने पर शत्रु पराजित होता है। शहद के द्वारा अभिषेक करने पर यक्ष्मा (तपेदिक) दूर हो जाती है। पातकों को नष्ट करने की कामना होने पर भी शहद से रुद्राभिषेक करें। गोदुग्धसे निíमत शुद्ध घी द्वारा अभिषेक करने से आरोग्यताप्राप्त होती है। पुत्रार्थी शक्कर मिश्रित जल से अभिषेक करें। इस प्रकार विविध द्रव्यों से शिवलिंगका विधिवत् अभिषेक करने पर अभीष्ट निश्चय ही पूर्ण होता है। शिव-भक्तों को यजुर्वेदविहितविधान से रुद्राभिषेक करना चाहिए। किंतु असमर्थ व्यक्ति प्रचलित मंत्र-ॐ नम:शिवायको जपते हुए भी रुद्राभिषेक कर सकते हैं। रुद्राभिषेक से समस्त कार्य सिद्ध होते हैं। अंसभवभी संभव हो जाता है। प्रतिकूल ग्रहस्थितिअथवा अशुभ ग्रहदशा से उत्पन्न होने वाले अरिष्ट का शमन होता है। जन्मकुंडली में मारकेशजैसे दुर्योगके बनने पर महामृत्युंजयमंत्र पढते हुए रुद्राभिषेक करें। वैदिक मृत्युंजय मंत्र-˜यम्बकं यजामहेसुगन्धिम्पुष्टिवर्धनम्।उर्वारुकमिवबन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमामृतात्।इसका अर्थ है- दिव्य सुगंध से युक्त, मृत्युरहित,धन-धान्यवर्धक, त्रिनेत्र रुद्र का हम पूजन करते हैं। वे रुद्र हमें अकालमृत्यु और सांसारिक बंधन से मुक्त करें। जिस प्रकार खरबूजा पक जाने पर डंठल से अपने-आप पृथक हो जाता है, उसी प्रकार हम भी मृत्यु से दूर हो जाएं किंतु अमृत (मोक्ष) से हमारा अलगाव न हो। ज्योतिषशास्त्र के प्राचीन प्रमुख ग्रंथ बृहत्पाराशरहोराशास्त्र में विभिन्न ग्रहों की दशा-अंतर्दशा में बनने वाले अनिष्टकारकयोग की निवृत्ति के लिए(शांति हेतु) शिवार्चन और रुद्राभिषेक का परामर्श दिया गया है। भृगुसंहितामें भी जन्मपत्रिकाका फलादेश करते समय महíष भृगुअधिकांश जन्मकुंडलियों में जन्म-जन्मांतरों के पापों और ग्रहों की पीडा के समूल नाश एवं नवीन प्रारब्ध के निर्माण हेतु महादेव शंकर की आराधना तथा रुद्राभिषेक करने का ही निर्देश देते हैं। किसी कामना से किए जाने वाले रुद्राभिषेक में शिव-वास का विचार करने पर अनुष्ठान अवश्य सफल होता है और मनोवांछित फल प्राप्त होता है। प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा (1), अष्टमी (8), अमावस्या तथा शुक्लपक्ष की द्वितीया (2)व नवमी (9) के दिन भगवान शिव माता गौरी के साथ होते हैं, इस तिथि में रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि उपलब्ध होती है। कृष्णपक्ष की चतुर्थी (4), एकादशी (11) तथा शुक्लपक्ष की पंचमी (5) व द्वादशी (12) तिथियों में भगवान शंकर कैलास पर्वत पर होते हैं और उनकी अनुकंपा से परिवार में आनंद-मंगल होता है। कृष्णपक्ष की पंचमी (5), द्वादशी (12) तथा शुक्लपक्ष की षष्ठी (6)व त्रयोदशी (13) तिथियों में भोलेनाथनंदी पर सवार होकर संपूर्ण विश्व में भ्रमण करते हैं। अत:इन तिथियों में रुद्राभिषेक करने पर अभीष्ट सिद्ध होता है। कृष्णपक्ष की सप्तमी (7), चतुर्दशी (14) तथा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा (1), अष्टमी (8), पूíणमा (15) में भगवान महाकाल श्मशान में