भगवान शिव के बारे में लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भगवान शिव के बारे में लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

शिव महिमा

हमारे हिंदू धर्म में त्रिदेवों अर्थात भगवान ब्रह्मा, विष्णु व शंकर का अपना एक विशिष्ट स्थान है और इसमें भी भगवान शंकर का चरित्र जहाँ अत्यधिक रोचक हैं वहीं यह पौराणिक कथाओं में अत्यधिक गूढ रहस्यों से भी भरा हुआ है ।

पौराणिक कथाओं में भगवान शिव को विश्वास का प्रतीक माना गया है क्योंकि उनका अपना चरित्र अनेक विरोधाभासों से भरा हुआ है जैसे शिव का अर्थ है जो शुभकर व कल्याणकारी हो, जबकि शिवजी का अपना व्यक्तित्व इससे जरा भी मेल नहीं खाता, क्योंकि वे अपने शरीर में इत्र के स्थान पर चिता की राख मलते हैं तथा गले में फूल-मालाओं के स्थान पर विषैले सर्पों को धारण करते हैं । यही नहीं भगवान शिव को कुबेर का स्वामी माना जाता है जबकि वे स्वयं कैलाश पर्वत पर बिना किसी ठौर-ठिकानों के यूँ ही खुले आकाश के नीचे निवास करते हैं । कहने का तात्पर्य है कि भगवान शिव का स्वभाव शास्त्रों में वर्णित उनके गुणों से जरा भी मेल नहीं खाता और इतने अधिक विरोधाभासों में, किसी भी व्यक्ति की शिव के प्रति आस्था, उसके अपने विश्वास के आधार पर ही टिकी हुई है, इसलिए, सभी कथाओं में भगवान शिव को विश्वास का प्रतीक माना गया है ।

पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती को भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए तपस्या के कठिन दौर से गुज़रना पडा था और चूँकि तपस्या के कठिन दौर की सफलता व्यक्ति की अपनी श्रद्धा पर निर्भर करती है और ऐसे समय भगवान शिव के प्रति माता पार्वती की श्रद्धा (चूँकि वे हिमालय पर्वत की बेटी हैं इसलिए) पर्वत की तरह अडिग व मज़बूत रहती है, इसलिए हमारी पौराणिक कथाओं में माता पार्वती को श्रद्धा का प्रतीक माना गया है ।

भगवान शिव के अपने दो पुत्र है, श्री कार्तिकेय व श्री गणेश । जहाँ कार्तिकेय का सीधा सा अर्थ यह है कि जो ‘तर्कय‘ हो अर्थात जो सभी प्रकार के तर्कों से मुक्त हो गया हो वहीं गणेश भगवान को माता पार्वती अपने मैल से उत्पन्न करती हैं किन्तु एक शिव भक्त के हाथों से उनका सिर, धड से अलग हो जाता हैं । संक्षेप में इसके द्वारा हमें यह बताने का प्रयास किया है कि अगर श्रद्धा अपने कुछ मैल रूपी अवगुणों को भी निकालती है तो उससे भी जगत में कुछ श्रेष्ठतम ही घटता है किन्तु इसके लिए श्रद्धा को विश्वास का सहयोग लेकर चलना चाहिए । इसके विपरीत आचरण करने पर इसके अमंगलमय होने की पूरी संभावना रहती है । कथा आगे कहती है कि इसके पश्चात भगवान शिव हाथी का सिर लगाकर श्री गणेशजी का उद्धार करते हैं अर्थात ऐसी अमंगलकारी स्थितियों में भी, हम विश्वास के सहयोग से इसे पुनर्व्यवस्थित कर, इसकी श्रेष्ठता को प्रमाणित कर सकते हैं और इसे शुभ सिद्ध कर सकते हैं ।

इस तरह पुराणों में वर्णित इस शिव-चरित्र के माध्यम से हमें यह समझाने का प्रयास किया गया है कि जिन व्यक्तियों के जीवन में मन अत्यधिक प्रबल हो उन्हें भगवान शिव की उपासना के द्वारा ही अपनी आध्यात्मिक सत्य की यात्रा आरम्भ करनी चाहिए क्योंकि इससे उनके मन में जहाँ विश्वास का भाव गहरे तौर पर अंकुरित होगा वहीं यह मज़बूत व अडिग श्रद्धा रूपी विशाल वट वृक्ष बनकर चहुं ओर अपनी शाखाएँ फैलाने लगेगा ।

इसी तरह और आगे की आध्यात्मिक यात्रा करने पर गणेश भगवान के आशीर्वाद से जहाँ उनकी सारी विघ्न बाधाएँ दूर होंगी वहीं इसके द्वारा उन्हें शुभ फलों की प्राप्ति भी होने लगेगी । जब भक्त इन सब बातों से उत्साहित होकर पूरी तन्मयता के साथ इसी रास्ते में थोडा और आगे निकलेगा तो वह स्वयं को सभी प्रकार के विधि-विधानों व तर्कों से मुक्त पाएगा तथा वह आध्यात्मिक सत्य व ईश्वर का साक्षात्कार करने में सफल होगा । यही शिव के अपने सम्पूर्ण जीवन का मर्म है जिसे कि शिव-चरित्र के माध्यम से हमें समझाने का प्रयास किया गया है ।

महा शिवरात्रि के बारे में यह कथा प्रचलित है कि एक पापी शिकारी अनजाने में ही बेलपत्रों के द्वारा भगवान शिव की उपासना करता है तथा हाथ में आए हुए शिकार को अभयदान देकर छोड देता है जिससे भगवान शिव प्रसन्न होकर उसे दर्शन देते हैं तथा उसका उद्धार करते हैं । इस कथा के द्वारा हमें यह समझाने का प्रयास किया गया है कि अगर कोई अनजाने में ही अपने पूर्ण विश्वास के साथ ईश्वर की स्तुति करें तो भी उसके जीवन का उद्धार संभव है । यही वजह है कि कई वर्षों तक पाप व अपराध का जीवन ढोते वाल्मीकि ऋषि, मगध सम्राट अशोक आदि का जीवन भी अनजाने में ही उनके द्वारा किए गए ईश्वरीय स्तुति के परिणामस्वरुप, मात्र एक छोटी सी घटना को आधार बनाकर रूपान्तिरित हो उठा और भगवान के द्वारा इनका उद्धार हुआ ।

इसी प्रकार एक अन्य कथा में भगवान शिव अपना ध्यान भंग करने के जुर्म में कामदेव को पूर्णतः समाप्त करने के स्थान पर, उसकी देह को ही भस्म कर देते हैं क्योंकि ‘काम‘ का सम्बन्ध व्यक्ति की देह के साथ ही जुडा हुआ है । यही नहीं इस कथा के माध्यम से हमें यह समझाने का प्रयास किया गया है कि यदि व्यक्ति के अन्दर ईश्वर के प्रति विश्वास घनीभूत रूप में हो तो वह अपनी एक ही नज़र में ‘काम‘ जैसे विकारों को नष्ट कर सकता है । इसी तरह कथा आगे यह कहती है कि शिव के हाथों भस्म होने के पश्चात कामदेव का दोबारा जन्म कृष्ण-पुत्र श्री प्रद्युम्न के रूप में होता है । भगवान श्रीकृष्ण स्वयं विष्णु के अवतार है जो कि हृदय के प्रतीक हैं और श्रीकृष्ण भगवान इसी हृदय से निकले साक्षात प्रेम के ही रूप है । यहाँ यह समझने योग्य बात है कि प्रद्युम्न का जन्म ब्रज की गोपियों अथवा राधा के गर्भ से न होकर, कृष्ण की सामाजिक पत्नी के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त रूक्मणि देवी के गर्भ से होता है अर्थात इस सम्पूर्ण कथा के माध्यम से हमें यह समझाने का प्रयास किया गया है कि यदि व्यक्ति के मन में काम का भाव यूँ ही उठे तब तो यह ग़लत है किन्तु यदि यह काम-भाव व्यक्ति के हृदय से निकले प्रेम रूप में हो तथा यह विवाह बंधन में बँधा हो, तब ही यह जगत के कल्याणकारी हित में पूर्णतः स्वीकार्य है ।

सोमवार, 27 अप्रैल 2009

ज्योतिष गुरु भगवान शिव

God Shivहमारी भारतीय संस्कृति इतनी विशाल है कि उसका प्रत्येक कार्य चाहे उपवास हो, पूजन हो, ध्यान हो या सामाजिक कार्य हो, सदैव संस्कृति से जुड़ा रहता है। हमारे देश के विभिन्न प्रांतों में अनेक देवताओं का पूजन होता रहा है किंतु शिव की व्यापकता ऐसी है कि वह हर जगह पूजे जाते हैं। हमारे प्राचीन ग्रंथ, जो हर जिज्ञासा को शांत करने में समर्थ हैं, जो श्रुति स्मृति के दैदीप्यमान स्तंभ हैं, ऐसे वेदों के वाग्मय में जगह-जगह शिव को ईश्वर या रुद्र के नाम से संबोधित कर उनकी व्यापकता को दर्शाया गया है।

यजुर्वेद के एकादश अध्याय के 54वें मंत्र में कहा गया है कि रुद्रदेव ने भूलोक का सृजन किया और उसको महान तेजस्विता से युक्त सूर्यदेव ने प्रकाशित किया। उन रुद्रदेव की प्रचंड ज्योति ही अन्य देवों के अस्तित्व की परिचायक है। शिव ही सर्वप्रथम देव हैं, जिन्होंने पृथ्वी की संरचना की तथा अन्य सभी देवों को अपने तेज से तेजस्वी बनाया। यजुर्वेद के 19वें अध्याय में 66 मंत्र हैं, जिन्हें रुद्री का नाम या नमक चमक के मंत्रों की संज्ञा दी है। इसी से भगवान भूत भावन महाकाल की पूजा-अर्चन व अभिषेक आदि होता है। इसी अध्याय के चौथे मंत्र में भगवान शिव को पर्वतवासी कहा गया। उनसे संपूर्ण जगत के कल्याण की कामना की गई और अपने विचारों की पवित्रता तथा निर्मलता मांगी गई। आगे 19वें मंत्र में अपनी संतानों की तथा पशुधन की रक्षा चाही गई।

महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य रघुवंश में महेश्वर ˜यम्बक एवं न द्रपटा कहकर त्रिलोचन सदाशिव को ही महेश्वर कहा है। सभी प्रकार की याचनाएं उसी से की जाती हैं, जो उसको पूर्ण करने में समर्थ है और यही कारण है कि शिव औघरदानी के नाम से भी जाने जाते हैं।

वैदिक वांगमय में रुद्र का विशिष्ट स्थान है। शतपथ ब्रह्मण में रुद्र को अनेक जगह अग्नि के निकट ही माना गया है। कहते हैं कि ‘यो वैरुद्र: सो अग्नि’ रुद्र को पशुओं का पति भी कहा गया है। भगवान रुद्र को मरुत्तपिता कहा गया है। तैत्तरीय संहिता में शिव की व्यापकता बताई गई है। इसी कारण रुद्र एवं उनके गणों की यजुर्वेद में स्तुति की गई है।

शिव को पंचमुखी, दशभुजा युक्त माना है। शिव के पश्चिम मुख का पूजन पृथ्वी तत्व के रूप में किया जाता है। उनके उत्तर मुख का पूजन जल तत्व के रूप में, दक्षिण मुख का तेजस तत्व के रूप में तथा पूर्व मुख का वायु तत्व के रूप में किया जाता है। भगवान शिव के ऊध्र्वमुख का पूजन आकाश तत्व के रूप में किया जाता है। इन पांच तत्वों का निर्माण भगवान सदाशिव से ही हुआ है। इन्हीं पांच तत्वों से संपूर्ण चराचर जगत का निर्माण हुआ है। तभी तो भवराज पुष्पदंत महिम्न में कहते हैं - हे सदाशिव! आपकी शक्ति से ही इस संपूर्ण संसार चर-अचर का निर्माण हुआ है।

आप ही रक्षक हैं। आपकी माया से ही इस ब्रम्हांड का लय होता है। हे शिव! सत्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण का समावेश भी आपसे ही होता है। श्लोक में आगे वे कहते हैं कि हे सदाशिव! आपके पास केवल एक बूढ़ा बेल, खाट की पाटी, कपाल, फरसा, सिंहचर्म, भस्म एवं सर्प है, किंतु सभी देवता आपकी कृपा से ही सिद्धियां, शक्तियां एवं ऐश्वर्य भोगते हैं। 29वें श्लोक में वे कहते हैं - शिव को ऋक, यजु, साम, ओंकार तीनों अवस्थाएं, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, स्वर्ग लोक, मृत्युलोक एवं पाताल लोक, ब्रह्मा, विष्णु आदि को धारण किए हुए दर्शाया है।

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि भगवान शिव उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के दृष्टा हैं। निर्माण, रक्षण एवं संहरण कार्यो का कर्ता होने के कारण उन्हें ही ब्रम्हा, विष्णु एवं रुद्र कहा गया है। इदं व इत्थं से उनका वर्णन शब्द से परे है। शिव की महिमा वाणी का विषय नहीं है। मन का विषय भी नहीं है। वे तो सारे ब्रम्हांड में तद्रूप होकर विद्यमान होने से सदैव श्वास-प्रश्वास में अनुभूत होते रहते हैं। इसी कारण ईश्वर के स्वरूप को अनुभव एवं आनंद की संज्ञा दी गई है।

आगे भगवान सदाशिव को अनेक नामों से जानने का प्रयत्न किया गया है, जिसमें त्रिनेत्र, जटाधर, गंगाधर, महाकाल, काल, नक्षत्रसाधक, ज्योतिषमयाय, त्रिकालधृष, शत्रुहंता आदि अनेक नाम हैं। यहां महाकाल पर चर्चा करना आवश्यक होगा। काल का अर्थ है समय। ज्योतिषीय गणना में समय का बहुत महत्व है। उस समय की गणना किसे आधार मानकर की जाए, यह भी एक महत्वपूर्ण बिंदु है। अवंतिका (उज्जैन) गौरवशालिनी है क्योंकि जब सूर्य की परम क्रांति 24 होती है, तब सूर्य ठीक अवंतिका के मस्तक पर होता है।

वर्ष में एक बार ही ऐसा होता है। यह स्थिति विश्व में और कहीं नहीं होती क्योंकि अवंतिका का ही अक्षांक्ष 24 है। यही संपूर्ण भूमंडल का मध्यवर्ती स्थान माना गया है। यह गौरव मात्र अवंतिका को ही प्राप्त है और इसी कारण यहां महाकाल स्थापित हुए हैं, जो स्वयंभू हैं। यहीं से भूमध्य रेखा को माना गया है। शिव को नक्षत्र साधक भी कहा गया है। जो यह स्पष्ट करता है कि शिव ज्योतिष शास्त्र के प्रणोता, गुरु, प्रसारक एवं उपदेशक शिव है।

भगवान सदाशिव का एक नाम शत्रुहंता भी है। हम इसका अर्थ लौकिक शत्रु का नाश करना समझते हैं, लेकिन इसका अर्थ है, अपने भीतर के शत्रु भाव को समाप्त करना। अनेक कथाओं में हम देखते हैं कि जब ब्रrांड पर कोई भी विपत्ति आई, सभी देवता सदाशिव के पास गए। चाहे समुद्रमंथन से निकलने वाला जहर हो या त्रिपुरासुर का आतंक या आपतदैत्य का कोलाहल, इसी कारण तो भगवान शिव परिवार के सभी वाहन शत्रु भाव त्यागकर परस्पर मैत्री भाव से रहते हैं। शिवजी का वाहन नंदी (बैल), उमा (पार्वती) का वाहन सिंह, भगवान के गले का सर्प, कार्तिकेय का वाहन मयूर, गणोश का चूहा सभी परस्पर प्रेम एवं सहयोग भाव से रहते हैं।

