रविवार, 2 नवंबर 2008

ध्यान रहे

सुख प्राप्त करने के लिये क्या न करें ?

Omसंसार में यदि आपने किसी प्राणी को किसी प्रकार का कष्ट दिया, तो निश्चित रूप से आपने अष्टमूर्ति शिव का अनिष्ट किया।( प्रमाण नन्दिकेश्वर का ब्रह्मा के पुत्र सनत्कुमार को उपदेश श्री शिवमहापुराण शतरूद्र संहिता अध्याय २ पृष्ठ संख्या ४९९)

प्रदोष-व्रत एवं पूजन का चमत्कार जो प्रदोष के समय भगवान शंकर का पूजन नहीं करता या प्रदोष के समय भगवान शंकर को छोड़कर अन्य देवताओं का पूजन करता है, वह जन्म जन्मान्तर तक दरिद्री रहता है। इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि जो व्यक्ति देहधारी गुरू से दीक्षा लेकर प्रभु शिव का प्रदोष पूजन नही करने पर भी जिसके पास आज धनादि सुख है वह उसके पूर्व जन्म के पुण्य से ही है जो कि वह बैंक से निकाल - निकाल कर खा रहा है। नया पुण्य भगवान शंकर की पूजा के बिना बन ही नहीं सकता। प्रदोष पूजन की दीक्षा की व्यवस्था है, प्रदोष के समय सभी देवता कैलास में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहते है।

"क्रोध" यह एक महान शत्रु है। विश्व में जितने भी धर्म है, उनको मानने वालों के पास ऐसा कोई प्रयोग नहीं है जो क्रोध को शान्त कर सके। एक धर्म को मानने वाले एक व्यक्ति इसी समस्या (क्रोध) को लेकर अपने धर्मगुरू के पास गये। धर्मगुरू ने कहा, "विचारों से क्रोध को कम करो और अगले दिन २४ घंटे निर्जला, निराहार व्रत करो।" उस व्यक्ति ने हमे बताया कि व्रत के डर से उसने क्रोध कम कर दिया। क्रोध आता तो है परन्तु उसे अन्दर ही अन्दर दबा देते है, जिससे शरीर में अनेक रोग उत्पन्न हो गये हैं। हमारे आश्रम में क्रोध को शान्त करने के सरल उपाय सिखाये जाते हैं, जिससे मनुष्य का स्वभाव ही परिवर्तित हो जाता है। कितनी बड़ी देन है हमारे आश्रम की समाज के प्रति। श्री शिवमहापुराण में अनेकों प्रसंग हैं, जहॉं ने शिव-पूजा से अपने तामसिक स्वभाग को सात्विक बना लिया।

शिवलिंग पूजा का महत्व

श्री शिवमहापुराण के सृष्टिखंड अध्याय १२श्लोक ८२से८६ में ब्रह्मा जी के पुत्र सनत्कुमार जी वेदव्यास जी को उपदेश देते हुए कहते है कि हर गृहस्थ को देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर पंचदेवों (श्री गणेश,सूर्य,विष्णु,दुर्गा,शंकर) की प्रतिमाओं में नित्य पूजन करना चाहिए क्योंकि शिव ही सबके मूल है, मूल (शिव)को सींचने से सभी देवता तृत्प हो जाते है परन्तु सभी देवताओं को तृप्त करने पर भी प्रभू शिव की तृप्ति नहीं होती। यह रहस्य देहधारी सद्गुरू से दीक्षित व्यक्ति ही जानते है।
सृष्टि के पालनकर्ता विष्णु ने एक बार ,सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के साथ निर्गुण-निराकार- अजन्मा ब्रह्म(शिव)से प्रार्थना की, "प्रभों! आप कैसे प्रसन्न होते है।"

प्रभु शिव बोले,"मुझे प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग का पूजन करो। जब जब किसी प्रकार का संकट या दु:ख हो तो शिवलिंग का पूजन करने से समस्त दु:खों का नाश हो जाता है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय श्लोक से पृष्ठ )

(२) जब देवर्षि नारद ने श्री विष्णु को शाप दिया और बाद में पश्चाताप किया तब श्री विष्णु ने नारदजी को पश्चाताप के लिए शिवलिंग का पूजन, शिवभक्तों का सत्कार, नित्य शिवशत नाम का जाप आदि क्रियाएं बतलाई।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय श्लोक से पृष्ठ )

(३) एक बार सृष्टि रचयिता ब्रह्माजी देवताओं को लेकर क्षीर सागर में श्री विष्णु के पास परम तत्व जानने के लिए पहुॅचे । श्री विष्णु ने सभी को शिवलिंग की पूजा करने की आज्ञा दी और विश्वकर्मा को बुलाकर देवताओं के अनुसार अलग-अलग द्रव्य के शिवलिंग बनाकर देने की आज्ञा दी और पूजा विधि भी समझाई।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय १२ )

(४) रूद्रावतार हनुमान जी ने राजाओं से कहा कि श्री शिवजी की पूजा से बढ़कर और कोई तत्व नहीं है। हनुमान जी ने एक श्रीकर नामक गोप बालक को शिव-पूजा की दीक्षा दी। (प्रमाण श्री शिवमहापुराण कोटीरूद्र संहिता अध्याय १७ ) अत: हनुमान जी के भक्तों को भी भगवान शिव की प्रथम पूजा करनी चाहिए।

(५) ब्रह्मा जी अपने पुत्र देवर्षि नारद को शिवलिंग की पूजा की महिमा का उपदेश देते है। देवर्षि नारद के प्रश्न और ब्रह्मा जी के उत्तर पर ही श्री शिव महापुराण की रचना हुई है। पार्वती जगदम्बा के अत्यन्त आग्रह से, जनकल्याण के लिए, निर्गुण निराकार अजन्मा ब्रह्म (शिव) ने सौ करोड़ श्लोकों में श्री शिवमहापुराण की रचना की। चारों वेद और अन्य सभी पुराण, श्री शिवमहापुराण की तुलना में नहीं आ सकते। प्रभू शिव की आज्ञा से विष्णु के अवतार वेदव्यास जी ने श्री शिवमहापुराण को २४६७२ श्लोकों में संक्षिप्त किया है। ग्रन्थ विक्रेताओं के पास कई प्रकार के शिवपुराण उपलब्ध है परन्तु वे मान्य नहीं है केवल २४६७२ श्लोकों वाला श्री शिवमहापुराण ही मान्य है। यह ग्रन्थ मूलत: देववाणी संस्कृत में है और कुछ प्राचीन मुद्रणालयों ने इसे हिन्दी, गुजराती भाषा में अनुदित किया है। श्लोक संख्या देखकर और हर वाक्य के पश्चात् श्लोक क्रमांक जॉंचकर ही इसे क्रय करें। जो व्यक्ति देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर , एक बार गुरूमुख से श्री शिवमहापुराण श्रवण कर फिर नित्य संकल्प करके (संकल्प में अपना गोत्र,नाम, समस्याएं और कामनायें बोलकर)नित्य श्वेत ऊनी आसन पर उत्तर की ओर मुखकर के श्री शिवमहापुराण का पूजन करके दण्डवत प्रणाम करता है और मर्यादा-पूर्वक पाठ करता है, उसे इस प्रकार सम्पूर्ण २४६७२ श्लोकों वाले श्री शिवमहापुराण का बोलते हुए सात बार पाढ करने से भगवान शंकर का दर्शन हो जाता है। पाठ करते समय स्थिर आसन हो, एकाग्र मन हो, प्रसन्न मुद्रा हो, अध्याय पढते समय किसी से वार्ता नहीं करें, किसी को प्रणाम नहीं करे और अध्याय का पूरा पाठ किए बिना बीच में उठे नहीं। श्री शिवमहापुराण पढते समय जो ज्ञान प्राप्त हुआ उसे व्यवहार में लावें।श्री शिव महापुराण एक गोपनीय ग्रन्थ है। जिसका पठन (परीक्षा लेकर) सात्विक, निष्कपटी, प्रभू शिव में श्रद्धा रखने वालों को ही सुनाना चाहिए।

