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सोमवार, 27 अप्रैल 2009

भगवान शिव के १०८ नाम

  1. शिव - कल्याण स्वरूप
  2. महेश्वर - माया के अधीश्वर
  3. शम्भू - आनंद स्स्वरूप वाले
  4. पिनाकी - पिनाक धनुष धारण करने वाले
  5. शशिशेखर - सिर पर चंद्रमा धारण करने वाले
  6. वामदेव - अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले
  7. विरूपाक्ष - भौंडी आँख वाले
  8. कपर्दी - जटाजूट धारण करने वाले
  9. नीललोहित - नीले और लाल रंग वाले
  10. शंकर - सबका कल्याण करने वाले
  11. शूलपाणी - हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले
  12. खटवांगी - खटिया का एक पाया रखने वाले
  13. विष्णुवल्लभ - भगवान विष्णु के अतिप्रेमी
  14. शिपिविष्ट - सितुहा में प्रवेश करने वाले
  15. अंबिकानाथ - भगवति के पति
  16. श्रीकण्ठ - सुंदर कण्ठ वाले
  17. भक्तवत्सल - भक्तों को अत्यंत स्नेह करने वाले
  18. भव - संसार के रूप में प्रकट होने वाले
  19. शर्व - कष्टों को नष्ट करने वाले
  20. त्रिलोकेश - तीनों लोकों के स्वामी
  21. शितिकण्ठ - सफेद कण्ठ वाले
  22. शिवाप्रिय - पार्वती के प्रिय
  23. उग्र - अत्यंत उग्र रूप वाले
  24. कपाली - कपाल धारण करने वाले
  25. कामारी - कामदेव के शत्रु
  26. अंधकारसुरसूदन - अंधक दैत्य को मारने वाले
  27. गंगाधर - गंगा जी को धारण करने वाले
  28. ललाटाक्ष - ललाट में आँख वाले
  29. कालकाल - काल के भी काल
  30. कृपानिधि - करूणा की खान
  31. भीम - भयंकर रूप वाले
  32. परशुहस्त - हाथ में फरसा धारण करने वाले
  33. मृगपाणी - हाथ में हिरण धारण करने वाले
  34. जटाधर - जटा रखने वाले
  35. कैलाशवासी - कैलाश के निवासी
  36. कवची - कवच धारण करने वाले
  37. कठोर - अत्यन्त मजबूत देह वाले
  38. त्रिपुरांतक - त्रिपुरासुर को मारने वाले
  39. वृषांक - बैल के चिह्न वाली झंडा वाले
  40. वृषभारूढ़ - बैल की सवारी वाले
  41. भस्मोद्धूलितविग्रह - सारे शरीर में भस्म लगाने वाले
  42. सामप्रिय - सामगान से प्रेम करने वाले
  43. स्वरमयी - सातों स्वरों में निवास करने वाले
  44. त्रयीमूर्ति - वेदरूपी विग्रह करने वाले
  45. अनीश्वर - जिसका और कोई मालिक नहीं है
  46. सर्वज्ञ - सब कुछ जानने वाले
  47. परमात्मा - सबका अपना आपा
  48. सोमसूर्याग्निलोचन - चंद्र, सूर्य और अग्निरूपी आँख वाले
  49. हवि - आहूति रूपी द्रव्य वाले
  50. यज्ञमय - यज्ञस्वरूप वाले
  51. सोम - उमा के सहित रूप वाले
  52. पंचवक्त्र - पांच मुख वाले
  53. सदाशिव - नित्य कल्याण रूप वाले
  54. विश्वेश्वर - सारे विश्व के ईश्वर
  55. वीरभद्र - बहादुर होते हुए भी शांत रूप वाले
  56. गणनाथ - गणों के स्वामी
  57. प्रजापति - प्रजाओं का पालन करने वाले
  58. हिरण्यरेता - स्वर्ण तेज वाले
  59. दुर्धुर्ष - किसी से नहीं दबने वाले
  60. गिरीश - पहाड़ों के मालिक
  61. गिरिश - कैलाश पर्वत पर सोने वाले
  62. अनघ - पापरहित
  63. भुजंगभूषण - साँप के आभूषण वाले
  64. भर्ग - पापों को भूंज देने वाले
  65. गिरिधन्वा - मेरू पर्वत को धनुष बनाने वाले
  66. गिरिप्रिय - पर्वत प्रेमी
  67. कृत्तिवासा - गजचर्म पहनने वाले
  68. पुराराति - पुरों का नाश करने वाले
  69. भगवान् - सर्वसमर्थ षड्ऐश्वर्य संपन्न
  70. प्रमथाधिप - प्रमथगणों के अधिपति
  71. मृत्युंजय - मृत्यु को जीतने वाले
  72. सूक्ष्मतनु - सूक्ष्म शरीर वाले
  73. जगद्व्यापी - जगत् में व्याप्त होकर रहने वाले
  74. जगद्गुरू - जगत् के गुरू
  75. व्योमकेश - आकाश रूपी बाल वाले
  76. महासेनजनक - कार्तिकेय के पिता
  77. चारुविक्रम - सुन्दर पराक्रम वाले
  78. रूद्र - भक्तों के दुख देखकर रोने वाले
  79. भूतपति - भूतप्रेत या पंचभूतों के स्वामी
  80. स्थाणु - स्पंदन रहित कूटस्थ रूप वाले
  81. अहिर्बुध्न्य - कुण्डलिनी को धारण करने वाले
  82. दिगम्बर - नग्न, आकाशरूपी वस्त्र वाले
  83. अष्टमूर्ति - आठ रूप वाले
  84. अनेकात्मा - अनेक रूप धारण करने वाले
  85. सात्त्विक - सत्व गुण वाले
  86. शुद्धविग्रह - शुद्धमूर्ति वाले
  87. शाश्वत - नित्य रहने वाले
  88. खण्डपरशु - टूटा हुआ फरसा धारण करने वाले
  89. अज - जन्म रहित
  90. पाशविमोचन - बंधन से छुड़ाने वाले
  91. मृड - सुखस्वरूप वाले
  92. पशुपति - पशुओं के मालिक
  93. देव - स्वयं प्रकाश रूप
  94. महादेव - देवों के भी देव
  95. अव्यय - खर्च होने पर भी न घटने वाले
  96. हरि - विष्णुस्वरूप
  97. पूषदन्तभित् - पूषा के दांत उखाड़ने वाले
  98. अव्यग्र - कभी भी व्यथित न होने वाले
  99. दक्षाध्वरहर - दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले
  100. हर - पापों व तापों को हरने वाले
  101. भगनेत्रभिद् - भग देवता की आंख फोड़ने वाले
  102. अव्यक्त - इंद्रियों के सामने प्रकट न होने वाले
  103. सहस्राक्ष - अनंत आँख वाले
  104. सहस्रपाद - अनंत पैर वाले
  105. अपवर्गप्रद - कैवल्य मोक्ष देने वाले
  106. अनंत - देशकालवस्तुरूपी परिछेद से रहित
  107. तारक - सबको तारने वाला
  108. परमेश्वर - सबसे परे ईश्वर

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

नर्मदा का हर कंकर शंकर

पुण्याकनखलेगंगा कुरुक्षेत्रेसरस्वती।

ग्रामेवायदि वारण्येपुण्यासर्वत्र नर्मदा।

त्रिभि:सारस्वतंपुण्यंसप्ताहेनतुयामुनम्।

सद्य:पुनातिगाङ्गेयंदर्शनादेवनर्मदाम्।

गंगा हरिद्वार तथा सरस्वती कुरुक्षेत्र में अत्यंत पुण्यमयीकही गयी है, किंतु नर्मदा चाहें गांव के बगल से बह रही हो या जंगल के बीच, वे सर्वत्र पुण्यमयीहैं। सरस्वती का जल तीन दिनों में, यमुनाजीका एक सप्ताह में तथा गंगाजीका जल स्पर्श करते ही पवित्र कर देता है किन्तु नर्मदा का जल केवल दर्शन मात्र से पावन कर देता है।

पुराणों में पुरुरवातथा हिरण्यतेजाके तप से नर्मदा जी के पृथ्वी पर पधारने की कथा का विस्तार से वर्णन है। भूलोक में भगवती नर्मदा का आगमन इनकी कठोर तपस्या के फलस्वरूप ही हुआ। स्कन्दपुराणका रेवाखण्डइस संदर्भ में पर्याप्त प्रकाश डालता है। वह स्थान अतिपवित्रहै, जहां नर्मदा जी विद्यमान हैं। नर्मदा के तट पर जहां कहीं भी स्नान, दान, जप, होम, वेद-पाठ, पितृ-तर्पण, देवाराधन, मंत्रोपदेश, सन्यास-ग्रहण और देह-त्याग आदि जो कुछ भी किया जाता है, उसका अनंत फल होता है। माघ, वैशाख अथवा कार्तिक की पूर्णिमा, विषुवयोग, संक्रान्तिकाल, व्यतिपातएवं वैधृतियोग, तिथि की वृद्धि अथवा क्षय (हानि), मन्वादि, युगादि, कल्पादितिथियों में नर्मदा का सेवन अक्षय पुण्य प्रदान करता है। नर्मदा में स्नान से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और अश्वमेध जो यज्ञ का फल प्राप्त होता है। प्रात:काल उठकर नर्मदा का कीर्तन करता है, उसका सात जन्मों का किया हुआ पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है। नर्मदा के जल से तर्पण करने पर पितरोंको तृप्ति और सद्गति प्राप्त होती है।

स्कन्दपुराणके अनुसार नर्मदा का पहला अवतरण आदिकल्पके सत्ययुग में हुआ था। दूसरा अवतरण दक्षसावर्णिमन्वन्तर में हुआ। तीसरा अवतरण राजा पुरुरवाद्वारा वैष्णव मन्वन्तर में हुआ। नर्मदा में स्नान करने, गोता लगाने, उसका जल पीने तथा नर्मदा का स्मरण एवं कीर्तन करने से अनेक जन्मों के घोर पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। नर्मदा समस्त सरिताओं में श्रेष्ठ है। वे सम्पूर्ण जगत् को तारने के लिये ही धरा पर अवतीर्ण हुई हैं। इनकी कृपा से भोग और मोक्ष, दोनो सुलभ हो जाते हैं।

धर्मग्रन्थों में नर्मदा में प्राप्त होने वाले बाणलिंग (नर्मदेश्वर)की बडी महिमा बतायी गई है। नर्मदेश्वर (बाणलिंग) को स्वयंसिद्ध शिवलिंगमाना गया है। इनकी प्राण-प्रतिष्ठा नहीं होती। आवाहन किए बिना इनका पूजन सीधे किया जा सकता है। कल्याण के शिवपुराणांक में वर्तमान श्रीविश्वेश्वर-लिंगको बाणलिङ्गबताया गया है। मेरुतंत्रके चतुर्दश पटल में स्पष्ट लिखा है कि नर्मदेश्वरके ऊपर चढे हुए सामान को ग्रहण किया जा सकता है। शिव-निर्माल्य के रूप उसका परित्याग नहीं किया जाता। बाणलिङ्ग (नर्मदेश्वर) के ऊपर निवेदित नैवेद्य को प्रसाद की तरह खाया जा सकता है। इस प्रकार नर्मदेश्वरगृहस्थोंके लिए सर्वश्रेष्ठ शिवलिंगहै। नर्मदा का बाणलिङ्गभुक्ति और मुक्ति, दोनों देता है।

आचार्यो का निर्देश है कि नर्मदा से बाणलिङ्गप्राप्त करने के उपरांत पहले उसकी ग्राह्यताकी परीक्षा करें। सर्वप्रथम बाणलिङ्गको चावल से ठीक प्रकार से तौलें। हाथ में लेने के बाद दोबारा पुन:तौलने पर यदि बाणलिङ्गहलका ठहरे तो वह गृहस्थोंके लिए पूजनीय होगा। कई बार तौलने पर भी यदि वजन बिल्कुल बराबर निकले तो उस लिङ्गको नर्मदा जी में विसर्जितकर दें। यदि बाणलिङ्गतौल में भारी सिद्ध हो तो वह उदासीनोंके लिए उपयुक्त रहेगा। तौल में कमी-बेशी ही बाणलिङ्गकी प्रमुख पहचान है। नर्मदा के नर्मदेश्वरअपने विशिष्ट गुणों के कारण शिव-भक्तों के परम आराध्य हैं।

भगवती नर्मदा की उपासना युगों से होती आ रही हैं। मेरुतंत्रमें नर्मदा देवी के निम्न मंत्र का उल्लेख है-

ऐं श्रींमेकल-कन्यायैसोमोद्भवायैदेवापगायैनम:।

इस मंत्र के ऋषि भृगु, छन्द अमित और देवता नर्मदा हैं। उनके अधिदैविक स्वरूप का ध्यान इस प्रकार करें-

कनकाभांकच्छपस्थांत्रिनेत्रांबहुभूषणां।

पद्माभय:सुधाकुम्भ:वराद्यान्विभ्रतींकरै:।

मंत्र के पुरश्चरण में एक लाख जप करने का विधान निर्दिष्ट है। तत्पश्चात् दशांश होम, तर्पणादिसविधि करें। इस मंत्र की साधना से विद्यार्थी विद्या और ज्ञान, धनार्थी सुख-समृद्धि रोगी स्वास्थ्य, पुत्रार्थी पुत्र तथा मोक्षार्थीभव-बंधन से मुक्ति पा जाता है।

पद्मपुराणके स्वर्गखण्डमें देवर्षिनारद भगवती नर्मदा की स्तुति करते हुए कहते हैं-

नम: पुण्यजलेआद्येनम: सागरगामिनि।

नमोऽस्तुतेऋषिगणै:शंकरदेहनि:सृते।

नमोऽस्तुतेधर्मभृतेवराननेनमोऽस्तुतेदेवगणैकवन्दिते।

नमोऽस्तुतेसर्वपवित्रपावनेनमोऽस्तुतेसर्वजगत्सुपूजिते।

पुण्यसलिला नर्मदा तुम सब नदियों में प्रधान हो, तुम्हें नमस्कार है। सागरगामिनीतुमको प्रणाम है। ऋषि-मुनियों द्वारा पूजित तथा भगवान शंकर की देह से प्रकट हुई नर्मदेतुम्हें बारंबार नमस्कार है। सुमुखितुम धर्म को धारण करने वाली हो, तुम्हें प्रणाम है। देवगण तुम्हारे समक्ष मस्तक झुकाते हैं, तुम्हें नमस्कार है। देवि तुम समस्त पवित्र वस्तुओं को भी परम पावन बनाने वाली हो, सारा संसार तुम्हारी पूजा करता है, तुम्हें बारंबार नमस्कार है।

