शनिवार, 8 अगस्त 2009

उत्तरांचल ( शिव पार्वती प्रतिमायें)

शिव :

हमें पुरतात्विक एवं ऐतिहासिक स्रोतों से यह भली भाँति ज्ञात हो चुका है कि समूचे भारत में शिवलिंगोपासना बहुत पुरातन है। शिव सृष्टि कर्ता आदि देव हैं। इसीलिए इन्हें महादेव कहा गया है। वे ही परमेश्वर हैं, वे ही रुद्र हैं तथा वे निर्विकार भी हैं। वे ही चराचर जगत की सृष्टि जगत करते हैं, अन्त में कुत्सित मनोवृतियों के बढ़ने पर उसका संहार कर डालते हैं तथा उन्हें के द्वारा पुन: सृष्टि का सृजन होता है।

शिव के इस सरल रुप को, उनके सृष्टि कर्ता स्वरुप को शक्ति प्रदान करती हैं-महादेवी। शिव-शक्ति के तात्विक मिलन को ही लिंग पुजन के माध्यम से ही व्यक्त किया गया है। लिंग वेदी महादेवी हैं, लिंग साक्षात महेश्वर हैं। सृष्टि को अपने में समाहित कर लेने से ही उनका नाम लिंग है। प्रलयकाल में सम्पूर्ण विश्व में लय हो जाएगा-लयं गच्छन्ति भूतानी संहारे निखिल यत:।

यहाँ दो प्रकार के लिंग प्राप्त हैं - पहला सादे लिंग जिन्हें निष्कल लिंग कहा जाता है और दूसरे वे जिन पर मुख सदृश आकृतियाँ बनी हों वे सकल लिंग कहे जाते हैं। सादे लिंगों को निष्कल स्थाणु भी कहा जाता है। कुमाऊँ मंडल के सभी शैव मंदिरों में निष्कल लिंगों की अभिकता है। नारायाण - काली, जोगेश्वर आदि स्थानों पर तो निष्कल लिंगों के समूह के समहू ही हैं। लिंग पुराम के मतानिसार सादे लिंगों की पूजा ही श्रेष्ठ है। यही पूजन शिव का वास्तविक पूजन है। इसी से शिव की कृपा प्राप्त होती है। इसलिए समूचे भारत में मुखलिंग की अपेक्षा निष्कल लिंग ही सर्वाधिक संख्या में पाये जाते हैं। विद्वान मुखलिंग को मिश्र लिंग की श्रेणी में भी रखते हैं क्योंकि यह दोनों प्रकार के लिंग में निष्कल और सकल (प्रतिमा) का सम्मिश्रण है।

कृति :

मुख की आकृति लिंगों कुमाऊँ मंडली में कम पाये जाते लिंगों में शिव लिंग - विग्रह और पुरुष - विग्रह का प्रतीक है। मध्य कुषाम काल में लिंग स्तम्भकार से कुछ छोटे आकार के बनाये गये तथा इन पर मुख अंकित किये गये। एक मुखी शिवलिंग को मूर्ति फलकों पर, प्राय: पीपल वृक्ष के नीचे बने चबूतरे पर, लिंग मुख सामने की ओर तथा पृष्ठ भाग वृक्ष के#े तने की ओर स्थापित किया गया है।

गुप्त काल से ही मुखलिंग का प्रचलन उत्तर भारत में मिलता है। इस काल में प्रतिमाओं के साथ ही लिंग पूजन हेतु मुखलिंगों का भी अर्चन व्यापक रुप से हुआ। उत्तर गुप्तकाल आते आते लिंग पर बनी प्रतिमा सर्पों से वेष्ठित करने की प्रक्रिया में सपंकुन्डल से अलंकृत तथा सर्पों से सज्जित करने का शिल्प में विधान किया गया। अभी तक मुख लिंगों की जो प्राचीनता सामने आयी है उससे प्रतीत होता है कि ई. पू. प्रथम शती का मुखलिंग गुउडिमल्लम आन्ध्र प्रदेश में है जबकि भीटा का पंचमुखी शिवलिंग प्राचीनतम है।

कुमाऊँ मंडल में भी अनेक एकमुखी, चतुर्मुखी तथा पंचायतन लिंग प्रकाश में आये हैं। इनमें जागेश्वर, नारायकाली, बाणेश्वर आदि ग्रामों से शिल्प की दृष्टि से महत्वपूर्ण लिंग प्रकाश में आये हैं। जागेश्वर के कादार मंदिर में स्थापित एकमुकी लिंग प्रतिमा विज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

नारयणकाली मंदिर समूह में एक लघु मंदिर में भी एक एकमुखी शिवलिंग स्थापित किया गया है। इसमें शिव मुख जटामिक कर्णकुंडल एवं एकावलि से साधारण किन्तु आकर्षक ढ़ंग से सजाया जाता है। इसके मस्तक पर तीसरा नेत्र विराजमान है।

महाभारत के आदिपर्व के अनुसार देवमंडली को देखने और उनकी प्रदक्षिणा करने वाली तिलोत्तमा का दर्शन करने के लिए शिव ने चारों दिशाओं में चार मुख प्रकट किये। शिव के ये रुप तत्पुरुष, सद्योजात वामदेव और अघोरुप हैं। पाँवा मुख ऊशान कहलाता है। नागों का मानना है कि ये चार मुख ब्रह्मा, विष्णु सीर्य और रुद्र के हैं। ईशाल मुख ब्रह्मांड का प्रतीक है।

प्राणी मात्र के अर्विभाव के लिए पृथ्वी, जल-अग्नि, वायु एवं आकाश का मुख्य योगदान माना जाता है। इन्हीं पंचभूतों को सद्योजात-पृथ्वी, वामदेव-जल, अघोर-अग्नि, तत्पुरुष-वायु तथा ईशान का आकाश के रुप में निरुपण किया गया है। इसी क्रम में नारायणकाली में पशुपतिनाथ मंदिर के सामने एक चतुर्मुखी शिवलिंग विराजमान है। यह शिवलिंग अत्यंत सुन्दर एवं कलात्मक है। अन्य परम्परागत शिवलिंगों के अनुरुप इस मुखलिंग में भी पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण दिशाओं में क्रमश: शिव के चार रुप दर्शनीय है। त्रिनेत्रधारी अघोरमुख, जटाजूट, सपंकुंडल, एकावलि से अलंकृत है। जटाजूट के मध्य मानवमुँड दर्शनीय है। अन्यमुख किरीट मुकुट, चक्रकुंडल एवं एकावली से युक्त है। लघु मंदिर के शिवलिंग पर निरुपित शिवमुख, जटा मुख, कर्णकुंडल एवं एकावली साधारण परन्तु आकर्षक ढ़ंग से सजाया गया है। मस्तक पर तीसरा नेत्र भी विराजमान है।

यहाँ से एक अन्य विलक्षण शिवलिंग की जानकारी प्राप्त होती है। यह लिंग दो भागों में विभाजित है। ऊपरी भाग तो सामान्य लिंग के अनुरुप है किन्तु निचले चौकोर भाग में चतुर्भुजी आसनस्थ गणेक का अंकन है। उनका दायाँ हाथ अभयमुद्रा में दर्शित है। अन्य हाथों में क्रमश: परशु, अंकुश: एवं मोदक मात्र सुशोभित है। लम्बोदर, एकदंत, सूपंकर्ण गणेश की सूँड वामावर्त है। लिंग के आदार पर गणेश को निर्मित किये जाने का उदाहरण अन्य जगहों से नहीं पाये जाते हैं।

गोमती नदी के तट पर बैजनाथ - बागेश्वर मार्ग पर बाणेश्वर ग्राम में कभी प्राचीन देवालयों का एक पूरा समूह अवस्थित रहा होगा जिसकी मूर्तियाँ पास के खेत से उठाकर एक नये देवालय में रख दी गयी है।

इस देवालय में एक विलक्षण पंचायतन शिवलिंग रखा हुआ है इसके पूजा भाग में द्विमुखी देवी, कार्तिकेय लकुलिश तथा शिव के घोर रुप को दर्शाया गया है।