शिव को त्रिनेत्र कहा गया है। ये तीन नेत्र सूर्य, चंद्र एवं वहनी है, जिनके नेत्र सूर्य एवं चंद्र हैं। शिव के बारे में जितना जाना जाए, उतना कम है। अधिक न कहते हुए इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि शिव केवल नाम ही नहीं हैं अपितु संपूर्ण ब्रह्मांड की प्रत्येक हलचल परिवर्तन, परिवर्धन आदि में भगवान सदाशिव के सर्वव्यापी स्वरूप के ही दर्शन होते हैं।

भगवान शिव के १०८ नाम

  1. शिव - कल्याण स्वरूप
  2. महेश्वर - माया के अधीश्वर
  3. शम्भू - आनंद स्स्वरूप वाले
  4. पिनाकी - पिनाक धनुष धारण करने वाले
  5. शशिशेखर - सिर पर चंद्रमा धारण करने वाले
  6. वामदेव - अत्यंत सुंदर स्वरूप वाले
  7. विरूपाक्ष - भौंडी आँख वाले
  8. कपर्दी - जटाजूट धारण करने वाले
  9. नीललोहित - नीले और लाल रंग वाले
  10. शंकर - सबका कल्याण करने वाले
  11. शूलपाणी - हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले
  12. खटवांगी - खटिया का एक पाया रखने वाले
  13. विष्णुवल्लभ - भगवान विष्णु के अतिप्रेमी
  14. शिपिविष्ट - सितुहा में प्रवेश करने वाले
  15. अंबिकानाथ - भगवति के पति
  16. श्रीकण्ठ - सुंदर कण्ठ वाले
  17. भक्तवत्सल - भक्तों को अत्यंत स्नेह करने वाले
  18. भव - संसार के रूप में प्रकट होने वाले
  19. शर्व - कष्टों को नष्ट करने वाले
  20. त्रिलोकेश - तीनों लोकों के स्वामी
  21. शितिकण्ठ - सफेद कण्ठ वाले
  22. शिवाप्रिय - पार्वती के प्रिय
  23. उग्र - अत्यंत उग्र रूप वाले
  24. कपाली - कपाल धारण करने वाले
  25. कामारी - कामदेव के शत्रु
  26. अंधकारसुरसूदन - अंधक दैत्य को मारने वाले
  27. गंगाधर - गंगा जी को धारण करने वाले
  28. ललाटाक्ष - ललाट में आँख वाले
  29. कालकाल - काल के भी काल
  30. कृपानिधि - करूणा की खान
  31. भीम - भयंकर रूप वाले
  32. परशुहस्त - हाथ में फरसा धारण करने वाले
  33. मृगपाणी - हाथ में हिरण धारण करने वाले
  34. जटाधर - जटा रखने वाले
  35. कैलाशवासी - कैलाश के निवासी
  36. कवची - कवच धारण करने वाले
  37. कठोर - अत्यन्त मजबूत देह वाले
  38. त्रिपुरांतक - त्रिपुरासुर को मारने वाले
  39. वृषांक - बैल के चिह्न वाली झंडा वाले
  40. वृषभारूढ़ - बैल की सवारी वाले
  41. भस्मोद्धूलितविग्रह - सारे शरीर में भस्म लगाने वाले
  42. सामप्रिय - सामगान से प्रेम करने वाले
  43. स्वरमयी - सातों स्वरों में निवास करने वाले
  44. त्रयीमूर्ति - वेदरूपी विग्रह करने वाले
  45. अनीश्वर - जिसका और कोई मालिक नहीं है
  46. सर्वज्ञ - सब कुछ जानने वाले
  47. परमात्मा - सबका अपना आपा
  48. सोमसूर्याग्निलोचन - चंद्र, सूर्य और अग्निरूपी आँख वाले
  49. हवि - आहूति रूपी द्रव्य वाले
  50. यज्ञमय - यज्ञस्वरूप वाले
  51. सोम - उमा के सहित रूप वाले
  52. पंचवक्त्र - पांच मुख वाले
  53. सदाशिव - नित्य कल्याण रूप वाले
  54. विश्वेश्वर - सारे विश्व के ईश्वर
  55. वीरभद्र - बहादुर होते हुए भी शांत रूप वाले
  56. गणनाथ - गणों के स्वामी
  57. प्रजापति - प्रजाओं का पालन करने वाले
  58. हिरण्यरेता - स्वर्ण तेज वाले
  59. दुर्धुर्ष - किसी से नहीं दबने वाले
  60. गिरीश - पहाड़ों के मालिक
  61. गिरिश - कैलाश पर्वत पर सोने वाले
  62. अनघ - पापरहित
  63. भुजंगभूषण - साँप के आभूषण वाले
  64. भर्ग - पापों को भूंज देने वाले
  65. गिरिधन्वा - मेरू पर्वत को धनुष बनाने वाले
  66. गिरिप्रिय - पर्वत प्रेमी
  67. कृत्तिवासा - गजचर्म पहनने वाले
  68. पुराराति - पुरों का नाश करने वाले
  69. भगवान् - सर्वसमर्थ षड्ऐश्वर्य संपन्न
  70. प्रमथाधिप - प्रमथगणों के अधिपति
  71. मृत्युंजय - मृत्यु को जीतने वाले
  72. सूक्ष्मतनु - सूक्ष्म शरीर वाले
  73. जगद्व्यापी - जगत् में व्याप्त होकर रहने वाले
  74. जगद्गुरू - जगत् के गुरू
  75. व्योमकेश - आकाश रूपी बाल वाले
  76. महासेनजनक - कार्तिकेय के पिता
  77. चारुविक्रम - सुन्दर पराक्रम वाले
  78. रूद्र - भक्तों के दुख देखकर रोने वाले
  79. भूतपति - भूतप्रेत या पंचभूतों के स्वामी
  80. स्थाणु - स्पंदन रहित कूटस्थ रूप वाले
  81. अहिर्बुध्न्य - कुण्डलिनी को धारण करने वाले
  82. दिगम्बर - नग्न, आकाशरूपी वस्त्र वाले
  83. अष्टमूर्ति - आठ रूप वाले
  84. अनेकात्मा - अनेक रूप धारण करने वाले
  85. सात्त्विक - सत्व गुण वाले
  86. शुद्धविग्रह - शुद्धमूर्ति वाले
  87. शाश्वत - नित्य रहने वाले
  88. खण्डपरशु - टूटा हुआ फरसा धारण करने वाले
  89. अज - जन्म रहित
  90. पाशविमोचन - बंधन से छुड़ाने वाले
  91. मृड - सुखस्वरूप वाले
  92. पशुपति - पशुओं के मालिक
  93. देव - स्वयं प्रकाश रूप
  94. महादेव - देवों के भी देव
  95. अव्यय - खर्च होने पर भी न घटने वाले
  96. हरि - विष्णुस्वरूप
  97. पूषदन्तभित् - पूषा के दांत उखाड़ने वाले
  98. अव्यग्र - कभी भी व्यथित न होने वाले
  99. दक्षाध्वरहर - दक्ष के यज्ञ को नष्ट करने वाले
  100. हर - पापों व तापों को हरने वाले
  101. भगनेत्रभिद् - भग देवता की आंख फोड़ने वाले
  102. अव्यक्त - इंद्रियों के सामने प्रकट न होने वाले
  103. सहस्राक्ष - अनंत आँख वाले
  104. सहस्रपाद - अनंत पैर वाले
  105. अपवर्गप्रद - कैवल्य मोक्ष देने वाले
  106. अनंत - देशकालवस्तुरूपी परिछेद से रहित
  107. तारक - सबको तारने वाला
  108. परमेश्वर - सबसे परे ईश्वर

शैव हिन्दू धर्म का एक पंथ

1.

शिव के सभी अनुयायियों का विश्वास है कि भगवान शिव ईश्वर हैं, जिनकी परम सत्ता, पराशिव, दिक्काल और रुप से परे है। योगी मौन रुप से उसे "नेति नेति" कहते हैं। जी हाँ, भगवान शिव ऐसे ही अबोधगम्य भगवान हैं। ॐ

2.

शिव के सभी अनुयायियों का विश्वाश है कि भगवान शिव ईश्वर हैं, जिनके प्रेम की सर्वव्यापी प्राकृति, पराशक्ति, आधारभूत, मूल तत्व या शुद्ध चेतना है, जो सभी स्वरुपों से ऊर्जा, अस्तित्व, ज्ञान और परमानन्द के रुप में बहती रहती है। ॐ

3.

शिव के सभी अनुयायियों का विश्वास है कि भगवान शिव ईश्वर हैं , जिनकी सर्वव्यापी प्रकृति परम् आत्मा, सर्वोपरि महादेव, परमेश्वर, वेदों एवं आगमों की प्रणेता तथा सभी सत्ताओं की कर्ता भर्ता एवं हर्ता हैं। ॐ

4.

शिव के सभी अनुयायी शिव-शक्ति के पुत्र महादेव भगवान गणेश में विश्वास करते हैं तथा कोई भी पूजा या कार्य प्रारंभ करने से पूर्व उनकी पूजा अवश्य करते हैं। उनका नियम सहानुभूतिशील है। उनका विधान न्यायपूर्ण है। न्याय ही उनका मन है। ॐ

5.

शिव के सभी अनुयायी शिव - शक्ति के पुत्र महादेव कार्तिकेय में विश्वास करते हैं, जिनकी कृपा का वेल अज्ञान के बंधन को नष्ट कर देता है। योगी पद्मासन में बैठकर मुरूगन की उपासना करते हैं। इस आत्मसंयम से, उनका मन शांत हो जाता है। ॐ

6.

शिव के सभी अनुयायियों का विश्वास है कि सभी आत्माओं की रचना भगवान शिव ने की है और वे तद्रूप (उन्ही जैसी) हैं तथा जब उनकी कृपा से अणव, कर्म और माया दूर हो जाएगी, तो सभी आत्माएं इस तद्रूपता का पूर्ण साक्षात्कार कर लेंगी। ॐ

7.

शिव के सभी अनुयायी तीन लोकों में विश्वास करते हैं: स्थूल लोक (भूलोक), जहां सभी आत्माएं भौतिक शरीर धारण करती हैं, सूक्ष्म लोक (अंतर्लोक) जहां आत्माएं सूक्ष्म शरीर धारण करती हैं, तथा कारण लोक (शिवलोक) जहां आत्माएं अपने स्व-प्रकाशमान स्परुप में विद्यमान रहती हैं। ऊँ

8.

शिव के सभी अनुयायी कर्म के विधान में विश्वास करते हैं - कि सबको अपने सभी कर्मों का फल अवश्य मिलता है - और यह कि सभी कर्मों के नष्ट होने तक और मोक्ष या निर्वाण प्राप्त होने तक सभी आत्मा बार-बार शरीर धारण करती रहती हैं। ॐ

9.

शिव के सभी अनुयायियों का विश्वास है कि ज्ञान या प्रज्ञा प्राप्त करने के लिए चर्या या धार्मिक जीवन, क्रिया या मंदिर में पूजा और जीवित सत्गुरू की कृपा से योगाभ्यास अत्यावश्यक है, जो पराशिव की और ले जाता है। ॐ

10.

शिव के सभी अनुयायियों का विश्वास है अशुभ या अमंगल का कोई तात्त्विक अस्तित्व नहीं है। जब तक अशुभ के आभास का स्रोत अज्ञान स्वयं न हो, अशुभ का कोई स्रोत नहीं है। शैव हिन्दू वास्तव में दयालु होते हैं, वे जानते हैं कि अन्ततः कुछ भी शुभ या अशुभ नहीं है। सबकुछ शिव की इच्छा है। ॐ

11.

शिव के सभी अनुयायियों का विश्वास है कि तीनों लोकों द्वारा सामंजस्यपूर्वक एकसाथ कार्य करना धर्म है और यह कि यह सामंजस्य मंदिर में पूजा करके उत्पन्न किया जा सकता है, जहां पर तीनों लोकों की सत्ताएं संप्रेषण कर सकती हैं। ॐ

12.

शिव के सभी अनुयायी पंचाक्षर मंत्र, पांच पवित्र अक्षरों से बने मंत्र "नमः शिवाय" में विश्वास करते हैं, जो शैव संप्रदाय का प्रमुख और अनिवार्य मंत्र है। "नमः शिवाय" का रहस्य इसे सही होठों से सही समय पर सुनना है। ॐ

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

रुद्र का अंश रुद्राक्ष

भगवान शंकर की उपासना में रुद्राक्ष का अत्यन्त महत्व है। रुद्राक्ष शब्द की शास्त्रीय विवेचना से यह स्पष्ट हो जाता है कि इसकी उत्पत्ति महादेव जी के अश्रुओं से हुई है-

रुद्रस्य अक्षि रुद्राक्ष:, अक्ष्युपलक्षितम्अश्रु, तज्जन्य: वृक्ष:।

शिवपुराणकी विद्येश्वर संहिता तथा श्रीमद्देवी भागवत में इस संदर्भ में कथाएं मिलती हैं। उनका सारांश यह है कि अनेक वर्षो की समाधि के बाद जब सदाशिव ने अपने नेत्र खोले, तब उनके नेत्रों से कुछ आँसू पृथ्वी पर गिरे। उन्हीं अश्रु बिन्दुओं से रुद्राक्ष के महान वृक्ष उत्पन्न हुए।

रुद्राक्ष धारण करने से तन-मन में पवित्रता का संचार होता है। रुद्राक्ष पापों के बडे से बडे समूह को भी भेद देते हैं। चार वर्णो के अनुरूप ये भी श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण वर्ण के होते हैं। ऋषियों का निर्देश है कि मनुष्य को अपने वर्ण के अनुसार रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। भोग और मोक्ष, दोनों की कामना रखने वाले लोगों को रुद्राक्ष की माला अथवा मनका जरूर पहिनना चाहिए। विशेषकर शैवोंके लिये तो रुद्राक्ष को धारण करना अनिवार्य ही है।

जो रुद्राक्ष आँवले के फल के बराबर होता है, वह समस्त अरिष्टोंका नाश करने में समर्थ होता है। जो रुद्राक्ष बेर के फल के बराबर होता है, वह छोटा होने पर भी उत्तम फल देने वाला व सुख-सौभाग्य की वृद्धि करने वाला होता है। गुन्जाफालके समान बहुत छोटा रुद्राक्ष सभी मनोरथों को पूर्ण करता है। रुद्राक्ष का आकार जैसे-जैसे छोटा होता जाता है, वैसे-वैसे उसकी शक्ति उत्तरोत्तर बढती जाती है। विद्वानों ने भी बडे रुद्राक्ष से छोटा रुद्राक्ष कई गुना अधिक फलदायी बताया है किन्तु सभी रुद्राक्ष नि:संदेह सर्वपापनाशक तथा शिव-शक्ति को प्रसन्न करने वाले होते हैं। सुंदर, सुडौल, चिकने, मजबूत, अखण्डित रुद्राक्ष ही धारण करने हेतु उपयुक्त माने गए हैं। जिसे कीडों ने दूषित कर दिया हो, जो टूटा-फूटा हो, जिसमें उभरे हुए दाने न हों, जो व्रणयुक्तहो तथा जो पूरा गोल न हो, इन पाँच प्रकार के रुद्राक्षों को दोषयुक्त जानकर त्याग देना ही उचित है। जिस रुद्राक्ष में अपने-आप ही डोरा पिरोने के योग्य छिद्र हो गया हो, वही उत्तम होता है। जिसमें प्रयत्न से छेद किया गया हो, वह रुद्राक्ष कम गुणवान माना जाता है।