(६) जब पाण्ड़व लोग वनवास में थे , तब भी कपटी, दुर्योधन , पाण्ड़वों को कष्ट देता था।(दुर्वासा ऋषि को भेजकर तथा मूक नामक राक्षस को भेजकर) तब पाण्ड़वों ने श्री कृष्ण से दुर्योधन के दुर्व्यवहार के लिए कहा और उससे राहत पाने का उपाय पूछा। तब श्री कृष्ण ने उन सभी को प्रभू शिव की पूजा के लिए सलाह दी और कहा "मैंने सभी मनोरथों को प्राप्त करने के लिए प्रभू शिव की पूजा की है और आज भी कर रहा हॅूॅ।तुम लोग भी करो।" वेदव्यासजी ने भी पाण्ड़वों को भगवान् शिव की पूजा का उपदेश दिया। हिमालय में, काशी में,उज्जैन में, नर्मदा-तट पर या विश्व में कहीं भी चले जायें, प्रत्येक स्थान पर सबसे सनातन शिवलिंग की पूजा ही है। मक्का मदीना में एवं रोम के कैथोलिक चर्च में भी शिवलिंग स्थापित है परन्तु सही देहधारी सद्गुरू से दीक्षा न लेकर ,सही पूजा न करने से ही हमें सांसारिक सभी सुख प्राप्त नहीं हो रहे है।

श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय ११ श्लोक १२से १५ में श्री शिव-पूजा से प्राप्त होने वाले सुखों का वर्णन निम्न प्रकार से है:- दरिद्रता, रोग सम्बन्धी कष्ट, शत्रु द्वारा होने वाली पीड़ा एवं चारों प्रकार का पाप तभी तक कष्ट देता है, जब तक प्रभू शिव की पूजा नहीं की जाती। महादेव का पूजन कर लेने पर सभी प्रकार का दु:ख नष्ट हो जाता है, सभी प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते है और अन्त में मुक्ति लाभ होता है। जो मनुष्य जीवन पाकर उसके मुख्य सुख संतान को प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें सब सुखों को देने वाले महादेव की पूजा करनी चाहिए। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र विद्यिवत शिवजी का पूजन करें। इससे सभी मनोकामनाएं सिद्द्ध हो जाती है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय ११श्लोक१२ से १५)

महिलाओं के लिये शिव पूजा

स्त्री को सबसे बड़ा सुख है - रूपवान, धनवान,बुद्धिमान और अनुकूल पति। सती जगदम्बा को सर्व गुण सम्पन्न और सृष्टि का मालिक भगवान शंकर ही पति रूप में मिल गए। प्रभु शिव ने भी लोग व्यवहार के अनुसार (आत्म चिन्तन छोड़कर) सती के साथ विहार करके उसे पूर्ण रूप से तृत्प किया। पूर्ण तृत्प होने पर सती जगदम्बा ने प्रभु शिव से प्रार्थना की ," हे नाथ ! आपने बहुत समय तक मेरे साथ विहार किया, उससे मैं प्रसन्न हॅू और मैरा मन उस ओर से निवृत्त हो गया है। अब मैं हे देवेश! हे हर!उस परम तत्व को आपसे जानना चाहती हॅू जिससे प्राणी शीघ्र ही संसार के दु:खों से पार हो जाये, जिसे करके विषयी जीव परम-पद को पाकर पुन: संसार में जन्म न ले सके। कृपा करके उस तत्व का आप वर्णन कीजिए।( प्रमाण श्री शिव महापुराण सतीखंड अध्याय २३श्लोक ४-९ पृष्ठ संख्या १९१)तब प्रभु शिव ने अपना गुप्त ज्ञान (शिव की नवधा भक्ति) सती जगदम्बा को दिया।...... भुक्ति-मुक्ति रूप फल को देने वाली मेरी भक्ति ब्रह्म-ज्ञान की माता है....भक्ति और ज्ञान में कोई भेद नहीं है..... मेरी भक्ति ज्ञान एवं वैराग्य उत्पन्न करती है, मुक्ति भी इसकी दासी बनी रहती है।( प्रमाण श्री शिव महापुराण अध्याय श्लोक १२-४६ पृष्ठ संख्या १९२-१९३)

पार्वती जगदम्बा ने जन कल्याण के लिए प्रभु शिव से पूछा,"अजितेन्द्रिय तथा मन्दबुद्धि वालों के वश में आप कैसे हो सकते है ? "प्रभु शिव ने जो रहस्यमय उपदेश पार्वती को दिया, वह २४६७२ श्लोक वाले श्री शिव महापुराण के वायवीय संहिता उत्तर भाग के अध्याय १०-११ पृष्ठ ८९५-८९९ में देख सकते है।

इसमें प्रभु शिव ने कृपा करके ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शुद्रों के भी कर्तव्य दिये हैं। विधवा स्त्री का धर्म बताया है। प्रभु शिव ने वेद-पुराण दूसरों को पढाना, यज्ञ कराना और दान लेने का अधिकार केवल ब्राह्मणों को दिया है, क्षत्रियों, वैश्यों को नहीं दिया। (श्री शिव महापुराण वायवीय संहिता उत्तर भाग अध्याय ११श्लोक १२ पृष्ठ ८९८) इसका स्पष्ट अर्थ है कि जो व्यक्ति, प्रभु शिव की इस आज्ञा को न मानकर,विरूद्ध कर्म करता है वह निश्चित मरकर नरक में जाता है।

- पति-पत्नी के धर्म क्या है?
- पति में क्या गुण होने चाहिए, पति को पत्नी की कैसे रक्षा करनी चाहिए?
- धर्म कर्म में कैसे सहायक होना चाहिए, इसका सम्पूर्ण ज्ञान वेद और पुराणों में दिया गया है।
- पतिव्रता पत्नी में क्या लक्षण होने चाहिए?
- पतिव्रता पत्नी कैसे अपने उद्धार के साथ पति और माता-पिता की तीन-तीन पीढ़ियों को तार सकती है? उसका वर्णन पार्वती खंड के अध्याय ५४ में वर्णित है।

प्रभु शिव की आज्ञा है कि "स्त्रियों के लिए पति सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। यदि पति की आज्ञा हो तो वह मेरा (शिव) पूजन करें।" जो स्त्री, पति की सेवा को छोड़कर व्रत करने लगती है, वह नि:सन्देह नरक को जाती है।(श्री शिव महापुराण वायवीय संहिता उत्तर भाग अध्याय ११ श्लोक १९-२० पृष्ठ ८९८)भारत में जन्मी स्त्रियों को इस ज्ञान पर विशेष ध्यान देना चाहिए। प्रभु शिव के इस आदेश के अनुसार महिलाओं को प्रभु शिव की उपासना के अतिरिक्त और कोई अधिकार नहीं है।

भारत की नारियों को, प्रभु शिव की पूजा का अधिकार कब प्राप्त हो सकता है, उसके लिए आश्रम से सम्पर्क करें।अधिकांश महिलाएं पूजा में किस भंयकर गलती के कारण विधवा होकर मरती है(सुहागिन होकर नहीं मरती) इस आश्रम से मार्गदर्शन लें।

जब ब्रह्मा के पुत्र दक्ष प्रजापति (जिनकी ६० कन्याओं से इन्द्रादि लोकपाल उत्पन्न हुए) एक महान यज्ञ सत्ययुग में किया उस यज्ञ में सभी को बुलाया केवल एक संहारक शंकर जी को ही नहीं बुलाया। तब दक्ष की पुत्री सती जगदम्बा स्वयं कनखल में हो रहे यज्ञ-स्थल में आई और अपने पिता से बोली,...."जो महादेव की निन्दा करता है तथा निन्दा के वचनों को सुनता है, वे दोनों ही तब तक नरक गामी होते है जब तक चन्द्र और सूर्य रहते है... शिव ये दो अक्षरों वाला नाम जिन मनुष्यों की जीभ ने एक बार भी लिया है वह उनके समस्त पापों का नाश कर देता है।( प्रमाण श्री शिव महापुराण सतीखण्ड अध्याय २९ पृष्ठ संख्या २०४ से २०६)