द्विभुज देवी पद्मपीठ पर, प्रलम्ब मुद्रा में आसनस्थ है। इनके दोनों घुटनों पर योगप बंधा है। पारम्परिक आभूषणों कंठमाला, एक लड़ी का हार - एकावली तता पैरों में पायजेब से वे अलंकृत है। मणिमाला से उनका प्रभा मंडल आलोकित है। जबकि कार्तिकेय सुखासन में बैठे हुए हैं, जिनके वामहस्त में शक्ति तता दक्षिम हाथ में सनाल कमल शोभित है। वे जटामुख, वृत कुँडल, कंठहार, कंकण तता नुपूर आदि आभूषणों सं अलंकृत हैं। उनके बायें स्कन्ध पर कुंडल झूल रहा है। कुमार के दायें घुटने पर तीन धारियों से युक्त योगप बंधा हुआ है। लकुलीश योगासन में बैठे हैं। उनका उर्ध्वलिंग तथा बायें कंधे के सहारे दंड स्पष्ट दृष्टिगोचर है। ऊपर उठे वाम हस्त में अस्पष्ट वस्तु हैं। दायाँ हाथ खण्डित है। शीर्ष पर कुंचित केश तथा गले में मणियों की माला शोभायमान है। शिव के घोर रुप में ललितासन में बैठे देव के दायें घुटने पर अर्धयोगपट्ट है, इनके मुख के बाहर निकले दांत लम्बे हैं। विस्फारित नेत्र, मोटे होंठ के कारण उनकी मुखाकृति उग्र हो गची है। उठे घुटने पर अवस्थित दायें हाथ में खपंर तथा बायें हाथ में सम्भवत: दंड त्रिशूल रुपी आयुध धारण किये हैं।

कुमाऊँ क्षेत्र में पूजा

अर्चना का प्रचलन प्रारम्भ से ही हो रहा है। सादे लिंगों का पूजा आनादि काल से अर्वाचीन समय तक निरन्तर चला आ रहा है। एकमुखी, चतुरमुखी तता पंचायतन शिवलिंग के निर्माण में प्राचीन परम्परा का निर्वाह किया गया है। सादा जटामुकुट, त्रिनेत्र तथा त्रिवलय युक्त ग्रीवा सहित शिवमुख लगभग १० वीं शती तक बनते रहे। यहाँ यह भी उल्लेख करना उचित होगा कि शिव देवालयों में चतुर्मुख शिवलिंग अधिक संख्या में प्राप्त होते हैं। गुप्त काल में यद्यपि प्रतिमा पूजना का बाहुल्य था तो भी मुखलिंगों की लोकप्रियता कम नहीं हुई। अन्तर केवल इतना आया कि इनका लम्बाई कम और मोटाई अधिक हो गयी। कुषाणकाल वाला शिवत्रिनेत्र क्षैतिज के स्थान पर उर्ध्व हो गया। शिव के केश सज्जायें भी इसी समय बनायी गयीं। उत्तर गुप्त काल में सपं से सम्बन्धित कर जाने के कारण सपं कुँडल, सर्पाहार तथा लिंग पर सपं बनाये जाने लगे।

यहाँ शिव की अनेक प्रतिमायें प्राप्त होती हैं। यह प्राय: मंदिरों की शुकनास के अग्रभाग में, स्वतन्त्र, परिकर खंडों में अथवा समूचे परिवार के साथ दृष्टिगोचर होती है। विशाल शिव प्रतिमाओं की संख्या कम है। पाँचवी शती के पश्चात शिव प्रतिमाओं का व्यापक निर्देशन हुआ है।

सभी शैव केन्द्रों में शिवत्रिमुख का प्रचलन प्रमुखता से मिलता है। मंदिर की शुकनास पर शिव के इस रुप को सर्वाधिक स्थान मिला। इसके पश्चात वे मंदिर के शिखर पर स्थापित किये गये। जोगेश्वर के मृत्युंजय मंदिर की शुकनास पर शिव त्रिमुख का आकर्षण अंकन किया गया है। इन्हें शिव के रुद्र रुप से पहचान की गयी है।

नटराज शिव का अंकन यहाँ बहुत कम देखने को मिलता है। जोगेश्वर तथा कपिलेश्वर मंदिरों की शुकनास पर नटराज शिव का अंकन हुआ है। अकेले कपिलेश्वर महादेव मंदिर समूह से ही नटराज शिव की तीन प्रतिमायें प्रकाश में आ चुकी हैं। चम्पावत से भी नटराज शिव प्राप्त हुए हैं। वैसे भी शिव ही नृत्य के प्रवर्तक हैं। शिव की नटराज मुद्राओं में भारतीय काल को आद्योपांत प्रभावित किया है।

लकुलीश की प्रतिमायें यहाँ प्रचुर मात्रा में देखने को मिलता है। कत्यूरी शासक आचार्य लकुलीश के माहेश्वर सम्प्रदाय में ही दीक्षित थे। इसलिए कत्यूरी शासकों के समय लकुलीश सम्प्रदाय अत्याधिक फला-फूला। लकुलीश को शिव का अट्ठाइसवां अवतार माना जाता है। उर्ध्व लिंग, एक हाथ में लकुट (डंडा) लिये देवता का अंकन मंदिरों की शुकनास पर, रथिकाओं में अथवा स्वतंत्र रुप से किया जाता रहा। पाताल भुवनेश्वर, जोगेश्वर कपिलेश्वर से लकुलीश की प्रतिमायें मिलती हैं।

कुमाऊँ मंडल से व्याख्यान दक्षिणामूर्ति, त्रिपुरान्तक मूर्ति, भैरव आदि भी पर्याप्त संख्या में मिले हैं। लेकिन उमा-महेश की प्रतिमा सर्वाधिक संख्या में मिलती है। इन प्रतिमाओं में शिव अपना वामांगी पार्वती के साथ प्रदर्शित किये जाते हैं; शिव का बायाँ हाथ देवी के स्कन्ध या कार्ट परखा रहता है। देवा का दाहिना हाथ भी शिव के स्कन्ध पर होता है। पद्म प्रभा मंडल शोभित रहता है।

यहाँ शिव की जंघा पर आसनस्य उमा को आलिंगनबद्ध दर्शाया गया है। शिव परम्परागत अलंकरण जटाजूट से सज्जित, ग्रैवेयक (गले का चपटा कंठा), कंठ में पड़े हार, बाजू-बंध तथा कुण्डलों से सुशोभित होते हैं। नारायण काली, पावनेश्वर, नकुलेश्वर आदि अनेक स्थानों से उमा महेश की प्रतिमायें मिलती हैं।

शिव परिवार में गणेश के बाद लोकप्रियता की दृष्टि से कुमार कार्तिकेय का निर्देसन हुआ है। शिव पुत्र कुमार स्कन्द ही कार्तिकेय नाम से जाने गये। भविष्य पुराण के अनुसार देवासुर संग्राम में सूर्य की रक्षार्थ उन्हें सूर्य के निचले पा में स्थापित किया गया। वरद अथवा अभय मुद्राओं वाले कुमार को शक्ति, खड्ग, शूल, तीर, ढाल सहित दो अथवा अधिक हाथों सहित निर्देशित किया जाने की परम्परा है।

कुमाऊँ क्षेत्र में मयूरारुढ़़, शूलधारी कुमार की स्वतन्त्र प्रतिमायें प्रकाश में आ चुकी है। उनके नाम से स्वतंत्र मंदिर भी अस्तित्व में है। स्वतन्त्र प्रतिमायें नौदेवल (अल्मोड़ा), नारायणकाली आदि से प्रकाश में आयी है। जबकि उमा-महेश के साथ भी उनकी प्रतिमायें अधिक संख्या में प्राप्त होती है। बैजनाथ से उनकी चतुर्मुखी प्रतिमा मिलती है।