रुद्राक्ष दो जाति के होते हैं- रुद्राक्ष एवं भद्राक्ष। रुद्राक्ष के मध्य में भद्राक्षधारण करना महान फलदायक होता है- रुद्राक्षाणांतुभद्राक्ष:स्यान्महाफलम्।

शास्त्रों में एक से चौदहमुखी तक रुद्राक्षों का वर्णन मिलता है। इनमें एकमुखी रुद्राक्ष सर्वाधिक दुर्लभ एवं सर्वश्रेष्ठ है।

एकमुखी रुद्राक्ष साक्षात् शिव का स्वरूप होने से परब्रह्म का प्रतीक माना गया है। इसका प्राय: अ‌र्द्धचन्द्राकार रूप ही दिखाई देता है। एकदम गोल एकमुखी रुद्राक्ष लगभग अप्राप्य ही है। एकमुखी रुद्राक्ष धारण करने से ब्रह्महत्या के समान महापात कभी नष्ट हो जाते हैं। समस्त कामनाएं पूर्ण होती हैं तथा जीवन में कभी किसी वस्तु का अभाव नहीं होता है। भोग के साथ मोक्ष प्रदान करने में समर्थ एकमुखी रुद्राक्ष भगवान शंकर की परम कृपा से ही मिलता है।

दोमुखी रुद्राक्ष को साक्षात् अ‌र्द्धनारीश्वर ही मानें। इसे धारण करने वाला भगवान भोलेनाथ के साथ माता पार्वती की अनुकम्पा का भागी होता है। इसे पहिनने से दाम्पत्य जीवन में मधुरता आती है तथा पति-पत्नी का विवाद शांत हो जाता है। दोमुखी रुद्राक्ष घर-गृहस्थी का सम्पूर्ण सुख प्रदान करता है।

तीन-मुखी रुद्राक्ष अग्नि का स्वरूप होने से ज्ञान का प्रकाश देता है। इसे धारण करने से बुद्धि का विकास होता है, एकाग्रता और स्मरण-शक्ति बढती है। विद्यार्थियों के लिये यह अत्यन्त उपयोगी है।

चार-मुखी रुद्राक्ष चतुर्मुख ब्रह्माजीका प्रतिरूप होने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थो को देने वाला है। नि:संतान व्यक्ति यदि इसे धारण करेंगे तो संतति-प्रतिबन्धक दुर्योगका शमन होगा। कुछ विद्वान चतुर्मुखी रुद्राक्ष को गणेश जी का प्रतिरूप मानते हैं।

पाँचमुखी रुद्राक्ष पंचदेवों-शिव, शक्ति, गणेश, सूर्य और विष्णु की शक्तियों से सम्पन्न माना गया है। कुछ ग्रन्थों में पंचमुखी रुद्राक्ष के स्वामी कालाग्नि रुद्र बताए गए हैं। सामान्यत: पाँच मुख वाला रुद्राक्ष ही उपलब्ध होता है। संसार में ज्यादातर लोगों के पास पाँचमुखी रुद्राक्ष ही हैं।

इसकी माला पर पंचाक्षर मंत्र (नम:शिवाय) जपने से मनोवांछित फल प्राप्त होता है।

छह मुखी रुद्राक्ष षण्मुखी कार्तिकेय का स्वरूप होने से शत्रुनाशकसिद्ध हुआ है। इसे धारण करने से आरोग्यता,श्री एवं शक्ति प्राप्त होती है। जिस बालक को जन्मकुण्डली के अनुसार बाल्यकाल में किसी अरिष्ट का खतरा हो, उसे छह मुखी रुद्राक्ष सविधि पहिनाने से उसकी रक्षा अवश्य होगी।

सातमुखी रुद्राक्ष कामदेव का स्वरूप होने से सौंदर्यवर्धकहै। इसे धारण करने से व्यक्तित्व आकर्षक और सम्मोहक बनता है। कुछ विद्वान सप्तमातृकाओंकी सातमुखीरुद्राक्ष की स्वामिनी मानते हैं। इसको पहिनने से दरिद्रता नष्ट होती है और घर में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।

आठमुखीरुद्राक्ष अष्टभैरव-स्वरूपहोने से जीवन का रक्षक माना गया है। इसे विधिपूर्वक धारण करने से अभिचार कर्मो अर्थात् तान्त्रिक प्रयोगों (जादू-टोने) का प्रभाव समाप्त हो जाता है। धारक पूर्णायु भोगकर सद्गति प्राप्त करता है।

नौमुखीरुद्राक्ष नवदुर्गा का प्रतीक होने से असीम शक्तिसम्पन्न है। इसे अपनी भुजा में धारण करने से जगदम्बा का अनुग्रह अवश्य प्राप्त होता है। शाक्तों(देवी के आराधकों)के लिये नौमुखीरुद्राक्ष भगवती का वरदान ही है। इसे पहिनने वाला नवग्रहों की पीडा से सुरक्षित रहता है।

दसमुखीरुद्राक्ष साक्षात् जनार्दन श्रीहरिका स्वरूप होने से समस्त इच्छाओं को पूरा करता है। इसे धारण करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है तथा कष्टों से मुक्ति मिलती है।

ग्यारहमुखीरुद्राक्ष एकादश रुद्र- स्वरूप होने से तेजस्विता प्रदान करता है। इसे धारण करने वाला कभी कहीं पराजित नहीं होता है।

बारहमुखीरुद्राक्ष द्वादश आदित्य- स्वरूप होने से धारक व्यक्ति को प्रभावशाली बना देता है। इसे धारण करने से सात जन्मों से चला आ रहा दुर्भाग्य भी दूर हो जाता है और धारक का निश्चय ही भाग्योदय होता है।

तेरहमुखीरुद्राक्ष विश्वेदेवोंका स्वरूप होने से अभीष्ट को पूर्ण करने वाला, सुख-सौभाग्यदायक तथा सब प्रकार से कल्याणकारी है। कुछ साधक तेरहमुखीरुद्राक्ष का अधिष्ठाता कामदेव को मानते हैं।

चौदहमुखीरुद्राक्ष मृत्युंजय का स्वरूप होने से सर्वरोगनिवारकसिद्ध हुआ है। इसको धारण करने से असाध्य रोग भी शान्त हो जाता है। जन्म-जन्मान्तर के पापों का शमन होता है।

एक से चौदहमुखीरुद्राक्षों को धारण करने के मंत्र क्रमश:इस प्रकार हैं-

1.ॐह्रींनम:, 2.ॐनम:, 3.ॐक्लींनम:, 4.ॐह्रींनम:, 5.ॐह्रींनम:, 6.ॐ ह्रींहुं नम:, 7.ॐहुं नम:, 8.ॐहुं नम:, 9.ॐह्रींहुं नम:, 10.ॐह्रींनम:, 11.ॐह्रींहुं नम:, 12.ॐक्रौंक्षौंरौंनम:, 13.ॐह्रींनम:, 14.ॐनम:।

निर्दिष्ट मंत्र से अभिमंत्रित किए बिना रुद्राक्ष धारण करने पर उसका शास्त्रोक्त फल प्राप्त नहीं होता है और दोष भी लगता है। रुद्राक्ष धारण करने पर मद्य, मांस, लहसुन, प्याज, सहजन,लिसोडा आदि पदार्थो का परित्याग कर देना चाहिए। इन निषिद्ध वस्तुओं के सेवन का रुद्राक्ष-जाबालोपनिषद् में सर्वथा निषेध किया गया है। रुद्राक्ष वस्तुत:महारुद्रका अंश होने से परम पवित्र एवं पापों का नाशक है। इसके दिव्य प्रभाव से जीव शिवत्व प्राप्त करता है।

शिव का स्वरूप

शिव की महिमा अनंत है। उनके रूप, रंग और गुण अनन्य हैं। समस्त सृष्टि शिवमयहै। सृष्टि से पूर्व शिव हैं और सृष्टि के विनाश के बाद केवल शिव ही शेष रहते हैं। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की, परंतु जब सृष्टि का विस्तार संभव न हुआ तब ब्रह्मा ने शिव का ध्यान किया और घोर तपस्या की। शिव अ‌र्द्धनारीश्वर रूप में प्रकट हुए। उन्होंने अपने शरीर के अ‌र्द्धभागसे शिवा (शक्ति या देवी) को अलग कर दिया। शिवा को प्रकृति, गुणमयीमाया तथा निर्विकार बुद्धि के नाम से भी जाना जाता है। इसे अंबिका, सर्वलोकेश्वरी,त्रिदेव जननी, नित्य तथा मूल प्रकृति भी कहते हैं। इनकी आठ भुजाएं तथा विचित्र मुख हैं। अचिंत्य तेजोयुक्तयह माया संयोग से अनेक रूपों वाली हो जाती है। इस प्रकार सृष्टि की रचना के लिए शिव दो भागों में विभक्त हो गए, क्योंकि दो के बिना सृष्टि की रचना असंभव है। शिव सिर पर गंगा और ललाट पर चंद्रमा धारण किए हैं। उनके पांच मुख पूर्वा, पश्चिमा, उत्तरा,दक्षिणा तथा ऊध्र्वाजो क्रमश:हरित,रक्त,धूम्र,नील और पीत वर्ण के माने जाते हैं। उनकी दस भुजाएं हैं और दसों हाथों में अभय, शूल, बज्र,टंक, पाश, अंकुश, खड्ग, घंटा, नाद और अग्नि आयुध हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वह त्रिशूल धारी, प्रसन्नचित,कर्पूर गौर भस्मासिक्तकालस्वरूपभगवान हैं। उनकी भुजाओं में तमोगुण नाशक सर्प लिपटे हैं। शिव पांच तरह के कार्य करते हैं जो ज्ञानमय हैं। सृष्टि की रचना करना, सृष्टि का भरण-पोषण करना, सृष्टि का विनाश करना, सृष्टि में परिवर्तनशीलतारखना और सृष्टि से मुक्ति प्रदान करना। कहा जाता है कि सृष्टि संचालन के लिए शिव आठ रूप धारण किए हुए हैं। चराचर विश्व को पृथ्वी रूप धारण करते हुए वह शर्वअथवा सर्व हैं। सृष्टि को संजीवन रूप प्रदान करने वाले जलमयरूप में वह भव हैं। सृष्टि के भीतर और बाहर रहकर सृष्टि स्पंदित करने वाला उनका रूप उग्र है। सबको अवकाश देने वाला, नृपोंके समूह का भेदक सर्वव्यापी उनका आकाशात्मकरूप भीम कहलाता है। संपूर्ण आत्माओं का अधिष्ठाता, संपूर्ण क्षेत्रवासी, पशुओं के पाश को काटने वाला शिव का एक रूप पशुपति है। सूर्य रूप से आकाश में व्याप्त समग्र सृष्टि में प्रकाश करने वाले शिव स्वरूप को ईशान कहते हैं। रात्रि में चंद्रमा स्वरूप में अपनी किरणों से सृष्टि पर अमृत वर्षा करता हुआ सृष्टि को प्रकाश और तृप्ति प्रदान करने वाला उनका रूप महादेव है। शिव का जीवात्मा रूप रुद्र कहलाता है। सृष्टि के आरंभ और विनाश के समय रुद्र ही शेष रहते हैं। सृष्टि और प्रलय, प्रलय और सृष्टि के मध्य नृत्य करते हैं। जब सूर्य डूब जाता है, प्रकाश समाप्त हो जाता है, छाया मिट जाती है और जल नीरव हो जाता है उस समय यह नृत्य आरंभ होता है। तब अंधकार समाप्त हो जाता है और ऐसा माना जाता है कि उस नृत्य से जो आनंद उत्पन्न होता है वही ईश्वरीय आनंद है। शिव,महेश्वर, रुद्र, पितामह, विष्णु, संसार वैद्य, सर्वज्ञ और परमात्मा उनके मुख्य आठ नाम हैं। तेईस तत्वों से बाहर प्रकृति,प्रकृति से बाहर पुरुष और पुरुष से बाहर होने से वह महेश्वर हैं। प्रकृति और पुरुष शिव के वशीभूत हैं। दु:ख तथा दु:ख के कारणों को दूर करने के कारण वह रुद्र कहलाते हैं। जगत के मूर्तिमान पितर होने के कारण वह पितामह, सर्वव्यापी होने के कारण विष्णु, मानव के भव रोग दूर करने के कारण संसार वैद्य और संसार के समस्त कार्य जानने के कारण सर्वज्ञ हैं। अपने से अलग किसी अन्य आत्मा के अभाव के कारण वह परमात्मा हैं। कहा जाता है कि सृष्टि के आदि में महाशिवरात्रि को मध्य रात्रि में शिव का ब्रह्म से रुद्र रूप में अवतरण हुआ, इसी दिन प्रलय के समय प्रदोष स्थिति में शिव ने ताण्डव नृत्य करते हुए संपूर्ण ब्रह्माण्ड अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से नष्ट कर दिया। इसीलिए महाशिवरात्रि अथवा काल रात्रि पर्व के रूप में मनाने की प्रथा का प्रचलन है।

साभार : आर एस रमन

जहां नटराज करते हैं आज भी राज!

हिमाचल प्रदेश के जिला चंबामें समुद्र तल से साढे सात हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित देव घाटी भरमौरका सौंदर्य नयनाभिराम है और अतीत गौरवपूर्ण। हमारे पौराणिक ग्रंथों में जिन चार कैलाश पर्वतों का उल्लेख आया है, उनमें से एक मणिमहेशकैलाश, इसी नैसर्गिक घाटी में स्थित है।

चंबाशहर से भरमौरकी दूरी कोई पैंसठ किलोमीटर है। भरमौरका रास्ता खडामुखसे होकर जाता है। खडामुखऔर भरमौरके बीच रावीनदी बहती है। भरमौरकई तरह के फलदार वृक्षों से सजी एक ऐसी मनोरम घाटी है, जहां कदम रखते ही सारी थकान पल भर के लिए छू-मंतर हो जाती है। यह घाटी वर्ष में तकरीबन पांच मास बर्फ की सफेद चादर से ढंकी रहती है।

भरमौरका जिक्र प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है और जनश्रुतियोंमें भी। भरमौरका प्राचीन नाम ब्रह्मपुर है। उसे पांच सौ वर्षो तक चंबाराज्य की राजधानी रहने का गौरव भी हासिल है। भरमौरनिवासियों की यह मान्यता है कि कालांतर में भगवान शिव यानी नटराज ने भरमौरघाटी में तांडव नृत्य भी किया था। भरमौरनिवासियों के अनुसार नटराज सात तरह के तांडव नृत्य करते हैं-आनंद तांडव, संध्या (प्रदोष) तांडव, कालिका तांडव, त्रिपुर दाह तांडव, गौरी तांडव, संहार तांडव और उमा तांडव। भारत ही नहीं, अनेक पाश्चात्य पुरातत्ववेताओंको भी भरमौरने अपने गौरवपूर्ण अतीत की तरफ आकर्षित किया है। इनमें डॉ. हटचिनसन,डा. फोगल,हरमनगोटसके नाम उल्लेखनीय है।

शिखर शैली में बना मणिमहेशका विशाल मंदिर यहां के निवासियों और शैव मतावलंबियों के लिए आस्था का प्रतीक है। आबादी के बीच एक बडे मंदिर परिसर में शिखर और पहाडी शैली में बने बीसियोंछोटे शिव मंदिर हैं और शिवलिंगभी। मंदिर समूह में सबसे बडा और ऊंचा मणिमहेशमंदिर ही है, जिसका शिखर दूर से ही दिखाई देने लग जाता है। विद्वानों ने इस मंदिर का निर्माण काल राजा मेरुवर्मन(780 ई.) के समय का माना है। इस काल में मेरुवर्मनने भरमौरमें अन्य मंदिरों और मूर्तियों की स्थापना की थी। कहा जाता है कि भरमौर(ब्रह्मपुर) में चौरासी सिद्धोंने धूनी रमाई थी और जहां-जहां वे बैठे थे, उन्हीं जगहों पर राजा साहिल वर्मा ने चौरासी मंदिरों का निर्माण करवाया था। यह मंदिर शिल्प व वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है। मणिमहेशमंदिर में प्रवेश करते ही नंदी की भव्य कांस्य प्रतिमा ध्यान आकर्षित करती है।

