रविवार, 23 नवंबर 2008

खजुराहो मंदिरों में सबसे विशाल कन्दारिया महादेव

खजुराहो के मंदिरों में सबसे विशाल कंदरिया महादेव मंदिर मूलतः शिव मंदिर है। मंदिर का निर्माणकाल १००० सन् ई. है तथा इसकी लंबाई १०२', चौड़ाई ६६' और ऊँचाई १०१' है। स्थानीय मत के अनुसार इसका कंदरिया नामांकरण, भगवान शिव के एक नाम कंदर्पी के अनुसार हुआ है। इसी कंदर्पी से कंडर्पी शब्द का विकास हुआ, जो कालांतर में कंदरिया में परिवर्तित हो गया।

स्थापत्य

यह विशाल मंदिर खजुराहो की वास्तुकला का आदर्श, अपने बाह्य आकार में ८४ समरस आकृति के छोटे- छोटे अंग तथा श्रंग शिखरों में जोड़कर बनाया, अनूठे उच्च शिखर से युक्त हे। मंदिर अपने अलंकरण एवं विशेष लय के कारण दर्शनीय है। मंदिर भव्य आकृति और अनुपातिक सुडौलता, उत्कृष्ट शिल्पसज्जा और वास्तु रचना के कारण मध्य भारतीय वास्तुकृतियों में श्रेष्ठ माना जाता है। मुख्य मंडप, मंडप और महामंडप के साथ- साथ इसका आधार योजना, रुप, ऊँचाई, उठाव, अलंकरण तथा आकार शास्रीय पद्धति का उत्तम उदाहरण प्रस्तुत करता है। इसकी विशिष्टा यह भी है कि इसकी ऊँचाई की ओर जाते हुए उत्थान श्रंग अत्यंत प्रभावशाली प्रतीत होता है। खजुराहो का यह एक मात्र मंदिर है, जिसकी जगती के दोनों पार्श्वों� में और पीछे प्रक्षेपण है। इसकी जगती लगभग तीन मीटर ऊँची है। इसकी धराशिला ग्रेनाई पत्थर की है तथा इस पर रेतीले पत्थर की खार- शिलाएँ बनी हुई हैं। मंदिर भि कमल पूष्प की पत्तियों से सजे हैं तथा जालय, कुंभ और बाहर को निकली पट्टिकाएँ तमाल पत्रों से सजी हुई हैं। मंदिर ऊँचे अधिस्थान पर स्थापित है, जिसपर अनेक सुसज्जित मूर्तियाँ हैं।

इन मूर्तियों में दो पंक्तियाँ, हाथियों, घोड़ों, योद्धाओं, शिकारियों, मदारियों, संगीतज्ञों, नर्तकों, और भक्तों की मूर्तियाँ आसीन है। मंदिर की तीन पट्टियों में देवी- देवताओं, सुर सुंदरियों, मिथुनों, व्यालों और नागिनों की मूर्तियाँ हैं। मंदिर के भीतर दो मकर- तोरण है। अप्सराओं की प्रतिमाएँ सुंदरता के साथ अंकित की गयी है। यहाँ की सभी मूर्तियाँ लंबी हैं तथा आकृति में संतुलित प्रतीत होती है। यहाँ नारी के कटावों का सौंदर्य स्पष्ट दिखता है।

तलच्छंद और ऊर्ध्वच्छंद के प्रत्येक अंगों की रचना और इसका अलंकरण अद्वितीय है। उर्ध्वच्छंद में सबसे अधिक लयबद्ध प्रक्षेपणों और रथिकाओं के सहित इसकी दांतेदार योजना उल्लेखनीय है।

प्रवेशद्वार

मंदिर का प्रवेश द्वार पंचायतन शैली का बना हुआ है। इस पर विषाणयुक्त और समुज्जवल देवताओं और संगीतज्ञों इत्यादि से अलंकृत तोरण तथा भव्य ज्यतोरण देखने योग्य हैं। अर्द्धमंडप और मंडप के उत्कीर्ण सघन हैं। परिक्रमा क्षेत्र में बाहरी भित्ती पर वृहदाकार मंच है। परिक्रमा के बाहर तथा मंदिर के बाहर का मंच बलिष्ट और गहन आकार में उठाया गया है। मंदिर का प्रत्येक भाग एक- दूसरे से जुड़ा हुआ है और पूर्व- पश्चिम दिशा की ओर इसका विस्तार है। छज्जों के रुप में वातायन बनाकर मंडप को महामंडप बनाया गया है। भीतर हवा जाने के लिए वातायन है और मंडप तीन ओर से खुले हैं। मंदिर की दीवारें पुख्ता हैं तथा छज्जायुक्त वातायन है, जो रोशनी जाने का साधन है। मूर्तियाँ छज्जे से ही शुरु हो जाती है। छज्जे और वातायन मूर्तियों पर रोशनी और परछाइयाँ पड़ती है। मंदिर का गर्भगृह सर्वोच्च स्थान पर है। वहाँ पहुँचने के लिए चंद्रशिलायुक्त सीढियों से ऊपर चढ़ना पड़ता है। सप्तरथ गर्भगृह के साथ ही शिखर के नीचे के वर्गाकार भाग को भी सात भाग दिये गए हैं।

मंडप

कंदिरिया मंदिर की जंघा पर मंडप और मुखमंडप के बाहरी भाग के कक्षासन्न पर राजसेना, वेदिका कलक, आसन्नपट्ट, कक्षासन्न है। मंदिर का छत कपोत भाग से शुरु होता है तथा व्रंदिका से छत को उठाता गया है। मंदिर के प्रत्येक मंडप की अलग- अलग छत है। सर्वाधिक ऊँचाईवाली छत गर्भगृह की है तथा इसका अंत सबसे ऊँचे शिखर पर हुआ है। यह शिखर चार उरु: शिखरों से सजाया गया है तथा असंख्य छोटे- छोटे श्रृंग भी बनाये गए हैं। इनमें कर्णश्रृंग तथा नष्टश्रृंग प्रकृति के श्रृंग हैं। मूलमंजरी के मुख्य आधार पर चतुरंग के रथ, नंदिका, प्रतिहार और कर्ण अंकित किये गए हैं। मंदिर के महामंडप की छत डोमाकार है, जिसे छोटे- छोटे तिलकों ( पिरामिड छतों ) से बनाया गया है। इससे ॠंग शैली स्पष्ट दिखाई देती है। प्रथम छत चार तिलकों से बनी है। साथ- ही तिलकों की चार अन्य पंक्तियाँ भी पिरामिड आकार में दिखाई देती हैं। उत्तर- दक्षिण की छत पर पाँच सिंहकरण, कुट- घंटा से उठ कर छत को सजाते हैं। यह छत पीठ और गृवा से युक्त है तथा इसको चंद्रिका, कलश और बीजपुंक से अलंकृत किया गया है।