नर्मदा जी का जितना भी गुण-गान किया जाए कम ही होगा। इनका हर कंकर शंकर की तरह पूजा जाता है। नर्मदा का स्वच्छ निर्मल जल पृथ्वी का मानों अमृत ही है। माघ मास के शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को शास्त्रों में नर्मदा जयंती कहा गया है।

साभार : डा. अतुल टण्डन

साक्षात् ब्रह्म का प्रतीक है शिवलिङ्ग

शिवलिंगकी अर्चना अनादिकालसे जगद्व्यापकहै। संसार के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में लिंगोपासना की चर्चा मिलती है। शुक्लयजुर्वेदकी रुद्राष्टाध्यायीके द्वारा शिवार्चन एवं रुद्राभिषेक करने से समस्त कामनाएं पूर्ण होती हैं तथा अन्त में सद्गति भी प्राप्त होती है। रुद्रहृदयोपनिषद्का स्पष्ट कथन है-

सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मका:।

अर्थात् शिव और रुद्र सर्वदेवमयहोने से ब्रह्म के ही पर्यायवाची शब्द हैं। प्राय: सभी पुराणों में शिवलिंगके पूजन का उल्लेख और माहात्म्य मिलता है। हिन्दू साहित्य में जहाँ कहीं भी शिवोपासनाका वर्णन है, वहाँ शिवलिंगकी महिमा का गुण-गान अवश्य हुआ है।

लिंग शब्द का साधारण अर्थ चिह्न अथवा लक्षण है। सांख्य दर्शन में प्रकृति को, प्रकृति से विकृति को भी लिंग कहते हैं। देव-चिह्न के अर्थ में लिंग शब्द भगवान सदाशिवके निर्गुण- निराकार रूप शिवलिंग के संदर्भ में ही प्रयुक्त होता है। स्कन्दपुराणमें लिंग की ब्रह्मपरकव्याख्या इस प्रकार की गई है-

आकाशं लिङ्गमित्याहु:पृथ्वी तस्यपीठिका।

आलय: सर्वदेवानांलयनाल्लिङ्गमुच्यते॥

आकाश लिंग है और पृथ्वी उसकी पीठिका है। इस लिंग में समस्त देवताओं का वास है। सम्पूर्ण सृष्टि का इसमें लय होता है, इसीलिए इसे लिंग कहते हैं।

शिवपुराणमें लिंग शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए कहा गया है-

लिङ्गमर्थ हि पुरुषंशिवंगमयतीत्यद:।

शिव-शक्त्योश्च चिह्नस्यमेलनंलिङ्गमुच्यते॥

अर्थात् शिव-शक्ति के चिह्नोंका सम्मिलित स्वरूप ही शिवलिंगहै। इस प्रकार लिंग में सृष्टि के जनक की अर्चना होती है। लिंग परमपुरुष सदाशिवका बोधक है। इस प्रकार यह विदित होता है कि लिंग का प्रथम अर्थ ज्ञापकअर्थात् प्रकट करने वाला हुआ, क्योंकि इसी के व्यक्त होने से सृष्टि की उत्पत्ति हुई। दूसरा अर्थ आलय है अर्थात् यह प्राणियों का परम कारण है और निवास-स्थान है। तीसरा अर्थ यह है कि प्रलय के समय सब कुछ जिसमें लय हो जाए वह लिंग है। समस्त देवताओं का वास होने से यह लिंग सर्वदेवमयहै। लिंग के आधार रूप में जो तीन मेखलायुक्तवेदिका है, वह भग रूप में कही जाने वाली जगद्धात्री महाशक्ति है। अत:आधार सहित लिंग जगत् का कारण है, उमा-महेश स्वरूप लिंग और वेदी के समायोग में भगवान शंकर के अर्धनारीश्वररूप के ही दर्शन होते हैं। सृष्टि के समय परमपुरुष सदाशिवअपने ही अर्धागसे प्रकृति (शक्ति) को पृथक कर उसके माध्यम से समस्त सृष्टि की उत्पत्ति करते हैं। इस प्रकार शिव- शक्ति का लिंग-योनिभाव और अ‌र्द्धनारीश्वर भाव मूलत:एक ही है। सृष्टि के बीज को देने वाले परमलिंगरूपश्रीशिवजब अपनी प्रकृतिरूपाशक्ति (योनि) से आधार-आधेय की भाँति संयुक्त होते हैं, तभी सृष्टि की उत्पत्ति होती है, अन्यथा नहीं। श्रीमद्भगवद्गीताके 14वें अध्याय के तीसरे श्लोक से इस तथ्य की पुष्टि होती है-

मम योनिर्महद्ब्रह्मतस्मिन्गर्भदधाम्यहम्।

ंभवत:सर्वभूतानांततोभवतिभारत॥

भगवान कहते हैं- महद्ब्रह्म(महान प्रकृति) मेरी योनि है, जिसमें मैं बीज देकर गर्भ का संचार करता हूँ और इसी से सम्पूर्ण सृष्टि (सब भूतों) की उत्पत्ति होती है। वस्तुत:अनादि सदाशिव-लिंगऔर अनादि प्रकृति-योनि के संयोग से ही सारी सृष्टि उत्पन्न होती है। इस दोनों के बिना सृष्टि की संरचना संभव नहीं है। शिवलिंग (परमपुरुष) जगदम्बारूपीजलहरीसे वेष्टित होने से प्रकृतिसंस्पृष्टपुरुषोत्तम है-

पीठमम्बामयं सर्वशिवलिङ्गंचचिन्मयम्।

अत: इसे जड समझना उचित न होगा। लिंगपुराणमें लिंगोद्भवकी कथा है। सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा और विष्णु के मध्य एक बार यह विवाद हो गया कि उन दोनों में कौन श्रेष्ठ है? इतने में उन्हें एक वृहत् ज्योतिर्लिगदिखाई दिया। उसके मूल और परिमाण का पता लगाने के लिए ब्रह्मा ऊपर गए और विष्णु नीचे, किंतु दोनों को उस लिंग के आदि-अन्त का पता न चला। तभी वेद ने प्रकट होकर उन्हें समझाया कि प्रणव (ॐ) में अ कार ब्रह्मा है, उ कार विष्णु है और म कार महेश है। म कार ही बीज है और वही बीज लिंगरूपसे सबका परम कारण है। लिंगपुराणशिवलिंगको त्रिदेवमयऔर शिव-शक्ति का संयुक्त स्वरूप घोषित करता है-

मूले ब्रह्मा तथा मध्येविष्णुस्त्रिभुवनेश्वर:।

रुद्रोपरिमहादेव: प्रणवाख्य:सदाशिव:॥

लिङ्गवेदीमहादेवी लिङ्गसाक्षान्महेश्वर:।

तयो:सम्पूजनान्नित्यंदेवी देवश्चपूजितो॥

शिवलिंगके मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा शीर्ष में शंकर हैं। प्रणव (ॐ) स्वरूप होने से सदाशिवमहादेव कहलाते हैं। शिवलिंगप्रणव का रूप होने से साक्षात् ब्रह्म ही है। लिंग महेश्वर और उसकी वेदी महादेवी होने से लिगांचर्नके द्वारा शिव-शिक्त दोनों की पूजा स्वत:सम्पन्न हो जाती है। भगवान सदाशिवस्वयं लिंगार्चन की प्रशंसा करते हैं-

लोकं लिङ्गात्मकंज्ञात्वालिङ्गेयोऽर्चयतेहि माम्।

न मेतस्मात्प्रियतर:प्रियोवाविद्यतेक्वचित्॥

जो भक्त संसार के मूल कारण महाचैतन्यलिंग की अर्चना करता है तथा लोक को लिंगात्मकजानकर लिंग-पूजा में तत्पर रहता है, मुझे उससे अधिक प्रिय अन्य कोई नर नहीं है।

वस्तुत:शिवलिंगसाक्षात् ब्रह्म का ही प्रतिरूप है। इस तथ्य को जान लेने पर साधक को शिवलिंगमें ब्रह्म का साक्षात्कार अवश्य होता है।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

जय जगदीश्वर जय परमेश्वर

गौरी सुताय ॐ नम ॐ
लम्बोदराय ॐ नम ॐ ( गौरी)
विघ्नेश्वराय ॐ नम ॐ
विश्वेश्वराय ॐ नम ॐ

शंकर गुरु जय शंकर गुरु
शंकर भगवत्पद शंकर गुरु ( शंकर)
अपार महिमा शंकर गुरु
दया सागर शंकर गुरु
गुरुदेव गुरुदेव सद्गुरु नाथ गुरु देव

लिंगोत्भवकर लिंगेश्वर
परमेश्वर मम पाहि प्रभो
पाहि प्रभो मम पाहि विभो

बोलो बोलो सब मिल बोलो ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
जूट जटा में गंगा धारी
त्रिशूल धारी डमरू बजावे
डम डम डम डमरू बाजे
गूंज उठा, ॐ नमः शिवाय
ॐ नम शिवाय, ॐ नमः शिवाय, ॐ नम शिवाय

गंगा धर शिव गौरी शिव
शम्भो शंकर साम्ब शिव ( गंगा)
जय जगदीश्वर जय परमेश्वर
जगदाधार जगदीश्वर
विश्वाधर विश्वेश्वर
शम्भो शंकर साम्ब शिव

चंद्र शेखराय नम ॐ
गंगाधराय नम ॐ
ॐ नम शिवाय नम ॐ
हर हर हराय नम ॐ
शिव शिव शिवाय नम ॐ
सायीश्वराय नम ॐ

शिव शम्भो शम्भो शिव शम्भो महादेव

हरि ॐ नमः शिवाय
हरि ॐ नमः शिवाय( हरि ॐ)
हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ नमः शिवाय
हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ नमः शिवाय

शंकर शिव शंकर शिव शंकर शम्भो
शंकर शिव शंकर शिव शम्भो महादेव ( शंकर)
डम डम डमरु बाजे शंकर घन घन घंटा बाजे
हर भोले नाथ शम्भो शंकर साईं नाथ शम्भो

शंकर साम्ब शिव हर हर
शंकर साम्ब शिव जय जय ( शंकर)
गंगा जटाधर गौरी महेश
चंद्र कलाधर हे परमेश
कैलासवास काशी पते
करुणा सागर गौरी पते

गंगा जटाधर गौरी शंकर गिरिजा मनरमण
जय मृत्युंजय महादेव महेश्वर मनग शुभ चरण
नंदी वाहन नाग भूषण
निरुपम गुणसदन
नटनमनोहर नील कण्ठ हर
नीरजदल नयन

ॐ शिव ॐ शिव परात्पर शिव ओंकार शिव तव शरणं
नमामि शंकर भजामि शंकर
उमामहेश्वर तव शरणं ( ॐ)
गौरी शंकर शम्भो शंकर साम्ब सदाशिव तव शरणं

शिव शंकर पार्वती रमण
गंगाधर भुवन धारण
शरणागत वंदित शरण
करुणाकर भवभय हरण

नन्दीश्वर हे नटराज
नंदात्मज हरि नारायण
नागभरण नमः शिवाय
नादस्वरूप नमो नमो

शम्भो महादेव मल्लिकार्जुन
मंगल चरण त्रिलोचन
शुभ मंगल चरण त्रिलोचन
पिनाकधारी पार्वतीरमण
भवभय हरण सनातन
पार्वतीरमण पतितपावन

शिव शम्भो शम्भो शिव शम्भो महादेव
हर हर महादेव शिव शम्भो महादेव
हल हल धर शम्भो अनाथ नाथ शम्भो
हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ नमः शिवाय

गंगाधर शिव गौरी शिव
शम्भो शंकर साम्ब शिव ( गंगा)
जय जगदीश्वर जय परमेश्वर
हे जगदीश जगदीश्वर
विश्वाधार विश्वेश्वर
शम्भो शंकर साम्ब शिव

भोले नाथ का विराट स्वरूप

जगत पिता के नाम से हम भगवान शिव को पुकारते हैं। भगवान शिव को सर्वव्यापी व लोग कल्याण का प्रतीक माना जाता है जो पूर्ण ब्रह्म है। धर्मशास्त्रों के ज्ञाता ऐसा मानते हैं कि शिव शब्द की उत्पत्ति वंश कांतौ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है- सबको चाहने वाला और जिसे सभी चाहते है। शिव शब्द का ध्यान मात्र ही सबको अखंड, आनंद, परम मंगल, परम कल्याण देता है।
शिव भारतीय धर्म, संस्कृति, दर्शन ज्ञान को संजीवनी प्रदान करने वाले हैं। इसी कारण अनादि काल से भारतीय धर्म साधना में निराकार रूप में शिवलिंग की व साकार रूप में शिवमूर्ति की पूजा होती है। शिवलिंग को सृष्टि की सर्वव्यापकता का प्रतीक माना जाता है। भारत में भगवान शिव के अनेक ज्योतिलिंग सोमनाथ, विश्वनाथ, त्र्यम्बकेश्वर, वैधनाथस नागेश्वर, रामेश्वर, घुवमेश्वर हैं। ये देश के विभिन्न हिस्सों उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम में स्थित हैं, जो महादेव की व्यापकता को प्रकट करते हैं शिव को उदार ह्रदय अर्थात् भोले भंडारी कहा जाता है। कहते हैं ये थोङी सी पूजा-अर्चना से ही प्रसन्न हो जाते हैं। अतः इनके भक्तों की संख्या भारत ही नहीं विदेशों तक फैली है। यूनानी, रोमन, चीनी, जापानी संस्कृतियों में भी शिव की पूजा व शिवलिंगों के प्रमाण मिले हैं। भगवान शिव का महामृत्जुंजय मंत्र पृथ्वी के प्रत्येक प्राणी को दीर्घायु, समृद्धि, शांति, सुख प्रदान करता रहा है और चिरकाल तक करता रहेगा। भगवान शिव की महिमा प्रत्येक भारतीय से जूङा है। मानव जाति की उत्पत्ति भी भगवान शिव से मानी जाती है। अतः भगवान शिव के स्वरूप को जानना प्रत्येक मानव के लिए जरूरी है।
जटाएं- शिव को अंतरिक्ष का देवता कहते हैं, अतः आकाश उनकी जटा का स्वरूप है, जटाएं वायुमंडल का प्रतीक हैं।
1चंद्र- चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन भोला, निर्मल, पवित्र, सशक्त है, उनका विवेक सदा जाग्रत रहता है। शिव का चंद्रमा उज्जवल है।
त्रिनेत्र- शिव को त्रिलोचन भी कहते हैं। शिव के ये तीन नेत्र सत्व, रज, तम तीन गुणों, भूत, वर्तमान, भविष्य, तीन कालों स्वर्ग, मृत्यु पाताल तीन लोकों का प्रतीक है।
सर्पों का हार- सर्प जैसा क्रूर व हिसंक जीव महाकाल के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक वृत्ति का जीव है, जिसे शिव ने अपने अधीन कर रखा है।
त्रिशूल- शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशुल सृष्टि में मानव भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है।
डमरू- शिव के एक हाथ में डमरू है जिसे वे तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्म रुप है।
मुंडमाला- शिव के गले में मुंडमाला है जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को वश में कर रखा है।
छाल- शिव के शरीर पर व्याघ्र चर्म है, व्याघ्र हिंसा व अंहकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा व अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है।
भस्म- शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से करते हैं। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है शरीर नश्वरता का प्रतीक है।
वृषभ- शिव का वाहन वृषभ है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है। वृषभ का अर्थ है, धर्म महादेव इस चार पैर वाले बैल की सवारी करते है अर्थात् धर्म, अर्थ, काम मोक्ष उनके अधीन है। सार रूप में शिव का रूप विराट और अनंत है, शिव की महिमा अपरम्पार है। ओंकार में ही सारी सृष्टि समायी हुई है।