महिलाओं को श्री शिव की पूजा बहुत शीघ्र फलवती हो जाती है। महानन्दा, चंचुला, पिंगला, शारदा, ऋषिका, आहुका आदि अनेक महिलाओं ने शिव भक्ति के प्रभाव से सद्गति प्राप्त की। कन्या में आत्मबल की वृद्धि,प्रभु शिव की (शिवलिंग में)पूजा के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। ५ से ८ वर्ष की कन्या यदि सही सद्गुरू से दीक्षा लेकर शिव-पूजा करती है तो उससे आत्मबल भी बढ़ता है, इसी जन्म में राजपद् भी प्राप्त होता है और वह निश्चित रूप से कुल तारक संतान को ही उत्पन्न करेगी। शेष जीवन को सुधारने के लिए महिला आश्रम से नि:शुल्क सेवा प्राप्त कर सकती है।(यदि महिला कोई धन नहीं कमाती हो) स्कन्दपुराण में यादव कुल की राजकुमारी कलावती की कथा इसी जन्म में मुक्त होने के लिए, अगले जन्म में राजकुल प्राप्त करने के लिए या अगले जन्म में पुरूष रूप में जन्म लेने के लिए, आश्रम से अलग - अलग क्रियाएं सिखायी जाती है।

महिलाओं को जबभी कभी कोई कष्ट होता है तो वे देहधारी शिवभक्त सद्गुरू से दीक्षा लेकर, भगवान शंकर की शिवलिंग में पूजा (संकल्प करके ) करके शिवलिंग के सामने ही महानन्दा की कथा का पाठ बोलकर करती है। महानन्दा एक वैश्या थी और महान् शिवभक्ता थी। बिना तपस्या के ही महानन्दा को निष्कपट-भाव से श्रद्धा-भक्ति से शिवलिंग का पूजन,प्रभु शिव के व्रत करने तथा शिवभक्त ब्राह्मणों को दान देने से घर बैठे प्रभु शिव ने दर्शन दिये और महानन्दा के मॉंगने पर प्रभुशिव ने उसको उसके समाज सहित सभी को शिव-लोक प्रदान कर अतुल सुख दिया। यह कथा स्कन्द पुराण में महानन्दा के नाम से और श्री शिवमहापुराण के शतरूद्र संहिता के अध्याय २६ प्रभु शिव के वैश्यनाथ अवतार के नाम से वर्णित है। महिलाये विधि को आश्रम से सीख सकती है। अतिथी सत्कार की महिमा सभी धर्म शास्त्रों में वर्णित है। स्कन्द पुराण में वेश्या पिंगला का चरित्र और श्री शिवमहापुराण में आहुका का चरित्र (शतरूद्र संहिता अध्याय २८ में) अतिथी सत्कार में यदि किसी महिला ने एक बार भी शिवभक्त का सत्कार कर दिया, तो निश्चित रूप से भगवान शंकर स्वयं अगले जन्म में सद्गुरू रूप से उसे दीक्षा देकर उसकी सद्गति करते है। अतिथी सत्कार की विधि आश्रम से नि:शुल्क सिखायी जाती है।

आजकल कुछ कपटी लोगों ने एक भ्रामक प्रचार फैला रखा है कि स्त्रियों को शिवलिंग के स्पर्श एवं पूजन का अधिकार नहीं है। रूद्राक्ष और भ्रस्म त्रिपुण्ड़ लगाने का अधिकार नहीं है। विष्णु भक्तों को रूद्राक्ष नहीं पहनना चाहिए, भस्म त्रिपुण्ड़ नहीं लगाना चाहिए, शिवलिंग का पूजन नहीं करना चाहिए, शिवजी का प्रसाद नहीं खाना चाहिए इत्यादि। वसिष्ठ की पत्नी अरून्धती जिसके दर्शन आज भी आकाशमण्डल के सप्तर्षि मण्ड़ल में होते हैं। यह अरून्धती पूर्व जन्म में ब्रह्मा की पुत्री सन्ध्या थी। सन्ध्या नेे गुरू वसिष्ठ से ऊॅं नम: शंकराय ऊॅं मंत्र की दीक्षा लेकर चार युगों तक हिमालय की चन्द्रभागा नदी के तट पर प्रभु शिव के लिए तपस्या की। ऋषि अत्रि की पत्नी अनसूया ने, अपने पति अत्रि के साथ प्रभु शिव की पूजा करके ब्रह्मा-विष्णु-महेश के अंश से एक-एक पुत्र दुर्वासा, दत्तात्रेय और चन्द्रमा उत्पन्न किये। चंचुला ब्राह्मणी भ्रष्ट हो गई थी। उसने देहधारी गुरू से दीक्षा लेकर शिवोपासना से सद्गति प्राप्त की। सूर्यवंशी राजा दशरथ की पत्नियॉं कौशल्या - सुमित्रा - कैकई ने शिव-पूजन से ही श्री विष्णु के अंश से चार पुत्र राम-लक्ष्मण- भरत-शत्रुघ्न प्राप्त किए। भारद्वाज गोत्र में उत्पन्न सुधर्मा ब्राह्मण की पुत्री घुष्मा ने शिवलिंग का पूजनकर बिना तपस्या के ही प्रभु शिव का साक्षात्कार कर लिया और उसके नाम से द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रसिद्ध घुष्मेश्वर ज्योतिर्लिंग(एलोरा गुफा के समीप) विराजमान है।

हिमालय जो कि विष्णु का अंश है, उसके १०० पुत्र थे परन्तु वे सब से अधिक स्नेह अपनी पुत्री पार्वती से करते थे। राजा अनरण्य जिसने सफलतापूर्वक १०० यज्ञ किए थे। देवता उसे इन्द्रपद प्रदान कर रहे थे परन्तु उसने स्वीकार नहीं किया। उसके भी सौ पुत्र थे। राजा अनरण्य सौ पुत्रों से भी अधिक स्नेह अपनी पुत्री पद्मा से करते थे। कन्या संतान भी कुलतारक होती है।

शिव पूजा विधि

श्री शिवमहापुराण में एक सूत्र इस प्रकार से है :- वेदी पर स्थापित प्रतिमा में, अग्नि में और ब्राह्मण के शरीर में षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। उक्त तीनो प्रकार में उत्तरोत्तर पूजन करना श्रेष्ठ है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण विद्येश्वर संहिता अध्याय १४ श्लोक२४) ब्राह्मण के षोडशोपचार पूजन में ये प्रक्रियाएं हैं। एक दिन पूर्व ब्राह्मण देवता को घर से सम्मानपूर्वक अपने घर लाना, उनके चरण धोकर चरणामृत पीना, उन्हें जल पान कराना, उनकी तेल-पंचामृत-पंचगव्य से अभिषेक करना, शरीर पोंछना, इत्र लगाना,भस्म त्रिपुण्ड़ लगाना , वस्त्र -उपवस्त्र पहनाना, पुष्प-माला पहनाना, धूप करना, पंच पकवान, ऋतु-फल खिलाना, दक्षिणा देना, आरती करना, चॅंवर डुलाना, चरण -सेवन करना और घर तक पहुॅचाने जाना।