नृसिंह भगवान का मंदिर शिखर शैली का बना है। इस मंदिर में नृसिंह भगवान की अष्टधातु की मूर्ति ग्यारह इंच ऊंचे तांबे की पीठ पर प्रतिष्ठित है। एक हजार से अधिक वर्ष पुरानी इन प्रतिमाओं पर वक्त की धूल जमी नहीं दिखाई देती, बल्कि इनकी चमक-दमक अभी तक बरकरार है और बडी श्रद्धा से इन्हें पूजा जाता है। भरमौरघाटी का दूसरा प्रसिद्ध शिव मंदिर हडसरमें है। हडसरजिसे स्थानीय बोली में हरसरभी कहा जाता है, पवित्र मणिमहेशको जाने वाली सडक पर अंतिम गांव है और कैलाश पर्वत के दर्शनार्थ जाने वाले श्रद्धालुओं की विश्राम स्थली भी है। गांव में पहाडी शैली में लकडी से निर्मित भगवान शिव का ऐतिहासिक मंदिर है। भरमौरघाटी का तीसरा प्रमुख मंदिर छतराडीमें है, जिसका निर्माण भी राजा मेरुवर्मनने करवाया था। मंदिर में अष्टधातु की बनी आदि शक्ति की कलात्मक मूर्ति प्रतिष्ठित है। इस बहूमूल्यमूर्ति का निर्माण काल छठी-सातवीं शताब्दी का है। मंदिर की कलात्मकता देखते ही बनती है।

कुछ लोग इसे हिमाचल का अमरनाथ कहकर भी पुकारते हैं। भारत के उत्तर-पश्चिम में यह सबसे बडा शैव तीर्थ है और इसे भगवान शिव का वास्तविक घर माना गया है। समुद्र तल से 18,564फुट की ऊंचाई पर स्थित मणिमहेशके आंचल में करीब दो सौ मीटर परिधि की झील है। प्रति वर्ष भाद्रपक्षमास में कृष्णाष्टमी तथा जन्माष्टमी को यहां विशाल मेला लगता है।

साभार : गुरमीतबेदी

रविवार, 19 अप्रैल 2009

शिवशंकर भोलेनाथ के अनेक रूप

गंगाधर

राजा भगीरथ ने जनकल्याण के लिए पतितपावन गंगाजी को पृथ्वी पर लाने के लिए कई वर्षों तक कठोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने राजा भगीरथ को यह वचन दिया कि सर्वकल्याणकारी गंगा पृथ्वी पर आएगी। मगर समस्या यह थी कि गंगाजी को पृथ्वी पर संभालेगा कौन?

समस्या का समाधान करते हुए ब्रह्माजी ने कहा कि गंगाजी को धारण करने की शक्ति भगवान शंकर के अतिरिक्त किसी में भी नहीं है अतः तुम्हें भगवान रुद्र की तपस्या करना चाहिए। ऐसा कहकर ब्रह्माजी अंतर्धान हो गए। ब्रह्माजी के वचन सुनकर भगीरथ ने प्रभु भोलेनाथ की कठोर तपस्या की। इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने भगीरथ से कहा- 'नरश्रेष्ठ! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। मैं गिरिराजकुमारी गंगा को अपने मस्तक पर धारण करके संपूर्ण प्राणियों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करूँगा।'

भगवान शंकर की स्वीकृति मिल जाने के बाद हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री गंगाजी बड़े ही प्रबल वेग से आकाश से भगवान शंकर के मस्तक पर गिरीं। उस समय गंगाजी के मन में भगवान शंकर को पराजित करने की प्रबल इच्छा थी। गंगाजी का विचार था कि मैं अपने प्रबल वेग से भगवान शंकर को लेकर पाताल में चली जाऊँगी।

गंगाजी के इस अहंकार को जान शिवजी कुपित हो उठे और उन्होंने गंगाजी को अदृश्य करने का विचार किया। पुण्यशीला गंगा जब भगवान रुद्र के मस्तक पर गिरीं, तब वे उनकी जटाओं के जाल में बुरी तरह उलझ गईं। लाख प्रयत्न करने पर भी वे बाहर न निकल सकीं। जब भगीरथ ने देखा कि गंगाजी भगवान शिव के जटामंडल में अदृश्य हो गईं, तब उन्होंने पुनः भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए तप करना प्रारंभ कर दिया। उनके तप से संतुष्ट होकर भगवान शिव ने गंगाजी को लेकर बिंदु सरोवर में छोड़ा। वहाँ से गंगाजी सात धाराएँ हो गईं।

इस प्रकार ह्लादिनी, पावनी और नलिनी नामक की धाराएँ पूर्व दिशा की ओर तथा सुचक्षु, सीता और महानदी सिंधु- ये तीन धाराएँ पश्चिम की ओर चली गईं। सातवीं धारा महाराज भगीरथ के पीछे-पीछे चली और पृथ्वी पर आई। इस प्रकार भगवान शंकर की कृपा से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ और भगीरथ के पितरों के उद्धार के साथ पतितपावनी गंगा संसारवासियों को प्राप्त हुईं।

औढरदानी शिव


भगवान शिव और उनका नाम समस्त मंगलों का मूल है। वे कल्याण की जन्मभूमि तथा शांति के आगार हैं। वेद तथा आगमों में भगवान शिव को विशुद्ध ज्ञानस्वरूप बताया गया है। समस्त विद्याओं के मूल स्थान भी भगवान शिव ही हैं। उनका यह दिव्यज्ञान स्वतः सम्भूत है।

ज्ञान, बल, इच्छा और क्रिया-शक्ति में भगवान शिव के समान कोई नहीं है। फिर उनसे अधिक होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। वे सबके मूल कारण, रक्षक, पालक तथा नियंता होने के कारण महेश्वर कहे जाते हैं। उनका आदि और अंत न होने से वे अनंत हैं। वे सभी पवित्रकारी पदार्थों को भी पवित्र करने वाले हैं, इसलिए वे समस्त कल्याण और मंगल के मूल कारण हैं।

भगवान शंकर दिग्वसन होते हुए भी भक्तों को अतुल ऐश्वर्य प्रदान करने वाले, अनंत राशियों के अधिपति होने पर भी भस्म-विभूषण, श्मशानवासी होने पर भी त्रैलोक्याधिपति, योगिराज होने पर भी अर्धनारीश्वर, पार्वतीजी के साथ रहने पर भी कामजित तथा सबके कारण होते हुए भी अकारण हैं। आशुतोष और औढरदानी होने के कारण वे शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों के संपूर्ण दोषों को क्षमा कर देते हैं तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, ज्ञान-विज्ञान के साथ अपने आपको भी दे देते हैं। कृपालुता का इससे बड़ा उदाहरण भला और क्या हो सकता है।

संपूर्ण विश्व में शिवमंदिर, ज्योतिर्लिंग, स्वयम्भूलिंग से लेकर छोटे-छोटे चबूतरों पर शिवलिंग स्थापित करके भगवान शंकर की सर्वाधिक पूजा उनकी लोकप्रियता का अद्भुत उदाहरण है।

हरिहर रूप


एक बार सभी देवता मिलकर संपूर्ण जगत के अशांत होने का कारण जानने के लिए विष्णुजी के पास गए। भगवान विष्णु ने कहा कि इस प्रश्न का उत्तर तो भोलेनाथ ही दे सकते हैं। अब सभी देवता विष्णुजी को लेकर शिवजी की खोजने मंदर पर्वत गए। वहाँ शंकरजी के होते हुए भी देवताओं को उनके दर्शन नहीं हो रहे थे।

पार्वतीजी का गर्भ नष्ट करने पर देवताओं को महापाप लगा था और इस कारण ही ऐसा हो रहा था। तब विष्णुजी ने कहा कि सारे देवता शिवजी को प्रसन्न करने के लिए तत्पकृच्छ्र व्रत करें। इसकी विधि भी विष्णुजी ने बताई। सारे देवताओं ने ऐसा ही किया। फलस्वरूप सारे देवता पापमुक्त हो गए। पुनः देवताओं को शंकरजी के दर्शन करने की इच्छा जागी। देवताओं की इच्छा जान प्रभु विष्णु ने उन्हें अपने हृदयकमल में विश्राम करने वाले भगवान शंकर के लिंग के दर्शन करा दिए।

अब सभी देवता यह विचार करने लगे कि सत्वगुणी विष्णु और तमोगुणी शंकर के मध्य यह एकता किस प्रकार हुई। देवताओं का विचार जान विष्णुजी ने उन्हें अपने हरिहरात्मक रूप का दर्शन कराया। देवताओं ने एक ही शरीर में भगवान विष्णु और भोलेनाथ शंकर अर्थात हरि और हर का एकसाथ दर्शन कर उनकी स्तुति की।

पंचमुखी शिव


मुक्तापीतपयोदमौक्तिकजपावर्णैर्मुखैः पञ्चभि- स्त्र्यक्षैरंजितमीशमिंदुमुकुटं पूर्णेन्दुकोटिप्रभम्‌ ।
शूलं टंककृपाणवज्रदहनान्नागेन्द्रघंटांकुशान्‌ पाशं भीतिहरं दधानममिताकल्पोज्ज्वलं चिन्तयेत्‌ ॥

'जिन भगवान शंकर के ऊपर की ओर गजमुक्ता के समान किंचित श्वेत-पीत वर्ण, पूर्व की ओर सुवर्ण के समान पीतवर्ण, दक्षिण की ओर सजल मेघ के समान सघन नीलवर्ण, पश्चिम की ओर स्फटिक के समान शुभ्र उज्ज्वल वर्ण तथा उत्तर की ओर जपापुष्प या प्रवाल के समान रक्तवर्ण के पाँच मुख हैं।

जिनके शरीर की प्रभा करोड़ों पूर्ण चंद्रमाओं के समान है और जिनके दस हाथों में क्रमशः त्रिशूल, टंक (छेनी), तलवार, वज्र, अग्नि, नागराज, घंटा, अंकुश, पाश तथा अभयमुद्रा हैं। ऐसे भव्य, उज्ज्वल भगवान शिव का मैं ध्यान करता हूँ।'

महामृत्युंजय


हस्ताभ्यां कलशद्वयामृतरसैराप्लावयन्तं शिरो द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यां वहंतं परम्‌ ।
अंकन्यस्तकरद्वयामृतघटं कैलासकान्तं शिवं स्वच्छाम्भोजगतं नवेन्दुमुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे ॥

भगवान मृत्युंजय अपने ऊपर के दो हाथों में स्थित दो कलशों से सिर को अमृत जल से सींच रहे हैं। अपने दो हाथों में क्रमशः मृगमुद्रा और रुद्राक्ष की माला धारण किए हैं। दो हाथों में अमृत-कलश लिए हैं। दो अन्य हाथों से अमृत कलश को ढँके हैं।

इस प्रकार आठ हाथों से युक्त, कैलास पर्वत पर स्थित, स्वच्छ कमल पर विराजमान, ललाट पर बालचंद्र का मुकुट धारण किए त्रिनेत्र, मृत्युंजय महादेव का मैं ध्यान करता हूँ।

सोमवार, 29 दिसंबर 2008

रुद्रावतार रामभक्त हनुमान

यस्यनि:श्वसितंवेदायो

वंदेभ्योऽखिलंजगत्।

निर्भयंतमहंवंदे

विद्यातीर्थमहेश्वरम्॥

वेद जिनके नि:श्वास हैं, जिन्होंने वेदों से सारी सृष्टि की रचना की और जो विद्याओं के तीर्थ हैं, ऐसे शिव की मैं वंदना करता हूं।

ॐनम: शिवाय

यह सौभाग्य की ही बात है कि भगवान शिव के ही एक अंश माने जानेवाले अनन्य राम भक्त हनुमान का ननिहाल झारखण्ड में ही अवस्थितहै, जिसे हम आंजन ग्राम के रूप में जानते हैं। गुमलाजिले के टोटोसे चार मील की दूरी पर अवस्थितआंजन ग्राम ही माता अंजनी और हनुमान का जन्मस्थलहै। गांव की सीमा पर स्थित एक पहाडी को आंजन पहाड कहा जाता है, जिसमें एक गुफाहै और धार्मिक मान्यता के अनुसार उसी गुफामें भगवान रुद्र स्वरूप हनुमान का अवतार हुआ था। एक मान्यता के अनुसार इस गांव में प्राचीन काल में 360तालाब व उतनी ही संख्या में शिवलिंगथे। माता अंजनी में भगवान शिव की अनन्य भक्ति थी, जो प्रतिदिन एक-एक तालाब में स्नान कर एक-एक शिवलिंगकी पूजा करती थी। अब भी गांव में सौ से अधिक शिवलिंगमौजूद हैं, जो विभिन्न आकार-प्रकार के हैं। अंजनी गुफामें प्राचीन काल से स्थापित अंजनी माता की सुंदर प्रस्तर-प्रतिमा को आंजन गांव में एक मंदिर बना कर स्थापित कर दिया गया है। साथ ही मंदिर में एक सुन्दर शंखमर्मरकी प्रतिमा भी स्थापित की गई है। इस तीर्थ की सबसे बडी विशेषता यह है कि वहां स्थापित प्रतिमा में माता अंजनी शिशु हनुमान को स्तनपान कराती दिखाई गई हैं। कहते हैं, इस मुद्रा की प्रतिमा देश के अन्य किसी भी तीर्थ में सुलभ नहीं है। आंजन ग्राम को भगवान शिव के श्रद्धालु भक्त विशेष फलदायक तीर्थ मानते हैं। ऐसा विश्वास है कि अंजनी गुफाके अंदर ही अंदर एक सुरंग है, जो पास बहने वाली खटवा नदी तक जाती है तथा जिससे हो कर अंजनी माता नदी तक स्नान करने जाती थीं। अभी भी दूर दराज से लोग अंजनी माता के दर्शन करने आते हैं तथा खटवा नदी में स्नान कर भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं। इस स्थान को सिद्ध स्थल माना गया है और ऐसा विश्वास है कि यहां मनौतियां बहुत जल्दी फलवती होती हैं। विशेष कर सुयोग्य पुत्र प्राप्त होने की मनौती।

रुद्राक्ष

रुद्राक्ष के उद्भव के विषय में शिवपुराण में एक कहानी है। इसके अनुसार, हजारों वर्ष तक तप करने के बाद भगवान शिव ने जब आंखें खोलीं, तो उनकी आंखों से एक-एक करके कई बूंदेंटपक पडीं। यही बूंदेंबाद में रुद्राक्ष का वृक्ष बन गई। पुराणों में यह उल्लेख मिलता है कि रुद्र का जन्म ब्रह्मा की आंखों से हुआ था। माना जाता है कि शिव जब क्रोधित होते हैं, तो वे रुद्र कहलाते हैं।

रूप की दृष्टि से अनेक प्रकार के रुद्राक्ष पाए जाते हैं, जैसे-एकमुखी से चतुर्दश तक। एकमुखीतथा पंचमुखीरुद्राक्ष को साक्षात शिव का स्वरूप माना जाता है। इसे धारण करने से हमें भक्ति तथा मुक्ति की प्राप्ति होती है। ऐसी मान्यता है कि द्वि-मुखी रुद्राक्ष धारण करने से गोवध का पाप नष्ट हो जाता है। त्रि-मुखी रुद्राक्ष धन तथा विद्या प्रदान करते हैं। चतुर्मुखी रुद्राक्ष को साक्षात ब्रह्मा का स्वरूप माना जाता हैं। षष्ठमुखीरुद्राक्ष दाहिनी बांह में धारण करना चाहिए। वह स्कंद का प्रतीक है।