समाधिस्थ रहते हैं अतएव इन तिथियों में किसी कामना की पूíत के लिए किए जाने वाले रुद्राभिषेक में आवाहन करने पर उनकी साधना भंग होगी। इससे यजमान पर महाविपत्तिआ सकती है। कृष्णपक्ष की द्वितीया (2), नवमी (9) तथा शुक्लपक्ष की तृतीया (3) व दशमी (10) में महादेवजीदेवताओं की सभा में उनकी समस्याएं सुनते हैं। इन तिथियों में सकाम अनुष्ठान करने पर संताप (दुख) मिलेगा। कृष्णपक्ष की तृतीया (3), दशमी (10) तथा शुक्लपक्ष की चतुर्थी (4) व एकादशी (11)में नटराज क्रीडारतरहते हैं। इन तिथियों में सकाम रुद्रार्चनसंतान को कष्ट दे सकता है। कृष्णपक्ष की षष्ठी (6), त्रयोदशी (13) तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी (7) व चतुर्दशी (14) में रुद्रदेवभोजन करते हैं। इन तिथियों में सांसारिक कामना से किया गया रुद्राभिषेक पीडा दे सकता है। यह ध्यान रहे कि शिव-वास का विचार सकाम अनुष्ठान में ही जरूरी है। निष्काम भाव से की जाने वाली अर्चना कभी भी हो सकती है। ज्योतिíलंग-क्षेत्र एवं तीर्थस्थान में तथा शिवरात्रि-प्रदोष, सावन के सोमवार आदि पर्वो में शिव-वास का विचार किए बिना भी रुद्राभिषेक किया जा सकता है। वस्तुत:शिवलिंगका अभिषेक आशुतोष शिव को शीघ्र प्रसन्न करके साधक को उनका कृपापात्र बना देता है और तब उसकी सारी समस्याएं स्वत:समाप्त हो जाती हैं। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि रुद्राभिषेक से सारे पाप-ताप-शाप धुल जाते हैं। साभार : डा. अतुल टण्डन |
शिवलिंग पूजन की परिपाटी
सर्वत्र मां रक्षतुविश्वमूर्ति
ज्र्योतिर्मयानन्दघनश्चिदात्मा।
अघोरणीयानुरुशक्तिरेक:
सईश्वर: पातुभयादशेषात्॥
संपूर्ण विश्व जिनकी मूर्ति है, जो ज्योतिर्मय आनन्दघनस्वरूप चिदात्मा हैं, वे भगवान शिव मेरी रक्षा करें। जो सूक्ष्म से भी अत्यन्त सूक्ष्म हैं, महान् शक्ति से संपन्न हैं, वे अद्वितीय ईश्वर महादेव जी संपूर्ण भयों से मेरी रक्षा करें।
ॐनम: शिवाय
ॐतत्पुरुषायविद्यहेमहादेवायधीमहि।
तन्नोरुद्र: प्रचोदयात्।
शिवलिंगके पूजन के प्रारंभ के संबंध में एक पौराणिक कथा है। दक्ष प्रजापति ने अपने यज्ञ में शिव जी का भाग नहीं रखा, जिससे कुपित होकर जगज्जननीसती दक्ष के यज्ञ मंडप में योगाग्निद्वारा जल कर भस्म हो गई। माता सती के शरीर त्याग की सूचना प्राप्त होते ही भगवान शिव अत्यंत क्रुद्ध हो गए और वे नग्न हो कर पृथ्वी में भ्रमण करने लगे। एक दिन वह उसी अवस्था में ब्राह्मणों की बस्ती में पहुंच गए। शिव जी को उस अवस्था में देख कर वहां की स्त्रियां मोहित हो गई। यह देख कर ब्राह्मणों ने उन्हें श्राप दे दिया कि उनका लिंग तत्काल शरीर से अलग हो कर भूमि पर गिर जाए। ब्राह्मणों के शाप के प्रभाव से शिव का लिंग उनके शरीर से अलग होकर गिर गया, जिससे तीनों लोकों में उत्पात होने लगा। समस्त देव, ऋषि, मुनि व्याकुल हो कर ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा ने योगबलसे शिवलिंगके अलग होने का कारण जान लिया और वह समस्त देवताओं, ऋषियों और मुनियों को अपने साथ लेकर शिव जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा ने शिव जी की स्तुति वंदना की और उन्हें प्रसन्न करते हुए उनसे लिंग धारण करने का निवेदन किया। तब भगवान शिव ने कहा कि आज से सभी लोग मेरे लिंग की पूजा प्रारंभ कर दें तो मैं पुन:उसे धारण कर लूंगा। शिव जी की बात सुनकर ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम स्वर्ण का शिवलिंगबना कर उसकी पूजा की। तत्पश्चात् देवताओं, ऋषियों और मुनियों ने अनेक द्रव्यों के शिवलिंगबनाकर पूजन किया। तभी से शिव लिंग के पूजन की परिपाटी प्रारंभ हो गई। शिव लिंग के महात्म्यका वर्णन करते हुए शास्त्रों ने कहा है कि जो मनुष्य किसी तीर्थ की मृत्तिका से शिवलिंगबना कर उनका हजार बार अथवा लाख बार अथवा करोड बार विधि-विधान के साथ पूजा करता है, वह शिवस्वरूपहो जाता है। जो मनुष्य तीर्थ में मिट्टी, भस्म, गोबर अथवा बालू का शिवलिंगबनाकर एक बार भी सविधि पूजन करता है, वह दस हजार कल्पोंतक स्वर्ग में निवास करता है। शिवलिंगका सविधि पूजन करने से मनुष्य संतान, धन, धन्य, विद्या, ज्ञान, सद्बुद्धि,दीर्घायु और मोक्ष की प्राप्ति करता है। जिस स्थान पर शिवलिंगकी पूजा होती है, वह तीर्थ न होने पर भी तीर्थ बन जाता है। जिस स्थान पर सर्वदाशिवलिंगका पूजन होता है, उस स्थान पर मृत्यु होने पर मनुष्य शिवलोक जाता है। शिव शब्द के उच्चारण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और उसका बाह्य और अंतकरणशुद्ध हो जाता है। दो अक्षरों का मंत्र शिव परब्रह्मस्वरूपएवं तारक है। इससे अलग दूसरा कोई तारक ब्रह्म नहीं है-
तारकंब्रह्म परमंशिव इत्यक्षरद्वयम्।
नैतस्मादपरंकिंचित् तारकंब्रह्म सर्वथा॥
शिवाराधना से आत्मकल्याण
हृतपुण्डरीकान्तरसन्निविष्टं
स्वतेजसाव्याप्तनभोवकाशं।
अतीन्द्रियंसूक्ष्ममनन्तमाद्यं
ध्यायेत्परानन्दमयंमहेशम्॥
परमानन्दमयभगवान महेश्वर हृदय-कमल के भीतर की कर्णिका में विराजमान हैं, उन्होंने अपने तेज से आकाशमंडल को व्याप्त कर रखा है। वे इन्द्रियातीत, सूक्ष्म, अनन्त एवं सबके आदिकारणहैं। उन भगवान महेश्वर का मैं ध्यान करता हूं।
ॐनम: शिवाय
शिव साक्षात् कल्याण हैं। शिव शुद्ध ब्रह्म हैं। सूर्य की आभा शिव हैं। शिव और शक्ति के प्रभाव से ही सूर्य प्रकाश और ऊष्मा बिखेरने में सक्षम होता है। शिव पराशक्ति हैं। पूरे ब्रह्माण्ड को दो भागों में बांटा गया है-अपरा प्रकृति और परा प्रकृति। अपरा प्रकृति के आठ स्वरूप हैं-भूमि, आप (जल), अनल, वायु, नभ, मन, बुद्धि तथा अहंकार। परा प्रकृति प्राण को कहते हैं, जो आत्मा है और अमर है। इसमें प्रभा-प्रभाकर, शिवा-शिव, नारायणी-नारायणआते हैं, जो परा प्रकृति को जानते हैं। अपरा प्रकृति किसी को नहीं जानती। शिव निराकार हैं, शंकर साकार हैं। शिव जब साकार हो जाते हैं तो गंगाधर, चंद्रशेखर, त्रिलोचन, नीलकंठ एवं दिगंबर कहलाते हैं। ओम का अर्थ है कल्याण रूपी ओंकार परमात्मा। जो शिव निर्गुण निराकार रूप में रोम-रोम में ओम बिराजते, उसी शिव का ध्यान भक्तगण शंकर के रूप में करते हैं। शिव जब सगुण साकार हो कर शंकर बनते हैं तो स्वयं ओम का जाप करते हैं स्वयं की शक्ति में ओज के निमित्त। जैसे सूर्य अपनी आभा में सारी सृष्टि को देखता है, उसी तरह शिव अपनी शिवा में पूरी सृष्टि को देखते हैं। विद्वान संत शिवानन्द स्वामी ने कहा है-