मैं इस प्रकार का नित्य ब्राह्मणों का पूजन करू- यह वरदान विष्णु के अवतार कृष्ण ने ब्राह्मण बालक उपमन्यु (ऋषि व्याघ्रपाद के पुत्र, द्यौम्य के बड़े भाई) से दीक्षा लेकर हिमालय पर १६ महीने तपस्या करके प्रभु शिव एवं पार्वती से आठ-आठ वरदानों में यह वरदान(ब्राह्मणों का नित्य पूजन) भी मॉंगा था।श्री गणेश जो कि प्रथम पूज्य है, विघ्ननाशक है तथा सब सिद्धियों को देने वाले हैं, उनकी पूजा की सिद्धि के लिए भी ब्राह्मणों का पूजन अनिवार्य है। (प्रमाण श्री शिवमहापुराण कुमारखंड अध्याय १८ ) शास्त्रों में पॉंच प्रकार के ब्राह्मण वर्णित है। यहॉं ब्राह्मण का अर्थ है जो जन्म और कर्म से ब्राह्मण हो। आपको जिस ब्राह्मण का नित्य पूजन करना है, उसके लक्षण निम्न होने चाहियें :- वह जन्म कर्म का ब्राह्मण हो, गुरू परम्परा से निर्गुण - निराकार अजन्मा ब्रह्म(शिव) के कर्मकाण्ड में दीक्षित हो, मंत्रों से रूद्राक्ष और भस्म त्रिपुण्ड़ धारण करता हो, श्री शिवमहापुराण २४६७२ श्लोक वाले का नित्य पूजन कर, साष्टॉंग प्रणाम कर, आजीवन मर्यादापूर्वक पाठ करता हो, नित्य दिन में १२ बार नर्मदेश्वर शिवलिंग का जल बिल्व पत्रादि से पूजा करता हो, नित्य सौ माला ऊॅं नम: शिवाय मंत्र को जपता हो, नित्य व्रत अथवा महिने में दस व्रत करता हो।(दोनों अष्टमी, दोनों एकादशी, दोनो प्रदोष तथा सभी सोमवार) प्रदोष का विशेष पूजन करता हो। हर मास शिवरात्रि को निर्जला-निराहार, रात्रि जागरण पूर्वक चार - पूजन करता हो, दिव्य नदी नर्मदा के तट पर रहता हो और प्राप्त दान में से चतुर्थांश हर माह दान करता हो। दिव्य नदी नर्मदा के नाभिक्षेत्र, दक्षिण-तट पर स्थापित श्री विमलेश्वर महादेव आश्रम में ऐसे गुरू परम्परा से दीक्षित , नित्य व्रत रखने वाले कर्मकाण्डी ब्राह्मण उपलब्ध है। ऐसे ब्राह्मणों का नित्य पूजन करने से और उनके द्वारा अनुष्ठान करवाने पर आपको घर बैठे निम्न लाभ प्राप्त होंगे जो कि विश्व में अन्यत्र कहीं संभव नहीं है।
सांसारिक सभी कामनाओं की प्राप्ति, पुराने सभी पापों का नाश(अब आपको पुराने पापों का बुरा फल भोगना नहीं पडेगा),शत्रु पीडा, ग्रह पीड़ा का नाश, पितरों की सद्गति, सुखद बुढापा, शांतिपूर्ण मृत्यु, निश्चित रूप से अगला जन्म राजकुल अथवा योगी कुल में प्राप्त होना, निश्चित रूप से तीन जन्मों में मुक्ति।

(२४) श्री गणेश की उत्पत्ति का रहस्य

श्री गणेश प्रथम पूज्य क्यों है ? श्री गणेश की विद्यिवत दीक्षा लेकर पूजा करने का फल, श्री गणेश की पूजा से पूरा फल क्यों नहीं मिल रहा है?
सभी धर्मशास्त्रों (वेद-पुराणादि)प्रभु शिव को सर्वोपरि मानते है फिर प्रभु शिव और पार्वती जगदम्बा ने मिलकर श्री गणेश क्यों उत्पन्न किया ? प्रभु शिव ने ही गणेश को अनेक वरदान दिये, प्रभु शिव ने ही प्रथम स्वयं गणेश पूजन किया। ब्रह्मा -विष्णु-महेश ने एक साथ गणेश को प्रथम पूजित होने का वरदान दिया फिर भी ये गणेश प्रभु शिव और पार्वती की आज्ञा के बिना आपका कार्य नहीं करते।

जो व्यक्ति अपने विश्वस्त एवं योग्य शिष्यों के तीनों गुणों(तामस, राजस, सात्विक) को हटाकर प्रभु शिव का साक्षात्कार करा देता है वही गुरू कहने योग्य हैं ( श्री शिव महापुराण विद्येश्वर संहिता अ०१८ श्लोक ८५-९८ पृष्ठ ७०-७१) जिसके मस्तक पर भस्म त्रिपुण्ड नहीं हो, शरीर में रूद्राक्ष धारण किया न हो और मुख में शिव नाम न हो ऐसे अधम को छोड़ देना चाहिए( श्री शिव महापुराण विद्येश्वर संहिता अ०२३ श्लोक १३ पृष्ठ ८२)पापों का विनाश करने के लिए ही रूद्राक्ष धारण करना कहा गया है। इसीलिए सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले इस रूद्राक्ष को अवश्य धारण करना चाहिए शिव भक्तों को, विष्णु भक्तों को तथा चारों वर्णो को, सभी स्त्रियों को धारण करना चाहिए।(प्रभु शिव ने पार्वती को यह गुप्त ज्ञान दिया)( श्री शिव महापुराण विद्येश्वर संहिता अ०२५ पृष्ठ ८८-९२)

दैत्यों के गुरू शुक्राचार्य के पास मृत संजीवनी विद्या है।(अर्थात् मृत को जीवित करने की विद्या)। यह विद्या विष्णु और ब्रह्मा के पास भी नहीं है, देवताओं के गुरू वृहस्पति के पास भी नहीं है। दैत्यों के गुरू शुक्राचार्य काशी में पॉंच हजार वर्ष तक (शुक्रेश्वर लिंग स्थापित कर)तपस्या की। प्रभु शिव प्रसन्न हुए और शुक्राचार्य ने शिव की अष्टमूर्ति की स्तुति की और प्रभु शिव ने प्रसन्न होकर शुक्राचार्य जी को मृतसंजीवनी विद्या प्रदान की।( प्रमाण श्री शिव महापुराण युद्धखण्ड अध्याय ५० पृष्ठ संख्या ४७४ से ४७६)
प्रहृलाद,विष्णु भक्त था। श्री विष्णु ने उसे बचाने के लिए नृसिंह अवतार लेकर उसके पिता हिरण्यकशिपु का वध किया। प्रहृलाद का पुत्र विरोचन महादानी था जिसने कपटी इन्द्र को (जो ब्राह्मण का रूप धर करआया था)अपना सिर काटकर दे दिया। विरोचन का पुत्र राजा बलि भी महादानी था और महान् शिवभक्त था। वरदान के कारण प्रभु शिव अपने गणों के साथ बाणासुर की राजधानी शोणितपुर में रहते थे ....... श्री कृष्ण का बाणासुर के साथ युद्ध हुआ, जिसमेें प्रभु शिव बाणासुर की ओर से श्री कृष्ण से लड़े। श्री कृष्ण सहित यादवों की सारी सेना परास्तहो गई तब श्री कृष्ण ने प्रभु शिव की स्तुति करके प्रभु को युद्ध स्थल से हट जाने के लिए प्रार्थना की।( प्रमाण श्री शिव महापुराण युद्धखण्ड अध्याय ५४ श्लोक ४३-५६ पृष्ठ संख्या ४८४)
सती जगदम्बा ने (जब सीता बनकर) राम की परीक्षा ली। तब सती के पूछने पर राम ने (विष्णु रूप में) प्रभु शिव से प्राप्त वरदान का वर्णन किया।( प्रमाण श्री शिव महापुराण सतीखण्ड अध्याय २५ श्लोक १-३८ पृष्ठ संख्या १९६-९७)जिस पर आप दोनों(शिव तथा सती) की दया हो जाती है, वही पुरूष श्रेष्ठ होता है।