सप्तमुखीरुद्राक्ष को धारण करने से निर्धन भी धन-धान्य से पूर्ण हो जाते हैं। अष्टमुखीबटुकभैरव का प्रतीक है। नवमुखीदुर्गा का प्रतीक है, दसमुखीजनार्दन का। एकादशमुखीरुद्रस्वरूप,द्वादशमुखीसूर्यस्वरूप,त्रयोदशमुखीविश्वदेवका प्रतीक है। चतुर्दशमुखीरुद्राक्ष को मस्तक पर धारण करना चाहिए, क्योंकि यह साक्षात् आनंददाताशिव का प्रतीक माना जाता है।

रविवार, 28 दिसंबर 2008

साक्षात् रुद्र हैं श्री भैरवनाथ

श्रीभैरवनाथसाक्षात् रुद्र हैं। शास्त्रों के सूक्ष्म अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि वेदों में जिस परमपुरुष का नाम रुद्र है, तंत्रशास्त्रमें उसी का भैरव के नाम से वर्णन हुआ है। तन्त्रालोक की विवेकटीका में भैरव शब्द की यह व्युत्पत्ति दी गई है- बिभíत धारयतिपुष्णातिरचयतीतिभैरव: अर्थात् जो देव सृष्टि की रचना, पालन और संहार में समर्थ है, वह भैरव है। शिवपुराणमें भैरव को भगवान शंकर का पूर्णरूप बतलाया गया है। तत्वज्ञानी भगवान शंकर और भैरवनाथमें कोई अंतर नहीं मानते हैं। वे इन दोनों में अभेद दृष्टि रखते हैं।

वामकेश्वर तन्त्र के एक भाग की टीका- योगिनीहृदयदीपिका में अमृतानन्दनाथका कथन है- विश्वस्य भरणाद्रमणाद्वमनात्सृष्टि-स्थिति-संहारकारी परशिवोभैरव:। भैरव शब्द के तीन अक्षरों भ-र-वमें ब्रह्मा-विष्णु-महेश की उत्पत्ति-पालन-संहार की शक्तियां सन्निहित हैं। नित्यषोडशिकार्णव की सेतुबन्ध नामक टीका में भी भैरव को सर्वशक्तिमान बताया गया है-भैरव: सर्वशक्तिभरित:।शैवोंमें कापालिकसम्प्रदाय के प्रधान देवता भैरव ही हैं। ये भैरव वस्तुत:रुद्र-स्वरूप सदाशिवही हैं। शिव-शक्ति एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे की उपासना कभी फलीभूत नहीं होती। यतिदण्डैश्वर्य-विधान में शक्ति के साधक के लिए शिव-स्वरूप भैरवजीकी आराधना अनिवार्य बताई गई है। रुद्रयामल में भी यही निर्देश है कि तन्त्रशास्त्रोक्तदस महाविद्याओंकी साधना में सिद्धि प्राप्त करने के लिए उनके भैरव की भी अर्चना करें। उदाहरण के लिए कालिका महाविद्याके साधक को भगवती काली के साथ कालभैरवकी भी उपासना करनी होगी। इसी तरह प्रत्येक महाविद्या-शक्तिके साथ उनके शिव (भैरव) की आराधना का विधान है। दुर्गासप्तशतीके प्रत्येक अध्याय अथवा चरित्र में भैरव-नामावली का सम्पुट लगाकर पाठ करने से आश्चर्यजनक परिणाम सामने आते हैं, इससे असम्भव भी सम्भव हो जाता है। श्रीयंत्रके नौ आवरणों की पूजा में दीक्षाप्राप्तसाधक देवियों के साथ भैरव की भी अर्चना करते हैं।

अष्टसिद्धि के प्रदाता भैरवनाथके मुख्यत:आठ स्वरूप ही सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं पूजित हैं। इनमें भी कालभैरव तथा बटुकभैरव की उपासना सबसे ज्यादा प्रचलित है। काशी के कोतवाल कालभैरवकी कृपा के बिना बाबा विश्वनाथ का सामीप्य नहीं मिलता है। वाराणसी में निíवघ्न जप-तप, निवास, अनुष्ठान की सफलता के लिए कालभैरवका दर्शन-पूजन अवश्य करें। इनकी हाजिरी दिए बिना काशी की तीर्थयात्रा पूर्ण नहीं होती। इसी तरह उज्जयिनीके कालभैरवकी बडी महिमा है। महाकालेश्वर की नगरी अवंतिकापुरी(उज्जैन) में स्थित कालभैरवके प्रत्यक्ष मद्य-पान को देखकर सभी चकित हो उठते हैं।

धर्मग्रन्थों के अनुशीलन से यह तथ्य विदित होता है कि भगवान शंकर के कालभैरव-स्वरूपका आविर्भाव मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की प्रदोषकाल-व्यापिनीअष्टमी में हुआ था, अत:यह तिथि कालभैरवाष्टमी के नाम से विख्यात हो गई। इस दिन भैरव-मंदिरों में विशेष पूजन और श्रृंगार बडे धूमधाम से होता है। भैरवनाथके भक्त कालभैरवाष्टमी के व्रत को अत्यन्त श्रद्धा के साथ रखते हैं। मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी से प्रारम्भ करके प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रदोष-व्यापिनी अष्टमी के दिन कालभैरवकी पूजा, दर्शन तथा व्रत करने से भीषण संकट दूर होते हैं और कार्य-सिद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। पंचांगों में इस अष्टमी को कालाष्टमी के नाम से प्रकाशित किया जाता है।

ज्योतिषशास्त्र की बहुचíचत पुस्तक लाल किताब के अनुसार शनि के प्रकोप का शमन भैरव की आराधना से होता है। इस वर्ष शनिवार के दिन भैरवाष्टमीपडने से शनि की शान्ति का प्रभावशाली योग बन रहा है। शनिवार 1दिसम्बर को कालभैरवाष्टमी है। इस दिन भैरवनाथके व्रत एवं दर्शन-पूजन से शनि की पीडा का निवारण होगा। कालभैरवकी अनुकम्पा की कामना रखने वाले उनके भक्त तथा शनि की साढेसाती, ढैय्या अथवा शनि की अशुभ दशा से पीडित व्यक्ति इस कालभैरवाष्टमीसे प्रारम्भ करके वर्षपर्यन्तप्रत्येक कालाष्टमीको व्रत रखकर भैरवनाथकी उपासना करें।

कालाष्टमीमें दिन भर उपवास रखकर सायं सूर्यास्त के उपरान्त प्रदोषकालमें भैरवनाथकी पूजा करके प्रसाद को भोजन के रूप में ग्रहण किया जाता है। मन्त्रविद्याकी एक प्राचीन हस्तलिखित पाण्डुलिपि से महाकाल भैरव का यह मंत्र मिला है- ॐहंषंनंगंकंसं खंमहाकालभैरवायनम:।

इस मंत्र का 21हजार बार जप करने से बडी से बडी विपत्ति दूर हो जाती है।। साधक भैरव जी के वाहन श्वान (कुत्ते) को नित्य कुछ खिलाने के बाद ही भोजन करे। साम्बसदाशिवकी अष्टमूíतयोंमें रुद्र अग्नि तत्व के अधिष्ठाता हैं। जिस तरह अग्नि तत्त्‍‌व के सभी गुण रुद्र में समाहित हैं, उसी प्रकार भैरवनाथभी अग्नि के समान तेजस्वी हैं। भैरवजीकलियुग के जाग्रत देवता हैं। भक्ति-भाव से इनका स्मरण करने मात्र से समस्याएं दूर होती हैं।

इनका आश्रय ले लेने पर भक्त निर्भय हो जाता है। भैरवनाथअपने शरणागत की सदैव रक्षा करते हैं।

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

शिव स्वरूप का रहस्य (त्रिनेत्र)

image शिव की आराधना का विशेष महत्व है। यह महत्व अनायास नहीं है। केवल कर्मकांड भी नहीं है। इनके राज गहरे हैं। केवल कर्मकाण्ड मानकर पूजा-पाठ करने से बात नहीं बनेगी।

शिव पूरक हैं। शिवत्व पूर्णता है। इनके व्यावहारिक और आध्यात्मिक दोनों तरह के जीवन में खास महत्व हैं। शिव के प्रचलित स्वरूप को ही देखें तो उनके हर अंग, आभूषण और मुद्रा का महत्व है। जैसे - जैसे आप इसे समझते हैं आप शिवमय होते जाते हैं। शिवत्व आपमें उतरता जाता है और आप सरस हो जाते हैं। केवल शिव ही हैं जिनकी आराधना के साथ अमर होने का वरदान जुड़ा हुआ है। वैसे तो शिव इतने व्यापक हैं कि उनके लेशमात्र का वर्णन करने की योग्यता मुझमें नहीं है, लेकिन उन्हीं की इच्छा से कोशिश करते हैं।


शिव की वेश-भूषा को देखिए। सर पर गंगा और चंद्रमा, माथे पर तीसरी खुली हुई आंख, कंठ और हाथों में सर्प, कंधे पर जनेउ, कमर में वाघम्बर, बाघम्बर का आसन, पद्मासन में भैरवी मुद्रा, त्रिशूल और डमरू। साथ में माता पार्वती और उनका वाहन नंदी। यह शिव की वाह्य छवि है जिसे हम देखते हैं। अगर हमें शिव को निरूपित करना हो तो हम कुछ ऐसी ही छवि बनाएंगे। सर के जिस स्थान पर गंगा को दर्शाया जाता है भारतीय शरीर शास्त्र (तंत्र) में उसे सहस्रार चक्र के रूप में परिभाषित किया गया है। जब बच्चा पैदा होता है तो सिर के मध्य भाग में एक स्थान बहुत कोमल होता है। बहुत दिनों तक उस स्थान पर होने वाले स्पंदन को प्रकट रूप में देखा जा सकता है। जैसे जैसे हमारी कोमलता नष्ट होने लगती है धीरे-धीरे वह स्थान भी कठोर हो जाता है। वह स्थान तंत्र में सहस्रार के रूप में परिभाषित है। सहस्रार का सामान्य अर्थ समझना हो तो उसे सहस्रदल कमल कह लें। वह अमरता का स्रोत है। सिर के उस हिस्से की बनावट ऐसी है जैसी कमल की पंखुड़ियां। कमल कहां पैदा होता है? पानी में। जल का पवित्रतम रूप हैं गंगा। और गंगा का उद्गम क्षेत्र है शिव की जटा। इसका मतलब यह हुआ कि गंगा को वहां स्थापित करने के पीछे कारण हैं। हम प्रतीक रूप में गंगा को देखकर यह समझ लें कि वह स्थान अमरता का केन्द्र है। उस केन्द्र तक पहुंचना ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। इसके लिए शिव ही साधना की अनेक विधियां बताते हैं जो विभिन्न शास्त्रों में वर्णित हैं। सामान्य जीवन में गंगा का क्या महत्व है यह बताने की आवश्यकता नहीं है।


उससे थोड़ा नीचे चंद्रमा स्थापित हैं। शिव के शरीर में जिस स्थान पर चंद्रमा का दर्शन होता है तंत्र में उस स्थान को बिन्दु विसर्ग कहते हैं। भौतिक शरीर में यह स्थान बुद्धि का केन्द्र है। चंद्रमा का स्वभाव शीतल है। बुद्धि शीतल हो। शांत हो। चंद्रमा इसी बात का संकेत हैं।


कंठ और भुजाओं पर सर्प की माला। संभवत: शिव की भारतीय मानस में स्थापना का ही परिणाम है कि सांप का सामान्य जीवन में बड़ा आदर है। सांपों का इतना आदर दुनिया के शायद ही किसी देश में हो। सांप पर्यावास के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण जीव होता है। संभवत: सांप ही एकमात्र ऐसा जीव होता है जो अपनी पूरा कायाकल्प कर लेता है। कंठ में जो चक्र स्थापित है उसका नाम है विशुद्धि। विशुद्धि चक्र शरीर में कई तरह के रसों का उत्पादन करता है जो पाचक रसों के रूप में जाने जाते हैं। अगर इन पाचक रसों में व्यवधान आ जाए तो व्यक्ति में कई तरह के रोग घर कर जाते हैं। तंत्र के साधक ऐसा कहते हैं कि विशुद्धि चक्र जागृत हो जाता है तो व्यक्ति में विष को पचा लेने की क्षमता अपने-आप आ जाती है। वह रसों का स्वामी हो जाता है। सांप को प्रतीक रूप में चुनने का एक और अर्थ है। शरीर के सबसे निचले हिस्से में कुंडलिनी शक्ति का स्थान होता है। उस स्थान को मूलाधार चक्र कहते हैं। मूलाधार चक्र जागृत होने पर वह शक्ति उर्ध्वगामी होती है और शरीर के सारे चक्रों का भेदन करती हुई सहस्रार में जाकर विस्फोट करती है। इस सुसुप्त शक्ति का जो आकार है वह कुंडली मारकर बैठे हुए सर्प जैसी है। इड़ा और पिंगड़ा नाड़ियां सुषुम्ना को लपेटे हुए उपर की तरफ चलती हैं। इसलिए सांप को शिव के गले में प्रतीक रूप में रखने के पीछे यह महत्वपूर्ण कारण है।

इसी तरह शिव के माथे पर एक अधखुली आंख के दर्शन होते हैं। उसे त्रिनेत्र कहते हैं। शिव का यह त्रिनेत्र तंत्र में आज्ञा चक्र के रूप में परिभाषित है। आज्ञा चक्र सभी चक्रों का नियंत्रण करता है। उच्चतर साधनाओं के लिए त्रिनेत्र का खुलना जरूरी है। क्योंकि साधना के दौरान यह शरीर एक अनंत उर्जा का स्रोत बनता चला जाता है। इस उर्जा का समायोजन त्रिनेत्र के खुलने पर ही हो सकता है। अन्यथा कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि कोई व्यक्ति साधना के दौरान अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है। त्रिनेत्र अथवा आज्ञा चक्र के खुलने पर हम एक नये ब्रह्माण्ड में पहुंच जाते हैं। इन दो आंखों से हम जो जगत देख पाते हैं त्रिनेत्र उसके परे के जगत से हमारा साक्षात्कार करवाता है। शिव के भाल पर त्रिनेत्र दर्शाने का संभवत: यही अर्थ है। क्योंकि जिन्हें तंत्र में चक्रों के रूप में परिभाषित किया गया है उनका कोई आकार तो है नहीं। वह उर्जा केन्द्र है। शिव में उन उर्जा केन्द्रों को उनके व्यवहार के अनुकूल दर्शाया गया है। आज्ञा चक्र का जो व्यवहार है उसको त्रिनेत्र के रूप इसीलिए दिखाया गया है।