कुमाऊँ मंडल से रावणानुग्रह प्रतिमायें भी प्राप्त होती हैं। गरुड़ के एक मंदिर के शुकनास पर यह दृश्य उकेरा गया है। कथा है कि एक बार मदान्ध रावण अपने बाहुबल से समूचा कैलाश ही उठाकर ले चलने को तत्पर हुआ। परन्तु कैलाश पर विराजमान शिव ने अपने पैर के अंगूठे से कैलाश को तनिक सा दबाया तो व नीचे से निकल न सका। लाचार रावण ने हजारों वर्ष तक शिव कि स्तुति कर मुक्ती पायी। शिल्प में इस कथा को बहुत लोकप्रियता मिली। परवर्ती काल में मंदिरों की शुकनास पर इस कथा का अंकन बहुत विचित्र ढ़ंग से दर्शाया गया है।

पूर्व मध्यकाल में वीणाधारी शिव का पर्याप्त प्रचलन हुआ। किन्तु इसकाल में भी सर्वाधिक प्रतिमायें उमा-महेश की प्राप्त होती है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि सत्यम-शिवम-सुन्दरम का सम्पूर्ण सार कलाकार द्वारा इन्हीं प्रतिमाओं में संजोकर रख दिया गया। द्विभुजी एवं अलंकरणों से युक्त शिव एवं उमा की प्रतिमा, नदी की नंगी पीठ पर आलिंगनबद्ध मुद्रा में आसनस्थ प्रतिमायें, अपनी विकास की गति को स्वयं अभिव्यक्त करती हैं। मध्यकाल में प्रतिमा कला के ह्रास के साथ चेहरे पर भावों के अंकन में कमी तथा कामोत्तेजना के भावों में वृद्धि अधिक प्रतीत होती है। पूर्व में शिव का पार्वती के कन्धों पर रखा हाथ इस काल में उनके वक्ष पर पहुँच गया। गढ़ने में भी बारीकी के स्थान पर स्थूलता आती चली गयी। इस काल में आभूषणों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि देखने को मिलती है।


पार्वती :

पार्वती की प्रतिमायें देवी प्रतिमाओं मे सबसे अधिक प्राप्त होती हैं। बाल्यवस्था में इनका नाम गौरी था। जब ये विवाह योग्य हुई तो इन्होंने शिव को पति के रुप में पाने के लिए घोर तपस्या की। तपस्यारत देवी पार्वती कहलाने लगी। प्रतिमाओं के तीनों रुपों में उक्त देवी का अँकन प्राप्त होता है। मार्कण्डेय पुराण में देवी महात्म्य के अनुसार गौरी की प्रतिमा द्विभुजी अथवा चतुर्भुजी होनी चाहिए। द्विहस्ता देवी का दायाँ हाथ अभय मुद्रा में तथा दायें हाथ में जलपात्र (कमण्डल) बनाने का विधान है। चतुर्भुजी गौरी के हाथों में अक्षमाला, पद्म तथा कमण्डल के साथ दक्षिण अधोहस्त अभय मुद्रा में होनी चाहिए। पार्वती के बायें हाथों में अक्षमाला, कमण्डलू एवं दायें हाथ अभय तता वरद मुद्रा में होने चाहिए। सुन्दर केश विन्यास, वस्र, सर्वालमकारों से भूषित शिव के साथ द्विभुजी तथा सेवतन्त्र रुप में चतुर्भुजी उमा की प्रतिमायें प्राप्त होती हैं। उनके हाथों में प्राय: अक्षमाला, दपंण, पद्म तथा जलपत्र होता है।

बांसुलीसेरा से देवी पार्वती की मूर्ति मिली है। प्रतिमा विज्ञान के मानदण्डों के अनुसार यह गौरी की प्रतिमा है। द्विभुजी देवी की मूर्ति हरे रंग के प्रस्तर में बनाई गयी है। पुष्पकुण्डल, कण्ठहार, स्तनसूत्र, केयूर, कंकम, आपादवृत साड़ी, नुपूर आदि आभूषणों से अलंकृत देवी के अभय मुद्रा में उठे दायें हस्त में अक्षमाला शोभित है। बायें हाथ में जलपत्र (कमण्डलू) धारण किये हुए हैं। शीर्ष पर जटामुकुट से निकली अलकावलि दोनों कन्धों को स्पर्श कर रही हैं। साड़ी पर अतिसुन्दर बेलबूटे, बने हुये हैं जो देवी के कमर में कटिसूत्र से आवेष्ठित हैं। बेलबूटेदार उत्रीय कन्धों को आवृत करता हुआ दोनों बाहों पर लहरा रहा है। गौरी के दोनों पाश्वों में एक-एक कदली वृक्ष निरुपित किया गया है।

मध्यकाल में पार्वती की अनेक स्वतन्त्रप्रतिमायें मिली हैं। जिनमें जटामुकुट, सर्वालंकारों से अलंकृत देवी की पीठीका पर गोधिका अंकित है। पार्वती की उक्त प्रतिमायें लगभग ८वीं शती ई. तक प्रचुर मात्रा में निर्मित हुई हैं। इनमें अल्मोड़ा जिलान्तर्गत बैजनाथ, चमोली जिलान्तर्गत लाखामण्डल में रखी पार्वती की प्रतिमायें कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। गढ़वाल एवं कुमाऊँ में बजिंगा, देवाल, तुंगनाथ, पलेठी, नारायणकाली तथा नैनीताल जिलान्तर्गत ग्राम त्यूड़ा दियारी में रखी लगभग ९वीं शती ई. की द्विभुजी पार्वती विशे, उल्लेखनीय है।

सदाशिव मंदिर ग्राम रौलमेल में देवी पार्वती की अत्यन्त सुन्दर प्रतिमा मिली है। ग्राम रौलमेल लोहाघाट - देवीधुरा मार्ग पर बसा है। चतुर्भुजी पार्वती को समपाद मुद्रा में स्थानक खड़ा दर्शाया गया है। देवी के वाम अधोहस्त में अग्निपात्र तथा दक्षिण अधोहस्त वरद मुद्रा में दर्शाया गया है। उनके दक्षिण उर्ध्व हस्त मे दपंण है। पाश्वों में दो-दो परिचरिकाओं सहित व्याल भी अंकित किया गया है। ऊपरी भाग में मालाधार अंकित हैं। पैरों तक धोती से आवृत देवी जटा मुकुट, सर्वालंकारों से भूषित हैं। देवी वाहन रुप में गोधिका अंकित है।

चैकुनी गाँव में शिव मंदिर के नाम से स्थापित देवालय में पार्वती की एक सुन्दर प्रतिमा है। देवी दायाँ हाथ वरद मुद्रा में उनके दायें घुटने पर आधारित है। ललितानस्थ देवी के अधो वाम हस्त में कमण्डलु, अधो दक्षिण हस्त वरद मुद्रा तथा दोनों ऊपरी हाथों में अग्निपात्र है। शीर्ष जटामुकुट से अलंकृत है। कानों में पुष्प कुण्डल, गले में मोतियों का हार, कंठहार, वक्ष पर दो लड़ियों का हार, कमर में मेखला, घुटनों से ऊपर मोतियों की मालाओं से अलंकृत है। उनकी दायीं पैर की ओर उनका वाहन सिंह तथा बायीं ओर मृग स्थापित किया गया है।

कत्यूर घाटी के ग्राम शाली - छतिया से भी पार्वती की पूर्व मध्य कालीन एक प्रतिमा प्रकाश में आया है जिसके बायें ओर मृग तथा दायीं ओर सिंह बैठा है।

बैजनाथ से प्राप्त मध्यकालीन पार्वती प्रतिमा सर्वाधिक सुन्दर है। इस प्रतिमा में चतुर्भुजी देवी को स्थानक समपाद मुद्रा में दिखाया गया है। उनका दायाँ अधो हाथ वरद मुद्रा, बायाँ अधो हस्त जलपात्र, दाहिना उर्ध्व हस्त शिव व अक्षमाला से सुशोभित है। वाम उर्ध्व हस्त में गणेश हैं। जटामुकुट से देवी सुशोभित हैं। स्तनसूत्र, हार, एकावली, मेखला, बाजूबन्ध से मंडित देवी पद्म पीठ पर खड़ी है। उनके पैर धोती से आवप्त तथा घुटनों तक आभूषण दर्शाये गये हैं। अधो पाश्वों में दो-दो उपासिकायें हैं प्रतिमा का परिकर भी अलंकृत है। ऊपरी पार्श्व में गणेश का भी अंकन हुआ है।