Shiv Poojaदक्ष के यज्ञ में विष्णु अध्यक्ष थे, ब्रह्मा भी उपस्थित थे, इन्द्रादि आठों लोकपाल आयुध लेकर यज्ञ की रक्षा करते थे, ८८ हजार ऋषि एक समय अग्नि में आहुति देते थे। अग्नि, साक्षात हजारों जिव्हा बनाकर आहुति स्वीकार कर रहे थे। सती जगदम्बा भी आ गई थी। केवल एक संहारक महेश ही नहीं थे( जबकि यज्ञ जैसे मांगलिक कार्य में संहारक देवता की आवश्यकता भी नहीं है फिर भी सत्युग में किये गये ब्रह्मा के पुत्र दक्ष प्रजापति का, समस्त विश्व का कल्याण हो- ऐसी श्रेष्ठ कामना से, यज्ञ जैसा शुभ कर्म भी सफल नहीं हुआ। यज्ञ विध्वंस हुआ, दक्ष प्रजापति मारा गया।संहारक भगवान शंकर की जटा के एक बाल के आधे टुकड़े से उत्पन्न वीरभद्र ने बड़ी सरलता से दक्ष का सिर काटकर अग्नि में डाल दिया और यज्ञ विध्वंस किया।वीरभद्र ने उत्पन्न होकर प्रभु शिव से कहा।( प्रमाण श्री शिव महापुराण सतीखण्ड अध्याय ३२ श्लोक २८-४४ पृष्ठ संख्या २१०-२११) हे शिवजी! आपकी आज्ञा से, नीच पुरूष भी संसार रूपी समुद्र को पार कर लेते है। आपके भेजे हुए तृण से भी बिना परिश्रम ही, बडे-़बड़े कार्य क्षण भर में हो जाते हैं इसमें कोई संदेह नहीं हैं।आपकी आज्ञा के बिना, कोई भी तिनका आदि वस्तुओं को भी हिला नहीं सकता, इसमें संदेह नहीं है। उसी की प्रतिदिन विजय होती है, उसी को शुभ की प्राप्ति होती है, जिसके मन में उत्तम आश्रय स्वरूप शिव में दृढ़ भक्ति होती है। वीरभद्र ने सरलता से दक्ष प्रजापति का सिर काटकर अग्नि कुण्ड में डाल दिया और यज्ञ विध्वंस कर दिया।( प्रमाण श्री शिव महापुराण सतीखण्ड अध्याय ३७ पृष्ठ संख्या २१८-२२०)
पृथ्वी पर सबसे बड़ा व्यक्ति देहधारी गुरू से दीक्षित शिव भक्त ब्राह्मण। यह व्यक्ति पृथ्वी पर राजा से भी बड़ा होता है और सबसे अधिक पूज्य होता है। ऐसे ही च्यवन ऋषि के पुत्र दधीचि ऋ़षि ने विष्णु और उनके सहायक इन्द्रादि लोकपालों को बिना अस्त्र के पराजित कर दिया और विष्णु सहित सभी देवताओं को शाप भी दिया।इस प्रसंग का नित्य (विधिवत)पाठ करने से शत्रु पर विजय प्राप्त होती है।( प्रमाण श्री शिव महापुराण सतीखण्ड अध्याय ३८-३९ पृष्ठ संख्या २२०-२२५)
इस अनुष्ठान का विधान आप आश्रम से सीख सकते हैं। जब सारा प्रयत्न करने पर भी (विष्णु-ब्रह्मा-इन्द्रादि लोकपाल के पूरा प्रयत्न करने पर भी) विध्वंस हो गया और दक्ष प्रजापति मारे गये, तब विष्णु ब्रह्मा इन्द्रादि लोकपाल कैलास में जाकर प्रभु शिव से क्षमा याचना मॉंगी और दक्ष को पुन: जीवित करनेऔर यज्ञ को पुन: सफल करने की प्रार्थना की। प्रभु शिव की प्रथम पूजा होगी और प्रभु शिव का भग निकाला जायेगा ऐसा विश्वास दिलाने पर प्रभु शिव ने कृपा की। दक्ष के धड़ पर बकरे का सिर लगाकर, प्रभु शिव ने अपनी कृपा दृष्टि से उसे जीवित कर दिया।(देवताओं की स्तुति श्री शिव महापुराण सतीखण्ड अध्याय ४१ पृष्ठ संख्या २२७-२२८) दक्ष ने (बकरे के सिर से) प्रभु शिव की स्तुति की( प्रमाण श्री शिव महापुराण सतीखण्ड अध्याय ४२ श्लोक ३२-४१ पृष्ठ संख्या २२९-२३०)आपने दंड़ देकर मेरे ऊपर बड़ी कृपा की। मैं मूर्ख हॅू। हे देव! मैने आपके तत्व को नहीं समझा। मैं आज आपके तत्व को समझ गया कि आप सर्वश्रेष्ठ है। आप ब्रह्मा-विष्णु आदि के भी सेवनीय है। वेदों द्वारा जानने योग्य महेश्वर है। आप साधु पुरूषों के लिए कल्पवृक्ष के समान है। दुष्टों को सदैव दंड़ देते है। आप स्वतंत्र परमात्मा है, अपने भक्तों को इच्छित वरदान देते है। हे शिवजी! आपने ही विद्या, तप, व्रत को धारण करने वाले ब्राह्मणों की सबसे पहले आत्म तत्व को जानने े लिए अपने मुख से सृष्टि की। जिस प्रकार ग्वाला, पशुओं की रक्षा करता है उसी प्रकार आप प्राणियों की, सभी आपत्तियों से दंड़ धारण कर, रक्षा करते हैं और आप ही मर्यादा के रक्षक है।
ब्रह्मा, अपने पुत्र देवर्षि नारद को समझाते है, "जब तक मनुष्य गृहस्थाश्रम में रहे तब तक वह पंचदेवों की प्रतिमाओं (श्री गणेश-सूर्य-विष्णु-दुर्गा-शंकर) का पूजन करता रहे अथवा केवल प्रभु शिवजी की शिवलिंग में पूजा करे, वे ही सबके मूल है क्योंकि मूल को सींचने से शाखादि सभी तृप्त हो जाते हैं। शाखाओं(श्री गणेश-सूर्य-विष्णु-दुर्गा) को सींचने से मूल (शिव) की प्राप्ति नहीं होती है। इस प्रकार सभी देवताओं(श्री गणेश-सूर्य-विष्णु-दुर्गा) के तृप्त हो जाने पर भी प्रभु शिवजी की तृप्ति नहीं होती है। ऐसा सुक्ष्म बुद्धि वालों को जानना चाहिये और शिवजी को पूज लेने पर सभी देवताओं (श्री गणेश-सूर्य-विष्णु-दुर्गा और शंकर) की पूजा हो जाती है। सभी प्राणियों के हित में लगे रहने वाले, सभी लोकों का कल्याण करने वाले प्रभु शिवजी की पूजा, सभी प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति के लिए करनी चाहिए।( प्रमाण श्री शिव महापुराण सृष्टिखण्ड अध्याय १२ श्लोक ८२-८६ पृष्ठ संख्या १२३)