मुख्य मंडप

मुख्यमंडप चार भद्रक- स्तंभों पर बनाया गया है। इसका ऊपरी आधा भाग आसन्न प के ऊपर है तथा नीचे का आधा भाग आसन्नप के नीचे स्थित है। इस भाग को कमलों से सजाया गया है। मंडप से मंडप तक आने के लिए मकरतोरण है। मुख्य मकरतोरण से शिल्पशैली पूर्णतया मिलती है। गर्भगृह के दरवाजे पर चंद्रशिला की चार सीढियाँ हैं। दरवाजे पर नौ शाख हैं। इसका विवरण निम्नलिखित है :-

  1. प्रथम शाखा पर साधारण उत्कीर्ण हैं।
  2. द्वितीय पर अप्सराएँ हैं।
  3. तृतीय पर व्याल है।
  4. चतुर्थ पर मिथुन है।
  5. पंचम पर व्याल आसीन है।
  6. छठी पर सुंदर अप्सराएँ अंकित हैं।
  7. सप्तम साधारण उत्कीर्ण है।
  8. अष्टम पर कमल पत्र का अंकन किया गया है।
  9. नवीं शाखा पर लहरदार लकीरें और नाग रुपांकिंत है।


सभी रथिकाएँ उद्गमों से सुसज्जित है। दाहिनी शाख पर कमल- पत्र और बायीं ओर यमुना अंकित किया गया है। द्वार शिला की एक रथिका सरस्वती को अभय के साथ प्रदर्शित करती है। यहाँ सरस्वती चक्रदार कमल दंड और कमंडल भी धारण किये हुए हैं। स्तंभ शाखा के नीचे रथिका में शिव- पार्वती को बैठे दिखाया गया है और नाग रथिका के नीचे की रथिका, चार व्यक्तियों को आसीन किया गया है। भीतरी वितान में कमल पुष्प और कोनों में कीर्कित्त मुख प्रतिमाएँ हैं। रेतीले पत्थर की एक पीठिका पत्थर के शिवलिंग को सहारा देती दिखाई गई है।

गर्भ गृह

मंदिर का गर्भगृह चतुरंग है तथा ऊँचे अधिस्थान पर टिका हुआ है। उत्तर प पर हाथी, घोड़े, आदमी और विविध दृश्य मिथुन सहित अंकित है। यहाँ वेदीवंघ पर जंघा है, जिसपर दो पंक्तियों में मूर्तियाँ हैं। यहाँ देवता, अप्सराएँ, व्याल और मिथुन- युग्म अंकन सुंदरता के साथ किया गया है।

कंदरिया महादेव मंदिर संधार प्रासाद में निर्मित है। इसमें एक शार्दूल सामने हैं और एक कोने में। इसकी पीठ की ऊँचाई काफी ज्यादा है। मंदिर का मुखपूर्व की ओर है। सीढियाँ चौड़ी हैं तथा मुखचतुष्कि तक जाती है। मुखचतुष्कि बंदनमालिका सुंदर है।

विश्व का एकमात्र अर्धनारीश्वर काठगढ़ महादेव

महाशिवरात्रि पर विशेष शिव पुराण की विधेश्वर संहिता के अनुसार पद्म कल्प के प्रारंभ में एक बार ब्रrा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठता का विवाद उत्पन्न हो गया और दोनों दिव्यास्त्र लेकर युद्ध हेतु उन्मुख हो उठे। यह भयंकर स्थिति देख शिव सहसा वहां आदि अनंत ज्योतिर्मय स्तंभ के रूप में प्रकट हो गए, जिससे दोनों देवताओं के दिव्यास्त्र स्वत: ही शांत हो गए।

ब्रम्हा और विष्णु दोनों उस स्तंभ के आदि-अंत का मूल जानने के लिए जुट गए। विष्णु शुक्र का रूप धरकर पाताल गए, मगर अंत न पा सके। ब्रम्हा आकाश से केतकी का फूल लेकर विष्णु के पास पहुंचे और बोले- ‘मैं स्तंभ का अंत खोज आया हूं, जिसके ऊपर यह केतकी का फूल है।’

ब्रम्हा का यह छल देखकर शंकर वहां प्रकट हो गए और विष्णु ने उनके चरण पकड़ लिए। तब शंकर ने कहा कि आप दोनों समान हैं। यही अग्नि तुल्य स्तंभ, काठगढ़ के रूप में जाना जाने लगा। ईशान संहिता के अनुसार इस शिवलिंग का प्रादुर्भाव फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात्रि को हुआ था।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

विश्वविजेता सिकंदर ईसा से 326 वर्ष पूर्व जब पंजाब पहुंचा, तो प्रवेश से पूर्व मीरथल नामक गांव में पांच हजार सैनिकों को खुले मैदान में विश्राम की सलाह दी। इस स्थान पर उसने देखा कि एक फ़कीर शिवलिंग की पूजा व्यस्त था।

उसने फ़कीर से कहा- ‘आप मेरे साथ यूनान चलें। मैं आपको दुनिया का हर ऐश्वर्य दूंगा।’ फ़कीर ने सिकंदर की बात को अनसुना करते हुए कहा- ‘आप थोड़ा पीछे हट जाएं और सूर्य का प्रकाश मेरे तक आने दें।’

फ़कीर की इस बात से प्रभावित होकर सिकंदर ने टीले पर काठगढ़ महादेव का मंदिर बनाने के लिए भूमि को समतल करवाया और चारदीवारी बनवाई। इस चारदीवारी के ब्यास नदी की ओर अष्टकोणीय चबूतरे बनवाए, जो आज भी यहां हैं।

रणजीत सिंह ने किया पुनरुद्धार

कहते हैं, महाराजा रणजीत सिंह ने जब गद्दी संभाली, तो पूरे राज्य के धार्मिक स्थलों का भ्रमण किया। वह जब काठगढ़ पहुंचे, तो इतना आनंदित हुए कि उन्होंने आदि शिवलिंग पर तुरंत सुंदर मंदिर बनवाया और वहां पूजा करके आगे निकले। मंदिर के पास ही बने एक कुएं का जल उन्हें इतना पसंद था कि वह हर शुभकार्य के लिए यहीं से जल मंगवाते थे।

अर्धनारीश्वर का रूप

दो भागों में विभाजित आदि शिवलिंग का अंतर ग्रहों एवं नक्षत्रों के अनुसार घटता-बढ़ता रहता है और शिवरात्रि पर दोनों का ‘मिलन’ हो जाता है। यह पावन शिवलिंग अष्टकोणीय है तथा काले-भूरे रंग का है। शिव रूप में पूजे जाते शिवलिंग की ऊंचाई 7-8 फुट है जबकि पार्वती के रूप में अराध्य हिस्सा 5-6 फुट ऊंचा है।

भरत की प्रिय पूजा-स्थली

मान्यता है, त्रेता युग में भगवान राम के भाई भरत जब भी अपने ननिहाल कैकेय देश (कश्मीर) जाते थे, तो काठगढ़ में शिवलिंग की पूजा किया करते थे।

कब जाएं?