ब्रह्मा विष्णु सदाशिवजानतअविवेका।
प्रणवाक्षरमध्य तीनों ही एका॥
गोस्वामी तुलसीदास ने भी शिव और शक्ति को इस रूप में देखा है-
भवानी शंकरौवंदे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।
याभ्यांविनान पश्यंतिसिद्धास्वांतस्थमीश्वर:॥
अर्थात् मैं श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप भवानी और शंकर की वंदना करता हूं, जिनकी कृपादृष्टि के बिना कोई भी सिद्ध योगी अपने अंतकरणमें अवस्थितईश्वर को देख नहीं सकता।
शिव की आराधना से आत्मबल में वृद्धि होती है। शिवाराधनमें शुद्धता को महत्व दिया जाता है, जिसका आधार फलाहार है। फलाहार से व्यवहार शुद्ध होता है। हर जीव शिव का ही अंश है और जब वह इसकी आराधना करता है तो अंत:सुखकी प्राप्ति होती है। शिव पूजा के लिए बेलपत्र,धूप, पुष्प, जल की महत्ता तो है ही, मगर शिव-श्रद्धा से अति प्रसन्न होते हैं, क्योंकि श्रद्धा जगज्जननीपार्वती हैं और सदाशिवभगवान शंकर स्वयं विश्वास हैं। श्रावण में शिवलिंगकी पूजा का काफी महत्व है, क्योंकि शिवलिंगभी अपने आप में भगवान शिव का ही एक विग्रह है। इसे सर्वतोमुखी भी कहा गया है, क्योंकि इसके चारों ओर मुख होते हैं। हमारे सतानतधर्म में जो 33करोड देवता हैं, उनकी पूजा शिवलिंगमें बिना आह्वान के ही मान्य हो जाती है। शिव की पूजा वस्तुत:आत्मकल्याण के लिए ही किया जाना चाहिए, न कि सांसारिक वैभव के लिए।
सभी देवों में श्रेष्ठ हैं महादेव
स्तुत्वाचवाग्भिरमलाभिरतंद्रिताभि:।
दीप्तैस्तमासिनुदतेस्वकरैर्विवस्वां
तंशंकरंशरणदंशरणंव्रजामि॥
जिन वरदायक भगवान के चरणों में भक्तिपूर्वकप्रणाम करने तथा आलस्य रहित निर्मल वाणी द्वारा जिनकी स्तुति करके सूर्य देव अपनी उद्दीप्त किरणों से जगत का अंधकार दूर करते हैं, उन शरणदाताभगवान शंकर की शरण ग्रहण करता हूं।
ॐनम: शिवाय
तेंतीस कोटि देवी-देवताओं का अपना-अपना अलग-अलग महत्व है, परन्तु सनातन धर्म में शिव का महत्व अत्यंत व्यापक है। इसलिए कि ये ऐसे देव हैं, जो क्षणिक साधना से भी अपने आराधकपर प्रसन्न हो जाते हैं। यही कारण है कि इन्हें सभी देवों में श्रेष्ठ और महादेव कहा गया है। भगवान शिव ऐसे देवता हैं कि जब प्रसन्न होते हैं तो अपने भक्त की कोई भी कामना पूरी करने में कोई संकोच नहीं करते। शिव के असंख्य स्वरूप हैं और उन्हीं स्वरूपों में से एक है रुद्र रूप। रुद्र सभी प्रकार के दुख-दारिद्र मिटानेवाले देवता हैं। रुद्र के भी पांच विग्रह हैं-रूपक, रुद्र, रुद्री,महारुद्रऔर अतिरुद्र।