प्रभु शिव को या शिव भक्तों को विशेष करके शिवभक्त ब्राह्मण को अपनी कन्या पत्नी रूप में देने का क्या महत्व है, उस पर श्री शिवमहापुराण में एक बहुत ही ज्ञानवर्द्धक प्रसंग है। कश्यप-दीति के वंश में वज्रांग-वरांगी के कुल में तारक नामक असुर पैदा हुआ, जिसके पैदा होतें ही पूरे विश्व में भंयकर अपशकुन हुए।( प्रमाण श्री शिवमहापुराण पार्वतीखंड अध्याय १४-१५ पृष्ठ संख्या २५७-२६०)
यह तारक दैत्य प्रभु शिव के वीर्य से उत्पन्न पुत्र ही उसको मार सकेगा, ऐसा वरदान ब्रह्मा से तारकासुर को प्राप्त हुआ। तारकासुर को विष्णु इन्द्रादि भी नहीं पराजित कर सके- तारकासुर ने सभी को जीत लिया। देवताओं ने प्रयत्न करके प्रभु शिव को विवाह के लिए तैयार कर दिया और उधर हिमालय को भी अपनी कन्या (पार्वती) को शिव पत्नी बनाने के लिए आज्ञा दी...... जब हिमालय, अपनी कन्या प्रभु शिवजी को (पत्नी रूप में ) देने के लिए तैयार हो गया तब देवताओं को एक अलग ही प्रकार की चिन्ता हुई।

"हिमालय यदि स्वेच्छा से अपनी कन्या शिवजी को पत्नी रूप में दे देगा, तो हिमालय का जो जड़ रूप है वह भी अदृश्य हो जायेगा तब देवता लोग विहार कहॉं करेंगे ? तब स्वार्थी देवता अपने गुरू वृहस्पति के पास गये और उनसे बोले, " आप हिमालय को शिव-निन्दा सुनाइयें, जिसे सुनकर हिमालय की इतना पाप लगेगा कि वह अपनी कन्या शिवजी को पत्नी रूप में देने पर भी मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकेगा। इस ज्ञानवर्द्धक प्रसंग को पाठकगण श्री शिवमहापुराण के पार्वतीखण्ड अध्याय ३१पृष्ठ संख्या २८९-२९१ से समझ लें।
श्री गणेश प्रथम पूज्य क्यों है ? उस पर देखे कुमार खण्ड अध्याय १३-२० पृष्ठ सं० ३६५-३८०

कुल-तारक सन्तान की प्राप्ति के लिए प्रभु शिव का गृहपति अवतार, श्री शिवमहापुराण शतरूद्र संहिता अध्याय १३-१५ पृष्ठ संख्या ५१९-५२६)प्रभु शिव की इच्छा बिना आप तिनके को भी हिलाने में भी असमर्थ है।( प्रमाण प्रभु शिव का यक्षेश्वर अवतार श्री शिवमहापुराण शतरूद्र संहिता अध्याय १६ पृष्ठ संख्या ५२६-५२९) प्रभु शिवजी का हनुमान अवतार ( श्री शिवमहापुराण शतरूद्र संहिता अध्याय २० पृष्ठ संख्या ५३३-३४)
विष्णु के घमण्ड को नष्ट करने वाला शिवजी का अवतार :- शरभेश्वर अवतार ,श्री शिवमहापुराण शतरूद्र संहिता अध्याय १०-१२ पृष्ठ संख्या ५१४-५१९)। भगवान शंकर का वृषेश्वर अवतार श्री शिवमहापुराण शतरूद्र संहिता अध्याय २२-२३ पृष्ठ संख्या ५३५-५३९)। शनि ग्रह-पीड़ा को नष्ट करने वाला प्रभु शिव का पिप्पलाद अवतार ,श्री शिवमहापुराण शतरूद्र संहिता अध्याय २४-२५ पृष्ठ संख्या ५३९-५४२)। महिलाओं के सभी पापों को नष्ट करने वाला श्री शिव का वैश्यनाथ अवतार श्री शिवमहापुराण शतरूद्र संहिता अध्याय २६ पृष्ठ संख्या ५४२-५४५) तथा स्कन्द पुराण में महानन्दा कथा।
हमारी सभी सम्पत्ति,धन, पत्नी, पुत्र,सम्पत्ति आदि १०० प्रतिशत प्रभु शिव की ही है- प्रभु शिव का कृष्ण दर्शन अवतार जिन्होंने विष्णु भक्त राजा अम्बरीष के पितामह राजा नभग को ज्ञान दिया। श्री शिव का कृष्ण-दर्शन अवतार ,श्री शिवमहापुराण शतरूद्र संहिता अध्याय २९ पृष्ठ संख्या ५४९-५५१)
जीवन में एक बार भी श्रद्धा-भक्ति से शिव भक्त(दीक्षित) का पूजन करने का फल प्रभु शिव स्वयंअपने ऋषभ अवतार से एक राजा के मृत बालक को जीवित करके उसे अमोघ शिवकवच की दीक्षा देकर १२ हजार हाथियों का बल देकर, खोया हुआ राज्य वापिस दिलाते है। (श्री शिवमहापुराण शतरूद्र संहिता अध्याय ४ श्लोक ३४-४६ पृष्ठ संख्या ५०२)
देवगुरू वृहस्पति के अंश से भरद्वाज द्वारा अयोनिज द्रोण के पुत्र, शिवजी का अवतार अश्वत्थामा,जिन्होंने महाभारत केे युद्ध में कौरवों की और से लड़े और जिन्हेें श्री कृष्ण और अर्जुन भी नहीं परास्त कर सके। (श्री शिवमहापुराण शतरूद्र संहिता अध्याय ३६ पृष्ठ संख्या ५६४-५६६)

श्री कृष्ण केे होते हुए पाण्ड़व लोग जुऍं में हार गये और १३ वर्ष वनवास का कष्ट भोगा। वनवास की अवधि में भी दुर्योधन ने दुर्वासा ऋषि और मूक राक्षस को पाण्ड़वों का अहित कने के लिए भेजा।वनवास काल में द्वारिका से श्री कृष्ण पाण्ड़वों सेे मिलने के लिए आये। दुर्योधन के त्रास सेे बचने का उपाय पाण्ड़वों ने श्री कृष्ण से पूछा। श्री कृष्ण बोले," हे श्रेष्ठ पाण्ड़व़ों! मैरे मत के अनुसार आपका कर्तव्य हैे कि आप सबको प्रभु शिवजी की विशेष भक्ति करनी चाहिए। मुझ कृष्ण ने द्वारिका जाकर अपने शत्रुओं को जीतने की इच्छा से , हिमालय में जाकर महात्मा उपमन्यु से दीक्षा लेकर १६ महिने उमा-महेश्वर की तपस्या करके पुत्र प्राप्ति, ब्राह्मणों का पूजन आदि ८-८ वरदान प्राप्त किये। प्रभु शिव ने मेरे सभी मनोरथ पूर्ण किये। प्रभु शिव के प्रभाव से मैने सभी उत्तम शक्तियॉं प्राप्त की। मैं अब भी प्रभु शिव की सेवा करता हॅू। तुम भी, भुक्ति तथा मुक्ति देने वाले तथा सभी प्रकार के सुखों को देने वाले प्रभु शिवजी की सेवा करो। (श्री शिवमहापुराण शतरूद्र संहिता अध्याय ३७ श्लोक १२-१६ पृष्ठ संख्या ५६६ तथा उमा संहिता अध्याय १-३ पृष्ठ संख्या ६६३-६७०)