काठगढ़ महादेव के दर्शनों के लिए साल भर में कभी भी जाया जा सकता है, मगर शिवरात्रि व सावन माह में लगने वाले मेलों में जाने का विशेष महत्व है।

कैसे जाएं?

मंदिर को जाने के दो मार्ग हैं। एक मार्ग पंजाब की जम्मू-कश्मीर को लगती सीमा का प्रवेश द्वार कहे जाते पठानकोट-इंदौरा जाता है। पठानकोट से यह मंदिर छह किमी दूर है। जबकि दूसरा मार्ग जालंधर-पठानकोट राजकीय मार्ग पर मीरथल क़स्बे से चार किमी दूर है। पठानकोट रेल से भी जुड़ा हुआ है। निकटतम हवाई अड्डा राजा सांसी (अमृतसर) है।

कहां ठहरें? काठगढ़ महादेव में ठहरने के लिए भव्य धर्मशाला है, जबकि निकटवर्ती नगर पठानकोट में होटलों व धर्मशालाओं की भरपूर व्यवस्था है।

कांकरोली का गुप्तेश्वर महादेव मंदिर

राजसमन्द के कांकरोली में राजकीय बालकृष्ण विधाभवन उच्च माध्यमिक विधालय के पास ही स्थित है, गुप्तेश्वर महादेव का पवित्र व बहुत प्राचीन मंदिर । यह मंदिर कांकरोली के महत्वपुर्ण शिव मंदिरों में से एक है । यहां के कई स्थानिय आस्थावान लोग, व्यापारीगण एवं महिलाएँ तो रोजाना प्रातः यहां दर्शनों के लिये गुप्तेश्वर महादेव मंदिर आते है् । यह राजसमन्द की पाल के दुसरी तरफ बना हुआ है व ईस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यह अतिप्राचीन लगभग 950 वर्ष पुराना मंदिर है। मंदिर में अन्दर जाने हेतु एक संकरी सी लम्बी गुफा में से होकर जाना पडता है, और यह गुफा करीब 65 फीट लम्बी है । अन्त में गोलाकार मंदिर आता है, ईसकी परिक्रमा भी है । दर्शनार्थी जो यहां दर्शन के लिये आते हैं, वे परिक्रमा भी करते है । इस मंदिर में जाने व दर्शन मात्र करने से एक बहुत अलग सा एहसास होता है व मन को काफी शान्ति मिलती है ।

महाशिवरात्री के पावन पर्व पर यहां दर्शनों के लिये सर्वाधिक भीड लगती है । उस दौरान यहां एक बडे मेले का सा माहोल होता है, मंदिर के बाहर ही फूल मालाएं, बिल्व पत्र व आकडे के फुलों की माला वाले, नारियल वाले, रंग बिरंगे गुब्बारे वाले, तरह तरह के खिलोने वाले आदि यकायक जाने कहीं से आ जाते है । मंदिर में भी व्यवस्था बनाए रखने के लिये रेलिंग वगेरह लगाई जाती है, ताकि दर्शन करने वाले एक लाईन मे चलते हुए शिवजी के दर्शन कर पाएं । युं तो मंदिर में भगवान शिव की पुजा, श्रंगार, आरती आदि रोजाना ही की जाती है पर ईस महाशिवरात्री के त्योहार के मौके पर खास श्रंगार किया जाता है व फिर दर्शन होते हैं । पुजारी एवं स्वयंसेवी लोगों द्वारा प्रसाद, चरणामृत आदि भी दर्शनार्थीयों को दिया जाता है

भजन भक्तगण “बम बम भोले” करते रहते है, शिव स्तुति व भजन गाते हैं, और शिवलिंग के दर्शनों का लुत्फ लेते हैं । कई शौकीन लोग शिवजी का विशेष प्रसाद “भांग” भी लेते हैं व मस्ती में तल्लीन रहते हैं, क्योंकि यह दिन हे ही भोले बाबा एवं उनके भक्तों के नाम । महाशिवरात्री के मौके पर तो यहां दर्शन करना बडा भारी काम हो ए॓सा लगता है । लाईन में लगना, धीरे धीरे भीड में से होकर मंदिर मे जाना, कहने का अभिप्राय यह हे कि भगवान भी युं ही दर्शन नहीं देते हें, काफी भक्ती करवाते है । वेसे इतनी भीड में जुते चोरी हो जाने का या फिर बटुआ कोई पार ना कर ले, इसका डर बना रहता है। पर यह भोले बाबा के भक्तगणों की अटूट आस्था है, कि वे कम से कम महाशिवरात्री के इस पावन पर्व तो एक बार शिव दर्शन करें ही करें ।

रणमुक्तेश्वर महादेव व प्रताप गुफा

हल्दीघाटी के ही रास्ते में आता है रणमुक्तेश्वर महादेव का मंदिर, यह मंदिर अपना एक अलग एतिहासिक महत्व रखता है, क्योंकि महाराणा प्रताप यहां गुफा में कुछ समय के लिये रुके थे, तब से यह प्रताप गुफा के नाम से भी जाना जाता है । रणमुक्तेश्वर महादेव मंदिर का यह पवित्र मंदिर आज भी जैसे स्वाभिमानी राणा प्रताप की दास्तान बयान करता नजर आता है, धन्य हें वे लाल जिन्होने आजादी कि खातिर अपने सारे एशोआराम छोड दिये ।

महाराणा प्रताप के जीवन का एक बडा समय यहीं मेवाड के पहाडों व गुफाओं में ही बीता । रण या युद्ध से मुक्ति दिलाने वाले रणमुक्तेश्वर महादेव का मंदिर वाकई में काफी अनोखा है । यहां की गुफा में अधिकांशतः पानी बहता रहता है जो पहाडों में से होता हुआ जाने कहां से आता है । यहां रोजाना पुजा अर्चना आदि की जाती हे और विशेष मौके जेसे महाशिवरात्री या महाराणा प्रताप जयंति आदि पर खास दर्शन होते हैं । यहां ठहर कर कुछ पल रुकने मात्र से ही मन को असीम शांति मिलती है ।
रणमुक्तेश्वर महादेव व प्रताप गुफा

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक ओम त्र्यंबकम यजामहे...