रविवार, 19 अप्रैल 2009

प्रदोष व्रत का महत्व

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प्रदोष व्रत में अति मंगलकारी और शिव कृपा प्रदान करने वाला है। स्त्री अथवा पुरूष जो भी अपना कल्याण चाहते हों यह व्रत रख सकते हैं।

प्रदोष व्रत को करने से हर प्रकार का दोष मिट जाता है। सप्ताह के सातों दिन के प्रदोष व्रत का अपना विशेष महत्व है

  • रविवार के दिन प्रदोष व्रत आप रखते हैं तो सदा नीरोग रहेंगे
  • सोमवार के दिन व्रत करने से आपकी इच्छा फलित होती है
  • मंगलवार को प्रदोष व्रत रखने से रोग से मुक्ति मिलती है और आप स्वस्थ रहते हैं।
  • बुधवार के दिन इस व्रत का पालन करने से सभी प्रकार की कामना सिद्ध होती है।
  • बृहस्पतिवार के व्रत से शत्रु का नाश होता है।
  • शुक्र प्रदोष व्रत से सौभाग्य की वृद्धि होती है।
  • शनि प्रदोष व्रत से पुत्र की प्राप्ति होती है।

इस व्रत के महात्म्य को गंगा के तट पर किसी समय वेदों के ज्ञाता और भगवान के भक्त श्री सूत जी ने सौनकादि ऋषियों को सुनाया था। सूत जी ने कहा है कि कलियुग में जब मनुष्य धर्म के आचरण से हटकर अधर्म की राह पर जा रहा होगा, हर तरफ अन्याय और अनचार का बोलबाला होगा। मानव अपने कर्तव्य से विमुख हो कर नीच कर्म में संलग्न होगा उस समय प्रदोष व्रत ऐसा व्रत होगा जो मानव को शिव की कृपा का पात्र बनाएगा और नीच गति से मुक्त होकर मनुष्य उत्तम लोक को प्राप्त होगा।

सूत जी ने सौनकादि ऋषियों को यह भी कहा कि प्रदोष व्रत से पुण्य से कलियुग में मनुष्य के सभी प्रकार के कष्ट और पाप नष्ट हो जाएंगे। यह व्रत अति कल्याणकारी है, इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को अभीष्ट की प्राप्ति होगी। इस व्रत में अलग अलग दिन के प्रदोष व्रत से क्या लाभ मिलता है यह भी सूत जी ने बताया। सूत जी ने सौनकादि ऋषियों को बताया कि इस व्रत के महात्मय को सर्वप्रथम भगवान शंकर ने माता सती को सुनाया था। मुझे यही कथा और महात्मय महर्षि वेदव्यास जी ने सुनाया और यह उत्तम व्रत महात्म्य मैने आपको सुनाया है।

प्रदोष व्रत विधान
सूत जी ने कहा है प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी के व्रत को प्रदोष व्रत कहते हैं। सूर्यास्त के पश्चात रात्रि के आने से पूर्व का समय प्रदोष काल कहलाता है। इस व्रत में महादेव भोले शंकर की पूजा की जाती है। इस व्रत में व्रती को निर्जल रहकर व्रत रखना होता है। प्रात: काल स्नान करके भगवान शिव की बेल पत्र, गंगाजल, अक्षत, धूप, दीप सहित पूजा करें। संध्या काल में पुन: स्नान करके इसी प्रकार से शिव जी की पूजा करना चाहिए। इस प्रकार प्रदोष व्रत करने से व्रती को पुण्य मिलता है।

बुधवार, 24 दिसंबर 2008

गौरी तपोव्रत कथा विधि

गौरी तपोव्रत महात्मय (Gauri Tapovrat Mahatmya)

मार्गशीर्ष अमावस्या तिथि को महिलाएं अति उत्तम मानती हैं. यह तिथि गौरी तपोव्रत के नाम से जानी जाती है. इस दिन महिलाएं अन्न जल का त्याग कर व्रत करती हैं. कुमारी कन्याएं योग्य वर पाने की इच्छा से यह व्रत रखती हैं और विवाहित स्त्रियां अपने पति और सुहाग की मंगल कामना से यह व्रत रखती हैं. शास्त्रों कें अनुसार इस व्रत का आधार माता गौरी द्वारा पति रूप में शिव को पाने के लिए किया जाने वाला व्रत है.

गौरी अत्यंत दयालु और कृपालु हैं. उनकी कृपा से सुहागिन स्त्रियो का सुहाग चिन्ह दमकता रहता है. कुंवारी कन्याओं को सुन्दर और सुयोग्य वर मिलता है व गृहस्थ जीवन ध्रर्मानुकूल एवं सुख शांतिमय रहता है. माता गौरी सदा अपने भक्तों पर ममता लुटाती हैं व उनकी हर मनोकामना पूरा करती है.

गौरी तपोव्रत विधि (Gauri Tapovrat Vidhi)

मां गौरी ने जिस प्रकार भगवान भोलेनाथ को पाने के लिए कठोर तपोव्रत किया और उनकी मनोकामना पूर्ण हुई उसी प्रकार गौरी तपोव्रत करने वाले की सभी मानोकामना मां गौरी और भगवान शंकर पूर्ण करते हैं. यह तपोव्रत मार्गशीर्ष की कृष्ण पक्ष में अमावस्या तिथि (Margshirsha Amavasya Gauri Tapovrat) के दिन किया जाता है.

इस व्रत को महिलाएं करती हैं, क्योंकि यह उनके लिए विशेष मंगलकारी है . इस व्रत को रखने कि विधि यह है कि व्रती को सुबह ब्रह्म मुर्हूत में उठकर स्नान करना चाहिए और शिव पार्वत की पूजा करनी चाहिए. दिन के वक्त देवी पार्वती और भगवान भोले नाथ का भजन कीर्तन करना चाहिए और उन्हीं में मन को लगाना चाहिए. संध्या काल में गौरी मैथ्या और शिव जी के नाम से दीप दान करना चाहिए.

इस व्रत का विशेष विधान यह है कि व्रती को मध्य रात्रि में मन्दिर में जाकर शिव पार्वती की पूजा करनी चाहिए. शास्त्रानुसार अगर आप यह व्रत करती हैं तो आपको व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब आप निरन्तर सोलह वर्ष तक इस व्रत का पालन करती हैं. जब सोलह वर्ष पूर्ण हो जाए तब मार्गशीर्ष पूर्णिमा तिथि को व्रत का उद्यापन यानी समापन करें.

कालाष्टमी या भैरवाष्टमी कथा एवं महात्मय

मार्गशीर्ष कृष्ष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को भगवान भोले नाथ भैरव रूप में प्रकट हुए थे. कालाष्टमी का व्रत इसी उपलक्ष्य में इस तिथि को किया जाता है. आदि देव महादेव ने यह रूप किस कारण से धारण किया इस सम्बन्ध में एक पारौणिक कथा है। आइये यह क्था सुनें।

भैरवाष्टमी कथा (Bhairav Ashtmi Katha)
कथा के अनुसार एक बार श्री हरि विष्णु और ब्रह्मा जी में इस बात को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया कि उनमें श्रेष्ठ कौन है. विवाद इस हद तक बढ़ गया कि शिव शंकर की अध्यक्षता में एक सभा बुलायी गयी. इस सभा में ऋषि-मुनि, सिद्ध संत, उपस्थित हुए. सभा का निर्णय श्री विष्णु ने तो स्वीकार कर लिया परंतु ब्रह्मा जी निर्णय से संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने महादेव का अपमान कर दिया.

यह तो सर्वविदित है कि भोले नाथ जब शांत रहते हैं तो उस गहरी नदी की तरह प्रतीत होते हैं जिसकी धारा तीव्र होती है परंतु देखने में उसका जल ठहरा हुआ नज़र आता है और जब क्रोधित होते हैं तो प्रलयकाल में गरजती और उफनती नदी के सामन दिखाई देते हैं. ब्रह्मा जी द्वारा अपमान किये जाने पर महादेव प्रलय के रूप में नज़र आने लगे और उनका रौद्र रूप देखकर तीनो लोक भयभीत होने लगा. भगवान आशुतोष के इसी रौद्र रूप से भगवान भैरव प्रकट हुए . भगवान भैरव (God Bhairav) कुत्ते पर सवार थे और इनके हाथ में दंड था. हाथ में दण्ड होने से ये दण्डाधिपति भी कहे जाते हैं. इनका रूप अत्यंत भयंकर था. भैरव जी के इस रूप को देखकर ब्रह्मा जी को अपनी ग़लती का एहसास हुआ और वे भगवान भोले नाथ एवं भैरव की वंदना करने लगे. भगवान वैरव ब्रह्मा जी एवं अन्य देव और साधुओं द्वारा वंदना करने पर शांत हुए इस तरह भैरव बाबा का जन्म हुआ।

भैरवाष्टमी व्रत पूजा विधि (Bhairavastmi Vrat Pooja Vidhi)
शिव के इस भैरव रूप की उपासना करने वाले भक्तों के सभी प्रकार के पाप, ताप एवं कष्ट दूर हो जाते हैं. इनकी भक्ति मनोवांछित फल देने वाली कही गयी है. भैरव जी की उपासना करने वाले को भैरवाष्टमी के दिन व्रत रख कर प्रत्येक प्रहर में भैरव नाथ (BHairo Nath) जी की षोड्षोपचार सहित पूजा करनी चाहिए व उन्हें आर्घ्य देना चाहिए. रात के समय जागरण करके माता पार्वती और भोले शंकर की कथा एवं भजन कीर्तन करना चाहिए व भैरव जी (Bhairo Nath) उत्पत्ति की कथा कहनी व सुननी चाहिए. रात का आधा पहर यानी मध्य रात्रि होने पर शंख, नगाड़ा, घंटा आदि बजाकर भैरव जी की आरती करनी चाहिए.

भगवान भैरव नाथ (Bhairo Nath) का वाहन कुत्ता है. भैरव जी की प्रसन्नता के लिए इस दिन कुत्ते को उत्तम भोजन दें. मान्यता के अनुसार इस दिन प्रात: काल पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करके पितरों का श्राद्ध व तर्पण करें फिर भैरव जी की पूजा व व्रत करें तो विघ्न बाधाएं समाप्त हो जाती हैं व आयु में वृद्धि होती है. भैरव जी के विषय में यह भी कहा गया है कि इनकी पूजा व भक्ति करने वाले से भूत, पिशाच एवं काल भी दूर दूर रहते हैं. इन्हें रोग दोष स्पर्श नहीं करते हैं. शुद्ध मन एवं आचरण से ये जो भी कार्य करते हैं उनमें इन्हें सफलता मिलती है.

काल भैरव (Kal Bhairav) के साथ ही इस दिन देवी कालिका (Devi Kali Pooja Vrat) की उपासना एवं व्रत का विधान भी है. इस रात देवी काली की उपासना करने वालों को अर्ध रात्रि के बाद मां की उसी प्रकार से पूजा करनी चाहिए जिस प्रकार दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि को देवी कालरात्रि (Devi Kalratri) की पूजा का विधान है.

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महाकाल को प्रिय है महाशिवरात्रि व्रत