पार्वती प्रतिमा निर्माण की परम्परा प्राचीन काल से लगभग १५वी. शती तक अत्यधिक वल्लवित हुई। पूर्व काल में नाभी छन्दक उनका प्रिय एवं प्रमुख आभूषण रहा जबकि उत्तर मध्य काल की प्रतिमाओं से युक्त आभूषण अधिक प्रचलित हुए।

बुधवार, 29 जुलाई 2009

सृष्टि और संहार के अधिपति भगवान शिव

सृष्टि और संहार के अधिपति भगवान शिव भगवान शिव सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से शिव को भिन्न माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदिस्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं।

प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि कहलाती है, लेकिन फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि कही गई है। इस दिन शिवोपासना भुक्ति एवं मुक्ति दोनों देने वाली मानी गई है, क्योंकि इसी दिन अर्धरात्रि के समय भगवान शिव लिंगरूप में प्रकट हुए थे।

माघकृष्ण चतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि ।
शिवलिंगतयोद्रूत: कोटिसूर्यसमप्रभ: ।।

भगवान शिव अर्धरात्रि में शिवलिंग रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए शिवरात्रि व्रत में अर्धरात्रि में रहने वाली चतुर्दशी ग्रहण करनी चाहिए। कुछ विद्वान प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी विद्धा चतुर्दशी शिवरात्रि व्रत में ग्रहण करते हैं। नारद संहिता में आया है कि जिस तिथि को अर्धरात्रि में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी हो, उस दिन शिवरात्रि करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जिस दिन प्रदोष व अर्धरात्रि में चतुर्दशी हो, वह अति पुण्यदायिनी कही गई है। इस बार 6 मार्च को शिवरात्रि प्रदोष व अर्धरात्रि दोनों में विद्यमान रहेगी।

ईशान संहिता के अनुसार इस दिन ज्योतिर्लिग का प्रादुर्भाव हुआ, जिससे शक्तिस्वरूपा पार्वती ने मानवी सृष्टि का मार्ग प्रशस्त किया। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि मनाने के पीछे कारण है कि इस दिन क्षीण चंद्रमा के माध्यम से पृथ्वी पर अलौकिक लयात्मक शक्तियां आती हैं, जो जीवनीशक्ति में वृद्धि करती हैं। यद्यपि चतुर्दशी का चंद्रमा क्षीण रहता है, लेकिन शिवस्वरूप महामृत्युंजय दिव्यपुंज महाकाल आसुरी शक्तियों का नाश कर देते हैं। मारक या अनिष्ट की आशंका में महामृत्युंजय शिव की आराधना ग्रहयोगों के आधार पर बताई जाती है। बारह राशियां, बारह ज्योतिर्लिगोंे की आराधना या दर्शन मात्र से सकारात्मक फलदायिनी हो जाती है।

यह काल वसंत ऋतु के वैभव के प्रकाशन का काल है। ऋतु परिवर्तन के साथ मन भी उल्लास व उमंगों से भरा होता है। यही काल कामदेव के विकास का है और कामजनित भावनाओं पर अंकुश भगवद् आराधना से ही संभव हो सकता है। भगवान शिव तो स्वयं काम निहंता हैं, अत: इस समय उनकी आराधना ही सर्वश्रेष्ठ है।

शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। वे अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। वे स्वयं द्वंद्वों से रहित सह-अस्तित्व के महान विचार का परिचायक हैं। ऐसे महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है शिवरात्रि।

शिवरात्रि व्रत की पारणा चतुर्दशी में ही करनी चाहिए। जो चतुर्दशी में पारणा करता है, वह समस्त तीर्थो के स्नान का फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य शिवरात्रि का उपवास नहीं करता, वह जन्म-मरण के चक्र में घूमता रहता है। शिवरात्रि का व्रत करने वाले इस लोक के समस्त भोगों को भोगकर अंत में शिवलोक में जाते हैं।

शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहर में करनी चाहिए। शिव को बिल्वपत्र, धतूरे के पुष्प अति प्रिय हैं। अत: पूजन में इनका उपयोग करें। जो इस व्रत को हमेशा करने में असमर्थ है, उन्हें इसे बारह या चौबीस वर्ष करना चाहिए। शिव का त्रिशूल और डमरू की ध्वनि मंगल, गुरु से संबद्ध हैं। चंद्रमा उनके मस्तक पर विराजमान होकर अपनी कांति से अनंताकाश में जटाधारी महामृत्युंजय को प्रसन्न रखता है तो बुधादि ग्रह समभाव में सहायक बनते हैं। सप्तम भाव का कारक शुक्र शिव शक्ति के सम्मिलित प्रयास से प्रजा एवं जीव सृष्टि का कारण बनता है। महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है।

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

पार्वती तुकेश्वर महादेव मंदिर

Parvati Mahadev temple
देवाधिदेव महादेव को सबसे ज्यादा प्रिय पार्वतीजी के मंदिरों की संख्या देशभर में नहीं के बराबर है, मगर इंदौर में केशरबाग रोड पर एक अत्यंत प्राचीन मंदिर है। इसका नाम केशरबाग शिव मंदिर उत्कीर्ण है, परंतु इस स्थान का वास्तविक नाम पार्वती तुकेश्वर महादेव मंदिर है। इस मंदिर के बारे में शहर में बहुत कम लोगों को जानकारी है।

इसकी सबसे बड़ी खासियत है माँ पार्वती की बेहद सुंदर प्रतिमा, जिसके एक हाथ में कलश है और गोद में स्तनपान कर रहे बाल गणेशजी हैं जबकि ठीक सामने शिवजी लिंगस्वरूप में विद्यमान है। इस मंदिर की स्थापना कब हुई, इसका कोई प्रामाणिक इतिहास उपलब्ध नहीं है, लेकिन वहाँ पर लगे पट्ट की मानें तो करीब 400 वर्ष पहले इसका निर्माण हुआ था। बाद में लोकमाता देवी अहिल्याबाई ने इसका जीर्णोद्धार भी करवाया।

ऐतिहासिक साक्ष्य के मुताबिक 1810 से 1840 के बीच होलकर वंश की केशरबाई ने इसका निर्माण करवाया। यह मंदिर पूर्वमुखी है। पहले इसका बाहरी प्रवेशद्वार भी पूर्वमुखी ही था, जो अब सड़क निर्माण की वजह से पश्चिम मुखी हो गया है। मंदिर की ऊँचाई 75 फुट और चौड़ाई करीब 30 फुट है। पूरा मंदिर मराठा, राजपूत और आंशिक रूप से मुगल शैली में बनकर तैयार हुआ है। इसकी एक और सबसे बड़ी खासियत माँ पार्वती की अत्यंत सुंदर प्रतिमा है, जो करीब दो फुट ऊँची है। प्रतिमा वास्तव में इतनी सुंदर है, जैसे लगता है कि अभी बोल पड़ेगी।

श्वेत संगमरमर से बनी इस प्रतिमा का भाव यह है कि इसमें पुत्र व पति की सेवा का एक साथ ध्यान रखा जा रहा है। मंदिर के ही ठीक सामने कमलाकार प्राचीन फव्वारा भी है। वर्तमान में मंदिर का कुल क्षेत्रफल 150 गुणा 100 वर्गफुट ही रह गया है। हर वर्ष श्रावण मास में विद्वान पंडितों के सान्निध्य में अभिषेक, श्रृंगार, पूजा-अर्चना आदि अनुष्ठान कराए जाते हैं।

मंदिर का गर्भगृह काफी अंदर होने के बावजूद सूर्यनारायण की पहली किरण माँ पार्वती की प्रतिमा पर ही पड़ती है। मंदिर की सुंदरता में चार चाँद लगाता है यहाँ का पीपल वृक्ष। समीप ही प्राचीन बावड़ी भी है जिसे सूखते हुए आज तक किसी ने नहीं देखा। भीषण गर्मी के मौसम में भी यह लबालब रहती है।