शिव जी के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक है त्र्यंबकेश्वर महादेव मंदिर। यह पवित्र ज्योतिर्लिंग नासिक से लगभग 35 किलोमीटर दूर त्र्यंबक कस्बे में स्थित है। इस गाँव के अंदर कदम रखते ही मन शिवभक्ति में लीन हो जाता है। पूरा वातावरण महामृत्युंजय मंत्र के ओजपूर्ण उच्चारण से गुंजायमान रहता है।

गाँव के अंदर कुछ दूर पैदल चलने के बाद मंदिर का मुख्य द्वार नजर आने लगता है। त्र्यंबकेश्वर मंदिर की भव्य इमारत सिंधु-आर्य शैली का उत्कृष्ट नमूना है। मंदिर के अंदर गर्भगृह में प्रवेश करने के बाद शिवलिंग की केवल आर्घा दिखाई देती है, लिंग नहीं। गौर से देखने पर आर्घा के अंदर एक-एक इंच के तीन लिंग दिखाई देते हैं। इन लिंगों को त्रिदेव- ब्रह्मा-विष्णु और महेश का अवतार माना जाता है। भोर के समय होने वाली पूजा के बाद इस आर्घा पर चाँदी का पंचमुखी मुकुट चढ़ा दिया जाता है।


इस प्राचीन मंदिर का पुनर्निर्माण तीसरे पेशवा बालाजी अर्थात नाना साहब पेशवा ने करवाया था। इस मंदिर का जीर्णोद्धार 1755 में शुरू हुआ था और 31 साल के लंबे समय के बाद 1786 में जाकर पूरा हुआ। कहा जाता है कि इस भव्य मंदिर के निर्माण में करीब 16 लाख रुपए खर्च किए गए थे, जो उस समय काफी बड़ी रकम मानी जाती थी।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर और गाँव ब्रह्मगिरि नामक पहाड़ी की तलझटी में स्थित है। इस गिरि‍ को शिव का साक्षात रूप माना जाता है। इसी पर्वत पर पवित्र गोदावरी नदी का उद्गमस्थल है। कहा जाता है-

‘प्राचीनकाल में त्र्यंबक गौतम ऋषि‍ की तपोभूमि थी। अपने ऊपर लगे गोहत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए गौतम ऋषि ने कठोर तप कर शिव से गंगा को यहाँ अवतरित करने का वरदान माँगा। फलस्वरूप दक्षिण की गंगा अर्थात गोदावरी नदी का उद्गम हुआ’ -दंत कथा


गोदावरी के उद्गम के साथ ही गौतम ऋषि के अनुनय-विनय के उपरांत शिवजी ने इस मंदिर में विराजमान होना स्वीकार कर लिया। तीन नेत्रों वाले शिवशंभु के यहाँ विराजमान होने के कारण इस जगह को त्र्यंबक (तीन नेत्रों वाले) कहा जाने लगा। उज्जैन और ओंकारेश्वर की ही तरह त्र्यंबकेश्वर महाराज को इस गाँव का राजा माना जाता है, इसलिए हर सोमवार को त्र्यंबकेश्वर के राजा अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं।

इस भ्रमण के समय त्र्यंबकेश्वर महाराज के पंचमुखी सोने के मुखौटे को पालकी में बैठाकर गाँव में घुमाया जाता है। फिर कुशावर्त तीर्थ स्थित घाट पर स्नान कराया जाता है। इसके बाद मुखौटे को वापस मंदिर में लाकर हीरेजड़ित स्वर्ण मुकुट पहनाया जाता है। यह पूरा दृश्य त्र्यंबक महाराज के राज्याभिषेक-सा महसूस होता है। इस यात्रा को देखना बेहद अलौकिक अनुभव है


‘कुशावर्त तीर्थ की जन्मकथा काफी रोचक है। कहते हैं ब्रह्मगिरि पर्वत से गोदावरी नदी बार-बार लुप्त हो जाती थी। गोदावरी के पलायन को रोकने के लिए गौतम ऋषि ने एक कुशा की मदद लेकर गोदावरी को बंधन में बाँध दिया। उसके बाद से ही इस कुंड में हमेशा लबालब पानी रहता है। इस कुंड को ही कुशावर्त तीर्थ के नाम से जाना जाता है। कुंभ स्नान के समय शैव अखाड़े इसी कुंड में शाही स्नान करते हैं’- दंत कथा

शिवरात्रि और सावन सोमवार के दिन त्र्यंबकेश्वर मंदिर में भक्तों का ताँता लगा रहता है। भक्त भोर के समय स्नान करके अपने आराध्य के दर्शन करते हैं। यहाँ कालसर्प योग और नारायण नागबलि नामक खास पूजा-अर्चना भी होती है, जिसके कारण यहाँ सालभर लोग आते रहते हैं।

कैसे जाएँ- त्र्यंबकेश्वर गाँव नासिक से काफी नजदीक है। नासिक पूरे देश से रेल, सड़क और वायु मार्ग से जुड़ा हुआ है। आप नासिक पहुँचकर वहाँ से त्र्यंबक के लिए बस, ऑटो या टैक्सी ले सकते हैं। टैक्सी या ऑटो लेते समय मोल-भाव का ध्यान रखें।

सोमवार, 3 नवंबर 2008

हरितालिका तीज व्रत

भाद्रपक्ष की शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र होता है. इस दिन भगवान् शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है. इस व्रत को कुमारी तथा सौभाग्यवती स्त्रियाँ ही करती हैं. इस व्रत को करनेवाली स्त्रियाँ पार्वती के समान सुखपूर्वक पति रमण करके स्वर्ग को जाती हैं. इस दिन स्त्रियों को निराहार रहकर, शाम के समय स्नान करके तथा शुद्ध वस्त्र धारण कर पार्वती तथा शिव की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजा करनी चाहिये.

Haritalika Vrat Katha
हरितालिका व्रत कथा

ll श्री गणेशाय नमः ll

कहते हैं कि इस व्रत के माहात्म्य की कथा भगवान् शिव ने पार्वती जी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण करवाने के उद्देश्य से इस प्रकार से कही थी - - - -

"हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया था. इस अवधि में तुमने अन्न ना खाकर केवल हवा का ही सेवन किया था. इतनी अवधि तुमने सूखे पत्ते चबाकर कटी थी.

माघ की शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश कर तप किया था. वैशाख की जला देने वाली गर्मी में पंचाग्नी से शरीर को तपाया. श्रावण की मुसलाधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न जल ग्रहन किये व्यतीत किया.

तुम्हारी इस कष्टदायक तपस्या को देखकर तुम्हारे पिता बहुत दुःखी और नाराज़ होते थे. तब एक दिन तुम्हारी तपस्या और पिता की नाराज़गी को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे.

तुम्हारे पिता द्वारा आने का कारण पूछने पर नारदजी बोले - 'हे गिरिराज! मैं भगवान् विष्णु के भेजने पर यहाँ आया हूँ. आपकी कन्या की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर वह उससे विवाह करना चाहते हैं. इस बारे में मैं आपकी राय जानना चाहता हूँ.'

नारदजी की बात सुनकर पर्वतराज अति प्रसन्नता के साथ बोले - 'श्रीमान! यदि स्वंय विष्णुजी मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो मुझे क्या आपत्ति हो सकती है. वे तो साक्षात ब्रह्म हैं. यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख - सम्पदा से युक्त पति के घर कि लक्ष्मी बने.'

नारदजी तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर विष्णुजी के पास गए और उन्हें विवाह तय होने का समाचार सुनाया. परंतु जब तुम्हे इस विवाह के बारे में पता चला तो तुम्हारे दुःख का ठिकाना ना रहा. तुम्हे इस प्रकार से दुःखी देखकर तुम्हारी एक सहेली ने तुम्हारे दुःख का कारण पूछने पर तुमने बताया - 'मैंने सच्चे मन से भगवान् शिव का वरण किया है, किन्तु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी के साथ तय कर दिया है. मैं विचित्र धर्मसंकट में हूँ. अब मेरे पास प्राण त्याग देने के अलावा कोई और उपाय नहीं बचा.'