ब्रह्माजी ने जब सम् पूर्ण जगत् की सृष्टि की, तब राशियों से कालचक्र उत्पन्न हुआ। उस काल चक्र में सब कार्यों की सिद्धि के लिए बारह राशियों और सत्ताईस नक्षत्र मुख्य हैं। इन बारह राशियों और सत्ताईस नक्षत्रों के साथ क्रीड़ा करता हुआ कालचक्र सहित काल जगत् को उत्पन्न करता है। ब्रह्मा से लेकर कीटपर्यन्त सबको काल ही उत्पन्न करता, वही पालन करता और वही संहार करता है। एक मात्र काल से ही यह सारा जगत् बंधा हुआ है। अकेला काल ही इस लोक में बलवान् है, दूसरा नहीं। अत: यह सब प्रपंच कालात्मक है। सबसे पहले काल हुआ। काल से ही स्वर्गलोक के अधिनायक उत्पन्न हुए। तदनन्तर लोकों की उत्पत्ति हुई। उसके बाद त्रुटि हुई। त्रुटि से लव हुआ। लव से क्षण हुआ। क्षण से निमिष हुआ जो प्राणियों में निरंतर देखा जाता है। साठ निमिष का एक पल कहा जाता है। साठ पलों की एक घड़ी होती है। साठ घड़ी का एक दिन होता है। पंद्रह दिन-रात का एक पक्ष माना जाता है। दो पक्ष का एक मास और बारह महीनों का एक वर्ष होता है। काल को जानने की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान् पुरुषों को इन सब बातों का ज्ञान रखना चाहिए। प्रतिपदा से लेकर पूर्णमासी तक पक्ष पूरा होता है। उस दिन पक्ष पूर्ण होने के कारण ही उसे पूर्णिमा कहते हैं। जिस तिथि को पूर्ण चन्द्रमा का उदय होता है, वह पूर्णमासी देवताओं को प्रिय है तथा जिस तिथि को चन्द्रमा लुप्त हो जाते हैं, उसे विद्वानों ने अमावस्या कहा है। अगि्ध्वात्त आदि पितरों को वह अधिक प्रिय है। ये तीस दिन पुण्यकाल से संयुक्त होते हैं। इनमें जो विशेषता है उसे सुनें। योगों में व्यतीपात, नक्षत्रों में श्रवण, तिथियों में अमावस्या और पूर्णिमा तथा संक्रान्ति-काल-ये सब दान-कर्म में पवित्र माने गये हैं। भगवान शंकर को अष्टमी प्रिय है। गणेशजी को चतुर्थी, नागराज को पंचमी, कुमार कार्तिकेय को षष्ठी, सूर्यदेव को सप्तमी, दुर्गाजी को नवमी, ब्रह्माजी को दशमी, रुद्रदेव को एकादशी, भगवान् विष्णु को द्वादशी, कामदेव को त्रयोदशी तथा भगवान् शंकर को चतुर्दशी विशेष प्रिय है। कृष्ण पक्ष में जो चतुर्दशी अर्धरात्रिव्यापिनी हो, उसमें सबको उपवास करना चाहिए। वह भगवान् शिव का सायुज्य प्रदान करने वाली है। वही शिवरात्रि के नाम से विख्यात है। वह सब पापों का नाश करने वाली है। इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं। पूर्वकाल में कोई विधवा ब्राह्मणी थी, जिसकी प्रकृति बड़ी चंचल थी। वह काम भोग में आसक्त रहती थी। अत: किसी कामी चाण्डाल के साथ उसका संबंध हो गया। उसके गर्भ से दुरात्मा चाण्डाल के एक पुत्र हुआ, जिसका नाम दुस्सह था। दुस्सह बड़ा ही दुष्टात्मा था। वह सब धर्मों के विपरीत ही आचरण करता था। महान् पापपूर्ण प्रयोगों के द्वारा वह सदा नये-नये पाप प्रारम्भ करता था। वह जुआरी, शराबी, चोर, गुरुस्त्रीगामी, वधिक, दुष्टात्मा तथा चाण्डालोचित कर्म करने वाला था। एक दिन वह अधर्मी मन में कोई बुरी वृत्ति लेकर ही किसी शिवालय में गया। उस दिन शिवरात्रि थी। वह रात में भगवान् शिव के पास उपवासपूर्वक रहा और वहां पास ही देव योग से होती हुई शैवशास्त्र की कथा सुनता रहा। वहां उसे लिङ्गस्वरूप भगवान् शिव का दर्शन हुआ। दुष्ट होते हुए भी उसने एक रात व्रत किया और शिवरात्रि में जागता रहा। उसी शुभ कर्म के परिणाम से उसने पुण्ययोनि प्राप्त करके बहुत वर्षों तक पुण्यात्माओं के लोक में सुख-भोग किया। तदनन्तर वह राजा चित्राङ्गद का पुत्र हुआ। उसमें राजराजेश्वरी के लक्षण थे। वहां वह विचित्रवीर्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसका रूप सुंदर था। उसे सुंदरी स्त्रियां प्यार करती थीं। उसने बहुत बड़ा राज्य प्राप्त करके भी अपने मन में अहंकार नहीं आने दिया। भगवान् शिव की भक्ति करते हुए वह सदा शिवधर्म के पालन में ही तत्पर रहा। शिवसंबंधी शास्त्रों को मान्यता देकर वह उन्हीं के अनुसार शिव की पूजा किया करता था। भगवान् शिव के समीप यत्नपूर्वक रात्रि में जागरण करके भगवान् शिव की गाथा का गान करता और रोमांचित होकर नेत्रों से आनन्द के अश्रुकण बहाया करता था। भगवान् शिव की कथा सुनने से उसमें प्रेम के सभी लक्षण प्रकट हो जाते थे। उसे देवाधिदेव शिव की प्रेमलक्षणा भक्ति प्राप्त हुई। भगवान् शिव के ध्यान में निरंतर संलग् रहने के कारण उसकी सारी आयु व्रत में ही बीती। भगवान् शिव इस संसार में पशुओं (अज्ञानियों) तथा ज्ञानीजनों को समान रूप से सुलभ हैं। अत: सुख की प्राप्ति के लिए एकमात्र सदाशिव का ही सेवन करना चाहिए। शिवरात्रि के उपवास से राजा को उत्तम ज्ञान प्राप्त हुआ। उस ज्ञान से राजा को सब प्राणियों में निरंतर समभाव का अनुभव हुआ। फिर, एकमात्र भगवान् सदाशिव ही सब भूतों के आत्मारूप हैं, इस ज्ञान का साक्षात्कार हुआ। तत्पश्चात यह अनुभव हुआ कि इस संसार में कहीं कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जो भगवान् शिव से रहित हो। इस प्रकार उन्होंने अत्यन्त दुर्लभ एवं पूर्ण प्रपंचातीत ज्ञान प्राप्त कर लिया। वह ज्ञान विज्ञ पुरुषों के लिए भी अत्यन्त दुर्लभ है, फिर औरों की तो बात ही क्या है। राजा विचित्रवीर्य वह ज्ञान प्राप्त करके भगवान् शिव के अत्यन्त प्रिय भक्त हो गये। शिवरात्रि के उपवास से उन्होंने सामुज्य मुक्ति प्राप्त कर ली। उसी पुण्य के प्रभाव से उन्होंने शिवजी की लीला में योग देने के लिए शिवजी से ही दिव्य जन्म प्राप्त किया। दक्ष-कन्या सती से जब शिवजी का वियोग हुआ तब उनके जटा फटकारने के शब्द से उन्हीं के मस्तक से जो वीरभद्र नामक वीर उत्पन्न हुआ, वह राजा विचित्रवीर्य ही है। वही दक्ष-यज्ञ का विनाश करने वाला हुआ।इसी प्रकार अन्य बहुत-से मनुष्य भी शिवरात्रि-व्रत के प्रभाव से पूर्वकाल में सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं।

क्या है महाशिवरात्रि-व्रत

महाशिवरात्रि-व्रत के रहस्य को जानने के लिए यह आवश्यक है कि उसका पदच्छेद करके उसके अंगीभूत प्रत्येक शब्द पर विचार किया जाय। देखा जाय कि ‘शिव’ किसे कहते हैं, ‘रात्रि’ क्या चीज है और ‘व्रत’ का क्या अर्थ है। साथ ही, इसका साधन क्या है और इसे करने से किस फल की प्राप्ति होती है, आदि। शिव- ‘शिव क्या है’ इसकी जानकारी प्राप्त कर लेना शिव कृपा पर ही अवलम्बित है। वस्तुत: इसे जानना ही शिव का साक्षात्कार कर लेना है, जो बहुत दूर की बात है, फिर भी साधारण ज्ञान के लिए इतना जान लेना आवश्यक है -
शेते तिष्ठति सर्वं जगत् यस्मिन् स: शिव: शम्भु: विकाररहित: …।
अर्थात ‘जिसमें सारा जगत् शयन करता है, जो विकार रहित है वह ‘शिव’ है, अथवा जो अमंगल का ह्रास करते हैं, वे ही सुखमय, मंगलरूप भगवान् शिव हैं। जो सारे जगत् को अपने अंदर लीन कर लेते हैं वे ही करुणा सागर भगवान् शिव हैं। जो भगवान् नित्य, सत्य, जगदाधार, विकाररहित, साक्षीस्वरूप हैं, वे ही शिव हैं।’महासमुद्र रूपी शिवजी ही एक अखण्ड पर तत्व हैं, इन्हीं की अनेक विभूतियां अनेक नामों से पूजी जाती हैं, यही सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान् हैं, यही व्यक्त-अव्यक्त रूप से क्रमश: ‘सगुण ईश्वर’ और ‘निर्गुण ब्रह्म’ कहे जाते हैं तथा यही ‘परमानंद’, ‘जगदात्मा’, ‘शम्भव’, ‘मयोभव’, ‘शंकर’, ‘मयस्कर’, ‘शिव’, ‘रुद्र’ आदि नामों से संबोधित किये जाते हैं। भगवान शिव वर्णनातीत होते हुए भी अनुभवगम्य हैं, यही आशुतोष भक्तों को अपनी गोद में रखते हैं, यही त्रिविधि तापों का शमन करने वाले हैं। इन्हीं से समस्त विद्याएं एवं कलाएं निकली हैं, ये ही वेद तथा प्रणव के उद्गम हैं। इन्हीं को वेदों ने ‘नेति-नेति’ कहा है। यही नित्याश्रय और अनन्ताश्रय हैं और यही दयासागर एवं करुणावतार हैं। इनकी महिमा का वर्णन करना मनुष्य की शक्ति के बाहर है।रात्रि ‘रा’ दानार्थक धातु से ‘रात्रि’ शब्द बनता है, अर्थात् जो सुखादि प्रदान करती है - वह ‘रात्रि’ है।
रात्रि सदा आनन्ददायिनी है, अत: सबकी आश्रयदात्री होने के कारण धर्मग्रंथों में उसकी स्तुति की गयी है और यहां रात्रि की स्तुति से प्रकृतिदेवी, दुर्गादेवी अथवा शिवादेवी की ही स्तुति समझनी चाहिए। इस प्रकार शिवरात्रि का अर्थ होता है ‘वह रात्रि जो आनन्द देने वाली है और जिसका शिव के नाम के साथ विशेष संबंध है।’ ऐसी रात्रि माघ फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की है, जिसमें शिवपूजा, उपवास और जागरण होता है। उक्त फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को शिवपूजा करना एक महाव्रत है। अत: उसका नाम महाशिवरात्रि-व्रत पड़ा। शिव के भावुक भक्तों के लिए इस संबंध में कुछ आवश्यक उद्धरण दिये जाते हैं -
परात् परत्तरं नास्ति शिवरात्रिपरात् परम्।न पूजयति भक्त्येशं रुद्रं
भ्रमते नात्र संशय:॥
(स्कन्दपुराण)
सौरो वा वैष्णवो वान्यो देवतान्तरपूजक:
पूजाफलमान्नोति शिवरात्रिबहिर्मुख:॥
(नृसिंह-परिचर्या और पद्मपुराण)
इसका आशय यह है कि शिवरात्रि-व्रत परात्पर है। जो जीव इस शिवरात्रि में महादेव की भक्तिपूर्वक पूजा नहीं करता, वह अवश्य सहस्रों वर्षों तक घूमता रहता है। चाहे सूर्यदेव का उपासक हो, चाहे विष्णु तथा अन्य किसी देव का, जो शिवरात्रि का व्रत नहीं करता, उसको फल की प्राप्ति नहीं होती। स्कन्दपुराण के अनुसार -
शिवं तु पूजयित्वा यो जागर्ति च चतुर्दशीम्।
मातु: पयोधररसं न पिवेत् स कदाचन॥
जो शिव-चतुर्दशी में शिव की पूजा करके जागता रहता है, उसको फिर किसी जन्म में अपनी माता का दूध नहीं पीना पड़ता अर्थात वह मुक्त हो जाता है। ‘चाहे सागर सूख जाय, हिमालय भी क्षय को प्राप्त हो जाय, मन्दर, विन्ध्यादि पर्वत भी विचलित हो जाये, पर शिव-व्रत कभी विचलित (निष्फल) नहीं हो सकता।’ इसका फल अवश्य मिलता है। जो मनुष्य ‘कालतत्व’ का भाव जानते हैं, उन्हें विदित है कि समय पर कार्य करने से इष्ट पदार्थों की प्राप्ति होती है। फाल्गुन के पश्चात् नये वर्ष चक्र का प्रारम्भ होता है। रात्रि के पश्चात् दिन और दिन के पश्चात् रात्रि होती है अथवा लय के बाद सृष्टि और सृष्टि के बाद लय होता है। इस प्रकार लय के बाद सृष्टि और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के बाद वर्षचक्र की पुनरावृत्ति एक ही बात है। वर्ष चक्र की पुनरावृत्ति के समय मुमुक्षु जीव परम तत्व शिव के पास पहुंचना चाहता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कृष्ण चतुर्दशी में चन्द्रमा सूर्य के समीप होते हैं। अत: उसी समय में जीवरूपी चन्द्र का शिवरूपी सूर्य के साथ योग होता है। अतएव फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिव पूजा करने से जीव को इष्ट पदार्थ की प्राप्ति होती है।
शिवरात्रि-व्रतअब यह समझना है कि शिवरात्रि-व्रत क्या है? इस व्रत में उपवास, जागरण और शिव-पूजा करने की परंपरा है। इन सबका तात्विक अर्थ समझना चाहिए। इसके पहले ‘व्रत’ क्या है, यह समझना आवश्यक है। वैदिक साहित्य में व्रत का अर्थ वेदबोधित, इष्टप्रापक कर्म है। दार्शनिक काल में ‘अभ्युदय’ और ‘नि:श्रेयस’ कर्मों का हेतु-पदार्थ ही ‘व्रत’ शब्द का अर्थ समझा जाता था। अमरकोष में ‘व्रत’ का अर्थ नियम है। पुराणों में व्रत ‘धर्म’ का वाचक हैँ निष्कर्ष यह है कि वेदबोधित अगि्होत्रादि कर्म, शास्त्रविहित नियमादि अथवा साधारण तथा असाधारण धर्म को ही ‘व्रत’ कहते हैं अथवा थोड़े में यों समझिये कि जिस कर्म द्वारा भगवान का सान्निध्य होता है वही व्रत है। उपवास क्या है? जीवात्मा का शिव के समीप वास ही ‘उपवास’ कहा जाता है।
उप-समीपे यो वास: जीवात्मपरमात्मनो: : स विज्ञेयो न तु कायस्य शोषणम्॥(वराहोपनिशद्)देवीपुराण में कहा गया है - ‘भगवान् (शिव) का ध्यान, उनका जप, स्नान, भगवान् की कथा का श्रवण आदि - इन गुणाें के साथ वास अर्थात् इन क्रियाओं को करते हुए काल-यापन करना ही उपवासकर्ता का लक्षण है। व्रती के अन्दर ये लक्षण अवश्य होने चाहिए। व्रती के लिए सब प्रकार के विषय-भोगों का वर्जन आवश्यक है। केवल अनशन करने से उपवास या व्रत नहीं होता।’ जागरण-मुमुक्षु जीवात्मा के लिए ‘जागरण’ आवश्यक है-
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:॥
‘सर्व प्राणियों की अर्थात् विषयासक्त संसारी जनों की जो निशा है, उसमें संयमी जगे रहते हैं। आत्मदर्शन विमुख प्राणिगण जिस जगदवस्था में जागते हैं, वह मनीषी, आत्मदर्शननिरत योगी के लिए निशा है।’ अत: सिद्ध है कि विषयासक्त जिसमें निद्रित हैं उसमें संयमी प्रबुद्ध हैं। अत: शिवरात्रि में जागरण करना आवश्यक है। शिवपूजा का अर्थ पुष्प-चन्दन-बिल्बपत्र अर्पितकर शिवनाम का जप-ध्यान करना एवं चित्तवृत्ति का निरोध कर जीवात्मा का परमात्मा ‘शिव’ के साथ योग करना है।योगशास्त्र के शब्दों में इन्द्रियों का प्रत्याहार, चित्तवृत्ति का निरोध और महाशिव रात्रि व्रत वास्तव में एक ही पदार्थ हैं। पंच ज्ञानेन्द्रियां, पंच कर्मेन्द्रियां तथा मन, अहंकार, चित्त और बुद्धि-इन चतुर्दश का समुचित निरोध ही सच्ची ‘शिव-पूजा’ या ‘शिवरात्रि-व्रत’ है। चाहे शिव-पूजा ज्ञान योग द्वारा कीजिये अथवा कर्मयोग द्वारा, भक्ति का सम्मिश्रण दोनों में रहेगा। ज्ञानप्रधान भक्ति अथवा कर्मप्रधान भक्ति द्वारा फाल्गुन-कृष्ण चतुर्दशी को शिवरात्रि-व्रत करने से मुक्ति मिलेगी।जो लोग शिव-भक्ति से प्रेरित होकर सच्चे पवित्र मन से अनशनव्रतकर परतत्व शिव की पूजा बिल्व-पत्र, दुग्ध व पुष्पादि से करते हैं, उन्हें भी अपनी भक्ति के अनुसार फल मिलता है। क्योंकि वास्तव में महाशिवरात्रि-व्रत का उद्देश्य जीवात्मा का परमात्मा के साथ सहयोग ही है। अपनी-अपनी भक्ति के अनुसार समस्त भूमण्डल के भावुकजन वैज्ञानिक महाशिवरात्र-व्रत का अनुष्ठान कर सकते हैं। भगवान् भूतनाथ की दया से उन्हें सिद्धि अवश्य मिलेगी। अज्ञानवश एक व्याध ने महाशिवरात्रि-व्रत का अनुष्ठान किया था, जिससे शिव के गणों ने उसके लिए भी एक विमान भेजकर उसे शिवलोक में पहुंचा दिया। यम ने भगवान् शिव के पास जाकर उस व्याध की इन शब्दों में शिकायत की -निषादो जीवघाती च सर्वधर्मबहिष्कृत:।न धर्मोऽप्यर्जितस्तेन निर्गतं यमशासनम्॥
आदि। भगवान शिव ने यमदेय को उस व्याध की कहानी कह सुनायी कि कैसे उसने बिल्वपत्र द्वारा शिवलिंग की उपासना की और कैसे अनशन-व्रत द्वारा ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने यमदेव को आध्यात्मिक घटनाओं का तारतम्य भी समझा दिया। अनशन द्वारा भक्तिपूर्वक शिव की बिल्वपत्र, पुष्प, चन्दन, दुग्ध, दधि द्वारा पूजा से बहुत बड़ा आध्यात्मिक लाभ और सांसारिक अभ्युदय प्रारम्भ में होगा। आज ईश्वर के नाम पर जगह-जगह झगड़े हो रहे हैं। शैव-पदार्थों की अवहेलना है। यद्यपि अनेक व्रतों तथा साधनों द्वारा शान्ति की चेष्टा की जा रही है तथापि महाशिवरात्रि-व्रत द्वारा ही इस ओर विशेष सफलता मिल सकती है।