इसी प्रकार शिव की पूजा-अर्चना विभिन्न नामों से होती है। शास्त्रों में शिव की पूजा-अर्चना के सरल विधानों की चर्चा की गई है। शास्त्रों के अनुसार रात्रि वेला में उत्तराभिमुखहोकर, प्रात:काल में पूर्व दिशा में मुंह कर तथा संध्या काल में पश्चिम दिशा की ओर मुंह कर भगवान शिव की अर्चना करनी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि श्रद्धालु भक्तगण शिव मंदिर या अपने घर में स्नान के बाद शुद्ध आसन पर बैठ जाएं और इन मंत्रों का उच्चारण करते हुए तीन बार आचमन करें-ॐ केशवायनम: ॐनारायणायनम: ॐमाधवायनम:। इसके उपरांत न्यास-ध्यान पूर्वक भगवान शिव की पूजा करें। इससे भक्तों की मनोकामना तो पूर्ण हो ही जाती है, संतानों को भी उसका फल मिलता है और घर में सुख-शांति बनी रहती है।
संपूर्ण कर्मो का त्याग कर शांत हृदय से जो भक्त रुद्राभिषेक करता है, उसके सभी दुखों का नाश हो जाता है। भगवान शिव का एक अत्यंत प्रभावशाली विग्रह है शिवलिंग।यह सर्वत्र ही सहज उपलब्ध होता है और इसकी पूजा-अर्चना भी अत्यंत सरल होती है। मात्र जल और बेलपत्रशिव लिंग पर अर्पित करने से भी भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं। शास्त्रों ने शिवलिंगकी पूजा का महात्म्यबताया है, जिसके अनुसार जो मनुष्य एक बार भी धतूरा के फूल और फल से शिवलिंगकी पूजा करता है, उसे गोदान का फल प्राप्त होता है। शिवलिंगकी पूजा करने से मनुष्य को श्रेष्ठ विद्या की प्राप्ति होती है। वह भक्त धन-धान्य और समृद्धि से परिपूर्ण जीवन व्यतीत कर मृत्यु के उपरांत सीधे शिवलोक गमन करता है। पार्थिव लिंग की पूजा से कार्यसिद्धि, पुष्पमयलिंग के पूजन से भूमि की प्राप्ति, नमक द्वारा निर्मित शिवलिंगके पूजन से सौभाग्य, वंशांकुर निर्मित शिवलिंगके पूजन से वंशवृद्धि और स्वर्ण निर्मित शिवलिंगके पूजन से महामुक्तिप्राप्त होती है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी कामनासिद्धिके लिए अवश्य ही शिव की पूजा-अर्चना करे और इसके सर्वश्रेष्ठ समय होता श्रावण।
वेद ही शिव हैं, शिव ही वेद
दु:स्वप्नदुश्शकुनदुर्गतिदौर्मनस्य,दुर्भिक्षदुर्व्यसनदुस्सहदुर्यशांसि।
उत्पाततापविषभीतिमसद्ग्रहार्ति,
व्याधीश्चनाशयतुमेजगतातमीश:॥
जगदीश्वरभगवान शिव मेरे बुरे स्वप्न, बुरे शकुन, बुरी गति, मन की दुष्ट भावना, दुर्भिक्ष, दुर्व्यसन, दुस्सह अपयश, उत्पात, संताप, विषभय,दुष्ट ग्रहों की पीडा तथा समस्त रोगों का नाश करें।
वेद: शिव: शिवोवेद:। अर्थात् वेद ही शिव हैं और शिव ही वेद हैं। अर्थात् शिव वेद स्वरूप हैं। यह भी कहा गया है कि वेद नारायण का साक्षात् स्वरूप हैं-वेदो नारायण: साक्षात् स्वयंभूतिरितिसुश्रूम।इसके साथ ही वेद को परमात्मप्रभु का नि:श्वास कहा गया है। वेद के प्रावधान के अनुरूप ही सनातन जगत में अनादि भगवान शिवजी का पूजन अभिषेक, यज्ञ और जप आदि किया जाता है। शिव और रुद्र ब्रह्म के ही पर्यायवाची शब्द हैं। शिव को रुद्र इसलिए कहा जाता है कि यह रुत अर्थात् दुख को विनष्ट कर देते हैं-रुतम दुखमद्रावयति-नाशयतीतिरुद्र:। अर्थात् शिव का अर्थ है कल्याण। इस शरीर में शिव न रहें तो व्यक्ति शव हो जाता है। यही कारण है कि अपने भीतर शिव को जाग्रत करने के लिए ही ॐ नम: शिवायका जाप किया जाता है। मनुष्य का मन विषयलोलुप हो कर अधोगति को प्राप्त न हो