तुम्हारी सखी बहुत ही समझदार थी. उसने कहा - 'प्राण छोड़ने का यहाँ कारण ही क्या है? संकट के समय धैर्य से काम लेना चाहिये. भारतीय नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि जिसे मन से पति रूप में एक बार वरण कर लिया, जीवनपर्यन्त उसी से निर्वाह करे. सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो भगवान् भी असहाय हैं. मैं तुम्हे घनघोर वन में ले चलती हूँ जो साधना थल भी है और जहाँ तुम्हारे पिता तुम्हे खोज भी नहीं पायेंगे. मुझे पूर्ण विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे.'

तुमने ऐसा ही किया. तुम्हारे पिता तुम्हे घर में न पाकर बड़े चिंतित और दुःखी हुए. वह सोचने लगे कि मैंने तो विष्णुजी से अपनी पुत्री का विवाह तय कर दिया है. यदि भगवान् विष्णु बारात लेकर आ गये और कन्या घर पर नहीं मिली तो बहुत अपमान होगा, ऐसा विचार कर पर्वतराज ने चारों ओर तुम्हारी खोज शुरू करवा दी. इधर तुम्हारी खोज होती रही उधर तुम अपनी सहेली के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन रहने लगीं. भाद्रपद तृतीय शुक्ल को हस्त नक्षत्र था. उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण किया. रात भर मेरी स्तुति में गीत गाकर जागरण किया. तुम्हारी इस कठोर तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन हिल उठा और मैं शीघ्र ही तुम्हारे पास पहुँचा और तुमसे वर मांगने को कहा तब अपनी तपस्या के फलीभूत मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा - 'मैं आपको सच्चे मन से पति के रूप में वरण कर चुकी हूँ. यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर यहाँ पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिये.' तब 'तथास्तु' कहकर मैं कैलाश पर्वत पर लौट गया. प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री नदी में प्रवाहित करके अपनी सखी सहित व्रत का वरण किया. उसी समय गिरिराज अपने बंधु - बांधवों के साथ तुम्हे खोजते हुए वहाँ पहुंचे. तुम्हारी दशा देखकर अत्यंत दुःखी हुए और तुम्हारी इस कठोर तपस्या का कारण पुछा. तब तुमने कहा - 'पिताजी, मैंने अपने जीवन का अधिकांश वक़्त कठोर तपस्या में बिताया है. मेरी इस तपस्या के केवल उद्देश्य महादेवजी को पति के रूप में प्राप्त करना था. आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूँ. चुंकि आप मेरा विवाह विष्णुजी से करने का निश्चय कर चुके थे, इसलिये मैं अपने आराध्य की तलाश में घर से चली गयी. अब मैं आपके साथ घर इसी शर्त पर चलूंगी कि आप मेरा विवाह महादेवजी के साथ ही करेंगे. पर्वतराज ने तुम्हारी इच्छा स्वीकार करली और तुम्हे घर वापस ले गये. कुछ समय बाद उन्होने पूरे विधि - विधान के साथ हमारा विवाह किया."

भगवान् शिव ने आगे कहा - "हे पार्वती! भाद्र पद कि शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के परिणाम स्वरूप हम दोनों का विवाह संभव हो सका. इस व्रत का महत्त्व यह है कि मैं इस व्रत को पूर्ण निष्ठा से करने वाली प्रत्येक स्त्री को मन वांछित फल देता हूँ."

इस व्रत को 'हरतालिका' इसलिये कहा जाता है क्योंकि पार्वती कि सखी उन्हें पिता और प्रदेश से हर कर जंगल में ले गयी थी. 'हरत' अर्थात हरण करना और 'तालिका' अर्थात सखी.

भगवान् शिव ने पार्वतीजी से कहा कि इस व्रत को जो भी स्त्री पूर्ण श्रद्धा से करेगी उसे तुम्हारी तरह अचल सुहाग प्राप्त होगा.

रविवार, 2 नवंबर 2008

हर हर महादेव...

"गौरीपति कामारि शिव भूतनाथ गिरिजेश
शंकर भव कैलाशपति महादेव रुद्रेश"
~-:0:-~

जय जय शम्भु जय महाज्ञानी, जय शंकर त्रिपुरारी
हम बालक अज्ञानी....
हम बालक अज्ञानी शम्भु, विपदा हरो हमारी
विपदा हरो हमारी भोले, रक्षा करो हमारी
जय शम्भु.....................

नहीं नीर है नहीं क्षीर है,
नहीं नीर है नहीं क्षीर है, नहीं बेल-पत्र है
आँखों में खारा पानी है और उर में हर हर है
हम सक्षम नहीं भोग लगायें..
हम सक्षम नहीं भोग लगायें, समझो प्रभु लाचारी
जय........................

नहीं चाहिये गंगा जी सा,
नहीं चाहिये गंगा जी सा, केशों में उलझाओ
नहीं चाहिये हमें मयंक सम मस्तक आप सजाओ
अपने चरणों में गिरिवासी..
अपने चरणों में गिरिवासी, रखलो जगह हमारी
जय........................

आप ही कर्ता आप ही हर्ता,
आप ही कर्ता आप ही हर्ता,आप ही जग पालक हैं
कृपादृष्टि बनाये रखना, हम पर हम बालक हैं
नहीं जानते विधि पूजा की..
नहीं जानते विधि पूजा की, हम नादान पुजारी
जय........................

भक्तों के दुःख दूर किये हैं,
भक्तों के दुःख दूर किये हैं, तरह तरह से आकर
बने केसरी भक्तों के हित, लंका रखी जलाकर
तारकासुर को मारा भोले..
तारकासुर को मारा भोले, हे भव भय दुःख हारी
जय........................

दूर करो त्रिशूल घुमाकर,
दूर करो त्रिशूल घुमाकर, शूल सभी जीवन के
हे नीलकण्ठ विष पी लो फिर से मानव अंतर्मन के
हे महादेव देवादिदेव हे..
हे महादेव देवादिदेव हे, अंग भभूति धारी
जय........................