मंगलवार, 23 दिसंबर 2008

ॐ नमः शिवाय

१०८ मंत्र
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय

शनिवार, 29 नवंबर 2008

सोलह सोमवार व्रत

कथा – मृत्यु लोक में विवाह करने की इच्छा करके एक समय श्री भूतनाथ महादेव जी माता पार्वती के साथ पधारे वहाँ वे ब्रमण करते-करते विदर्भ देशांतर्गत अमरावती नाम की अतीव रमणीक नगरी में पहुँचे । अमरावती नगरी अमरपुरी के सदृश सब प्रकार के सुखों से परिपूर्ण थी । उसमें वहां के महाराज का बनाया हुआ अति रमणीक शिवजी का मन्दिर बना था । उसमें भगवान शंकर भगवती पार्वती के साथ निवास करने लगे । एक समय माता पार्वती प्राणपति को प्रसन्न देख के मनोविनोद करने की इच्छा से बोली – हे माहाराज, आज तो हम तुम दोनों चौसर खेलें । शिवजी ने प्राणप्रिया की बात को मान लिया और चौसर खेलने लगे । उसी समय इस स्थान पर मन्दिर का पुजारी ब्राहमण मन्दिर मे पूजा करने को आया । माताजी ने ब्राहमण से प्रश्न किया कि पुजारी जी बताओ कि इस बाजी में दोनों में किसकी जीत होगी । ब्राहमण बिना विचारे ही शीघ्र बोल उठा कि महादेवजी की जीत होगी । थोड़ी देर में बाजी समाप्त हो गई और पार्वती जी की विजय हुई । अब तो पार्वती जी ब्राहमण को झूठ बोलने के अपराध के कारण श्राप देने को उघत हुई । तब महादेव जी ने पार्वती जी को बहुत समझाया परन्तु उन्होंने ब्राहमण को कोढ़ी होने का श्राप दे दिया । कुछ समय बाद पार्वती जी के श्रापवश पुजारी के शरीर में कोढ़ पैदा हो गया । इस प्रकार पुजारी अनेक प्रकार से दुखी रहने लगा । इस तरह के कष्ट भोगते हुए जब बहुत दिन हो गये तो देवलोक की अप्सराएं शिवजी की पूजा करने उसी मन्दिर मे पधारी और पुजारी के कष्ट को देखकर बड़े दया भाव से उससे रोगी होने का कारण पूछने लगी – पुजारी ने निःसंकोच सब बाते उनसे कह दी । वे अप्सरायें बोली – हे पुजारी । अब तुम अधिक दुखी मत होना । भगवान शिवजी तुम्हारे कष्ट को दूर कर देंगे । तुम सब बातों में श्रेष्ठ षोडश सोमवार का व्रत भक्तिभाव से करो । तब पुजारी अप्सराओं से हाथ जोड़कर विनम्र भाव से षोडश सोमवार व्रत की विधि पूछने लगा । अप्सरायें बोली कि जिस दिन सोमवार हो उस दिन भक्ति के साथ व्रत करें । स्वच्छ वस्त्र पहनें आधा सेर गेहूँ का आटा ले । उसके तीन अंगा बनाये और घी, गुड़, दीप, नैवेघ, पुंगीफल, बेलपत्र, जनेऊ का जोड़ा, चन्दन, अक्षत, पुष्पादि के द्घारा प्रदोष काल में भगवान शंकर का विधि से पूजन करे तत्पश्चात अंगाऔं में से एक शिवजी को अर्पण करें बाकी दो को शिवजी का प्रसाद समझकर उपस्थित जनों में बांट दें । और आप भी प्रसाद पावें । इस विधि से सोलह सोमवार व्रत करें । तत्पश्चात् सत्रहवें सोमवार के दिन पाव सेर पवित्र गेहूं के आटे की बाटी बनायें । तदनुसार घी और गुड़ मिलाकर चूरमा बनावें । और शिवजी का भोग लगाकर उपस्थित भक्तों में बांटे पीछे आप सकुटुंबी प्रसादी लें तो भगवान शिवजी की कृपा से उसके मनोरथ पूर्ण हो जाते है । ऐसा कहकर अप्सरायें स्वर्ग को चली गयी । ब्राहमण ने यथाविधि षोड़श सोमवार व्रत किया तथा भगवान शिवजी की कृपा से रोग मुक्त होकर आनन्द से रहने लगा । कुछ दिन बाद जब फिर शिवजी और पार्वती उस मन्दिर में पधारे, तब ब्राहमण को निरोग देखकर पार्वती ने ब्राहमण से रोग-मुक्त होने का कारण पूछा तो ब्राहमण ने सोलह सोमवार व्रत कथा कह सुनाई । तब तो पार्वती जी अति प्रसन्न होकर ब्राहमण से व्रत की विधि पूछकर व्रत करने को तैयार हुई । व3त करने के बाद उनकी मनोकामना पूर्ण हुई तथा उनके रुठे हुये पुत्र स्वामी कार्तिकेय स्वयं माता के आज्ञाकारी हुए परन्तु कार्तिकेय जी को अपने विचार परिवर्तन का रहस्य जानने की इच्छा हुई और माता से बोले – हे माताजी आपने ऐसा कौन सा उपाय किया जिससे मेरा मन आपकी ओर आकर्षित हुआ । तब पार्वती जी ने वही षोड़श सोमवार व्रत कथा उनको सुनाई । स्वामी कार्तिकजी बोले कि इस व्रत को मैं भी करुंगा क्योंकि मेरा प्रियमित्र ब्राहमण दुखी दिल से परदेश चला गया है । हमें उससे मिलने की बहुत इच्छा है । कार्तिकेयजी ने भी इस व्रत को किया और उनका प्रिय मित्र मिल गया । मित्र ने इस आकस्मिक मिलन का भेद कार्तिकेयजी से पूछा तो वे बोले – हे मित्र । हमने तुम्हारे मिलने की इच्छा करके सोलह सोमवार का व्रत किया था । अब तो ब्राहमण मित्र को भी अपने विवाह की बड़ी इच्छा हुई । कार्तिकेयजी से व्रत की विधि पूछी और यथाविधि व्रत किया । व्रत के प्रभाव से जब वह किसी कार्यवश विदेश गया तो वहाँ के राजा की लड़की का स्वयंवर था । राजा ने प्रण किया था कि जिस राजकुमार के गले में सब प्रकार ऋंडारित हथिनी माला डालेगी मैं उसी के साथ प्यारी पुत्री का विवाह कर दूंगा । शिवजी की कृपा से ब्राहमण भी स्वयंवर देखने की इच्छा से राजसभा में एक ओर बैठ गया । नियत समय पर हथिनी आई और उसने जयमाला उस ब्राहमण के गले में डाल दी । राजा की प्रतिज्ञा के अनुसार बड़ी धूमधाम से कन्या का विवाह उस ब्राहमण के साथ कर दिया और ब्राहमण को बहुत-सा धन और सम्मान देकर संतुष्ट किया । ब्राहमण सुन्दर राजकन्या पाकर सुख से जीवन व्यतीत करने लगा ।

एक दिन राजकन्या ने अपने पति से प्रश्न किया । हे प्राणनाथ आपने ऐसा कौन-सा भारी पुण्य किया जिसके प्रभाव से हथिनी ने सब राजकुमारों को छोड़कर आपको वरण किया । ब्राहमण बोला – हे प्राणप्रिये । मैंने अपने मित्र कार्तिकेयजी के कथनानुसार सोलह सोमवार का व्रत किया था जिसके प्रभाव से मुझे तुम जैसी स्वरुपवान लक्ष्मी की प्राप्ति हुई । व्रत की महिमा को सुनकर राजकन्या को बड़ा आश्चर्य हुआ और वह भी पुत्र की कामना करके व्रत करने लगी । शिवजी की दया से उसके गर्भ से एक अति सुन्दर सुशील धर्मात्मा विद्घान पुत्र उत्पन्न हुआ । माता-पिता दोनों उस देव पुत्र को पाकर अति प्रसन्न हुए । और उनका लालन-पालन भली प्रकार से करने लगे ।

जब पुत्र समझदार हुआ तो एक दिन अपने माता से प्रश्न किया कि मां तूने कौन-सा तप किया है जो मेरे जैसा पुत्र तेरे गर्भ से उत्पन्न हुआ । माता ने पुत्र का प्रबल मनोरथ जान के अपने किये हुए सोलह सोमवार व्रत को विधि सहित पुत्र के सम्मुख प्रकट किया । पुत्र ने ऐसे सरल व्रत को सब तरह के मनोरथ पूर्ण करने वाला सुना तो वह भी इस व्रत को राज्याधिकार पाने की इच्छा से हर सोमवार को यथाविधि व्रत करने लगा । उसी समय एक देश के वृद्घ राजा के दूतों ने आकर उसको एक राजकन्या के लिये वरण किया । राजा ने अपनी पुत्री का विवाह ऐसे सर्वगुण सम्पन्न ब्राहमण युवक के साथ करके बड़ा सुख प्राप्त किया ।

वृद्घ राजा के दिवंगत हो जाने पर यही ब्राहमण बालक गद्दी पर बिठाया गया, क्योंकि दिवंगत भूप के कोई पुत्र नहीं था । राज्य का अधिकारी होकर भी वह ब्राहमण पुत्र अपने सोलह सोमवार के व्रत को कराता रहा । जब सत्रहवां सोमवार आया तो विप्र पुत्र ने अपनी प्रियतमा से सब पूजन सामग्री लेकर शिवालय में चलने के लिये कहा । परन्तु प्रियतमा ने उसकी आज्ञा की परवाह नहीं की । दास-दासियों द्घारा सब सामग्रियं शिवालय पहुँचवा दी और आप नहीं गई । जब राजा ने शिवजी का पूजन किया, तब एक आकाशवाणी राजा के प्रति हुई । राजा ने सुना कि हे राजा । अपनी इस रानी को महल से निकाल दे नहीं तो तेरा सर्वनाश कर देगी । वाणी को सुनकर राजा के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा और तत्काल ही मंत्रणागृह में आकर अपने सभासदों को बुलाकर पूछने लगा कि हे मंत्रियों । मुझे आज शिवजी की वाणी हुई है कि राजा तू अपनी इस रानी को निकाल दे नहीं तो तेरा सर्वनाश कर देगी । मंत्री आदि सब बड़े विस्मय और दुःख में डूब गये क्योंकि जिस कन्या के साथ राज्य मिला है । राजा उसी को निकालने का जाल रचता है, यह कैसे हो सकेगा । अंत में राजा ने उसे अपने यहां से निकाल दिया । रानी दुःखी हृदय भाग्य को कोसती हुई नगर के बाहर चली गई । बिना पदत्राण, फटे वस्त्र पहने, भूख से दुखी धीरे-धीरे चलकर एक नगर में पहुँची ।

वहाँ एक बुढ़िया सूत कातकर बेचने को जाती थी । रानी की करुण दशा देख बोली चल तू मेरा सूत बिकवा दे । मैं वृद्घ हूँ, भाव नहीं जानती हूँ । ऐसी बात बुढ़िया की सुत रानी ने बुढ़िया के सर से सूत की गठरी उतार अपने सर पर रखी । थोड़ी देर बाद आंधी आई और बुढ़िया का सूत पोटली के सहित उड़ गया । बेचारी बुढ़िया पछताती रह गई और रानी को अपने साथ से दूर रहने को कह दिया । अब रानी एक तेली के घर गई, तो तेली के सब मटके शिवजी के प्रकोप के कारण चटक गये । ऐसी दशा देख तेली ने रानी को अपने घर से निकाल दिया । इस प्रकार रानी अत्यंत दुख पाती हुई सरिता के तट पर गई तो सरिता का समस्त जल सूख गया । तत्पश्चात् रानी एक वन में गई, वहां जाकर सरोवर में सीढ़ी से उतर पानी पीने को गई । उसके हाथ से जल स्पर्श होते ही सरोवर का नीलकमल के सदृश्य जल असंख्य कीड़ोमय गंदा हो गया ।