और व्यक्ति अपनी चित्तवृत्तियोंको स्वच्छ रख सके, इसके निमित्त रुद्र का अनुष्ठान करना मुख्य और उत्कृष्ट साधन है। यह रुद्रानुष्ठानप्रवृत्ति मार्ग से निवृत्ति मार्ग को प्राप्त कराने में समर्थ है। जो व्यक्ति समुद्र, वन, पर्वत, वृक्षों तथा श्रेष्ठ गुणों से युक्त ऐसी पृथ्वी का दान करता है, जो धन-धान्य, सुवर्ण और औषधियों से युक्त है, उससे भी अधिक पुण्य एक बार में रुद्रीजपएवं रुद्राभिषेक से प्राप्त हो जाता है। इसलिए जो भगवान रुद्र का ध्यान करके रुद्रीका पाठ करता है, वह उसी देह से निश्चित ही रुद्रमयहो जाता है। सोमवारीव्रत श्रावण मास के सभी सोमवार को किया जाता है।
इस समय व्रतों और पूजा का विशेष महत्व है। यह व्रत अत्यंत शुभकारीऔर फलदायीहोता है। श्रावण में इस व्रत को धारण करनेवाले सभी भक्तों पर शिव अपनी विशेष अनुकंपा रखते हैं। सभी मनोकामनाएंपूर्ण होती हैं। सावन के प्रत्येक सोमवार को शिव के अलावा जगज्जननीपार्वती, गणेश जी तथा नंदी जी की पूजा की जानी चाहिए। भगवान शिव की पूजा के लिए आसन पर पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुखबैठ जाएं। फिर पूजन तथा अभिषेक सामग्री जैसे दूध, जल, शहद, घी, गुड, जनेऊ, चंदन, रोली, बेलपत्र,भांग-धतूरा, धूप, दीप से पूजन करना चाहिए। कपूर से आरती करके रात्रि में जागरण करे। इसलिए सोलह सोमवार व्रत कथा का महात्म्यसुनना चाहिए।
शुक्रवार, 28 नवंबर 2008
अनिष्ट निवारक शंख
शंख निधि का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि इस मंगलचिह्न को घर के पूजास्थल में रखने से अरिष्टों एवं अनिष्टों का नाश होता है और सौभाग्य की वृद्धि होती है। भारतीय धर्मशास्त्रों में शंख का विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण स्थान है। मंदिरों एवं मांगलिक कार्यों में शंख-ध्वनि करने का प्रचलन है। मान्यता है कि इसका प्रादुर्भाव समुद्र-मंथन से हुआ था। समुद्र-मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में शंख भी एक है। विष्णु पुराण के अनुसार माता लक्ष्मी समुद्रराज की पुत्री हैं तथा शंख उनका सहोदर भाई है। अत यह भी मान्यता है कि जहाँ शंख है, वहीं लक्ष्मी का वास होता है। स्वर्गलोक में अष्टसिद्धियों एवं नवनिधियों में शंख का महत्वपूर्ण स्थान है। भगवान विष्णु इसे अपने हाथों में धारण करते हैं।
धार्मिक कृत्यों में शंख का उपयोग किया जाता है। पूजा-आराधना, अनुष्ठान-साधना, आरती, महायज्ञ एवं तांत्रिक क्रियाओं के साथ शंख का वैज्ञानिक एवं आयुर्वेदिक महत्व भी है। प्राचीन काल से ही प्रत्येक घर में शंख की स्थापना की जाती है। शंख को देवता का प्रतीक मानकर पूजा जाता है एवं इसके माध्यम से अभीष्ट की प्राप्ति की जाती है। शंख की विशिष्ट पूजन पद्धति एवं साधना का विधान भी है। कुछ गुह्य साधनाओं में इसकी अनिवार्यता होती है। शंख कई प्रकार के होते हैं और सभी प्रकारों की विशेषता एवं पूजन-पद्धति भिन्न-भिन्न है। शंख साधक को उसकी इच्छित मनोकामना पूर्ण करने में सहायक होते हैं तथा जीवन को सुखमय बनाते हैं। उच्च श्रेणी के श्रेष्ठ शंख कैलाश मानसरोवर, मालद्वीप, लक्षद्वीप, कोरामंडल द्वीप समूह, श्रीलंका एवं भारत में पाये जाते हैं।