साभार

सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्र अनेक तीर्थों का प्रमुख स्थल है। कश्मीर में अमरनाथ, उत्तराखंड में बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमनोत्री, तिब्बत, चीन में कैलाश, मानसरोवर नेपाल में पशुपतिनाथ और पूर्वोत्तर में कामाख्या आदि तीर्थों सहित अनेक तीर्थ भी सम्पूर्ण हिमालय क्षेत्र में छाए हुए हैं। चातुर्मास के अंदर इन तीर्थ स्थलों पर श्रद्धालुओं की अपार भीड़ रहती है। सभी प्रमुख तीर्थों के संक्षिप्त वर्णन कों हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।

केदारनाथ एवं बद्रीनाथ:

ऋषिकेश से जोशीमठ तक मोटर, बस की राष्ट्रीय सड़क बन गई है। जोशीमठ तक केवल वे यात्री जाते हैं, जिन्हें बद्रीनाथ जाना होता है। केदारनाथ जाने वाले यात्री रूद्रप्रयाग जाते हैं। बाईं ओर कमलेश्वर महादेव का मंदिर है। यह स्थान श्रीक्षेत्र कहलाता है। सोमप्रयाग से गौरीकुंड होते हुए केदारनाथ जाने का रास्ता है।

गौरी कुंड:
यहां दो कुंड हैं, एक गरम पानी का और दूसरा ठंडे पानी का। शीतल जल का कुंड अमृतकुंड कहलाता है। कहते हैं कि भगवती पार्वती ने इसी कुंड में प्रथम स्नान किया था। गौरी कुंड का जल पर्याप्त उष्ण है। माता पार्वती का जन्म यहीं हुआ था। यहां पार्वती के अतिरिक्त श्री राधाकृष्ण मंदिर भी है। इसके नज़दीक ही केदारनाथ है, जहां की चढ़ाई काफी कठिन है। यहां अत्यधिक ठंड पड़ती है। पर्वतीय मक्खियों का उपद्रव बहुत रहता है। श्री केदारनाथ जी द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं।

यह केदार क्षेत्र अनादि है। इस क्षेत्र में महिषरूपधारी भगवान शंकर के विभिन्न अंग पांच स्थानों में प्रतिष्ठित हुए, इसलिए इस क्षेत्र को पंच केदार कहा जाता है। इनमें द्वितीय मदमहेश्वर में नाभि, तृतीय केदार तुंगनाथ में बाहु, चतुर्थ रूद्रनाथ में मुख, पंचम कल्पेश्वर में जटा तथा इस प्रथम केदारनाथ में पृष्ठ भाग प्रतिष्ठित हुआ। केदारनाथ में भगवान शंकर का नित्य सानिध्य बताया गया है। केदारनाथ में कोई मूर्ति नहीं है, बहुत बड़ा त्रिकोण पर्वत खंड सा है, जिसकी पूजा यात्री स्वयं जाकर करते हैं।

मंदिर प्राचीन और साधारण है। भृगुपंथ गंगा, क्षीरगंगा चोरा बाड़ीताल, वासुकी ताल एवं भैरव शिला यहां के दर्शनीय स्थल हैं। यहां पांचों पांडवों की मूर्तियां हैं। इसके अतिरिक्त भीम गुफा और भीम शिला हैं। कहते हैं कि इस मंदिर का जीर्णोद्धार आदि शंकराचार्य ने करवाया था और यहीं उन्होंने देहत्याग भी किया था। मंदिर के पास कई कुंड हैं। पर्वत शिखर पर कमल मिलते हैं। श्री केदारनाथ मंदिर में उषा, अनिरूद्ध, पंच पांडव, श्रीकृष्ण तथा शिव-पार्वती की मूर्तियां हैं। मंदिर के बार परिक्रमा के पास अमृतकुंड, ईशानकुंड, हंसकुंड, रेतकुंड आदि तीर्थ मुख्य हैं।

तुंगनाथ:
यहां स्थित मंदिर में शिवलिंग तथा कई और मूर्तियां हैं। यहां पाताल गंगा नामक एक अत्यंत शीतल जल की धारा बहती है। तुंगनाथ शिखर से पूर्व की ओर नंदा देवी और द्रोणागिरिचल शिखर दिखाई देते हैं। उत्तर की ओर गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ तथा रूद्रनाथ दिखाई पड़ते हैं। दक्षिण में पैड़ी, चंद्र वदनी पर्वत तथा सुरखंडा देवी शिखर दिखाई देते हैं।

जंगलचट्टी:
यदि तुंगनाथ की चढ़ाई न करनी हो, तो चोपता से सीधे जंगलचट्टी पहुंच सकते हैं। यहां 12 मील पर श्री महादेव जी का मंदिर है, परशुराम जी का फरसा तथा अष्टधातु का त्रिशूल दर्शनीय है। यहां वैतरणी नदी बहती है। यहां ऋषिकेश से सीधे बद्रीनाथ जाने वाली सड़क मिलती है, जो जोशीमठ तक जाती है।

मंडलचट्टी से एक मार्ग अमृतकुंड जाता है। इस मार्ग में अनुसूयामठ, अत्रि आश्रम, दत्तात्रेय आश्रम तथा अमृतकुंड मिलते हैं। मंडलचट्टी से एक मार्ग रूद्रनाथ को भी जाता है। रूद्रनाथ चतुर्थ केदार माने जाते हैं। पीपलकोटी से एक मार्ग गोहनताल जाता है। यह स्थान मनोरम है। हेलंग से अलकनंदा का पुल पार करके एक मार्ग कल्पेश्वर शिव मंदिर आता है।

जोशीमठ:
शीतकाल में 6 महीने श्री बद्रीनाथ जी की चलमूर्ति यहीं रहती है। उस दौरान पूजा यहीं होती है। इसके पास एक अत्यंत प्राचीन कल्पवृक्ष और ज्योतिषपीठ शंकराचार्य मठ है, यहां नभगंगा, दंडधारा का स्नान होता है। शालिग्राम शिला में भगवान नृसिंह की अद्भुत मूर्ति है, जिनकी एक भुजा बहुत पतली है और लगता है कि पूजा करते समय वह मूर्ति से कभी भी अलग हो सकती है।

कहा जाता है कि जिस दिन यह हाथ अलग होगा, उसी दिन विष्णुप्रयाग से आगे नर-नारायण पर्वत, जो बिल्कुल पास आ गए हैं, वह मिल जाएंगे और बद्रीनाथ मार्ग बंद हो जाएगा। उसके बाद यात्री भविष्यबद्री जाया करेंगे। जोशीमठ से आगे विष्णुप्रयाग, विष्णु गंगा और अलकनंदा का संगम है। यहां भगवान विष्णु का मंदिर है। देवर्षि नारद ने यहां भगवान की आराधना की थी।

पांडुकेश्वर योग बद्री (ध्यान बद्री) का मंदिर है, जिन्हें पांडुकेश्वर भी कहते हैं। पांडुकेश्वर से एक मार्ग लोकपाल पुष्पघाटी हेमकुंड तथा काकभुशुंडी आश्रम तक जाता है। बद्रीनाथ से 4 मील पर हनुमान चट्टी है, उसके ऊपर ही लोकपाल तीर्थ है। मार्ग पांडुकेश्वर से ही है। रास्ते में झूला पुल से होकर गंगा को पार करना पड़ता है। पुल के पार लक्ष्मण गंगा है, जो लोकपाला सरोवर से निकली है।