रानी ने भाग्य पर दोषारोपण करते हुए उस जल को पान करके पेड़ की शीतल छाया में विश्राम करना चाहा । वह रानी जिस पेड़ के नीचे जाती उस पेड़ के पत्ते तत्काल ही गिरते चले गये । वन, सरोवर के जल की ऐसी दशा देखकर गऊ चराते ग्वालों ने अपने गुंसाई जी से जो उस जंगल में स्थित मंदिर में पुजारी थे कही । गुंसाई जी के आदेशानुसार ग्वाले रानी को पकड़कर गुंसाई के पास ले गये । रानी की मुख कांति और शरीर शोभा देख गुंसाई जान गए । यह अवश्य ही कोई विधि की गति की मारी कोई कुलीन अबला है । ऐसा सोच पुजारी जी ने रानी के प्रति कहा कि पुत्री मैं तुमको पुत्री के समान रखूंगा । तुम मेंरे आश्रम में ही रहो । मैं तुम को किसी प्रकार का कष्ट नहीं होने दूंगा । गुंसाई के ऐसे वचन सुन रानी को धीरज हुआ और आश्रम में रहने लगी ।

आश्रम में रानी जो भोजन बनाती उसमें कीड़े पड़ जाते, जल भरकर लाती उसमें कीड़े पड़ जाते । अब तो गुंसाई जी भी दुःखी हुए और रानी से बोले कि हे बेटी । तेरे पर कौन से देवता का कोप है, जिससे तेरी ऐसी दशा है । पुजारी की बात सुन रानी ने शवजी की पूजा करने न जाने की कथा सुनाई तो पुजारी शिवजी महाराज की अनेक प्रकार से स्तुति करते हुए रानी के प्रति बोले कि पुत्री तुम सब मनोरथों के पूर्ण करने वाले सोलह सोमवार व्रत को करो । उसके प्रभाव से अपने कष्ट से मुक्त हो सकोगी । गुंसाई की बात सुनकर रानी ने सोलह सोमवार व्रत को विधिपूर्वक सम्पन्न किया और सत्रहवें सोमवार को पूजन के प्रभाव से राजा के हृदय में विचार उत्पन्न हुआ कि रानी को गए बहुत समय व्यतीत हो गया । न जाने कहां-कहां भटकती होगी, ढूंढना चाहिये ।


यह सोच रानी को तलाश करने चारों दिशाओं में दूत भेजे । वे तलाश करते हुए पुजारी के आश्रम में रानी को पाकर पुजारी से रानी को मांगने लगे, परन्तु पुजारी ने उनसे मना कर दिया तो दूत चुपचाप लौटे और आकर महाराज के सन्मुख रानी का पता बतलाने लगे । रानी का पता पाकर राजा स्वयं पुजारी के आश्रम में गये और पुजारी से प्रार्थना करने लगे कि महाराज । जो देवी आपके आश्रम में रहती है वह मेरी पत्नी ही । शिवजी के कोप से मैंने इसको त्याग दिया था । अब इस पर से शिवजी का प्रकोप शांत हो गया है । इसलिये मैं इसे लिवाने आया हूँ । आप इसेमेरे साथ चलने की आज्ञा दे दीजिये ।

गुंसाई जी ने राजा के वचन को सत्य समझकर रानी को राजा के साथ जाने की आज्ञा दे दी । गुंसाई की आज्ञा पाकर रानी प्रसन्न होकर राजा के महल में आई । नगर में अनेक प्रकार के बाजे बजने लगे । नगर निवासियों ने नगर के दरवाजे पर तोरण बन्दनवारों से विविध-विधि से नगर सजाया । घर-घर में मंगल गान होने लगे । पंड़ितों ने विविध वेद मंत्रों का उच्चारण करके अपनी राजरानी का आवाहन किया । इस प्रकार रानी ने पुनः अपनी राजधानी में प्रवेश किया । महाराज ने अनेक प्रकार से ब्राहमणों को दानादि देकर संतुष्ट किया ।

याचकों को धन-धान्य दिया । नगरी में स्थान-स्थान पर सदाव्रत खुलवाये । जहाँ भूखों को खाने को मिलता था । इस प्रकार से राजा शिवजी की कृपा का पात्र हो राजधानी में रानी के साथ अनेक तरह के सुखों का भोग भोग करते सोमवार व्रत करने लगे । विधिवत् शिव पूजन करते हुए, लोक के अनेकानेक सुखों को भोगने के पश्चात शिवपुरी को पधारे ऐसे ही जो मनुष्य मनसा वाचा कर्मणा द्घारा भक्ति सहित सोमवार का व्रत पूजन इत्यादि विधिवत् करता है वह इस लोक में समस्त सुखोंक को भोगकर अन्त में शिवपुरी को प्राप्त होता है । यह व्रत सब मनोरथों को पूर्ण करने वाला है ।

सोमवार की आरती

जय शिव ओंकारा, भज शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव अद्र्धागी धारा॥ \हर हर हर महादेव॥

एकानन, चतुरानन, पंचानन राजै।
हंसासन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजै॥ \हर हर ..

दो भुज चारु चतुर्भुज, दशभुज ते सोहे।
तीनों रूप निरखता, त्रिभुवन-जन मोहे॥ \हर हर ..

अक्षमाला, वनमाला, रुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी, कंसारी, करमाला धारी। \हर हर ..

श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघाम्बर अंगे।
सनकादिक, गरुड़ादिक, भूतादिक संगे॥ \हर हर ..

कर मध्ये सुकमण्डलु, चक्र शूलधारी।
सुखकारी, दुखहारी, जग पालनकारी॥ \हर हर ..

ब्रह्माविष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका। \हर हर ..

त्रिगुणस्वामिकी आरती जो कोई नर गावै।
कहत शिवानन्द स्वामी मनवान्छित फल पावै॥ \हर हर ..


2. हर हर हर महादेव।

सत्य, सनातन, सुन्दर शिव! सबके स्वामी।
अविकारी, अविनाशी, अज, अन्तर्यामी॥ हर हर .

आदि, अनन्त, अनामय, अकल कलाधारी।
अमल, अरूप, अगोचर, अविचल, अघहारी॥ हर हर..

ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, तुम त्रिमूर्तिधारी।
कर्ता, भर्ता, धर्ता तुम ही संहारी॥ हरहर ..

रक्षक, भक्षक, प्रेरक, प्रिय औघरदानी।
साक्षी, परम अकर्ता, कर्ता, अभिमानी॥ हरहर ..

मणिमय भवन निवासी, अति भोगी, रागी।
सदा श्मशान विहारी, योगी वैरागी॥ हरहर ..

छाल कपाल, गरल गल, मुण्डमाल, व्याली।
चिताभस्मतन, त्रिनयन, अयनमहाकाली॥ हरहर ..

प्रेत पिशाच सुसेवित, पीत जटाधारी।
विवसन विकट रूपधर रुद्र प्रलयकारी॥ हरहर ..

शुभ्र-सौम्य, सुरसरिधर, शशिधर, सुखकारी।
अतिकमनीय, शान्तिकर, शिवमुनि मनहारी॥ हरहर ..

निर्गुण, सगुण, निर†जन, जगमय, नित्य प्रभो।
कालरूप केवल हर! कालातीत विभो॥ हरहर ..

सत्, चित्, आनन्द, रसमय, करुणामय धाता।
प्रेम सुधा निधि, प्रियतम, अखिल विश्व त्राता। हरहर ..

हम अतिदीन, दयामय! चरण शरण दीजै।
सब विधि निर्मल मति कर अपना कर लीजै। हरहर ..


(3) शीश गंग अर्धग पार्वती सदा विराजत कैलासी।
नंदी भृंगी नृत्य करत हैं, धरत ध्यान सुखरासी॥

शीतल मन्द सुगन्ध पवन बह बैठे हैं शिव अविनाशी।
करत गान-गन्धर्व सप्त स्वर राग रागिनी मधुरासी॥

यक्ष-रक्ष-भैरव जहँ डोलत, बोलत हैं वनके वासी।
कोयल शब्द सुनावत सुन्दर, भ्रमर करत हैं गुंजा-सी॥

कल्पद्रुम अरु पारिजात तरु लाग रहे हैं लक्षासी।
कामधेनु कोटिन जहँ डोलत करत दुग्ध की वर्षा-सी॥

सूर्यकान्त सम पर्वत शोभित, चन्द्रकान्त सम हिमराशी।
नित्य छहों ऋतु रहत सुशोभित सेवत सदा प्रकृति दासी॥

ऋषि मुनि देव दनुज नित सेवत, गान करत श्रुति गुणराशी।
ब्रह्मा, विष्णु निहारत निसिदिन कछु शिव हमकू फरमासी॥

ऋद्धि सिद्ध के दाता शंकर नित सत् चित् आनन्दराशी।
जिनके सुमिरत ही कट जाती कठिन काल यमकी फांसी॥

त्रिशूलधरजी का नाम निरन्तर प्रेम सहित जो नरगासी।
दूर होय विपदा उस नर की जन्म-जन्म शिवपद पासी॥

कैलाशी काशी के वासी अविनाशी मेरी सुध लीजो।
सेवक जान सदा चरनन को अपनी जान कृपा कीजो॥

तुम तो प्रभुजी सदा दयामय अवगुण मेरे सब ढकियो।
सब अपराध क्षमाकर शंकर किंकर की विनती सुनियो॥


(4) अभयदान दीजै दयालु प्रभु, सकल सृष्टि के हितकारी।
भोलेनाथ भक्त-दु:खगंजन, भवभंजन शुभ सुखकारी॥

दीनदयालु कृपालु कालरिपु, अलखनिरंजन शिव योगी।
मंगल रूप अनूप छबीले, अखिल भुवन के तुम भोगी॥

वाम अंग अति रंगरस-भीने, उमा वदन की छवि न्यारी। भोलेनाथ

असुर निकंदन, सब दु:खभंजन, वेद बखाने जग जाने।
रुण्डमाल, गल व्याल, भाल-शशि, नीलकण्ठ शोभा साने॥

गंगाधर, त्रिसूलधर, विषधर, बाघम्बर, गिरिचारी। भोलेनाथ ..

यह भवसागर अति अगाध है पार उतर कैसे बूझे।
ग्राह मगर बहु कच्छप छाये, मार्ग कहो कैसे सूझे॥

नाम तुम्हारा नौका निर्मल, तुम केवट शिव अधिकारी। भोलेनाथ ..

मैं जानूँ तुम सद्गुणसागर, अवगुण मेरे सब हरियो।
किंकर की विनती सुन स्वामी, सब अपराध क्षमा करियो॥

तुम तो सकल विश्व के स्वामी, मैं हूं प्राणी संसारी। भोलेनाथ ..

काम, क्रोध, लोभ अति दारुण इनसे मेरो वश नाहीं।
द्रोह, मोह, मद संग न छोड़ै आन देत नहिं तुम तांई॥

क्षुधा-तृषा नित लगी रहत है, बढ़ी विषय तृष्णा भारी। भोलेनाथ ..

तुम ही शिवजी कर्ता-हर्ता, तुम ही जग के रखवारे।
तुम ही गगन मगन पुनि पृथ्वी पर्वतपुत्री प्यारे॥

तुम ही पवन हुताशन शिवजी, तुम ही रवि-शशि तमहारी। भोलेनाथ

पशुपति अजर, अमर, अमरेश्वर योगेश्वर शिव गोस्वामी।
वृषभारूढ़, गूढ़ गुरु गिरिपति, गिरिजावल्लभ निष्कामी।

सुषमासागर रूप उजागर, गावत हैं सब नरनारी। भोलेनाथ ..

महादेव देवों के अधिपति, फणिपति-भूषण अति साजै।
दीप्त ललाट लाल दोउ लोचन, आनत ही दु:ख भाजै।

परम प्रसिद्ध, पुनीत, पुरातन, महिमा त्रिभुवन-विस्तारी। भोलेनाथ ..

ब्रह्मा, विष्णु, महेश, शेष मुनि नारद आदि करत सेवा।
सबकी इच्छा पूरन करते, नाथ सनातन हर देवा॥

भक्ति, मुक्ति के दाता शंकर, नित्य-निरंतर सुखकारी। भोलेनाथ ..

महिमा इष्ट महेश्वर को जो सीखे, सुने, नित्य गावै।
अष्टसिद्धि-नवनिधि-सुख-सम्पत्ति स्वामीभक्ति मुक्ति पावै॥

श्रीअहिभूषण प्रसन्न होकर कृपा कीजिये त्रिपुरारी। भोलेनाथ ..

शुक्रवार, 28 नवंबर 2008

सच्चिदानंद का साक्षात्कार ही है महाशिवरात्रि








बंगलौर में 65 फुट

ऊँची शिव प्रतिमा





अपने भीतर स्थित शिव को जानने का महापर्व है महाशिवरात्रि। वैसे तो प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि होती है पर फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की शिवरात्रि का विशेष महत्व होने के कारण ही उसे महाशिवरात्रि कहा गया है। यह भगवान शिव की विराट दिव्यता का महापर्व है। भारतीय शास्त्र के अनुसार शिव अनंत हैं। शिव की अनंतता भी अनंत है। मानव जब सभी प्रकार के बंधनों और सम्मोहनों से मुक्त हो जाता है तो स्वयं शिव के समान हो जाता है। समस्त भौतिक बंधनों से मुक्ति होने पर ही मनुष्य को शिवत्व प्राप्त होता है। शिव और शिवत्व की दिव्यता को जान लेने का महापर्व है महाशिवरात्रि।

इस पवित्र दिन शिव भक्त पूजा एवं उपवास करते हैं। शिव मंदिरों को भव्यता के साथ सजाया जाता है। महादेव जी की बहु विधि पूजा अर्चना की जाती है। पूरा दिन लोग निराहार रहकर उपवास करते हैं। इस दिन काले तिल पानी में डाल कर स्नान करने के पश्चात भगवान शंकर की पूजा का विधान बताया गया है। शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, कनेर और मौल श्री के पत्ते अर्पित करके पूजा की जाती है। लोग रात्रि जागरण करके शिव का भजन पूजन करते हैं और अगले दिन शिव जी को जल का अर्घ्य प्रदान कर उपवास खोला जाता है। इस दिन विष्णु पुराण का पाठ भी किया जाता हैं। शिव भक्तों की मान्यता है कि जो व्यक्ति निरंतर चौदह वर्ष तक अन्न जल रहित इस व्रत का पालन करता है तो उसकी अनेक पीढ़ियों के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और उनको स्वर्ग की प्राप्ति होती है। शिव अर्चना को मोक्ष प्राप्त करने वाला सबसे सरल मार्ग माना गया है।