साभार : संजय तिवारी

shivbhakt.blogspot.com


बुधवार, 24 दिसंबर 2008

भगवान शिव को सर्वाधिक प्रिय

• अखण्ड बिल्वपत्र भगवान शिव को अत्यन्त प्रिय है। जो श्रध्दापूर्वक नम: शिवाय मंत्र जाप करते हुए शिव लिंग पर बेलपत्र अर्पित करता है वह सभी पापों से मुक्त हो शिव के परमधाम में स्थान पाता है। यहाँ तक कि बिल्वपत्र के दर्शन, स्पर्श व वंदना से ही दिन-रात के किये पापों से छुटकारा मिल जाता है।
• इसके अलावा भगवन् भोलेनाथ को आक-धतूरा विजया भांग आदि भी अति प्रिय हैं।
• पत्र, पुष्प, फल अथवा स्वच्छ जल तथा कनेर से भी भगवान् शिव की पूजा करके मनुष्य उन्हीं के समान हो जाता है। आक (मदार) का फूल कनेर से दसगुना श्रेष्ठ माना गया है।
• आक के फूल से भी दस गुना श्रेष्ठ है धतूरे आदि का फल। नील कमल एक हजार कह्लार (कचनार) से भी श्रेष्ठ माना गया है।
• शिवरात्रि व्रत करते हुए शिवोपासना से मनुष्य के त्रिविध तापों का शमन हो जाता है, संकटव कष्ट के बादल छंट जाते हैं, कर्मज व्याधियों व ग्रह बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है। इससे अकाल मृत्यु को टाला जा सकता है, मोक्ष प्राप्ति होती है। इस पर्व पर मनुष्य जिस मनोकामना से जिस रूप में शिव की आराधना करता है वह पूरी होती है और भोले शंकर उसी रूप में प्रसन्न होकर फल भी प्रदान करते हैं।
• जो व्यक्ति रोग ग्रस्त होकर बिस्तर पर पड़ा है, वह भी महामृत्युंजय के जाप से अपने को स्वस्थ अनुभव करने लगता है।
• घर में कलह, व्यापार में मंदी, कुसंतान, रोग, भाग्य में रूकावट, भाइयों में मतभेद आदि हो तब भी मनुष्य को शिवरात्रि के दिन कालसर्प शांति अवश्य करवा लेनी चाहिए। इस प्रकार की बाधाओं से मुक्ति के लिए शिवरात्रि से बढ़कर दूसरा उत्तम मुहूर्त नहीं।
• जिन व्यक्तियों को ‘शनि की साढेसाती’ प्रतिकूलता का संकेत दे रही हो उसका शमन शिव आराधना के द्वारा बड़ी सरलता से किया जा सकता है, उसके अलावा और कोई दूसरी आराधना उसे सरलता से शांत नहीं कर सकती।
• शिव गृहस्थ जीवन के आदर्श है जो अनासक्त रहते हुए भी पूर्ण गृहस्थ स्वरूप हैं। इनकी आराधना से मनुष्य के गृहस्थ जीवन में अनुकूलता प्राप्त होती है और वह सुखमय गृहस्थी का स्वामी बनता है।
• भगवान शिव सौभाग्य दायक हैं। अत: इस रात्रि में कुंवारी कन्या द्वारा इनकी आराधना करने से उसे मनोवांछित वर की प्राप्ति होती है।
• जो स्त्री संतान सुख की कामना से शिवरात्रि पर शिव की पूजा अर्चना करती है उसे शिव कृपा से संतान की भी प्राप्ति होती है, क्योंकि शिव पुत्र प्रदान करने वाले देवता हैं।
• भगवान शिव परमपिता परमात्मा के सम्पूर्ण स्वरूप है इसलिए इनकी आराधना जीवन पर्यन्त की जाती है और विशेषकर शिवरात्रि पर इनकी आराधना से व्यक्ति अपने इष्ट के दर्शन पाकर धन्य हो जाता है एवं उसके समस्त मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं।

बुधवार, 26 नवंबर 2008

सर्पशैय्या पर आसीन है शिव परिवार

देश के बारह ज्योतिर्लिगोंमें प्रमुख प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर के शीर्ष पर स्थित नागचंद्रेश्वरमंदिर में देवाधिदेव भगवान शिव की एक ऐसी विलक्षण प्रतिमा है, जिसमें वह अपने पूरे परिवार के साथ सर्प सिंहासन पर आसीन है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार सर्प भगवान शिव का कंठाहारऔर भगवान विष्णु का आसन है लेकिन यह विश्व का संभवत:एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान शिव, माता पार्वती एवं उनके पुत्र गणेशजीको सर्प सिंहासन पर आसीन दर्शाया गया है। वर्ष में केवल एक दिन नागपंचमी पर इस मंदिर के पट 24घंटे के लिए खुलते है और इस दौरान दूरदराज से आने वाले श्रद्धालुओं की भारी भीड उमड पडती है। शनिवार को नागपंचमी का पर्व होने की वजह से शुक्रवार की मध्यरात्रि से ही इस मंदिर में भगवान शिव के दर्शनों के लिए भक्तों की कतार लगने का सिलसिला आरंभ हो जाएगा।

महाकाल भक्त मंडल के अध्यक्ष एवं महाकालेश्वर मंदिर के पुजारी पंडित रमण त्रिवेदी ने बताया कि पौराणिक मान्यता के अनुसार सर्पोके राजा तक्षक ने भगवान शंकर की यहां घनघोर तपस्या की थी। तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए और तक्षक को अमरत्व का वरदान दिया। ऐसा माना जाता है कि उसके बाद से तक्षक नाग यहां विराजितहै, जिस पर शिव और उनका परिवार आसीन है। एकादशमुखीनाग सिंहासन पर बैठे भगवान शिव के हाथ-पांव और गले में सर्प लिपटे हुए है।

इस अत्यंत प्राचीन मंदिर का परमार राजा भोज ने एक हजार और 1050ईस्वी के बीच पुनर्निर्माण कराया था। 1732में तत्कालीन ग्वालियर रियासत के राणाजीसिंधिया ने उज्जयिनीके धार्मिक वैभव को पुन:स्थापित करने के भागीरथी प्रयास के तहत महाकालेश्वर मंदिर का जीर्णाेद्धार कराया। प्रतिवर्ष श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी के दिन नागपंचमी का पर्व पडता है और इस दिन नाग की पूजा की जाती है।

इस दिन कालसर्पयोग की शांति के लिए यहां विशेष पूजा के आयोजन भी होते है। श्री महाकाल ज्योतिष अनुसंधान केंद्र के संचालक और ज्योतिषाचार्य पंडित कृपाशंकर व्यास ने बताया कि नागचन्द्रेश्वरमंदिर दुनिया में अपनी तरह का एक ही मंदिर है।उन्होने कहा कि यहां पूजा-पाठ का विशेष महत्व है।

भगवान् शिव के द्वारा सृष्टि

जिस समय सर्वत्र केवल अन्धकार-ही-अन्धकार था; न सूर्य दिखायी देते थे न चन्द्रमा, अन्यान्य ग्रह-नक्षत्रों का भी कहीं पता नहीं था; न दिन होता था न रात। अग्नि, पृथ्वी, जल और वायुकी भी सत्ता नहीं थी—उस समय एक मात्र सत् ब्रह्म अर्थात् सदाशिव की ही सत्ता विद्यमान थी, जो अनादि और चिन्मय कही जाती है। उन्हीं भगवान् सदाशिव को वेद, पुराण और उपनिषद् तथा संत-महात्म आदि ईश्वर तथा सर्वलोकमहेश्वर कहते हैं।

एक बार भगवान् शिव के मन में सृष्टि रचने की इच्छा हुई। उन्होंने सोचा कि मैं एक से अनेक हो जाऊँ। यह विचार आते ही सबसे पहले परमेश्वर शिवने अपनी परा शक्ति अम्बिकाको प्रकट किया तथा उनसे कहा कि हमें सृष्टि के लिये किसी दूसरे पुरुष का सृजन करना चाहिये, जिसके कंधेपर सृष्टि-संचालन का महान् भार रखकर हम आनन्दपूर्वक विचरण कर सकें। ऐसा निश्चय करके शक्तिसहित परमेश्वर शिव ने अपने वाम अंग के दसवें भागपर अमृत मल दिया। वहाँ से तत्काल एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ। उसका सौन्दर्य अतुलनीय था। उसमें सत्वगुणकी प्रधानता थी। वह परम शान्त तथा अथाह सागर की तरह गम्भीर था। रेशमी पीताम्बर से उसके अंग की शोभा द्विगुणित हो रही थी। उसके चार हाथों में शंक, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित हो रहे थे।

उस दिव्य पुरुष ने भगवान् को प्रणाम करके कहा कि ‘भगवन् ! मेरा नाम निश्चित कीजिये और काम बताइये।’ उसकी बात सुनकर भगवान् शंकरने मुस्कराकर कहा—‘वत्स ! व्यापक होने के कारण तुम्हारा नाम विष्णु होगा। सृष्टि का पालन करना तुम्हारा कार्य होगा। इस समय तुम उत्तम तप करो।’

भगवान् शिव का आदेश प्राप्तकर श्रीविष्णु कठोर तपस्या करने लगे। उस तपस्या के श्रम से उनके अंगों से जल-धाराएं निकलने लगीं, जिससे सूना आकाश भर गया। अंततः उन्होंने थककर उसी जलमें शयन किया। जल अर्थात् ‘नार’ में शयन करने के कारण ही श्रीविष्णु का एक नाम ‘नारायण’ हुआ।

तदनन्तर सोये हुए नारायण की नाभि से एक उत्तम कमल प्रकट हुआ। उसी समय भगवान् शिव ने अपने दाहिने अंग से चतुर्मुख ब्रह्मा को प्रकट करके उस कमल पर डाल दिया। महेश्वर की माया से मोहित हो जाने के कारण बहुत दिनों तक ब्रह्माजी उस कमलके नाल में भ्रमण करते रहे, किंतु उन्हें अपने उत्पत्तिका का पता नहीं लगा। आकाशवाणी द्वारा तपका आदेश मिलने पर ब्रह्माजी ने अपने जन्मदाता के दर्शनार्थ बारह वर्षों तक कठोर तपस्या की। तत्पश्चात् उनके सम्मुख भगवान् विष्णु प्रकट हुए। परमेश्वर शिवकी लीला से उस समय वहाँ विष्णु और ब्रह्माजी के बीच विवाद छिड़ गया। सहसा उन दोनों के मध्य एक दिव्य अग्निस्तम्भ प्रकट हुआ। बहुत प्रयास के बाद भी ब्रह्मा और विष्णु उस अग्निस्तम्भ के आदि-अन्त का पता नहीं लगा सके। अंततः थककर भगवान् विष्णु ने प्रार्थना किया कि ‘महाप्रभो ! हम आपके स्वरूप को नहीं जानते। आप जो कोई भी हों, हमें दर्शन दीजिये।’

भगवान् विष्णु की स्तुति सुनकर महेश्वर सहसा प्रकट हो गये और बोले —‘सुरश्रेष्ठगण मैं तुम दोनों के तप और भक्ति से संतुष्ट हूँ। ब्रह्मन् ! तुम मेरी आज्ञा से जगत की सृष्टि करो और वत्स विष्णु ! तू इस चराचर जगत का पालन करो,। तदनन्तर परमेश्वर शिवने अपने हृदयभाग से रुद्र को प्रकट किया और उन्हें संहार का दायित्व सौंपकर वहीं अंतर्धान हो गये।

अर्धनारीश्वर शिव

सृष्टि के प्रारम्भ में जब ब्रह्माजी द्वारा रची गयी मानसिक सृष्टि विस्तार न पा सकी, तब ब्रह्माजी को बहुत दुःख हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई—‘ब्रह्मन् ! अब मैथुनी सृष्टि करो।’
आकाशवाणी सुनकर ब्रह्माजी ने मैथुनी सृष्टि रचने का निश्चय तो कर लिया, किंतु उस समय तक नारियों की उत्पत्ति न होने के कारण वे अपने निश्चय में सफल नहीं हो सके। तब ब्रह्माजी ने सोचा कि परमेश्वर शिव की कृपा के बिना मैथुनी सृष्टि नहीं हो सकती। अतः वे उन्हें प्रसन्न करने के लिये कठोर तप करने लगे। बहुत दिनों तक ब्रह्माजी अपने हृदयमें प्रेमपूर्वक महेश्वर शिव का ध्यान करते रहे। उनके तीव्र तप से प्रसन्न होकर भगवान् उमा –महेश्वर नमे उन्हें अर्धनारीश्वर-रूप में दर्शन दिया। देवादिदेव भगवान् शिव के दिव्य स्वरूप को देखकर ब्रह्माजी अभिभूत हो उठे और उन्होंने दण्डकी भाँति भूमि पर लेटकर उस अलौकिक विग्रह को प्रणाम किया।

महेश्वर शिवने कहा—‘पुत्र ब्रह्मा ! मुझे तुम्हारा मनोरथ ज्ञात हो गया है। तुमने प्रजाओं की वृद्धि के लिए जो कठिन तप किया है; उससे मैं परम प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूँगा।’ ऐसा कहकर शिवजी ने अपने शरीर के आधे भाग से उमादेवी को अलग कर दिया। तदनन्तर परमेश्वर शिव के अर्धांग से अलग हुई उन पराशक्ति को साष्टांग प्रणाम करके ब्रह्माजी इस प्रकार कहने लगे—

‘शिवे ! सृष्टि के प्रारम्भ में आपके पति देवाधिदेव ने शम्भुने मेरी रचना की थी। भगवति ! उन्हीं के आदेश से मैने देवता आदि समस्त प्रजाओं का मानसिक सृष्टि की। परंतु अनेक प्रयासों के बाद भी उनकी वृद्धि करने में मैं असफल रहा हूँ। अतः अब स्त्री-पुरुष के समागम से मैं प्रजाको उत्पन्न कर सृष्टि का विस्तार करना चाहता हूँ, किंतु अभीतक नारी-कुलका प्राकट्य नहीं हुआ है और नारी-कुलकी सृष्टि करना मेरी शक्ति से बाहर है। देवि ! आप सम्पूर्ण सृष्टि शक्तियों की उद्गमस्थली हैं। इसलिये हे मातेश्वरी, आप मुझे नारी-कुल की सृष्टि करने की शक्ति प्रदान करें। मैं आपसे एक और विनती करता हूँ कि चराचर जगत् की वृद्धि के लिये आप मेरे पुत्र दक्ष की पुत्री के रूप में जन्म लेने की कृपा करें।’

ब्रह्मा की प्रार्थना सुनकर शिवाने ‘तथास्तु’—ऐसा ही होगा—कहा और ब्रह्माको उन्होंने नारी कुल की सृष्टि करने की शक्ति प्रदान की। इसके लिए उन्होंने अपनी भौहों के मध्यभाग से अपने ही समान कान्तमती एक शक्ति प्रकट की। उसे देखकर देवदेवेश्वर शिवने हँसते हुए कहा—‘देवि ! ब्रह्माने तपस्या द्वारा तुम्हारी आराधना की है। अब तुम उनपर प्रसन्न हो जाओ और उनका मनोरथ पूर्ण करो।’ परमेश्वर शिवकी इस आज्ञा को शिरोधार्य करके वह शक्ति ब्रह्माजी की प्रार्थना के अनुसार दक्षकी पुत्री हो गयी। इस प्रकार ब्रह्माजी को अनुपम शक्ति देकर देवी शिवा महादेवजी के शरीर में प्रविष्ट हो गयीं। फिर महादेवजी भी अन्तर्धान हो गये तभी से इस लोक में मैथुनी सृष्टि चल पड़ी। सफल मनोरथ होकर ब्रह्माजी भी परमेश्वर शिव का स्मरण करते हुए निर्विघ्नरूपसे सृष्टि-विस्तार करने लगे।

इस प्रकार शिव और शक्ति एक-दूसरे से अभिन्न तथा सृष्टि के आदिकारण हैं। जैसे पुष्प में गन्ध, चन्द्रमें चन्द्रिका, सूर्य में प्रभा नित्य और स्वभाव-सिद्ध है, उसी प्रकार शिवमें शक्ति भी स्वभाव-सिद्ध है। शिव में इकार ही शक्ति है। शिव कूटस्थ तत्त्व है और शक्ति परिणामी तत्त्व। शिव अजन्मा आत्मा है और शक्ति जगत् में नाम-रूप के द्वारा व्यक्त सत्ता। यही अर्धनारीश्वर शिवका रहस्य है।