बद्रीनाथ धाम के अन्य तीर्थ:
श्री बद्रीनाथ जी के सिंहद्वार से 4-5 सीढ़ियां उतरकर शंकराचार्य मंदिर है, जहां लिंगमूर्ति स्थापित है। उससे 3-4 सीढ़ियां नीचे आदि केदार के दर्शन और तब बद्रीनाथ जी के दर्शन करने चाहिए। केदारनाथ से नीचे तप्तकुंड है, जिसे अग्नितीर्थ कहा जाता है। तप्तकुंड के नीचे निम्नलिखित पांच शिलाएं हैं।

गरूड़ शिला:
यह शिला केदारनाथ मंदिर को अलकनन्दा की ओर से रोके खड़ी है। इसी के नीचे होकर उष्ण जल तप्तकुंड में आता है।

नारद शिला:
तप्तकुंड से अलकनंदा तक एक बड़ी शिला है। इसके नीचे अलकनंदा में नारद कुंड है। इस पर नारद जी ने दीर्घकाल तक तप किया था।

मार्कण्डेय शिला:
नारदकुंड के पास अलकनंदा की धारा में स्थिति शिला इस पर मार्कण्डेय जी ने भगवान की आराधना की थी।

नृसिंह शिला:
नारदकुंड के ऊपर जल में एक सिंहाकार शिला है। हिरण्यकश्यप वध के पश्चात नृसिंह भगवान यहां पधारे थे।

वाराही शिला:
यह उच्च शिला अलकनंदा के जल में है। पाताल से पृथ्वी का उद्धार करके हिरण्याक्ष वध के पश्चात वराह भगवान यहां शिलारूप में स्थित हुए। यहां गंगा जी में लक्ष्मी धारा तीर्थ है। तप्तकुंड से कुछ दूर ब्रह्मकपाली तीर्थ है, जहां श्रद्धालु पिंडदान करते हैं। इसके नीचे ही ब्रह्मकुंड है, जहां ब्रह्माजी ने तप किया था।

ब्रह्मकुंड से मातामूर्ति:
ब्रह्मकुंड से गंगाजी के किनारे-किनारे ऊपर जाने पर जहां अलकनंदा मुड़ती है, वहां अनुसूया तीर्थ है। उस स्थान से माणा की सड़क से आगे चलने पर इन्द्रधारा नामक श्वेत झरना मिलता है, जहां इन्द्र ने तप किया था, इसलिए इसे इन्द्रपद तीर्थ भी कहते हैं। यहां से थोड़ी दूर आगे भारत का अंतिम सीमा वाला माणा गांव है। यह गांव अलकनंदा के उस पार है, किन्तु इसी पार नर नारायण की माता मूर्ति देवी का छोटा सा मंदिर है। भाद्रशुक्ल द्वादशी को यहां मेला लगता है। यह स्थान बद्रीनाथ से लगभग 3 मील है।

सत्पथ तीर्थ:
अलकनंदा के इसी किनारे आगे चलकर अनेक तीर्थ हैं, जिनमें सत्पथ प्रमुख है। सत्पथ के आगे मार्ग दुर्गम ही है आगे बढ़ने पर चढ़ाई पार करने के बाद पर्याप्त नीचे एक गोलकुंड दिखाई देता है। यह सोमतीर्थ है, जिसमें प्रायः जल नहीं रहता। यहां चन्द्रमा ने दीर्घ काल तक तपस्या की थी। आगे मार्ग नहीं है, मार्गदर्शक बर्फ पर अनुमान से ले जाता है। कुछ दूर आगे सूर्यकुंड नामक छोटा सा कुंड है, जहां नर नारायण पर्वत मिल गए हैं। यहीं विषणुकुंड भी है।

यमुनोत्री:
यह स्थान समुद्र तल से दस हजार फुट की ऊंचाई पर है। यहां यात्रियों के ठहरने के लिए कालीकमली वाले क्षेत्र की धर्मशाला है। यहां गरम पानी के कई कुंड हैं। यात्री कपड़े में बांधकर चावल, आलू आदि इन कुंडों में डुबो देते हैं और वे पदार्थ पक जाते हैं। इस प्रकार यहां भोजन बनाने के लिए चूल्हा नहीं जलाना पड़ता। इन कुंडों में स्नान करना संभव नहीं और यमुना का जल इतना शीतल है कि उसमें स्नान करना भी असंभव है। इसलिए गरम तथा शीतल जल मिलाकर स्नान करने के कुंड बने हुए हैं।

बहुत ऊंचाई पर कलिंदगिरि से हिम पिघलकर कई धाराओं में गिरती है। कलिंद पर्वत से निकलने के कारण यमुना कालिंदी कही जाती हैं। वहां शीत इतना है कि बार-बार झरनों का पानी जमता पिघलता है, यमुनोत्री का स्थान संकीर्ण है। छोटी सी धर्मशाला है और छोटा सा यमुना का मंदिर है। कहा जाता है कि महर्षि असित का यहां आश्रम था। वे नित्य स्नान करने गंगा जी आते और यहां निवास करते। यहां यमुनोत्री में वृद्धावस्था में दुर्गम पर्वतीय मार्ग नित्य पार करना उनके लिए कठिन हो गया, तब गंगाजी ने अपना एक छोटा झरना यमुना किनारे ऋषि के आश्रम पर प्रकट कर दिया।

वह उज्जवल पानी का झरना आज भी वहां है। हिमालय में गंगा और यमुना की धाराएं एक हो गई होतीं, यदि दोनों के मध्य दंड पर्वत न होता। देहरादून के समीप भी दोनों धाराएं बहुत पास आ जाती हैं। सूर्यपुत्री यमराज सहोदर कृष्णप्रिया कालिंदी का यह उद्गम स्थान अत्यन्त भव्य है। यहां से एक मार्ग मेलंगघाटी से कैलाश मानसरोवर जाता है। मार्ग कठिन है। श्रीकंठ से आई दूध गंगा यहां भागीरथी में मिलती है। इस संगम पर शिव मंदिर है और सामने श्रीकंठ पर्वत है। यह महाराज भगीरथ का तप स्थान है। यहां गंगापार मुखबा मठ है, जाड़ों में गंगोत्री के पंडे मुखबा में रहते हैं। यहां से कुछ दूर मार्कंडेय स्थान है, शीतकाल में गंगाजी की पूजा यहीं होती है।

गंगोत्री:
वैसे तो गंगा जी का उद्गम गोमुख से हुआ है और वहां की यात्रा बहुत कठिन होने के कारण, बहुत कम यात्री वहां जाते हैं। गंगोत्री में स्नान और गंगाजी का पूजन करके, यात्री गंगाजल लेकर यहीं से नीचे लौटते हैं। यह स्थान समुद्रतल से 20,000 फुट ऊंचाई पर गंगाजी के दक्षिण तट पर है। गंगा यहां केवल 44 फुट चौड़ी है और गहराई लगभग तीन फुट है। आसपास देवदारू तथा चीड़ के वन हैं।