शिवरात्रि को शिव पार्वती के विवाह की रात्रि भी माना जाता है। दार्शनिक इसे पुरुष एवं प्रकृति के मिलन की रात्रि मान कर इस दिवस को सृष्टि का प्रारंभ मानते हैं। इसे आसुरी शक्तियों पर विजय प्राप्त करने के लिए शिव एवं शक्ति का योग भी कहा गया है। शिव की पूजा के संबंध में एक प्रचलित धारणा यह है कि एक बार ब्रह्मा जी एवं विष्णु जी में यह विवाद छिड़ गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। ब्रह्मा जी सृष्टि के रचयिता होने के कारण श्रेष्ठ होने का दावा कर रहे थे और भगवान विष्णु पूरी सृष्टि के पालन कर्ता के रूप में स्वयं को श्रेष्ठ कह रहे थे। जब वह विवाद अपने चरम पर पहुँचा तो अचानक एक विराट ज्योतिर्मय लिंग अपनी संपूर्ण भव्यता के साथ वहाँ प्रकट हुआ। उसका कोई और छोर दिखाई नहीं दे रहा था। सर्वानुमति से यह निश्चय किया गया कि जो इस महान ज्योतिर्मय लिंग के छोर का पहले पता लगाएगा उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा। अत: दोनों विपरीत दिशा में शिवलिंग की जानकारी प्राप्त करने के लिए निकल पड़े। बहुत लंबे समय तक विष्णु जी कुछ भी खोज पाने में असमर्थ रहे और लौट आए। ब्रह्मा जी भी इस कार्य में सफल नहीं हुए परंतु उन्होंने कहा कि वह छोर तक पहुँच गए थे। मार्ग से उन्होंने केतकी के फूल को साक्षी के रूप में साथ ले लिया था। ब्रह्मा जी के असत्य कहने पर स्वयं शिव वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्मा जी की इसके लिए आलोचना की। दोनों देवताओं ने महादेव की स्तुति की तब शिव जी बोले कि मैं ही सृष्टि का कारण, उत्पत्तिकर्ता और स्वामी हूँ। मैंने ही तुम दोनों को उत्पन्न किया है अत: तुम दोनों भी मुझ से भिन्न नहीं हो। शिव ने केतकी पुष्प को झूठी साक्षी देने के लिए दंडित करते हुए कहा कि यह पुष्प मेरी पूजा में प्रयुक्त नहीं किया जा सकेगा। उसी काल से शिवलिंग की पूजा एवं महाशिवरात्रि का पर्व प्रारंभ हुआ माना जाता है।

शिवलिंग की पूजा का अर्थ है कि समस्त विकारों और वासनाओं से रहित रह कर मन को निर्मल बनाना। वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। शिव पुराण में भगवान स्वयं कहते हैं, 'प्रलय काल आने पर जब चराचर जगत नष्ट हो जाता है और समस्त प्रपंच प्रकृति में विलीन हो जाता है, तब मैं अकेला ही स्थित रहता हूँ। दूसरा कोई नहीं रहता। सभी देवता और शास्त्र पंचाक्षर मंत्र में स्थित होते हैं। अत: मेरे से पालित होने के कारण वे नष्ट नहीं होते। तदनंतर मुझसे प्रकृति और पुरुष के भेद से युक्त सृष्टि होती है, वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदुनाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। इस तरह यह विश्व शक्ति स्वरूप ही है। नाद बिंदु का और बिंदु इस जगत का आधार है। यह शक्ति और शिव संपूर्ण जगत के आधार रूप में स्थित हो। बिंदु और नाद से युक्त सब कुछ शिव है, वही सबका आधार है। आधार में ही आधेय का समावेश या लय होता है। यही वह समष्टि है जिससे सृजन काल में सृष्टि का प्रारंभ होता है। बिंदु एवं नाद अर्थात शक्ति और शिव का संयुक्त रूप ही तो शिवलिंग में अवस्थित है। इसी कारण शिवलिंग की उपासना से ही परमानंद की प्राप्ति संभव है।

भारत ही नहीं विश्व के अन्य अनेक देशों में भी प्राचीन काल से शिव की पूजा होती रही है इसके अनेक प्रमाण समय समय पर प्राप्त हुए हैं। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई में भी ऐसे अवशेष प्राप्त हुए हैं जो शिव पूजा के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। हमारे समस्त प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में भी शिव जी की पूजा की विधियाँ विस्तार से उल्लिखित हैं। शास्त्रों में शिव की शक्ति को रात्रि ही कहा गया है। रात्रि शब्द का अर्थ है जन-मन को अवकाश या उत्सव प्रदान करने वाली। शिव की शक्ति रात्रि ही है जो विश्व के समस्त प्राणियों को अपनी गोद में आराम प्रदान करती है।

ईशान संहिता के अनुसार महाशिवरात्रि को ही ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ। शिव पुराण में ब्रह्मा जी ने कहा है कि संपूर्ण जगत के स्वामी सर्वज्ञ महेश्वर के कान से गुण श्रवण, वाणी से कीर्तन, मन से मनन करना महान साधना माना गया है। इसी लिए महाशिवरात्रि के दिन उपवास, ध्यान, जप, स्नान, दान, कथा श्रवण, प्रसाद एवं अन्य धार्मिक कृत्य करना महाफलदायक होता है। वास्तव में शिव की महिमा अपरंपार है। जिनके कोष में भभूत के अतिरिक्त कुछ नहीं है परंतु वह निरंतर तीनों लोकों का भरण पोषण करने वाले हैं। परम दरिद्र शमशानवासी होकर भी वह समस्त संपदाओं के उद्गम हैं और त्रिलोकी के नाथ हैं। अगाध महासागर की भांति शिव सर्वत्र व्याप्त हैं। वह सर्वेश्वर हैं। अत्यंत भयानक रूप के स्वामी होकर भी स्वयं शिव हैं।

जब भीष्म शरशैरया पर सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे तो पांडवों ने उनसे शिव महिमा के विषय में जानने की जिज्ञासा की तो उन्होंने उत्तर दिया कि कोई भी देहधारी मानव शिव महिमा बताने में सर्वथा असमर्थ है। भारतीय मनीषियों के अनुसार शिव अव्यक्त हैं और जो कुछ व्यक्त है, वह उसी की शक्ति है, वही उसका व्यक्त रूप है। शिव ही निराकार ब्रह्म हैं। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, पाँचों ज्ञानेंद्रियों और पाँचों कर्मेंद्रियों पर विजय प्राप्त कर शिव शक्ति की साधना करना ही शिवरात्रि व्रत करना है। शिवरात्रि के जागरण के संदर्भ में वही भावना है जो गीता में जागरण के विषय में व्यक्त की गई है। सामान्य प्राणियों की रात्रि में जोगी जागता है और उनके दिन में जोगी सोता है। इस प्रकार जो पाशबद्ध है उसे मनीषियों ने पशु कहा है अपने परम स्वरूप शिव के अधिक से अधिक निकट पहुँचना ही ''पशुपति`` शिव की उपासना का लक्ष्य है और यही जागरण का महत्व है। रात्रि में जागृत जीवन का कोलाहल नहीं रहता। प्रकृति शांत रहती है। यह अवस्था साधना, मनन और चिंतन के लिए अधिक अनुकूल होती है। उपवास का भी एक अर्थ है 'किसी के समीप रहना। वराह उपनिषद के अनुसार उपवास का अर्थ है जीवात्मा का परमात्मा के समीप रहना। महाशिवरात्रि पर जागरण और उपवास का यही लक्ष्य है।

शिव तनिक-सी सेवा से ही प्रसन्न होकर बड़े से बड़े पापियों का उद्धार करने वाले महादेव हैं। कभी केवल जल चढ़ा देने मात्र से प्रसन्न हो जाते हैं तो कभी बेल पत्र से ही। भले ही पूजा अनजाने में ही हो गई हो वह व्यर्थ नहीं जाती। किसी भी जाति अथवा वर्ण का व्यक्ति उनका भक्त हो सकता है। देव, गंधर्व, राक्षस, किन्नर, नाग, मानव सभी तो उनके आराधक है। हिंदू-अहिंदू में महादेव कोई भेद भाव नहीं करते। शिवलिंग पर तीन पत्ती वाले बेलपत्र और बूंद-बूंद जल का चढ़ाया जाना भी प्रतीकात्मक है। सत, रज और तम तीनों गुणों के रूप में शिव को अर्पित करना उनकी अर्चना है। बूंद-बूंद जल जीवन के एक-एक कण का प्रतीक है। इसका अभिप्राय है कि जीवन का क्षण-क्षण शिव की उपासना को समर्पित होना चाहिए।

शिव तो सर्वस्व देने वाले हैं। विश्व की रक्षार्थ स्वयं विष पान करते हैं। अत्यंत कठिन यात्रा कर गंगा को सिर पर धारण करके मोक्षदायिनी गंगा को धरा पर अवतरित करते हैं। श्रद्धा, आस्था और प्रेम के बदले सब कुछ प्रदान करते हैं। महाशिवरात्रि शिव और पार्वती के वैवाहिक जीवन में प्रवेश का दिन होने के कारण प्रेम का दिन है। यह प्रेम त्याग और आनंद का पर्व है। शिव स्वयं आनंदमय हैं। शिव के समीप ले जा कर सच्चिदानंद का साक्षात्कार करवाने का पर्व ही तो है महाशिवरात्रि।


गुरुवार, 27 नवंबर 2008

नागपंचमी

वाराणसी धर्म अध्यात्म और मोक्ष की नगरी काशी में नाग देवता के पूजा अर्चना की अपनी एक अलग परम्परा है। इस दिन घरों में महिलाएं नाग को देवता मानकर उनकी पूजा करती हैं तो बाहर पुरुष अखाड़े में कुश्ती लड़ते हैं और जादूगर तरह तरह के खेल तमाशे दिखाकर लोगों का मनोरंजन करते हैं जिसे वाराणसी में महुवर कहा जाता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार श्रावण शुक्ल पंचमी तिथि का स्वामी नाग है। इस कारण नाग पंचमी के दिन नागदेवता की विशेष पूजा अर्चना घरों में की जाती है। नागपंचमी के दिन महिलाए घरों की साफ -सफाई कर नागदेवता का चित्र लगाकर उसे सिन्दूर का टीका लगाकर दूध और लावा चढ़ाती है। इसके साथ नाग देवता से घर के लोगों की सुरक्षा हेतु दरवाजों पर भी नागदेवता का चित्र लगाकर अनकी पूजा की जाती है।
प्रख्यात ज्योतिषाचार्य पंडित प्रसाद दीक्षित के अनुसार हिन्दू धर्मशास्त्रों इस त्यौहार पर नाग की होने वाली पूजा के पीछे कई कारण हैं। एक तो यह कि हमारी पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी हुई है, दूसरी यह कि भगवान विष्णु क्षीर सागर में इसी शेषनाग के ऊपर आराम करते हैं और तीसरा यह है कि लक्ष्मण जी शेषनाग के अवतार माने जाते हैं।
वाराणसी में हालांकि नाग देवता का कोई मंदिर नहीं है, लेकिन सदियों से श्रद्धालु जैतपुरा स्थित नागकुंआ पर जाकर विधि विधान से नागदेवता की पूजा कर दूध लावा चढ़ाते आ रहे हैं। यहीं पर प्राच्य विधा के पोषक अपने ज्ञान को बढ़ाने के लिए नागकूप पर एकत्र होकर शास्त्रार्थ और शास्त्र चर्चा भी करते रहे हैं। नागपंचमी के दिन काशी में परम्परा के अनुसार मल्लयुद्ध, दंगल , महुवर आदि का प्रदर्शन भी होता है तथा सपेरे टोकरी में नाग लेकर लोगों को दर्शन कराके अच्छा खासा चढ़ावा भी पा जाते हैं।

वैसे नाग पंचमी के अवसर पर नगर के कई स्थानों पर महुअर खेलने और दंगल का आयोजन किया जाता है। लेकिन पहले और आज में अंतर पूछने पर लगभग 70 साल के हो चुके मुसाफिर पहलवान बताते हैं कि बदलते समय के अनुसार अब नागपंचमी पर पहले जैसी रौनक नही दिखाई देती है। महुअर और दंगल भी कम ही होते हैं। लोग पूजा अर्चना कर रस्म अदायगी कर लेते है। पारम्परिक परम्पराओं पर पाश्चात्य संस्कृति हावी हो रही है। अब अखाडे क़ी जगह जिम आ गया है, महुवर की जगह टेलीविजन ने ले लिया है।

कष्ट निवारक भैरवाष्टमी व्रत

शिव के इस भैरव रूप की उपासना करने वाले भक्तों के सभी प्रकार पाप, ताप एवं कष्ट दूर हो जाते हैं। इनकी भक्ति मनोवांछित फल देने वाली कही गई है। भैरव जी की उपासना करने वाले को भैरवाष्टमी के दिन व्रत रख कर प्रत्येक पहर में भैरवनाथ जी की षोड्षोपचार सहित पूजा करनी चाहिए व उन्हें अर्घ्य देना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार इस दिन श्री कालभैरव जी का दर्शन एवं पूजन मनोभिलषित पूर्ति में सहायक होता है।
श्री भैरवनाथ साक्षात् रुद्र हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि वेदों में जिस परम पुरुष का नाम रुद्र है, तंत्रशास्त्र में उसी का भैरव के नाम से वर्णन हुआ है। तन्त्रालोक की विवेक टीका में भैरव शब्द की यह व्युत्पत्ति दी गई है-
बिभत धारयतिपुष्णातिरचयतीति भैरव अर्थात् जो देव सृष्टि की रचना, पालन और संहार में समर्थ है, वह भैरव है। शिवपुराण में भैरव को भगवान शंकर का पूर्णरूप बतलाया गया है।
तत्वज्ञानी भगवान शंकर और भैरवनाथ में कोई अंतर नहीं मानते हैं। वे इन दोनों में अभेद दृष्टि रखते हैं। इनका आश्रय ले लेने पर भक्त निर्भय हो जाता है। भैरवनाथ अपने शरणागत की सदैव रक्षा करते हैं।