पार्वती मंदिर से ही लगे हुए दो और मंदिर भी हैं। एक है राम मंदिर और दूसरा है हनुमान मंदिर। प्राचीन राम मंदिर से ही एक सुरंग भूगर्भ से ही दोनों मंदिरों को जोड़ती है। यह बावड़ी के अंदर भी खुलती है। बताते हैं कि किसी समय यह सुरंग लालबाग मंदिर तक जाती थी। राम मंदिर के ठीक नीचे एक तहखाना भी है। मौजूदा समय में यह स्थल देवी अहिल्याबाई होलकर खासगी ट्रस्ट में शामिल है।

होलकर शासकों द्वारा प्रसिद्ध मराठी संत नाना महाराज तराणेकर को यहाँ का परंपरागत पुजारी नियुक्ति पत्र दिया गया था। इस आशय की सनद भी उन्हें प्रदान की गई थी, तभी से उनका परिवार यहाँ सेवारत है। मंदिर के पुजारी बाड़ा महाराज (विजय कामले) हैं।

विश्व के कल्याण की कामना है कांवड़ यात्रा में


हिंदू कैलिंडर का पांचवां महीना सावन मुख्य रूप से तप और ध्यान पर केंद्रित है। सूर्य के उत्तरायण में होने पर यज्ञ, अनुष्ठान और देवपूजा करने का विधान है, तो दक्षियाणन में तप एवं साधना पर जोर दिया गया है। सावन में शिवभक्त हलाहल पान करने वाले शिव का ताप मिटाने के लिए कांवड़ से गंगा जल लाकर अपने अभीष्ट शिवधाम में जलाभिषेक करते हैं।

विषपान की घटना सावन महीने में हुई थी, तभी से यह क्रम अनवरत चलता आ रहा है। कांवड़ यात्रा को आप पदयात्रा को बढ़ावा देने के प्रतीक रूप में मान सकते हैं। पैदल यात्रा से शरीर के वायु तत्व का शमन होता है। कांवड़ यात्रा के माध्यम से व्यक्ति अपने संकल्प बल में प्रखरता लाता है। वैसे साल के सभी सोमवार शिव उपासना के माने गए हैं, लेकिन सावन में चार सोमवार, श्रावण नक्षत्र और शिव विवाह की तिथि पड़ने के कारण शिव उपासना का माहात्म्य बढ़ जाता है।

'शिव' परमात्मा के कल्याणकारी स्वरूप का नाम है। जो मार्ग नियम, व्यवहार, आचरण और विचार हमें तुच्छता से शीर्ष की ओर ले जाए, वही कल्याणकारी है। शिव लिंग को अंतर्ज्योति का प्रतीक माना गया है। यह ध्यान की अंतिम अवस्था का प्रतीक है, क्योंकि सृष्टि के संहारक शिव भय, अज्ञान, काम, क्रोध, मद और लोभ जैसी बुराइयों का भी अंत करते हैं।

शिव कर्पूर गौर अर्थात सत्वगुण के प्रतीक हैं। वे दिगंबर अर्थात माया के आवरण से पूरी तरह मुक्त हैं। उनकी जटाएं वेदों की ऋचाएं हैं। शिव त्रिनेत्रधारी हैं अर्थात भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों के ज्ञाता हैं। बाघंबर उनका आसन है और वे गज चर्म का उत्तरीय धारण करते हैं। हमारी संस्कृति में बाघ क्रूरता और संकटों का प्रतीक है, जबकि हाथी मंगलकारी माना गया है। शिव के इस स्वरूप का अर्थ यह है कि वे दूषित विचारों को दबाकर अपने भक्तों को मंगल प्रदान करते हैं।

शिव का त्रिशूल उनके भक्तों को त्रिताप से मुक्ति दिलाता है। उनके सांपों की माला धारण करने का अर्थ है कि यह संपूर्ण कालचक्र कुंडली मार कर उन्हीं के आश्रित रहता है। चिता की राख के लेपन का आशय दुनिया से वैराग्य का संदेश देना है। भगवान शिव के विष पान का अर्थ है कि वे अपनी शरण में आए हुए जनों के संपूर्ण दुखों को पी जाते हैं। शिव की सवारी नंदी यानी बैल है। यहां बैल धर्म और पुरुषार्थ का प्रतीक है।

भगवान शिव कल्याण के देव हैं और कल्याण की संस्कृति ही वास्तव में शिव की संस्कृति है। सावन का महीना, पार्वती जी का भी महीना है। शिव परमपिता परमेश्वर हैं तो मां पार्वती जगदंबा और शक्ति। सदाशिव और मां पार्वती प्रकृति के आधार हैं। चतुर्मास में जब भगवान विष्णु शयन के लिए चले जाते हैं, तब शिव रुद नहीं, वरन भोले बाबा बनकर आते हैं।

सावन में धरती पर पाताल लोक के प्राणियों का विचरण होने लगता है। वर्षायोग से राहत भी मिलती है और परेशानी भी। चतुर्मास की शुरुआत में वर्षा के कारण रास्ते आने-जाने लायक नहीं रह जाते। सावन आते-आते वर्षा की गति मंथर हो जाती है। इस काल में पैदल यात्राओं का दौर धीरे-धीरे शुरू हो जाता है।

कांवडि़यों के रूप में यह प्रार्थना सामूहिक उत्सव के रूप में देखने को मिलती है। कांवड़ यात्रा धर्म और अर्पण का प्रतीक है। सावन में काम का आवेग बढ़ता है। शंकर जी इस आवेग का शमन करते हैं। कामदेव को भस्म करने का प्रसंग भी सावन का ही है। और शिव का विवाह भी श्रावण मास की शिवरात्रि को ही संपन्न हुआ। शिव चरित में उल्लेख है कि सृष्टि चक्र की मर्यादा, परंपरा और नियमोपनियम बने रहें, इसलिए तारकासुर को मारने के लिए शिव ने विवाह किया। तभी से सावन में विवाह परंपरा का भी जन्म हुआ था। इस नाते सावन लोकोत्पत्ति का उत्सव है।

कांवडि़यों के रूप में समाज के हर वर्ग के लोग उमंग और आस्था के साथ शिव जी के इस विवाह में शामिल होने जाते हैं। कुछ वर्षों से कांवड़ यात्रा के दौरान अप्रिय घटनाएं हुई हैं और मार्ग में असामाजिक तत्व उत्पात और हंगामे की स्थिति पैदा कर देते हैं। अगर साधक भगवान शिव के समान कल्याण की कामना ले कर चलें तभी कांवड़ यात्रा का उद्देश्य सार्थक होगा।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