शंख की आकृति के आधार पर इसके प्रकार माने जाते हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं - दक्षिणावृत्ति शंख, मध्यावृत्ति शंख तथा वामावृत्ति शंख। जो शंख दाहिने हाथ से पकड़ा जाता है, वह दक्षिणावृत्ति शंख कहलाता है। जिस शंख का मुँह बीच में खुलता है, वह मध्यावृत्ति शंख होता है तथा जो शंख बायें हाथ से पकड़ा जाता है, वह वामावृत्ति शंख कहलाता है। मध्यावृत्ति एवं दक्षिणावृति शंख सहज रूप से उपलब्ध नहीं होते हैं। इनकी दुर्लभता एवं चमत्कारिक गुणों के कारण ये अधिक मूल्यवान होते हैं। इनके अलावा लक्ष्मी शंख, गोमुखी शंख, कामधेनु शंख, विष्णु शंख, देव शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख, सुघोष शंख, गरुड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, राक्षस शंख, शनि शंख, राहु शंख, केतु शंख, शेषनाग शंख, कच्छप शंख आदि प्रकार के होते हैं।
महाभारत काल में सभी योद्धाओं ने युद्ध घोष के लिए अलग-अलग शंख बजाए थे। गीता के प्रथम अध्याय के श्लोक 15-19 में इसका वर्णन मिलता है -
पांचजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदर।।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर।
नकुल सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ।।
काश्यश्च परमेष्वास शिखण्डी च महारथ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजिताः।।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वश पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्।।
अर्थात् श्रीकृष्ण भगवान ने पांचजन्य नामक, अर्जुन ने देवदत्त और भीमसेन ने पौंड्र शंख बजाया। कुंती-पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनंतविजय शंख, नकुल ने सुघोष एवं सहदेव ने मणिपुष्पक नामक शंख का नाद किया। इसके अलावा काशीराज, शिखंडी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट, सात्यकि, राजा द्रुपद, द्रौपदी के पाँचों पुत्रों और अभिमन्यु आदि सभी ने अलग-अलग शंखों का नाद किया।
शंख को विजय, समृद्धि, सुख, यश, कीर्ति तथा लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। वैदिक अनुष्ठानों एवं तांत्रिक क्रियाओं में भी विभिन्न प्रकार के शंखों का प्रयोग किया जाता है। पारद शिवलिंग, पार्थिव शिवलिंग एवं मंदिरों में शिवलिंगों पर रुद्राभिषेक करते समय शंखध्वनि की जाती है। आरती, धार्मिक उत्सव, हवन-क्रिया, राज्याभिषेक, गृह-प्रवेश, वास्तु-शांति आदि शुभ अवसरों पर शंखध्वनि से लाभ मिलता है। पितृ-तर्पण में शंख की अहम भूमिका होती है।