यहां का मुख्य दर्शनीय स्थल श्री गंगा जी का मंदिर है, जिसमें आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिष्ठित गंगा जी की मूर्ति के अतिरिक्त राजा भगीरथ, यमुना सरस्वती एवं शंकराचार्य आदि की मूर्तियां भी हैं। गंगा जी के मंदिर के पास एक भैरवनाथ मंदिर है। गंगोत्री में सूर्यकुंड, विष्णु कुंड, ब्रह्माकुंड आदि तीर्थ हैं। यही विशाल भगीरथ शिला है, जिस पर राजा भगीरथ ने तप किया था।

इस शिला पर पिंडदान किया जाता है। यहां गंगा को विष्णु तुलसी चढ़ाई जाती है। शीतकाल में यह स्थान बर्फ हो जाता है, इसलिए पंडे चलमूर्तियों को मुखबा ग्राम के पास मार्कंडेय क्षेत्र में ले आते हैं। कहा जाता है कि यह मार्कण्डेय ऋषि की तप स्थली है। गंगोत्री से नीचे केदार व गंगा का संगम है।

गोमुख:
गंगोत्री से आगे का मार्ग अत्यंत कठिन है। मार्ग में वन्य जीव रीछ और चीते जैसे वन्य जीव भी मिल सकते हैं। तीव्र वेगी पर्वतीय पालों को पार करना तथा कच्चे पर्वतों पर चढ़ना उतरना बहुत साहस तथा सावधानी की अपेक्षा रखता है। आगे न कोई बना मार्ग है, न पड़ाव और न ही कोई दुकान। गोमुख में ही हिमधारा के नीचे से गंगा जी की धारा प्रकट होती है। इस स्थान की शोभा अतुलनीय है।

गंगा के इस उद्गम में स्नान कर पाना मनुष्य का अहोभाग्य है। गोमुख में इतना शीत है कि जल में हाथ डालते ही हाथ सुन्न हो जाता है। अग्नि जलाकर यात्री स्नान करते हैं। गोमुख से लौटने में शीघ्रता करनी चाहिए, क्योंकि धूप निकलते ही हिमशिखरों से भारी हिमचट्टाने टूट-टूटकर गिरने लगती हैं। श्री बद्रीनाथ से आगे नर-नारायण पर्वत हैं।

नारायण पर्वत के निचले चरण से ही अलकनंदा निकलती है और सत्पथ होकर बद्रीनाथ धाम आती है। यहीं नारायण पर्वत के चरणों से भागीरथी गंगोत्री का हिमप्रवाह भी प्रारंभ होता है। यह प्रवाह सुमेरू पर्वत से शिवलिंग शिखर पर आता है। यह शिखर गोमुख से दक्षिण में है। उससे नीचे उतर कर हिमप्रवाह से गोमुख गंगा की धारा पृथ्वी पर उतरती है।

मानसरोवर कैलाश यात्रा:
हिमालय की पर्वतीय यात्राओं में मानसरोवर कैलाश की यात्रा सबसे कठिन है। यात्रा में यात्रियों को लगभग तीन सप्ताह तिब्बत में ही रहना पड़ता है। केवल यही एक यात्रा है, जिसमें यात्री हिमालय को पूरा पार करते हैं। मानसरोवर, कैलाश, अमरनाथ, सत्पथतीर्थ, गोमुख, स्वर्गारोहण जैसे क्षेत्रों की यात्रा में यात्री ऑक्सीजन मास्क साथ ले जाएं तो हवा में ऑक्सीजन की कमी से होने वाल श्वास कष्ट से बच जाएंगे। इस स्थल पर पहुंचने के अनेक मार्ग हैं। इनमें तीन मार्ग अपेक्षाकृत अधिक सुगम हैं।

(1) पूर्वोत्तर रेलवे के टनकपुर स्टेशन से मोटर बस द्वारा पिथौरागढ़ जाकर फिर वहां से पैदल लिपू नामक दर्रा पार करके जाने वाला मार्ग।
(2) उसी रेलवे के काठगोदाम स्टेशन से मोटर बस द्वारा कपकोट जाकर फिर पैदल यात्रा करते हुए कुंगरी बिंगरी घाटियों को पार करके जाने वाला मार्ग ।
(3) उत्तर रेलवे के ऋषिकेश स्टेशन से मोटर बस द्वारा जोशीमठ जाकर वहां से पैदाल यात्रा करते हुए तपोवन नीती घाटी को पार करके पैदल जाने का सीधी मार्ग।

मानसरोवर: पूरे हिमालय पार करके तिब्बती पठार में लगभग 30 मील जाने पर पर्वतों से घिरे दो महान सरोवर मिलते हैं। मनुष्य के दोनों नेत्रों के समान वे स्थित हैं और उनके मध्य में नासिका के समान ऊपर उठी पर्वतीय भूमि है, जो दोनों को पृथक करती है। इनमें एक है राक्षसताल और दूसरा मानसरोवर।

राक्षसताल विस्तार में बहुत बड़ा है और वह गोल या चौकोर नहीं है। उसकी कई भुजाएं मीलों दूर तक टेढ़ी मेढ़ी होकर पर्वतों में चली गई हैं। कहा जाता है कि किसी समय राक्षसराज रावण ने यहीं खड़े होकर देवाधिदेव भगवान शंकर की आराधना की थी। मानसरोवर का जल अत्यंत स्वच्छ और नीला है। इसका आकार लगभग अंडे जैसा है। मानसरोवर 51 शक्ति पीठों में से एक है। सती की दाहिनी हथेली इसी में गिरी थी।

मानसरोवर में हंस बहुत हैं और राजहंस भी हैं। सामान्य हंसों की दो जातियां हैं, मटमैले सफेद और बादमी। मानसरोवर में सीप के मोती मिल जाते हैं, पर कमल उसमें नहीं है। प्रत्यक्ष में मानसरोवर से कोई नदी या छोटा झरना भी नहीं निकलता है। किन्तु कुछ अन्वेषक अंग्रेज विद्वानों का मत है कि सरयू और ब्रहमपुत्र नदियों में मानसरोवर का जल भूमि के भीतर के मार्गों से आकर मिलता है। मानसरोवर के आसपास कैलाश पर कहीं कोई वृक्ष नहीं, कोई पुष्प नहीं है। सरोवर जल सामान्य शीतल है।

कैलाश:
मानसरोवर से कैलाश लगभग 20 मील दूर है। वैसे उसके दर्शन मानसरोवर पहुंचने से बहुत पहले से ही होने लगते हैं। जौहर मार्ग में कुंगरी बिंगरी की चोटी पर पहुंचते ही, यदि आकाश में बादल न हों, तो यात्री को कैलश के दर्शन हो जाते हैं। तिब्बत के लोगों में कैलाश के प्रति अपार श्रद्धा है। अनेक तिब्बती श्रद्धालु पूरे कैलाश की 32 मील की परिक्रमा, दंडवत प्रणाम करते हुए पूरी करते हैं। वह कैलाश तो दिव्यधाम है, अपार्थिव लोक है, जैसे गोलोक। कैलाश का यह क्षेत्र शिवलिंग के आकार का है, षोडशदल कमल के मध्य स्थिति आस-पास के सभी शिखरों से ऊंचा है।
साभार : पं.केवल आनंद जोशी