गंगावतरण श्रावण मास भगवान भोले शंकर का प्रिय महीना

युधिष्ठिर ने लोमश ऋषि से पूछा, "हे मुनिवर! राजा भगीरथ गंगा को किस प्रकार पृथ्वी पर ले आये? कृपया इस प्रसंग को भी सुनायें।" लोमश ऋषि ने कहा, "धर्मराज! इक्ष्वाकु वंश में सगर नामक एक बहुत ही प्रतापी राजा हुये। उनके वैदर्भी और शैव्या नामक दो रानियाँ थीं। राजा सगर ने कैलाश पर्वत पर दोनों रानियों के साथ जाकर शंकर भगवान की घोर आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उनसे कहा कि हे राजन्! तुमने पुत्र प्राप्ति की कामना से मेरी आराधना की है। अतएव मैं वरदान देता हूँ कि तुम्हारी एक रानी के साठ हजार पुत्र होंगे किन्तु दूसरी रानी से तुम्हारा वंश चलाने वाला एक ही सन्तान होगा। इतना कहकर शंकर भगवान अन्तर्ध्यान हो गये।
"समय बीतने पर शैव्या ने असमंज नामक एक अत्यन्त रूपवान पुत्र को जन्म दिया और वैदर्भी के गर्भ से एक तुम्बी उत्पन्न हुई जिसे फोड़ने पर साठ हजार पुत्र निकले। कालचक्र बीतता गया और असमंज का अंशुमान नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। असमंज अत्यन्त दुष्ट प्रकृति का था इसलिये राजा सगर ने उसे अपने देश से निष्कासित कर दिया। फिर एक बार राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ करने की दीक्षा ली। अश्वमेघ यज्ञ का श्यामकर्ण घोड़ा छोड़ दिया गया और उसके पीछे-पीछे राजा सगर के साठ हजार पुत्र अपनी विशाल सेना के साथ चलने लगे। सगर के इस अश्वमेघ यज्ञ से भयभीत होकर देवराज इन्द्र ने अवसर पाकर उस घोड़े को चुरा लिया और उसे ले जाकर कपिल मुनि के आश्रम में बाँध दिया। उस समय कपिल मुनि ध्यान में लीन थे अतः उन्हें इस बात का पता ही न चला। इधर सगर के साठ हजार पुत्रों ने घोड़े को पृथ्वी के हरेक स्थान पर ढूँढा किन्तु उसका पता न लग सका। वे घोड़े को खोजते हुये पृथ्वी को खोद कर पाताल लोक तक पहुँच गये जहाँ अपने आश्रम में कपिल मुनि तपस्या कर रहे थे और वहीं पर वह घोड़ा बँधा हुआ था। सगर के पुत्रों ने यह समझ कर कि घोड़े को कपिल मुनि ही चुरा लाये हैं, कपिल मुनि को कटुवचन सुनाना आरम्भ कर दिया।
अपने निरादर से कुपित होकर कपिल मुनि ने राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को अपने क्रोधाग्नि से भस्म कर दिया।
"जब सगर को नारद मुनि के द्वारा अपने साठ हजार पुत्रों के भस्म हो जाने का समाचार मिला तो वे अपने पौत्र अंशुमान को बुलाकर बोले कि बेटा! तुम्हारे साठ हजार दादाओं को मेरे कारण कपिल मुनि की क्रोधाग्नि में भस्म हो जाना पड़ा। अब तुम कपिल मुनि के आश्रम में जाकर उनसे क्षमाप्रार्थना करके उस घोड़े को ले आओ। अंशुमान अपने दादाओं के बनाये हुये रास्ते से चलकर कपिल मुनि के आश्रम में जा पहुँचे। वहाँ पहुँच कर उन्होंने अपनी प्रार्थना एवं मृदु व्यवहार से कपिल मुनि को प्रसन्न कर लिया। कपिल मुनि ने प्रसन्न होकर उन्हें वर माँगने के लिये कहा। अंशुमान बोले कि मुने! कृपा करके हमारा अश्व लौटा दें और हमारे दादाओं के उद्धार का कोई उपाय बतायें। कपिल मुनि ने घोड़ा लौटाते हुये कहा कि वत्स! जब तुम्हारे दादाओं का उद्धार केवल गंगा के जल से तर्पण करने पर ही हो सकता है।
"अंशुमान ने यज्ञ का अश्व लाकर सगर का अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण करा दिया। यज्ञ पूर्ण होने पर राजा सगर अंशुमान को राज्य सौंप कर गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने के उद्देश्य से तपस्या करने के लिये उत्तराखंड चले गये इस प्रकार तपस्या करते-करते उनका स्वर्गवास हो गया। अंशुमान के पुत्र का नाम दिलीप था। दिलीप के बड़े होने पर अंशुमान भी दिलीप को राज्य सौंप कर गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने के उद्देश्य से तपस्या करने के लिये उत्तराखंड चले गये किन्तु वे भी गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने में सफल न हो सके। दिलीप के पुत्र का नाम भगीरथ था। भगीरथ के बड़े होने पर दिलीप ने भी अपने पूर्वजों का अनुगमन किया किन्तु गंगा को लाने में उन्हें भी असफलता ही हाथ आई।
"अन्ततः भगीरथ की तपस्या से गंगा प्रसन्न हुईं और उनसे वरदान माँगने के लिया कहा। भगीरथ ने हाथ जोड़कर कहा कि माता! मेरे साठ हजार पुरखों के उद्धार हेतु आप पृथ्वी पर अवतरित होने की कृपा करें। इस पर गंगा ने कहा वत्स! मैं तुम्हारी बात मानकर पृथ्वी पर अवश्य आउँगी, किन्तु मेरे वेग को शंकर भगवान के अतिरिक्त और कोई सहन नहीं कर सकता। इसलिये तुम पहले शंकर भगवान को प्रसन्न करो। यह सुन कर भगीरथ ने शंकर भगवान की घोर तपस्या की और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी हिमालय के शिखर पर गंगा के वेग को रोकने के लिये खड़े हो गये। गंगा जी स्वर्ग से सीधे शिव जी की जटाओं पर जा गिरीं। इसके बाद भगीरथ गंगा जी को अपने पीछे-पीछे अपने पूर्वजों के अस्थियों तक ले आये जिससे उनका उद्धार हो गया। भगीरथ के पूर्वजों का उद्धार करके गंगा जी सागर में जा गिरीं और अगस्त्य मुनि द्वारा सोखे हुये समुद्र में फिर से जल भर गया।"

श्रावण मास भगवान भोले शंकर का प्रिय महीना

श्रावण मास भगवान शंकर को विशेष प्रिय है। अत: इस मास में आशुतोष भगवान शंकर की पूजा का विशेष महत्व है। सोमवार शंकर का प्रिय दिन है। इसलिए श्रावण सोमवार का और भी विशेष महत्व है।

गौरतलब हो कि भगवान शंकर का यह व्रत सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है। इस मास में लघुरूद्र महारूद्ध अथवा अतिरूद्र पाठ करके प्रत्येक सोमवार को शिवजी का व्रत किया जाता है। प्रात: काल गंगा या किसी पवित्र नदी सरोवर या घर पर ही विधि पूर्वक स्नान करने का विधान है। इसके बाद शिव मंदिर जाकर या घर में पार्थिव मूर्ति बना कर यथा विधि से रूद्राभिषेक करना अत्यंत ही फलदायी है। इस व्रत में श्रावण महात्म्य और विष्णु पुराण कथा सुनने का विशेष महत्व है।

विदित हो कि कैलाश के उत्तर में निषध पर्वत के शिखर पर स्वयं प्रभा नामक एक विशाल पुरी थी जिसमें धन वाहन नामक एक गनविराज रहते थे। समयानुसार उन्हे आठ पुत्र और अंत में एक कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम गंधर्व सेना था। वह अत्यन्त रूपवती थी और उसे अपने रूप का बहुत अभिमान था। वह कहा करती थी कि संसार में कोई गंधर्व या देवती मेरे रूप के करोड़वे अंश के समान भी नहीं है। एक दिन एक आकाशचरीगण नायक ने उसकी बात सुनी तो उसे शाप दे दिया 'तुम रूप के अभिमान' में गंधर्वो और देवताओं का अपमान करती हो अत: तुम्हारे शरीर में केाढ़ हो जायेगा। शाप सुन कर कन्या भयभीत हो गयी और दया की भीख मांगने लगी। उसकी बिनती सुन कर गणनायक को दया आ गयी और उन्होंने कहा हिमालय के वन में गोश्रृंग नाम के श्रेष्ठ मुनी रहते है। वे तुम्हारा उपकार करेगे। ऐसा कह कर गणनायक चला गया। गंधर्व सेना व छोड़ कर अपने पिता के पास आई और अपने कुष्ट होने के कारण तथा उससे मुक्ति का उपाय बतायी। माता पिता उसे तत्क्षण लेकर हिमालय पर्वत पर गए और गोश्रृंग का दर्शन करके स्तुति करने लगे। मुनि के पूछने पर उन्होंने कहा कि मेरे बेटी को कोढ़ हो गया है कृपया इसकी शांति का उपाय बताएं।