सती जन्म तप तथा विवाह


भगवान् शंकर की आज्ञा शिरोधार्य करके ब्रह्माजी ने सृष्टि का कार्य प्रारम्भ किया। सर्वप्रथम उन्होंने सूक्ष्मभूत, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, नदी, समुद्र इत्यादि के साथ सप्तर्षियों तथा अपने मानस पुत्रों को उत्पन्न किया। तत्पश्चात अमिका एवं महादेवजीकी आज्ञा से उन्होने दक्ष और वीरिणी की सृष्टि की और उन्हें मैथुनी सृष्टि करने का आदेश किया। उन दोनों ने पहले हर्यश्व और शबलाश्व आदि नाम से सहस्रों पुत्र पैदा किये जो नारदजी के उपदेश से संन्यासी हो गये। बाद में उन्हें कल्पान्तर में साठ कन्याएँ हुईं, जिनका विवाहभृगु, शिव, मरीच आदि ऋषियों के साथ सम्पन्न हुआ।

ब्रह्मा की आराधना संतुष्ट होकर परमेश्वर शम्भु की आदि शक्ति सतीदेवी ने लोकहितका कार्य सम्पादित करने के लिये दक्ष के यहाँ अवतार लिया। पुत्री का मनोहर मुख देखकर सबको बड़ी प्रसन्नता हुई।
दक्षने ब्राह्मणों तथा याचकों को दान-मान से संतुष्ट किया। भाँत-भाँति के मंगल-कृत्यों के साथ नृत्य और गान के सुन्दर आयोजन किये गये। दक्ष के महल में जैसे खुशियों का साम्राज्य ही उतर आया। देवताओंने पुष्पवर्षा की दक्ष ने अपनी उस दिव्य कन्या का नाम ‘उमा’ रखा। परमेश्वर शिव की अभिन्न स्वरूपा होने के कारण वे बाल्यवस्था से ही उनके ध्यानमें निमग्न रहा करती थीं।

एक दिन देवर्षि नारद और पितामह ब्रह्माजी उस अद्भुत बालिका के दर्शन की इच्छा से दक्ष के यहाँ आये। ब्रह्माजी ने भगवती सती से कहा—‘जो केवल तुम्हें ही चाहते हैं और तुम्हारे मनमें भी जिनको पति रूप में प्राप्त करने की अभिलाषा है, उन्हीं महादेवजी की तुम्हें तपस्या करनी चाहिये।’ ऐसा कहकर ब्रह्माजी देवर्षि नारद के साथ अपने लोक को चले गये।
युवावस्था में प्रवेश करते ही भगवती सती अपनी माता वीरणी से अनुमति लेकर महेश्वर शिव को पतिरूप में प्राप्त करने के लिये कठोर तपस्या करने लगीं। तपस्या करती हुई सती मूर्तिमती सिद्धि के समान दिखलायी देती थीं। भाँति-भाँति के उपचारों द्वारा महेश्वर की साधना में वे इस तरह लीन हो गयीं कि उन्हें अपने शरीर की भी सुधि न रही।

भगवान् विष्णु के साथ सभी देवताओं ने कैलास पहुँचकर भगवान् शिवसे कहा—‘महेश्वर ! महातेजस्विनी सती आपको पतिरूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप कर रही हैं। हमलोगों की प्रार्थना है कि आप उन्हें पत्नीस्वरूप स्वीकार करें।’
देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान् महादेव सती के समक्ष प्रकट हो गये। उनकी अंग कान्ति करोड़ों कामदेवों को लज्जित कर रही थी। भगवती सती ने सौन्दर्य के धाम महेश्वर शिवकी वन्दना की। उस समय उनका मुख नारीसुलभ लज्जा के कारण झुका हुआ था।

महादेवजी ने कहा—‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाली सती ! मैं तुमपर परम प्रसन्न हूँ। इसलिए तुम इच्छानुसार वर माँगो। शुभे ! तुम्हारा कल्याण हो।’

सती बोलीं—‘प्रभो ! यदि आप मुझपर सचमुच प्रसन्न हैं तो वैवाहिक विधि से मेरा पाणिग्रहण कर मुझ दासी को कृतार्थ करें।’ ‘ऐसा ही होगा’ कहकर परमेश्वर शिव अन्तर्धान हो गये।
तदनन्तर शुभ लग्न और मुहूर्त मे प्रजापति दक्ष ने हर्षपूर्वक अपनी पुत्री का हाथ भगवान् शंकर के हाथों में दे दिया। महेश्वर शिव को अपनी कन्या प्रदान करके दक्ष कृतार्थ हो गये। समस्त देवताओं और ऋषि-मुनियों के आनन्दकी सीमा न रही। विवाहोपरान्त दक्ष से विदा लेकर शिवा के साथ महादेव कैलास लौट आये। समस्त संसार सती और शिव के इस दिव्य मिलन से आनन्दित हो गया।

रविवार, 23 नवंबर 2008

महाशिवरात्रि की व्रत-कथा

एक बार पार्वती ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्यु लोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?'

उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया।

अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।

पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए।

एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई।

कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी ! मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।'

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे मत मार।'

शिकारी हँसा और बोला, 'सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे।'

उत्तर में मृगी ने फिर कहा, 'जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।'

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्व करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला,' हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा।'

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।'

उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।

देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।'

शिव परिवार

देवी पार्वती-

यह शिव की शक्ति हैं। शिव की अनाम शक्ति ही अलग-अलग नाम धारण करती है। लक्ष्मी से लेकर राधा तक, सब शिव की शक्तियां ही हैं। पार्वती पूर्वजन्म में सती थीं। वह शिव की प्रेरणा हैं। शिव भोले हैं, पार्वती उनकी बुद्धिशक्ति हैं। वह शिव को जगाने का साहस करती है। पार्वती का वाहन सिंह है, जो शिव द्वारा ही दिया गया है। पार्वती को शिव, उमा या गौरी नाम से बुलाते हैं।

पुत्र गणोश-

गणोश का सिर काटकर शिव ने हाथी का सिर लगा दिया था, बाद में वरदान स्वरूप अपने गणों का मुखिया बना दिया। गणोश शिव की क्षुधा यानी भूख शक्ति हैं। शिव ख़ुद आहार नहीं लेते, बल्कि गणोश खाते हैं। जितना खाते हैं, सब महादेव के पेट में जाता है, लेकिन पेट गणोश का बड़ा होता है। यानी शिव गणोश से लेकर भी नहीं लेते। रस ले लेते हैं, बाक़ी गणोश को दे देते हैं। गणोश को उन्होंने बुद्धि, शौर्य और बोलने-सुनने की शक्ति दी है। इसी शक्ति के कारण गणोश व्यास से सुन-सुनकर उतनी ही गति से महाभारत को लिख सके। गणोश की पत्नी ऋद्धि और सिद्धि हैं, इनके दो पुत्र हैं क्षेम और लाभ। ऋद्धि के कारण दुनिया में बुद्धि का प्रसार हुआ, सिद्धि ने साधना का प्रसार किया। बेटे क्षेम के कारण लोग कुशलता से रहना सीख पाए और लाभ ने सफलता के भाव का प्रसार किया।

बेटा कार्तिकेय-

कार्तिकेय दया और कृपा के देव हैं। शिव जगत के प्रति अपना प्रेम इन्हीं के ज़रिए व्यक्त करते हैं। दक्षिण भारत में कार्तिकेय की विशेष पूजा होती हैं। शिव ने जैसे रावण के भाई कुबेर को उत्तर भारत का संपत्ति-राज्य सौंपा था, उसी तरह कार्तिकेय को दक्षिण भारत का। दक्षिण दिशा में निवास करने वालों को संपन्नता के लिए कार्तिकेय की आराधना करनी चाहिए। उत्तर में कुबेर की आराधना होती है, किंतु देवरूप में नहीं, क्योंकि कुबेर मात्र क्षेत्रपाल हैं, देव नहीं। वह असुर योनि के हैं। कार्तिकेय का वाहन है मयूर और पत्नी हैं देवसेना, जो देवताओं की पूरी सेना को नियंत्रित करती हैं। यह भी शिव की एक अव्यक्त शक्ति ही हैं।

गणसेना- शिव अपने गणों से बहुत प्रेम करते हैं। ये गण साधारण नहीं, बल्कि बहुत डरावने हैं। शिव के साथ 11 रुद्र, 11 रुद्रिणियां, चौंसठ योगिनियां, अनगिनत मातृकाएं व 108 भैरव हैं। इस सेना के अध्यक्ष वीरभद्र हैं, जिनके पास अनगिनत रुद्र हैं। कालिकापुराण के अनुसार सीधे शिवराज से वार्ता करने वाले 36 करोड़ प्रमथगण उनकी सेना में हैं। शिव के पार्षदों व क्षेत्रपालों में प्रमुख हैं-बाण, रावण, चंडी, रिटि, भृंगी, लाटा, गोरिल और विजया, जो कि माता पार्वती की ख़ास सखी हैं। शिव के प्रमुख द्वाररक्षक हैं कीर्तिमुख।

बाल गणोश ने सिर कटने से पहले इन्हीं के साथ युद्ध किया था। शिव और शक्ति को अलग मानने वाले ध्यान दें कि आदिशक्ति महादेवी दुर्गा, जिन्हें चंडिका, काली, गढ़देवी, त्रिपुरसुंदरी, अंबा जैसे कई नामों से जाना जाता है, की सेना भी यही है। मात्र एक अंतर है- शिव अपने सेनाध्यक्ष को वीरभद्र के नाम से पुकारते हैं, जबकि आदिशक्ति अपने सेनाध्यक्ष को कालभैरव नाम से। वीरभद्र और कालभैरव एक ही हैं। दोनों शिव के ही लीलावतार हैं। यह भी ध्यान देने लायक़ बात है कि शिव ही वह एकमात्र देव हैं, जिनकी सेना में स्त्री की भी जगह है। योगिनियां और मातृकाएं शिव की स्त्री-शक्ति में विश्वास का ही प्रतीक है।

रविवार, 2 नवंबर 2008

शिवलिंग पूजा का महत्व

श्री शिवमहापुराण के सृष्टिखंड अध्याय १२श्लोक ८२से८६ में ब्रह्मा जी के पुत्र सनत्कुमार जी वेदव्यास जी को उपदेश देते हुए कहते है कि हर गृहस्थ को देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर पंचदेवों (श्री गणेश,सूर्य,विष्णु,दुर्गा,शंकर) की प्रतिमाओं में नित्य पूजन करना चाहिए क्योंकि शिव ही सबके मूल है, मूल (शिव)को सींचने से सभी देवता तृत्प हो जाते है परन्तु सभी देवताओं को तृप्त करने पर भी प्रभू शिव की तृप्ति नहीं होती। यह रहस्य देहधारी सद्गुरू से दीक्षित व्यक्ति ही जानते है।
सृष्टि के पालनकर्ता विष्णु ने एक बार ,सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के साथ निर्गुण-निराकार- अजन्मा ब्रह्म(शिव)से प्रार्थना की, "प्रभों! आप कैसे प्रसन्न होते है।"

प्रभु शिव बोले,"मुझे प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग का पूजन करो। जब जब किसी प्रकार का संकट या दु:ख हो तो शिवलिंग का पूजन करने से समस्त दु:खों का नाश हो जाता है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय श्लोक से पृष्ठ )

(२) जब देवर्षि नारद ने श्री विष्णु को शाप दिया और बाद में पश्चाताप किया तब श्री विष्णु ने नारदजी को पश्चाताप के लिए शिवलिंग का पूजन, शिवभक्तों का सत्कार, नित्य शिवशत नाम का जाप आदि क्रियाएं बतलाई।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय श्लोक से पृष्ठ )

(३) एक बार सृष्टि रचयिता ब्रह्माजी देवताओं को लेकर क्षीर सागर में श्री विष्णु के पास परम तत्व जानने के लिए पहुॅचे । श्री विष्णु ने सभी को शिवलिंग की पूजा करने की आज्ञा दी और विश्वकर्मा को बुलाकर देवताओं के अनुसार अलग-अलग द्रव्य के शिवलिंग बनाकर देने की आज्ञा दी और पूजा विधि भी समझाई।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय १२ )

(४) रूद्रावतार हनुमान जी ने राजाओं से कहा कि श्री शिवजी की पूजा से बढ़कर और कोई तत्व नहीं है। हनुमान जी ने एक श्रीकर नामक गोप बालक को शिव-पूजा की दीक्षा दी। (प्रमाण श्री शिवमहापुराण कोटीरूद्र संहिता अध्याय १७ ) अत: हनुमान जी के भक्तों को भी भगवान शिव की प्रथम पूजा करनी चाहिए।

(५) ब्रह्मा जी अपने पुत्र देवर्षि नारद को शिवलिंग की पूजा की महिमा का उपदेश देते है। देवर्षि नारद के प्रश्न और ब्रह्मा जी के उत्तर पर ही श्री शिव महापुराण की रचना हुई है। पार्वती जगदम्बा के अत्यन्त आग्रह से, जनकल्याण के लिए, निर्गुण निराकार अजन्मा ब्रह्म (शिव) ने सौ करोड़ श्लोकों में श्री शिवमहापुराण की रचना की। चारों वेद और अन्य सभी पुराण, श्री शिवमहापुराण की तुलना में नहीं आ सकते। प्रभू शिव की आज्ञा से विष्णु के अवतार वेदव्यास जी ने श्री शिवमहापुराण को २४६७२ श्लोकों में संक्षिप्त किया है। ग्रन्थ विक्रेताओं के पास कई प्रकार के शिवपुराण उपलब्ध है परन्तु वे मान्य नहीं है केवल २४६७२ श्लोकों वाला श्री शिवमहापुराण ही मान्य है। यह ग्रन्थ मूलत: देववाणी संस्कृत में है और कुछ प्राचीन मुद्रणालयों ने इसे हिन्दी, गुजराती भाषा में अनुदित किया है। श्लोक संख्या देखकर और हर वाक्य के पश्चात् श्लोक क्रमांक जॉंचकर ही इसे क्रय करें। जो व्यक्ति देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर , एक बार गुरूमुख से श्री शिवमहापुराण श्रवण कर फिर नित्य संकल्प करके (संकल्प में अपना गोत्र,नाम, समस्याएं और कामनायें बोलकर)नित्य श्वेत ऊनी आसन पर उत्तर की ओर मुखकर के श्री शिवमहापुराण का पूजन करके दण्डवत प्रणाम करता है और मर्यादा-पूर्वक पाठ करता है, उसे इस प्रकार सम्पूर्ण २४६७२ श्लोकों वाले श्री शिवमहापुराण का बोलते हुए सात बार पाढ करने से भगवान शंकर का दर्शन हो जाता है। पाठ करते समय स्थिर आसन हो, एकाग्र मन हो, प्रसन्न मुद्रा हो, अध्याय पढते समय किसी से वार्ता नहीं करें, किसी को प्रणाम नहीं करे और अध्याय का पूरा पाठ किए बिना बीच में उठे नहीं। श्री शिवमहापुराण पढते समय जो ज्ञान प्राप्त हुआ उसे व्यवहार में लावें।श्री शिव महापुराण एक गोपनीय ग्रन्थ है। जिसका पठन (परीक्षा लेकर) सात्विक, निष्कपटी, प्रभू शिव में श्रद्धा रखने वालों को ही सुनाना चाहिए।