वेदव्यास जी ने भी (श्री कृष्ण की तरह)वनवास काल में दुर्याधन के त्रास से बचने के लिए पाण्ड़वों को श्री शिवजी की पूजा करने का निर्देश दिया। श्री व्यास बोले,"धर्म बुद्धि वाले पाण्ड़वों!श्री कृष्ण ने सत्य ही कहा क्योंकि मैं भी शिवजी की उपासना करता हॅू। आप लोग भी प्रेम में प्रभु शिवजी की सेवा करो, उससे अपार सुख आपको मिलेगा।प्रभु शिव को भुला देने से ही सब प्रकारके दु:ख होते हैंं।(श्री शिवमहापुराण उमासंहिता अध्याय ३७ श्लोक ५१ -५२ पृष्ठ संख्या ५६७)
गुरू व्यास जी ने अर्जुन को प्राथमिक दीक्षा दी। फिर इन्द्र ने अर्जुन को प्रभु शिवजी की अगली दीक्षा दी। तब तपस्या करके अर्जुन ने प्रभु शिव को प्रसन्न कर लिया तब प्रभु शिव ने अर्जुन को पशुपतास्त्र देते हुए कहा,"मैने अपना महान अस्त्र तुम्हें दे दिया है।अब तुम्हें कोई जीत नहीं सकेगा और मैं श्री कृष्ण से भी यही कहॅूगा। वे तुम्हारी सहायता करेंगे।(श्री शिवमहापुराण उमासंहिता अध्याय ४१,श्लोक ५६-५८ पृष्ठ ५७६) क्या श्री कृष्ण पाण्ड़वों की सहायता(बिना प्रभु शिव की आज्ञा के) नहीं कर सकते थे। श्री कृष्ण के होते हुए अर्जुन को तपस्या करने और प्रभु शिव से पाशुपतास्त्र प्राप्त करने की क्यों आवश्यकता पड़ी? भारत मेें प्रभु शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग, जिनके स्मरण मात्र से (प्रात: सायं) सम्पूर्ण पापों का नाश होता है।(श्री शिवमहापुराण कोटिरूद्र संहिता अध्याय १४-३३ पृष्ठ संख्या ६०४-६४०)

शाप से उद्धार पाने के लिए, चन्द्रमा देवता द्वारा भगवान शिव की तपस्या से प्रकट श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग।(श्री शिव महापुराण कोटिरूद्र संहिता, अध्याय १४ पृष्ठ ६०४-६०६)
जाति धर्म के कर्म से भी अधिक महत्वपूर्ण है प्रभु शिव की शिवलिंग में पूजा।(श्री शिव महापुराण कोटिरूद्र संहिता, अध्याय १६-१७ पृष्ठ ६०७-६११)
खेल-खेल में (बिना दीक्षा के,बिना रूद्राक्ष के, बिना त्रिपुण्ड़ के, बिना शिवलिंगि के, बिना सामग्री के) शिव-पूजा करने का प्रभाव।आठवी पीढ़ी में नन्दबाबा का जन्म, जिनके घर में विष्णु का कृष्ण अवतार हुआ। श्रीकर गोप की कथा(श्री शिव महापुराण कोटिरूद्र संहिता, अध्याय १७ पृष्ठ ६०८-६११)

सुख-दु:ख ,लाभ-हानि, यश-अपयश, में मन स्थिर रहे, समान-भाव बना रहे,( गौतम ऋषि का चरित्र श्री शिव महापुराण कोटिरूद्र संहिता, अध्याय २४-२७ पृष्ठ ६२१-२८ तथा ब्राह्मणी भरद्वाज गोत्रीय घुष्मा द्वारा बिना तपस्या के प्रकट किया गया श्री घुष्मेश्वर ज्योतिर्लिंगश्री शिव महापुराण कोटिरूद्र संहिता, अध्याय ३२-३३ पृष्ठ ६३६-६४०)
जब विष्णु भी देवताओं की रक्षा के लिए, दैत्यों का वध नहीं कर सके, तब विष्णु ने प्रभु शिव से सुदर्शन चक्र कैसे प्राप्त किया?(श्री शिव महापुराण कोटिरूद्र संहिता, अध्याय ३४-३६ पृष्ठ ६४०-६४६)
प्रभु शिव की पूजा तथा उनके लिए नियमित दान किए बिना कुल-तारक संतान की प्राप्ति नहीं हो सकती।(सूतजी का ऋषियों को उपदेश श्री शिव महापुराण कोटिरूद्र संहिता, अध्याय ३७ पृष्ठ ६४६-६४८)
जो ब्राह्मण प्रभु शिव को प्रसन्न करने के लिए महीने में दस व्रत नहीं रखता और प्रभु शिव के लिए नियमित २५ प्रतिशत दान नहीं करता, वह अगले जन्म में चोर होता है एवं व्रतराज शिवरात्रि की महिमा( विष्णु आदि के पूछले पर प्रभु शिव द्वारा उपदेश श्री शिव महापुराण कोटिरूद्र संहिता, अध्याय ३८ पृष्ठ ६४८-६५१)

प्रभु शिव की माया का प्रभाव: विष्णु, ब्रह्मा,इन्द्र,सूर्य,चन्द्रमा,ऋषि मुनि आदि काम के वशीभूत होकर पर-स्त्री रमन किये। (श्री शिव महारापुराण उमा संहिता अध्याय ४, पृष्ठ ६७०-६७१)

अन्नदान की महिमा:(श्री शिव महापुराण उमा संहिता, अध्याय ११ पृष्ठ ६८२-६८४ )ब्राह्मण की परीक्षा लेकर अन्नदान करने का महत्व(स्कन्द पुराण रेवाखंड)