मुनि ने कहा कि समुद्र के समीप भगवान सोमनाथ विराजमान है। वहां जाकर सोमवार व्रत द्वारा भगवान शंकर की आराधना करो। ऐसा करने से पुत्री का रोग दूर हो जायेगा। मुनि के वचन सुन कर धनवाहन अपनी पुत्री के साथ प्रभास क्षेत्र में जाकर सोमनाथ के दर्शन किए और पूरे विधि विधान के साथ सोमवार व्रज करते हुए भगवान शंकर की आराधना किए उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शंकर भगवान ने उस कन्या के रोगों को दूर किया और उन्हे अपनी भक्ति भी दान में दिया। आज भी लोग शिव जी को प्रसन्न करने के लिए इस व्रत को पूरी निष्ठा एवं भक्ति के साथ करते है और शिव को प्राप्त करते है।

शनिवार, 18 जुलाई 2009

भगवान शिव की पूजा और पूजा विधि

भगवान शिव ने भगवती के आग्रह पर अपने लिए सोने की लंका का निर्माण किया था गृहप्रवेश से पूर्व पूजन के लिए उन्होने अपने असुर शिष्य प्रकाण्ड विद्वान रावण को आमंत्रित किया था दक्षिणा के समय रावण ने वह लंका ही दक्षिणा में मांग ली और भगवान शिव ने सहजता से लंका रावण को दान में दे दी तथा वापस कैलाश लौट आए ऐसी सहजता के कारण ही वे ÷भोलेनाथ' कहलाते हैं ऐसे भोले भंडारी की कृपा प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील होने के लिए शिवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण पर्व है।

भगवान शिव का स्वरुप अन्य देवी देवताओं से बिल्कुल अलग है।जहां अन्य देवी-देवताओं को वस्त्रालंकारों से सुसज्जित और सिंहासन पर विराजमान माना जाता है,वहां ठीक इसके विपरीत शिव पूर्ण दिगंबर हैं,अलंकारों के रुप में सर्प धारण करते हैं और श्मशान भूमि पर सहज भाव से अवस्थित हैं। उनकी मुद्रा में चिंतन है, तो निर्विकार भाव भी है!आनंद भी है और लास्य भी। भगवान शिव को सभी विद्याओं का जनक भी माना जाता है। वे तंत्र से लेकर मंत्र तक और योग से लेकर समाधि तक प्रत्येक क्षेत्र के आदि हैं और अंत भी। यही नही वे संगीत के आदिसृजनकर्ता भी हैं, और नटराज के रुप में कलाकारों के आराध्य भी हैं। वास्तव में भगवान शिव देवताओं में सबसे अद्भुत देवता हैं वे देवों के भी देव होने के कारण ÷महादेव' हैं तो, काल अर्थात समय से परे होने के कारण ÷महाकाल' भी हैं वे देवताओं के गुरू हैं तो, दानवों के भी गुरू हैं देवताओं में प्रथमाराध्य, विनों के कारक निवारणकर्ता, भगवान गणपति के पिता हैं तो, जगद्जननी मां जगदम्बा के पति भी हैं वे कामदेव को भस्म करने वाले हैं तो, ÷कामेश्वर' भी हैं तंत्र साधनाओं के जनक हैं तो संगीत के आदिगुरू भी हैं उनका स्वरुप इतना विस्तृत है कि उसके वर्णन का सामर्थ्य शब्दों में भी नही है।सिर्फ इतना कहकर ऋषि भी मौन हो जाते हैं किः-

असित गिरिसमम स्याद कज्जलम सिंधु पात्रे, सुरतरुवर शाखा लेखनी पत्रमुर्वी

लिखति यदि गृहीत्वा शारदासर्वकालम, तदपि तव गुणानाम ईश पारम याति॥

अर्थात यदि समस्त पर्वतों को, समस्त समुद्रों के जल में पीसकर उसकी स्याही बनाइ जाये, और संपूर्ण वनों के वृक्षों को काटकर उसको कलम या पेन बनाया जाये और स्वयं साक्षात, विद्या की अधिष्ठात्री, देवी सरस्वती उनके गुणों को लिखने के लिये अनंतकाल तक बैठी रहें तो भी उनके गुणों का वर्णन कर पाना संभव नही होगा। वह समस्त लेखनी घिस जायेगी! पूरी स्याही सूख जायेगी मगर उनका गुण वर्णन समाप्त नही होगा। ऐसे भगवान शिव का पूजन अर्चन करना मानव जीवन का सौभाग्य है

भगवान शिव के पूजन की अनेकानेक विधियां हैं।इनमें से प्रत्येक अपने आप में पूर्ण है और आप अपनी इच्छानुसार किसी भी विधि से पूजन या साधना कर सकते हैं।भगवान शिव क्षिप्रप्रसादी देवता हैं,अर्थात सहजता से वे प्रसन्न हो जाते हैं और अभीप्सित कामना की पूर्ति कर देते हैं। भगवान शिव के पूजन की कुछ सहज विधियां प्रस्तुत कर रहा हूं।इन विधियों से प्रत्येक आयु, लिंग, धर्म या जाति का व्यक्ति पूजन कर सकता है और भगवान शिव की यथा सामर्थ्य कृपा भी प्राप्त कर सकता है।


भगवान शिव पंचाक्षरी मंत्रः-

ऊं नमः शिवाय

यह भगवान शिव का पंचाक्षरी मंत्र है। इस मंत्र का जाप आप चलते फिरते भी कर सकते हैं। अनुष्ठान के रूप में इसका जाप ग्यारह लाख मंत्रों का किया जाता है विविध कामनाओं के लिये इस मंत्र का जाप किया जाता है।


बीजमंत्र संपुटित महामृत्युंजय शिव मंत्रः-

ऊं हौं ऊं जूं ऊं सः ऊं भूर्भुवः ऊं स्वः ऊं त्रयंबकं यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम, उर्वारुकमिव बंधनात मृत्युर्मुक्षीय मामृतात ऊं स्वः ऊं भूर्भुवः ऊं सः ऊं जूं ऊं हौं ऊं

भगवान शिव का एक अन्य नाम महामृत्युंजय भी है।जिसका अर्थ है, ऐसा देवता जो मृत्यु पर विजय प्राप्त कर चुका हो। यह मंत्र रोग और अकाल मृत्यु के निवारण के लिये सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसका जाप यदि रोगी स्वयं करे तो सर्वश्रेष्ठ होता है। यदि रोगी जप करने की सामर्थ्य से हीन हो तो, परिवार का कोई सदस्य या फिर कोई ब्राह्‌मण रोगी के नाम से मंत्र जाप कर सकता है। इसके लिये संकल्प इस प्रकार लें, ÷÷मैं(अपना नाम) महामृत्युंजय मंत्र का जाप, (रोगी का नाम) के रोग निवारण के निमित्त कर रहा हॅूं, भगवान महामृत्युंजय उसे पूर्ण स्वास्थ्य लाभ प्रदान करें'' इस मंत्र के जाप के लिये सफेद वस्त्र तथा आसन का प्रयोग ज्यादा श्रेष्ठ माना गया है।रुद्राक्ष की माला से मंत्र जाप करें।

शिवलिंग की महिमा

भगवान शिव के पूजन मे शिवलिंग का प्रयोग होता है। शिवलिंग के निर्माण के लिये स्वर्णादि विविध धातुओं, मणियों, रत्नों, तथा पत्थरों से लेकर मिटृी तक का उपयोग होता है।इसके अलावा रस अर्थात पारे को विविध क्रियाओं से ठोस बनाकर भी लिंग निर्माण किया जाता है, इसके बारे में कहा गया है कि,

मृदः कोटि गुणं स्वर्णम, स्वर्णात्कोटि गुणं मणिः, मणेः कोटि गुणं बाणो,

बाणात्कोटि गुणं रसः रसात्परतरं लिंगं भूतो भविष्यति

अर्थात मिटृी से बने शिवलिंग से करोड गुणा ज्यादा फल सोने से बने शिवलिंग के पूजन से, स्वर्ण से करोड गुणा ज्यादा फल मणि से बने शिवलिंग के पूजन से, मणि से करोड गुणा ज्यादा फल बाणलिंग से तथा बाणलिंग से करोड गुणा ज्यादा फल रस अर्थात पारे से बने शिवलिंग के पूजन से प्राप्त होता है। आज तक पारे से बने शिवलिंग से श्रेष्ठ शिवलिंग तो बना है और ही बन सकता है।