(६) जब पाण्ड़व लोग वनवास में थे , तब भी कपटी, दुर्योधन , पाण्ड़वों को कष्ट देता था।(दुर्वासा ऋषि को भेजकर तथा मूक नामक राक्षस को भेजकर) तब पाण्ड़वों ने श्री कृष्ण से दुर्योधन के दुर्व्यवहार के लिए कहा और उससे राहत पाने का उपाय पूछा। तब श्री कृष्ण ने उन सभी को प्रभू शिव की पूजा के लिए सलाह दी और कहा "मैंने सभी मनोरथों को प्राप्त करने के लिए प्रभू शिव की पूजा की है और आज भी कर रहा हॅूॅ।तुम लोग भी करो।" वेदव्यासजी ने भी पाण्ड़वों को भगवान् शिव की पूजा का उपदेश दिया। हिमालय में, काशी में,उज्जैन में, नर्मदा-तट पर या विश्व में कहीं भी चले जायें, प्रत्येक स्थान पर सबसे सनातन शिवलिंग की पूजा ही है। मक्का मदीना में एवं रोम के कैथोलिक चर्च में भी शिवलिंग स्थापित है परन्तु सही देहधारी सद्गुरू से दीक्षा न लेकर ,सही पूजा न करने से ही हमें सांसारिक सभी सुख प्राप्त नहीं हो रहे है।

श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय ११ श्लोक १२से १५ में श्री शिव-पूजा से प्राप्त होने वाले सुखों का वर्णन निम्न प्रकार से है:- दरिद्रता, रोग सम्बन्धी कष्ट, शत्रु द्वारा होने वाली पीड़ा एवं चारों प्रकार का पाप तभी तक कष्ट देता है, जब तक प्रभू शिव की पूजा नहीं की जाती। महादेव का पूजन कर लेने पर सभी प्रकार का दु:ख नष्ट हो जाता है, सभी प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते है और अन्त में मुक्ति लाभ होता है। जो मनुष्य जीवन पाकर उसके मुख्य सुख संतान को प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें सब सुखों को देने वाले महादेव की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र विद्यिवत शिवजी का पूजन करें। इससे सभी मनोकामनाएं सिद्द्ध हो जाती है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय ११श्लोक१२ से १५)

महिलाओं के लिये शिव पूजा

स्त्री को सबसे बड़ा सुख है - रूपवान, धनवान,बुद्धिमान और अनुकूल पति। सती जगदम्बा को सर्व गुण सम्पन्न और सृष्टि का मालिक भगवान शंकर ही पति रूप में मिल गए। प्रभु शिव ने भी लोग व्यवहार के अनुसार (आत्म चिन्तन छोड़कर) सती के साथ विहार करके उसे पूर्ण रूप से तृत्प किया। पूर्ण तृत्प होने पर सती जगदम्बा ने प्रभु शिव से प्रार्थना की ," हे नाथ ! आपने बहुत समय तक मेरे साथ विहार किया, उससे मैं प्रसन्न हॅू और मैरा मन उस ओर से निवृत्त हो गया है। अब मैं हे देवेश! हे हर!उस परम तत्व को आपसे जानना चाहती हॅू जिससे प्राणी शीघ्र ही संसार के दु:खों से पार हो जाये, जिसे करके विषयी जीव परम-पद को पाकर पुन: संसार में जन्म न ले सके। कृपा करके उस तत्व का आप वर्णन कीजिए।( प्रमाण श्री शिव महापुराण सतीखंड अध्याय २३श्लोक ४-९ पृष्ठ संख्या १९१)तब प्रभु शिव ने अपना गुप्त ज्ञान (शिव की नवधा भक्ति) सती जगदम्बा को दिया।...... भुक्ति-मुक्ति रूप फल को देने वाली मेरी भक्ति ब्रह्म-ज्ञान की माता है....भक्ति और ज्ञान में कोई भेद नहीं है..... मेरी भक्ति ज्ञान एवं वैराग्य उत्पन्न करती है, मुक्ति भी इसकी दासी बनी रहती है।( प्रमाण श्री शिव महापुराण अध्याय श्लोक १२-४६ पृष्ठ संख्या १९२-१९३)

पार्वती जगदम्बा ने जन कल्याण के लिए प्रभु शिव से पूछा,"अजितेन्द्रिय तथा मन्दबुद्धि वालों के वश में आप कैसे हो सकते है ? "प्रभु शिव ने जो रहस्यमय उपदेश पार्वती को दिया, वह २४६७२ श्लोक वाले श्री शिव महापुराण के वायवीय संहिता उत्तर भाग के अध्याय १०-११ पृष्ठ ८९५-८९९ में देख सकते है।

इसमें प्रभु शिव ने कृपा करके ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शुद्रों के भी कर्तव्य दिये हैं। विधवा स्त्री का धर्म बताया है। प्रभु शिव ने वेद-पुराण दूसरों को पढाना, यज्ञ कराना और दान लेने का अधिकार केवल ब्राह्मणों को दिया है, क्षत्रियों, वैश्यों को नहीं दिया। (श्री शिव महापुराण वायवीय संहिता उत्तर भाग अध्याय ११श्लोक १२ पृष्ठ ८९८) इसका स्पष्ट अर्थ है कि जो व्यक्ति, प्रभु शिव की इस आज्ञा को न मानकर,विरूद्ध कर्म करता है वह निश्चित मरकर नरक में जाता है।

- पति-पत्नी के धर्म क्या है?
- पति में क्या गुण होने चाहिए, पति को पत्नी की कैसे रक्षा करनी चाहिए?
- धर्म कर्म में कैसे सहायक होना चाहिए, इसका सम्पूर्ण ज्ञान वेद और पुराणों में दिया गया है।
- पतिव्रता पत्नी में क्या लक्षण होने चाहिए?
- पतिव्रता पत्नी कैसे अपने उद्धार के साथ पति और माता-पिता की तीन-तीन पीढ़ियों को तार सकती है? उसका वर्णन पार्वती खंड के अध्याय ५४ में वर्णित है।

प्रभु शिव की आज्ञा है कि "स्त्रियों के लिए पति सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। यदि पति की आज्ञा हो तो वह मेरा (शिव) पूजन करें।" जो स्त्री, पति की सेवा को छोड़कर व्रत करने लगती है, वह नि:सन्देह नरक को जाती है।(श्री शिव महापुराण वायवीय संहिता उत्तर भाग अध्याय ११ श्लोक १९-२० पृष्ठ ८९८)भारत में जन्मी स्त्रियों को इस ज्ञान पर विशेष ध्यान देना चाहिए। प्रभु शिव के इस आदेश के अनुसार महिलाओं को प्रभु शिव की उपासना के अतिरिक्त और कोई अधिकार नहीं है।

भारत की नारियों को, प्रभु शिव की पूजा का अधिकार कब प्राप्त हो सकता है, उसके लिए आश्रम से सम्पर्क करें।अधिकांश महिलाएं पूजा में किस भंयकर गलती के कारण विधवा होकर मरती है(सुहागिन होकर नहीं मरती) इस आश्रम से मार्गदर्शन लें।

जब ब्रह्मा के पुत्र दक्ष प्रजापति (जिनकी ६० कन्याओं से इन्द्रादि लोकपाल उत्पन्न हुए) एक महान यज्ञ सत्ययुग में किया उस यज्ञ में सभी को बुलाया केवल एक संहारक शंकर जी को ही नहीं बुलाया। तब दक्ष की पुत्री सती जगदम्बा स्वयं कनखल में हो रहे यज्ञ-स्थल में आई और अपने पिता से बोली,...."जो महादेव की निन्दा करता है तथा निन्दा के वचनों को सुनता है, वे दोनों ही तब तक नरक गामी होते है जब तक चन्द्र और सूर्य रहते है... शिव ये दो अक्षरों वाला नाम जिन मनुष्यों की जीभ ने एक बार भी लिया है वह उनके समस्त पापों का नाश कर देता है।( प्रमाण श्री शिव महापुराण सतीखण्ड अध्याय २९ पृष्ठ संख्या २०४ से २०६)

महिलाओं को श्री शिव की पूजा बहुत शीघ्र फलवती हो जाती है। महानन्दा, चंचुला, पिंगला, शारदा, ऋषिका, आहुका आदि अनेक महिलाओं ने शिव भक्ति के प्रभाव से सद्गति प्राप्त की। कन्या में आत्मबल की वृद्धि,प्रभु शिव की (शिवलिंग में)पूजा के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। ५ से ८ वर्ष की कन्या यदि सही सद्गुरू से दीक्षा लेकर शिव-पूजा करती है तो उससे आत्मबल भी बढ़ता है, इसी जन्म में राजपद् भी प्राप्त होता है और वह निश्चित रूप से कुल तारक संतान को ही उत्पन्न करेगी। शेष जीवन को सुधारने के लिए महिला आश्रम से नि:शुल्क सेवा प्राप्त कर सकती है।(यदि महिला कोई धन नहीं कमाती हो) स्कन्दपुराण में यादव कुल की राजकुमारी कलावती की कथा इसी जन्म में मुक्त होने के लिए, अगले जन्म में राजकुल प्राप्त करने के लिए या अगले जन्म में पुरूष रूप में जन्म लेने के लिए, आश्रम से अलग - अलग क्रियाएं सिखायी जाती है।

महिलाओं को जबभी कभी कोई कष्ट होता है तो वे देहधारी शिवभक्त सद्गुरू से दीक्षा लेकर, भगवान शंकर की शिवलिंग में पूजा (संकल्प करके ) करके शिवलिंग के सामने ही महानन्दा की कथा का पाठ बोलकर करती है। महानन्दा एक वैश्या थी और महान् शिवभक्ता थी। बिना तपस्या के ही महानन्दा को निष्कपट-भाव से श्रद्धा-भक्ति से शिवलिंग का पूजन,प्रभु शिव के व्रत करने तथा शिवभक्त ब्राह्मणों को दान देने से घर बैठे प्रभु शिव ने दर्शन दिये और महानन्दा के मॉंगने पर प्रभुशिव ने उसको उसके समाज सहित सभी को शिव-लोक प्रदान कर अतुल सुख दिया। यह कथा स्कन्द पुराण में महानन्दा के नाम से और श्री शिवमहापुराण के शतरूद्र संहिता के अध्याय २६ प्रभु शिव के वैश्यनाथ अवतार के नाम से वर्णित है। महिलाये विधि को आश्रम से सीख सकती है। अतिथी सत्कार की महिमा सभी धर्म शास्त्रों में वर्णित है। स्कन्द पुराण में वेश्या पिंगला का चरित्र और श्री शिवमहापुराण में आहुका का चरित्र (शतरूद्र संहिता अध्याय २८ में) अतिथी सत्कार में यदि किसी महिला ने एक बार भी शिवभक्त का सत्कार कर दिया, तो निश्चित रूप से भगवान शंकर स्वयं अगले जन्म में सद्गुरू रूप से उसे दीक्षा देकर उसकी सद्गति करते है। अतिथी सत्कार की विधि आश्रम से नि:शुल्क सिखायी जाती है।

आजकल कुछ कपटी लोगों ने एक भ्रामक प्रचार फैला रखा है कि स्त्रियों को शिवलिंग के स्पर्श एवं पूजन का अधिकार नहीं है। रूद्राक्ष और भ्रस्म त्रिपुण्ड़ लगाने का अधिकार नहीं है। विष्णु भक्तों को रूद्राक्ष नहीं पहनना चाहिए, भस्म त्रिपुण्ड़ नहीं लगाना चाहिए, शिवलिंग का पूजन नहीं करना चाहिए, शिवजी का प्रसाद नहीं खाना चाहिए इत्यादि। वसिष्ठ की पत्नी अरून्धती जिसके दर्शन आज भी आकाशमण्डल के सप्तर्षि मण्ड़ल में होते हैं। यह अरून्धती पूर्व जन्म में ब्रह्मा की पुत्री सन्ध्या थी। सन्ध्या नेे गुरू वसिष्ठ से ऊॅं नम: शंकराय ऊॅं मंत्र की दीक्षा लेकर चार युगों तक हिमालय की चन्द्रभागा नदी के तट पर प्रभु शिव के लिए तपस्या की। ऋषि अत्रि की पत्नी अनसूया ने, अपने पति अत्रि के साथ प्रभु शिव की पूजा करके ब्रह्मा-विष्णु-महेश के अंश से एक-एक पुत्र दुर्वासा, दत्तात्रेय और चन्द्रमा उत्पन्न किये। चंचुला ब्राह्मणी भ्रष्ट हो गई थी। उसने देहधारी गुरू से दीक्षा लेकर शिवोपासना से सद्गति प्राप्त की। सूर्यवंशी राजा दशरथ की पत्नियॉं कौशल्या - सुमित्रा - कैकई ने शिव-पूजन से ही श्री विष्णु के अंश से चार पुत्र राम-लक्ष्मण- भरत-शत्रुघ्न प्राप्त किए। भारद्वाज गोत्र में उत्पन्न सुधर्मा ब्राह्मण की पुत्री घुष्मा ने शिवलिंग का पूजनकर बिना तपस्या के ही प्रभु शिव का साक्षात्कार कर लिया और उसके नाम से द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रसिद्ध घुष्मेश्वर ज्योतिर्लिंग(एलोरा गुफा के समीप) विराजमान है।

हिमालय जो कि विष्णु का अंश है, उसके १०० पुत्र थे परन्तु वे सब से अधिक स्नेह अपनी पुत्री पार्वती से करते थे। राजा अनरण्य जिसने सफलतापूर्वक १०० यज्ञ किए थे। देवता उसे इन्द्रपद प्रदान कर रहे थे परन्तु उसने स्वीकार नहीं किया। उसके भी सौ पुत्र थे। राजा अनरण्य सौ पुत्रों से भी अधिक स्नेह अपनी पुत्री पद्मा से करते थे। कन्या संतान भी कुलतारक होती है।

शिव ने ली अर्जुन की परीक्षा

पांडवों को अपने 13 साल के वनवास के दौरान दर-दर भटकना पड़ा। पांडव हर हाल में कौरवों से अपने अपमान का बदला लेना चाहते थे। इसके लिए जरूरत थी शक्ति जुटाने की। फिर क्या था अर्जुन ने शिवजी की घोर तपस्या की और हासिल किया पाशुपास्त्र। वनवास काटते हुए पांडवों के चार साल इधर-उधर भटकते हुए निकल गए। पांचवा साल अर्जुन के लिए बड़ा ही अहम साबित हुआ। वो अपने भाइयों से अलग होकर उत्तराखंड की बर्फीली वादियों में शिवजी की तपस्या करने चले गए। मकसद था शिव से पाशुपास्त्र हासिल करना। बद्रीनाथ से आगे स्वर्गारोहिणी के रास्ते में चक्रतीर्थ नाम की जगह पड़ती है। कहते हैं वहां पर धनुर्धारी अर्जुन ने शिवजी से पाशुपास्त्र पाने के लिए तपस्या की थी। लेकिन अर्जुन को अपनी धनुर्विद्या पर काफी अहंकार था। सो शिवजी ने अर्जुन की परीक्षा लेने की ठानी।

अपने एक गण को शूकर यानी जंगली सूअर का रूप धारण कर अर्जुन की तपस्या भंग करने का आदेश दिया। तपस्या भंग होने पर अर्जुन ने गुस्से में गांडिव उठाया और सूअर पर तीर छोड़ दिया। अर्जुन सूअर के पास पहुंचे तो वहां सामने खड़ा था एक भील। मारा गया सूअर किसका शिकार है - ये फैसला करने के लिए भील और अर्जुन में घनघोर युद्ध हुआ।लड़ते-लड़ते अर्जुन बेहोश हो गए। होश आया तो सामने भील को मुस्कुराते हुए पाया। अर्जुन को लगा ये कोई साधारण इंसान नहीं हो सकता। शिवजी ने अपने असली रूप में अर्जुन को दर्शन दिए और बताया कि अर्जुन के अहंकार के नाश के लिए ही उन्होंने ये लीला रची। अर्जुन की तपस्या सफल हुई और उन्हें पाशुपास्त्र मिल गया। इसके बाद अर्जुन अपने भाइयों से आ मिले।