घर में पूजा-वेदी पर शंख की स्थापना की जाती है। निर्दोष एवं पवित्र शंख को दीपावली, होली, महाशिवरात्रि, नवरात्र, रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य नक्षत्र आदि शुभ मुहूर्त में विशिष्ट कर्मकांड के साथ स्थापित किया जाता है। रुद्र, गणेश, भगवती, विष्णु भगवान आदि के अभिषेक के समान शंख का भी गंगाजल, दूध, घी, शहद, गुड़, पंचद्रव्य आदि से अभिषेक किया जाता है। इसका धूप, दीप, नैवेद्य से नित्य पूजन करना चाहिए और लाल वस्त्र के आसन में स्थापित करना चाहिए। शंखराज सबसे पहले वास्तु-दोष दूर करते हैं। मान्यता है कि शंख में कपिला (लाल) गाय का दूध भरकर भवन में छिड़काव करने से वास्तुदोष दूर होते हैं। परिवार के सदस्यों द्वारा आचमन करने से असाध्य रोग एवं दुःख-दुर्भाग्य दूर होते हैं। विष्णु शंख को दुकान, ऑफिस, फैक्टरी आदि में स्थापित करने पर वहाँ के वास्तु-दोष दूर होते हैं तथा व्यवसाय आदि में लाभ होता है।
शंख की स्थापना से घर में लक्ष्मी का वास होता है। स्वयं माता लक्ष्मी कहती हैं कि शंख उनका सहोदर भ्राता है। शंख, जहाँ पर होगा, वहाँ वे भी होंगी। देव प्रतिमा के चरणों में शंख रखा जाता है। पूजास्थली पर दक्षिणावृत्ति शंख की स्थापना करने एवं पूजा-आराधना करने से माता लक्ष्मी का चिरस्थायी वास होता है। इस शंख की स्थापना के लिए नर-मादा शंख का जोड़ा होना चाहिए। गणेश शंख में जल भरकर प्रतिदिन गर्भवती नारी को सेवन कराने से संतान गूंगेपन, बहरेपन एवं पीलिया आदि रोगों से मुक्त होती है। अन्नपूर्णा शंख की व्यापारी व सामान्य वर्ग द्वारा अन्नभंडार में स्थापना करने से अन्न, धन, लक्ष्मी, वैभव की उपलब्धि होती है। मणिपुष्पक एवं पांचजन्य शंख की स्थापना से भी वास्तु-दोषों का निराकरण होता है। शंख का तांत्रिक-साधना में भी उपयोग किया जाता है। इसके लिए लघु शंखमाला का प्रयोग करने से शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है।
वैज्ञानिकों के अनुसार शंख-ध्वनि से वातावरण का परिष्कार होता है। इसकी ध्वनि के प्रसार-क्षेत्र तक सभी कीटाणुओं का नाश हो जाता है। इस संदर्भ में अनेक प्रयोग-परीक्षण भी हुए हैं। आयुर्वेद के अनुसार शंखोदक भस्म से पेट की बीमारियाँ, पीलिया, यकृत, पथरी आदि रोग ठीक होते हैं। त्र+षि श्रृंग की मान्यता है कि छोटे-छोटे बच्चों के शरीर पर छोटे-छोटे शंख बाँधने तथा शंख में जल भरकर अभिमंत्रित करके पिलाने से वाणी-दोष नहीं रहता है। बच्चा स्वस्थ रहता है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि मूक एवं श्वास रोगी हमेशा शंख बजायें तो बोलने की शक्ति पा सकते हैं। हृदय रोगी के लिए यह रामबाण औषधि है। दूध का आचमन कर कामधेनु शंख को कान के पास लगाने से `ँ़' की ध्वनि का अनुभव किया जा सकता है। यह सभी मनोरथों को पूर्ण करता है।
वर्तमान समय में वास्तु-दोष के निवारण के लिए जिन चीजों का प्रयोग किया जाता है, उनमें से यदि शंख आदि का उपयोग किया जाए तो कई प्रकार के लाभ हो सकते हैं। यह न केवल वास्तु-दोषों को दूर करता है, बल्कि आरोग्य वृद्धि, आयुष्य प्राप्ति, लक्ष्मी प्राप्ति, पुत्र प्राप्ति, पितृ-दोष शांति, विवाह में विलंब जैसे अनेक दोषों का निराकरण एवं निवारण भी करता है। इसे पापनाशक बताया जाता है। अत शंख का विभिन्न प्रकार की कामनाओं के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