शिवलिंगों में नर्मदा नदी से प्राप्त होने वाले नर्मदेश्वर शिवलिंग भी अत्यंत लाभप्रद तथा शिवकृपा प्रदान करने वाले माने गये हैं। यदि आपके पास शिवलिंग हो तो अपने बांये हाथ के अंगूठे को शिवलिंग मानकर भी पूजन कर सकते हैं शिवलिंग कोई भी हो जब तक भक्त की भावना का संयोजन नही होता तब तक शिवकृपा नही मिल सकती।

शिवलिंग पर अभिषेक या धारा

भगवान शिव अत्यंत ही सहजता से अपने भक्तों की मनोकामना की पूर्ति करने के लिए तत्पर रहते है। भक्तों के कष्टों का निवारण करने में वे अद्वितीय हैं। समुद्र मंथन के समय सारे के सारे देवता अमृत के आकांक्षी थे लेकिन भगवान शिव के हिस्से में भयंकर हलाहल विष आया। उन्होने बडी सहजता से सारे संसार को समाप्त करने में सक्षम उस विष को अपने कण्ठ में धारण किया तथा ÷नीलकण्ठ' कहलाए। भगवान शिव को सबसे ज्यादा प्रिय मानी जाने वाली क्रिया है ÷अभिषेक' अभिषेक का शाब्दिक तात्पर्य होता है श्रृंगार करना तथा शिवपूजन के संदर्भ में इसका तात्पर्य होता है किसी पदार्थ से शिवलिंग को पूर्णतः आच्ठादित कर देना। समुद्र मंथन के समय निकला विष ग्रहण करने के कारण भगवान शिव के शरीर का दाह बढ गया। उस दाह के शमन के लिए शिवलिंग पर जल चढाने की परंपरा प्रारंभ हुयी। जो आज भी चली रही है इससे प्रसन्न होकर वे अपने भक्तों का हित करते हैं इसलिए शिवलिंग पर विविध पदार्थों का अभिषेक किया जाता है।

शिव पूजन में सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति शिवलिंग पर जल या दूध चढाता है शिवलिंग पर इस प्रकार द्रवों का अभिषेक ÷धारा' कहलाता है जल तथा दूध की धारा भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है

पंचामृतेन वा गंगोदकेन वा अभावे गोक्षीर युक्त कूपोदकेन कारयेत

अर्थात पंचामृत से या फिर गंगा जल से भगवान शिव को धारा का अर्पण किया जाना चाहिये इन दोनों के अभाव में गाय के दूध को कूंए के जल के साथ मिश्रित कर के लिंग का अभिषेक करना चाहिये

हमारे शास्त्रों तथा पौराणिक ग्रंथों में प्रत्येक पूजन क्रिया को एक विशिष्ठ मंत्र के साथ करने की व्यवस्था है, इससे पूजन का महत्व कई गुना बढ जाता है शिवलिंग पर अभिषेक या धारा के लिए जिस मंत्र का प्रयोग किया जा सकता है वह हैः-

1 ऊं हृौं हृीं जूं सः पशुपतये नमः

ऊं नमः शंभवाय मयोभवाय नमः शंकराय, मयस्कराय नमः शिवाय शिवतराय च।

इन मंत्रों का सौ बार जाप करके जल चढाना शतधारा तथा एक हजार बार जल चढाना सहस्रधारा कहलाता है जलधारा चढाने के लिए विविध मंत्रों का प्रयोग किया जा सकता है इसके अलावा आप चाहें तो भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र का प्रयोग भी कर सकते हैं पंचाक्षरी मंत्र का तात्पर्य है ÷ ऊं नमः शिवाय ' मंत्र

विविध कार्यों के लिए विविध सामग्रियों या द्रव्यों की धाराओं का शिवलिंग पर अर्पण किया जाता है तंत्र में सकाम अर्थात किसी कामना की पूर्ति की इच्ठा के साथ पूजन के लिए विशेष सामग्रियों का उपयोग करने का प्रावधान रखा गया है इनमें से कुछ का वर्णन आगे प्रस्तुत हैः-

सहस्रधाराः-

जल की सहस्रधारा सर्वसुख प्रदायक होती है
घी
की सहस्रधारा से वंश का विस्तार होता है
दूध
की सहस्रधारा गृहकलह की शांति के लिए देना चाहिए
दूध
में शक्कर मिलाकर सहस्रधारा देने से बुद्धि का विकास होता है
गंगाजल
की सहस्रधारा को पुत्रप्रदायक माना गया है
सरसों
के तेल की सहस्रधारा से शत्रु का विनाश होता है
सुगंधित
द्रव्यों यथा इत्र
, सुगंधित तेल की सहस्रधारा से विविध भोगों की प्राप्ति होती है

इसके अलावा कइ अन्य पदार्थ भी शिवलिंग पर चढाये जाते हैं, जिनमें से कुछ के विषय में निम्नानुसार मान्यतायें हैं:-

सहस्राभिषेक

एक हजार कनेर के पुष्प चढाने से रोगमुक्ति होती है
एक
हजार धतूरे के पुष्प चढाने से पुत्रप्रदायक माना गया है
एक
हजार आक या मदार के पुष्प चढाने से प्रताप या प्रसिद्धि बढती है
एक
हजार चमेली के पुष्प चढाने से वाहन सुख प्राप्त होता है
एक
हजार अलसी के पुष्प चढाने से विष्णुभक्ति विष्णुकृपा प्राप्त होती है
एक
हजार जूही के पुष्प चढाने से समृद्धि प्राप्त होती है
एक
हजार सरसों के फूल चढाने से शत्रु की पराजय होती है

लक्षाभिषेक

एक लाख बेलपत्र चढाने से कुबेरवत संपत्ति मिलती है
एक
लाख कमलपुष्प चढाने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है
एक
लाख आक या मदार के पत्ते चढाने से भोग मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है
एक
लाख अक्षत या बिना टूटे चावल चढाने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है
एक
लाख उडद के दाने चढाने से स्वास्थ्य लाभ होता है
एक
लाख दूब चढाने से आयुवृद्धि होती है
एक
लाख तुलसीदल चढाने से भोग मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है
एक
लाख पीले सरसों के दाने चढाने से शत्रु का विनाश होता है

बेलपत्र

शिवलिंग पर अभिषेक या धारा के साथ साथ बेलपत्र चढाने का भी विशेष महत्व है। बेलपत्र तीन-तीन के समूह में लगते हैं। इन्हे एक साथ ही चढाया जाता है।अच्छे पत्तों के अभाव में टूटे फूटे पत्र भी ग्रहण योग्य माने गये हैं।इन्हे उलटकर अर्थात चिकने भाग को लिंग की ओर रखकर चढाया जाता है।इसके लिये जिस श्लोक का प्रयोग किया जाता है वह है,

त्रिदलं त्रिगुणाकारम त्रिनेत्रम त्रिधायुधम।
त्रिजन्म
पाप संहारकम एक बिल्वपत्रं शिवार्पणम॥

उपरोक्त मंत्र का उच्चारण करते हुए शिवलिंग पर बेलपत्र को समर्पित करना चाहिए

शिवपूजन में निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना चाहियेः-

पूजन स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनकर करें।
माता
पार्वती का पूजन अनिवार्य रुप से करना चाहिये अन्यथा पूजन अधूरा रह जायेगा।
रुद्राक्ष
की माला हो तो धारण करें।
भस्म
से तीन आडी लकीरों वाला तिलक लगाकर बैठें।
शिवलिंग
पर चढाया हुआ प्रसाद ग्रहण नही किया जाता
, सामने रखा गया प्रसाद अवश्य ले सकते हैं।
शिवमंदिर
की आधी परिक्रमा ही की जाती है।
केवडा
तथा चम्पा के फूल चढायें।
पूजन
काल में सात्विक आहार विचार तथा व्यवहार रखें।