भैरवाष्टमी का महात्म्य
अष्टमी तिथि यूं तो भगवती महामाया का दिन होता है। परंतु मार्गशीर्ष यानी अगहन की कृष्ण पक्ष में जो अष्टमी तिथि होती है वह महामाया के साथ भगवान भोले शंकर का भी प्रिय दिन है। इस दिन ही भगवान भोले नाथ भैरव रूप में प्रकट हुए थे। एक बार श्री हरि विष्णु और ब्रह्मा जी में इस बात को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया कि उनमें श्रेष्ठ कौन है। विवाद इस हद तक बढ़ गया कि शिव शंकर की अध्यक्षता में एक सभा बुलाई गई। इस सभा में ऋषि-मुनि, सिध्द संत, उपस्थित हुए। सभा का निर्णय श्री विष्णु ने तो स्वीकार कर लिया परंतु ब्रह्मा जी निर्णय से संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने महादेव का अपमान कर दिया।
यह तो सर्वविदित है कि भोले नाथ जब शांत रहते हैं तो उस गहरी नदी की तरह प्रतीत होते हैं जिसकी धारा तीव्र होती है परंतु देखने में उसका जल ठहरा हुआ नजर आता है और जब क्रोधित होते हैं तो प्रलयकाल में गरजती और उफनती नदी जैसे दिखाई देते हैं। ब्रह्मा जी द्वारा अपमान किए जाने पर महादेव प्रलय के रूप में नजर आने लगे और उनका रौद्र रूप देखकर तीनों लोक भयभीत होने लगा। भगवान आशुतोष के इसी रौद्र रूप से भगवान भैरव प्रकट हुए। भगवान भैरव कुत्ते पर सवार थे और इनके हाथ में दंड था। हाथ में दण्ड होने से ये दण्डाधिपति भी कहे जाते हैं। इनका रूप अत्यंत भयंकर था। भैरव जी के इस रूप को देखकर ब्रह्मा जी को अपनी गलती का एहसास हुआ और वे भगवान भोले नाथ एवं भैरव की वंदना करने लगे।
शिव के इस भैरव रूप की उपासना करने वाले भक्तों के सभी प्रकार पाप, ताप एवं कष्ट दूर हो जाते हैं। इनकी भक्ति मनोवांछित फल देने वाली कही गई है। भैरव जी की उपासना करने वाले को भैरवाष्टमी के दिन व्रत रख कर प्रत्येक पहर में भैरवनाथ जी की षोड्षोपचार सहित पूजा करनी चाहिए व उन्हें अर्घ्य देना चाहिए। शास्त्रो के अनुसार इस दिन श्री कालभैरव जी का दर्शन एवं पूजन मनोभिलषित पूर्ति में सहायक होता है। भगवान शिव की भक्ति प्राप्त करने वालो के लिए श्री कालभैरव जी का आशीर्वाद अपेक्षित है। शिवस्तु कल्याणकारक के अनुसार कल्याण चाहने वालों को कालभैरव जी का दर्शन करना चाहिए। रात के समय जागरण करके माता पार्वती और भोले शंकर की कथा एवं भजन कीर्तन करना चाहिए व भैरव जी उत्पत्ति की कथा कहनी व सुननी चाहिए। रात का आधा पहर यानी मध्य रात्रि होने पर शंख, नगाड़ा, घंटा आदि बजाकर भैरव जी की आरती करनी चाहिए। भगवान भैरव नाथ का वाहन कुत्ता है। भैरव जी की प्रसन्नता के लिए इस दिन कुत्ते को उत्तम भोजन दें। मान्यता के अनुसार इस दिन प्रात: काल पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करके पितरों का श्राध्द व तर्पण करें फिर भैरव जी की पूजा व व्रत करें तो विघ्न बाधाएं समाप्त हो जाती हैं व आयु में वृध्दि होती है। भैरव जी के विषय में यह भी कहा गया है कि इनकी पूजा व भक्ति करने वाले से भूत, पिशाच एवं काल भी दूर-दूर रहते हैं। उन्हें रोग व दोष स्पर्श भी नहीं करते हैं। शुध्द मन एवं आचरण से जो भी भैरव जी की अराधना करते हैं उन्हें जीवन के हर मुश्किल रास्ते पर सफलता मिलती है। काल भैरव के साथ ही इस दिन देवी कालिका की उपासना एवं व्रत का विधान भी है।
इस रात देवी काली की उपासना करने वालों को अर्ध रात्रि के बाद मां की उसी प्रकार से पूजा करनी चाहिए जिस प्रकार दुर्गा पूजा में सप्तमी तिथि को देवी कालरात्रि की पूजा का विधान है। कालाष्टमी में दिन भर उपवास रखकर सांय सूर्यास्त के उपरान्त प्रदोष काल में भैरवनाथ की पूजा करके प्रसाद को भोजन के रूप में ग्रहण किया जाता है। मन्त्र विद्या की एक प्राचीन हस्तलिखित पाण्डुलिपि से महाकाल भैरव का यह मंत्र मिला है-
हंषंनंगंकंसं खंमहाकालभैरवायनम:।
इस मंत्र का 21 हजार बार जप करने से बड़ी से बड़ी विपत्ति दूर हो जाती है। साधक भैरव जी के वाहन श्वान (कुत्ते) को नित्य कुछ खिलाने के बाद ही भोजन करें।
सदाशिव की अष्टमूतयों में रुद्र अग्नि तत्व के अधिष्ठाता हैं। जिस तरह अग्नि तत्व के सभी गुण रुद्र में समाहित हैं, उसी प्रकार भैरवनाथ भी अग्नि के समान तेजस्वी हैं। भैरव जी कलयुग के जाग्रत देवता हैं। भक्ति-भाव से इनका स्मरण करने मात्र से समस्याएं दूर होती हैं।

शिवमानसपूजा

आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा रचित शिव मानस पूजा शिव की एक अनुठी स्तुति है। यह स्तुति शिव भक्ति मार्ग के अतयंत सरल पर साथ ही एक अतयन्त गुढ रहस्य को समझाता है। शिव सिर्फ भक्ति द्वारा प्रापत्य हैं, आडम्बर ह्की कोई आवश्यकता नहीं है। इस स्तुति में हम प्रभू को भक्ति द्वारा मानसिक रूप से तैयार की हुई वस्तुएं समर्पित करते हैं। हम उन्हे रत्न जडित सिहांसन पर आसिन करते हैं, वस्त्र, भोज तथा भक्ति अर्पण करते हैं; पर ये सभी हम भोतिक स्वरूप में अपितु मानसिक रूप में करते हैं। इस प्रकार हम स्वयं को शिव को शिव को समर्पित कर शिव स्वरूप में विलिन हो जाते हैं।

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं
नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम्
जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ॥१..

हे दयानिधे, हे पशुपते, मैंने आपके लिए एक रत्नजड़ित सिहांसन की कल्पना की है, स्नान के लिए हिमालय सम शीतल जल, नाना प्रकार के रत्न जड़ित दिव्य वस्त्र, तथा कस्तुरि, चन्दन, विल्व पत्र एवं जुही, चम्पा इत्यादि पुष्पांजलि तथा धूप-दीप ये सभी मानसिक पूजा उपहार ग्रहण करें।

सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं
भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम् .
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु ..२..

हे महादेव, मैंने अपने मन में नवीन रत्नखण्डों से जड़ित स्वर्ण पात्रों में धृतयूक्त खीर, दुध एवं दही युक्त पाँच प्रकार के व्यंजन, रम्भा फल एवं शुद्ध मीठा जल ताम्बुल और कर्पूर से सुगन्धित धुप आपके लिए प्रस्तुत किया है। हे प्रभू मेरी इस भक्ति को स्वीकार करें।

छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलम्
वीणाभेरिमृदङ्गकाहलकला गीतं च नृत्यं तथा .
साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया
सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ..३..

हे प्रभो! मैंने सकंल्प द्वारा आपके लिए एक छ्त्र, दो चंवर, पंखा एव निर्मल दर्पन की कल्पना की है। आपको साष्टाङ्ग प्रणाम करते हुए, तथा विणा, भेरि एवं मृदङ्ग के साथ गीत, नृत्य एव बहुदा प्रकार की स्तुति प्रस्तुत करता हूँ। हे प्रभो! मेरी इस पूजा को ग्रहण करें।

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः .
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् .. ४..

हे शम्भों ! आप मेरी आत्मा हैं, माँ भवानी मेरी बुद्धी हैं, मेरी इन्द्रियाँ आपके गण हैं एवं मेरा शरीर आपका गृह है। सम्पुर्ण विषय-भोग की रचना आपकी ही पूजा है। मेरे निद्रा की स्थिति समाधि स्थिति है, मेरा चलना आपकी ही परिक्रमा है, मेरे शब्द आपके ही स्तोत्र हैं। वास्त्व में मैं जो भी करता हूँ वह सब आपकी आराधना ही है।

करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा .
श्रवणनयनजं वा मानसंवापराधम् .
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व .
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेवशम्भो .. ५..

हे प्रभो! मेरे हाथ या पैर द्वारा, कर्म द्वारा, वाक्य या स्रवण द्वारा या मन द्वारा हुए समस्त विहित अथवा अविहित अपराधों को क्षमा करें। हे करूणा मय महादेव सम्भों आपकी सदा जय हो।

.. इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिता शिवमानसपूजा समाप्ता..

रविवार, 23 नवंबर 2008

षोडशमातृका पूजन


षोडशमातृकाओं की स्थापना के लिए फर्श पर वृत्ताकार मंडल बनाया जाता है। इस आकृति में सोलह कोष्ठक (खाने) बनाए जाते हैं। पश्चिम दिशा से पूर्व दिशा की ओर मातृकाओं की स्थापना करें।

प्रत्येक कोष्ठक में अक्षत, जौ, गेहूँ रखें। पहले कोष्ठक में गौरी का आह्वान किया जाता है। लेकिन गौरी के आह्वान से पहले भगवान गणेश के आह्वान की परंपरा है। गणेश का आह्वान पुष्प और अक्षत से किया जाता है। अन्य कोष्ठकों में मंत्र उच्चारित करते हुए आह्वान करें।

षोडशमातृका चक्र

आत्मनः 11 कुलदेवता 12 लोकमातरः 8 देवसेना मेधा 4
तुष्टिः 15 मातरः 11 जया 7 शची 3
पुष्टिः 10 स्वाहा 10 विजया 6 पद्मा 2
धृतिः 13 स्वधा 9 सावित्री 5 गौरी गणेश 1

आह्वान एवं स्थापना मंत्र
किसी भी देवी या देवता की पूजा में आह्वान का सबसे अधिक महत्व होता है क्योंकि उस देवी या देवता के आह्वान के बिना पूजा कार्य प्रारंभ नहीं होता है। षोडशमातृका पूजन में महादेवियों का आह्वान और स्थापना के लिए निम्न मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। इस मंत्रों में षोडशमातृकाओं का आह्वान किया गया है :-

1. ॐ गणपतये नमः, गणपतिमावाहयामि, स्थापयामि ।
ॐ ॐ गौर्यै नमः, गौरीमावाहयामि, स्थापयामि ।

2. ॐ पद्मायै नमः, ॐ पद्मावाहयामि, स्थापयामि ।

3. ॐ शच्यै नमः, शचीमावाहयामि, स्थापयामि ।

4. ॐ मेधायै नमः, मेधामावाहयामि, स्थापयामि ।

5. ॐ सावित्र्यै नमः, सावित्रीमावाहयामि स्थापयामि ।

6. ॐ विजयायै नमः, विजयामावाहयाम, स्थापयामि ।

7. ॐ जयायै नमः जयामावाहयामि, स्थापयामि ।

8. ॐ देवसेनायै नमः, देवसेनामावाहयामि, स्थापयामि ।

9. ॐ स्वधायै नमः, स्वधामावाहयामि, स्थापयामि ।

10. ॐ स्वाहायै नमः, स्वाहामावाहयामि, स्थापयामि ।

11. ॐ मातृभ्यो नमः, मातृः आवाहयामि, स्थापयामि ।

12. ॐ लोकमातृभ्यो नमः, लोकमातृः आवाहयामि, स्थापयामि ।

13. ॐ धृत्यै नमः, धृतिमावाहयामि, स्थापयामि ।

14. ॐ पुष्टयै नमः, पुष्टिमावाहयामि, स्थापयामि ।

15. ॐ तुष्टयै नमः, तुष्टिमावाहयामि, स्थापयामि.

16. ॐ आत्मनः कुलदेवतायै नमः, आत्मनः कुलदेतामावाहयामि, स्थापयामि ।

षोडशमातृकाओं की स्थापना के लिए फर्श पर वृत्ताकार मंडल बनाया जाता है। इस आकृति में सोलह कोष्ठक (खाने) बनाए जाते हैं। पश्चिम दिशा से पूर्व दिशा की ओर मातृकाओं की स्थापना करें। प्रत्येक कोष्ठक में अक्षत, जौ, गेहूँ रखें।

पंचदेव पूजन

पंचदेव पूजन के लिए सबसे पहले देवताओं का ध्यान कर उनका पूजन करें-

विष्णु का ध्यान
उद्यत्कोटिदिवाकराभमनिशं शंख गदां पंकजं
चक्रं बिभ्रतमिन्दिरावसुमतीसंशोभिपार्श्वद्वयम्‌।

कोटीरांगदहारकुण्डलधरं पीताम्बरं कौस्तुभै-
र्दीप्तं श्विधरं स्ववक्षसि लसच्छीवत्सचिह्रं भजे॥

ॐ श्री विष्णवे नमः,ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि ।
ॐ विष्णवे नमः, पाद्यं, अर्घ्यं, आचमन्यं, स्नानं समर्पयामि।

शिव का ध्यान
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारूचंद्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्‌ ।

पद्मासीनं समन्तात्‌ स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभय हरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्‌ ।

ॐ नमः शिवाय,ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि ।
ॐ नमः शिवाय, पाद्यं, अर्घ्यं, आचमन्यं स्नानं समर्पयामि।

गणेश का ध्यान
खर्वं स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरं
प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम्‌ ।

दन्ताघातविदारितारिरुधिरैः सिन्दूरशोभाकरं
वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम्‌ ॥

ॐ श्री गणेशाय नमः,ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि ।
ॐ श्री गणेशाय नमः, पाद्यं, अर्घ्यं, आचमन्यं, स्नानं समर्पयामि।

सूर्य का ध्यान
रक्ताम्बुजासनमशेषगुणैकसिन्धुं
भानुं समस्तजगतामधिपं भजामि।

पद्मद्वयाभयवरान्‌ दधतं कराब्जै-
र्माणिक्यमौलिमरुणांगरुचिं त्रिनेत्रम्‌॥

ॐ श्री सूर्याय नमः, ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समपर्यामि ।
ॐ श्री सूर्याय नमः, पाद्यं, अर्घ्यं, आचमन्यं, स्नानं समर्पयामि।

दुर्गा का ध्यान
सिंहस्था शशिशेखरा मरकतप्रख्यैश्चतुर्भिर्भुजैः
शंख चक्रधनुः शरांश्च दधती नेत्रैस्त्रिभिः शोभिता।

आमुक्तांगदहारकंकणरणत्काञ्चीरणन्नूपुरा
दुर्गा दुर्गतिहारिणी भवतु नो रत्नोल्लसत्कुण्डला॥

ॐ श्री दुर्गायै नमः, ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समपर्यामि ।
ॐ श्री दुर्गायै नमः, पाद्यं, अर्घ्यं, आचमन्यं, स्नानं समर्पयामि।

महाशिवरात्रि की व्रत-कथा

एक बार पार्वती ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्यु लोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?'

उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया।

अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए।

एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई।

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी ! मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।'

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे मत मार।'

शिकारी हँसा और बोला, 'सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे।'

उत्तर में मृगी ने फिर कहा, 'जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।'

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्व करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला,' हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा।'

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।'

उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।

देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।'