तपस्या तथा सत्य की महिमा (श्री शिव महापुराण उमा संहिता, अध्याय १२ पृष्ठ ६८४-६८६ )किसी भी मंदिर में (दीक्षा लेकर) पुराण पढ़ने का फल श्री शिव महापुराण २४६७२ श्लोक वाले के पढ़ने का चमत्कार। सद्गुरू से दीक्षा लेकर २४६७२ श्लोक वाले श्री शिव महापुराण के मर्यादापूर्वक ५ से ७ बार पाठ करने पर प्रभु शिव का साक्षात्कार हो जाता है।(श्री शिव महापुराण उमा संहिता, अध्याय १३ पृष्ठ ६८६-६८८ ) इसके पढ़ने की दीक्षा इस आश्रम द्वारा दी जाती है। परीक्षा लेकर, दीक्षित शिव कर्मकाण्ड़ी ब्राह्मण को १० महादान देने का फल जैसे भूमि, स्वर्ण,तिल, हाथी,कन्या, दासी, घर, रथ, मणि, कपिला-गाय (श्री शिव महापुराण उमा संहिता, अध्याय १४ पृष्ठ ६८८-६८९ )
विशेष दान(श्री शिव महापुराण उमा संहिता, अध्याय १५ पृष्ठ ६८९-६९० )देवताओं की पूजा से भी अधिक महत्व अपने मर गये पितरों ककी पूजा का महाफल है।(सनत्कुमार का मार्कण्डेयजी को उपदेश,मार्कण्डेय जी का शान्तनु को उपदेश, शान्तनु का भीष्म-पितामह को उपदेश, शरशय्या पर लेटे हुए भीष्म पितामह का युधिष्ठिर आदि पाण्ड़वों को पितरों की पूजा का महत्व बतलाना।(श्री शिव महापुराण उमा संहिता, अध्याय ४०-४२ पृष्ठ ७३४-७३९ )
जिन सद्गुरू से आपने पुराण श्रवण किया, उनके पूजन का महत्व(श्री शिव महापुराण उमा संहिता, अध्याय ४३ पृष्ठ ७३९-७४४ )सर्वकामना की प्राप्ति के लिए काशी के दारा नगर में स्थित श्री मद्यमेश्वर की पूजा का फल:- श्री वेदव्यास की उत्पत्ति, श्री वेदव्यास की तपस्या, श्री वेदव्यास द्वारा प्रभु शिव से प्राप्त वरदान।(श्री शिव महापुराण उमा संहिता, अध्याय ४० पृष्ठ ७४०-७४५ )
प्रभु शिव तथा उनकी शक्ति दुर्गा की महिमा- आश्विन नवरात्रा की महिमा, मोह का नाशक तथा छिने हुए राज्य को पुन:प्राप्त करना।(श्री शिवमहापुराण उमा संहिता,अध्याय४५-५१पृष्ठ ७५५-५७ ) प्रयोग विधि आश्रम से सीखें।
पार्वती जगदम्बा ने ऊॅ मंत्र की दीक्षा प्रभु शिव से प्राप्त की।(श्री शिव महापुराण कैलाससंहिता, अध्याय १-२ पृष्ठ ७६३-७६६ )
वामदेव ऋषि रचित कार्तिकेय स्तुति जिसका नित्य पाठ करने से बुद्धि,शिवभक्ति, आयु, आरोग्य,धनवृद्धि के साथ सभी कामनायें पूर्ण होती है।(श्री शिव महापुराण कैलाससंहिता,पूर्वभाग, अध्याय ११ पृष्ठ ७८१-७८३)
ब्रह्मा द्वारा ऋषियों को शिव की महिमा बताया।(श्री शिव महापुराण वायवीय संहिता,पूर्वभाग, अध्याय १-३ पृष्ठ ८१३-८१९ )
वायु देवता द्वारा ऋषियों को शिवतत्व समझाना,वायवीय संहिता, पूर्वभाग,अध्याय ४-३५, पृष्ठ सं० ८१९-८७८)
प्रभु शिव को छोड़कर और किसी देवता से वरदान नहीं लेना चाहिए। उस पर आधारित विष्णु अवतार श्री कृष्ण के गुरू उपमन्यु का चरित्र(श्री शिव महापुराण वायुसंहिता,पूर्वभाग, अध्याय ३४-३५ पृष्ठ ८७४-८७८ )
पृथ्वी पर देवताओं की पूजा की बड़ी महिमा है परन्तु ये देवता महा-स्वार्थी हैं, ऐसे ही उनके गुरूदेव वृहस्पति है। तारकासुर से पीड़ित देवता लोग दुर्गा की स्तु ति करके उसे हिमालय और मेना की पुत्री (पार्वती) उत्पन्न करने में सफल हो गये। जब देवताओं की प्रार्थना से प्रभु शिव ने पार्वती से विवाह भी कर लिया तब प्रभु शिव और पार्वती के विहार में स्वार्थी देवताओं ने विघ्न किया और पार्वती से देवताओं की स्त्रियों को शाप मिला।( प्रमाण श्री शिव महापुराण कुमारखंड, अध्याय २ श्लोक १४-१८ पृष्ठ ३४४ ) जब हिमालय और मैना अपनी पुत्री (पार्वती) प्रभु शिव को पत्नी रूप में देने को तैयार हो गये (इसमें देवताओं का ही हित था) पार्वती और शिव से पुत्र कार्तिकेय का जन्म होना थ जो कि देवताओं के वैरी तारकासुर को मारेगा), तब भी स्वार्थी नहीं चाहते थे कि हिमालय भक्ति से अपनी पुत्री पार्वती को पत्नी रूप में प्रभु शिव को दे।(क्योंकि ऐसा करने से हिमालय का भी मोक्ष हो जायेगा। तब देवता विहार कहॉं करेंगे?)तब देवता लोग पहले गुरू वृहस्पति के पास, फिर ब्रह्मा के पास गये और प्रार्थना की कि वे (वृहस्पति या ब्रह्मा) हिमालय के पास जाकर प्रभु शिव की निन्दा करें। (क्योंकि शिव निन्दा सुनने से हिमालय को इतना प्रभु शिव की माया को समझना अत्यन्त कठिन है यहॅंा तक की साक्षात दुर्गा, विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र आदि भी नहीं समझतें। प्रभु शिव की माया से मोहित होकर विष्णु ने पर-स्त्री गमन किया। ब्रह्मा अपनी ही पोत्री, दक्ष की कन्या सती पर कामासक्त हुए। उस समय कामासक्त ब्रह्मा के चार बूॅंदे वीर्य पृथ्वी पर गिरी तब प्रभु शिव ब्रह्मा का वध करने के लिए उत्सुक हुए। तब विष्णु ने प्रभु शिव की स्तुति की।( प्रमाण श्री शिव महापुराण सतीखंड अध्याय १९ श्लोक ५०-५६तथा ६८-७५ पृष्ठ संख्या १८३-१८४) दूसरी बार फिर ब्रह्मा प्रभु शिव की पत्नी (दुर्गा) का अवतार, पार्वती पर कामासक्त हुए, तब फिर प्रभु शिव ब्रह्मा का वध करने के लिए तत्पर हुए तब देवताओं ने आपकी स्तुति करते हुए कहा,.... हे विभु! सातों समुद्र आपके वस्त्र है, दसो दिशाऍं भुजा है, द्युलोक शिर है, आकाश नाभि है, वायु नासिका है, अग्नि-सूर्य-चन्द्रमा आपके नेत्र है। मेघमण्डल केश है, नक्षत्र - तारे आदि आपके आभूषण है। हे विभु!हे परमेश्वर! हे देवेश! हम आपकी कैसे स्तुति करें। आप मन तथा वाणी से परे है। आप पंचमुख रूद्र हैं। पचास करोड़ मूर्तियों वाले हैं, तीनों लोकों के स्वामी है, सर्वश्रेष्ठ है। विद्यातत्व के अधिपति हैं, वर्णनातीत हैं, नित्य है। (प्रमाण श्री शिव महापुराण पार्वती खण्ड अध्याय ४९ श्लोक १२-३१ पृष्ठ संख्या ३२५ से ३२६)
पाप लगेगा कि वह शिवजी को कन्यादान करने पर मोक्षलाभ नहीं प्राप्त कर सकेगा। (श्री शिव महापुराण पार्वतीसंहिता, अध्याय ३१ श्लोक १-२३ पृष्ठ २८९-२९० )ये सभी स्वार्थी देवता हर मनुष्य के शरीर में विद्यमान रहते है। ये सभी देवता चाहते है कि वह हम केवल देवताओं का ही पूजन करें(प्रभु शिव का नहीं)। जब मनुष्य प्रभु शिव का पूजन करता है, तो ये शरीर-स्थित स्वार्थी देवता(अपने ही इष्ट प्रभु शिव) प्रभु शिव की पूजा करने वाले को विघ्न डालते है। ये देवता केवल एक ही प्रयोग से (शरीर में रहते हुए भी)शान्त रहते है। हमारा आश्रम यह प्रयोग सिखाता है।
अधिकांश धर्माचार्य बताते हैं कि बुरे कर्मो का फल भुगतना ही पड़ता है, परन्तु देहधारी गुरू से दीक्षा लेकर प्रभु शिव की शिवलिंग में विद्यिवत पूजा करने से पुराने पापों का बुरा फल भुगतना नहीं पड़ता । मृकण्डु पुत्र मार्कण्डेय ऋ्रषि की आयु( उसके पूर्व जन्मों के कर्मो के अनुसार) केवल आठ वर्ष की ही थी, शिवलिंग की पूजा से मार्कण्डेय चिरंजीवि हो गया। मार्कण्डेय ऋषि रचित चन्द्रशेखराष्टक स्तोत्र है, जिसमें मार्कण्डेय ऋषि कहे है, "मैं चन्द्रशेखर (शिव) के आश्रय में हॅू, यमराज मेरा क्या बिगाड़ सकेगा?"अकाल मृत्यु से बचने के लिए इस चन्द्रशेखराष्टक का प्रयोग हमारा आश्रम सिखाता है।

शिव ने ली अर्जुन की परीक्षा

पांडवों को अपने 13 साल के वनवास के दौरान दर-दर भटकना पड़ा। पांडव हर हाल में कौरवों से अपने अपमान का बदला लेना चाहते थे। इसके लिए जरूरत थी शक्ति जुटाने की। फिर क्या था अर्जुन ने शिवजी की घोर तपस्या की और हासिल किया पाशुपास्त्र। वनवास काटते हुए पांडवों के चार साल इधर-उधर भटकते हुए निकल गए। पांचवा साल अर्जुन के लिए बड़ा ही अहम साबित हुआ। वो अपने भाइयों से अलग होकर उत्तराखंड की बर्फीली वादियों में शिवजी की तपस्या करने चले गए। मकसद था शिव से पाशुपास्त्र हासिल करना। बद्रीनाथ से आगे स्वर्गारोहिणी के रास्ते में चक्रतीर्थ नाम की जगह पड़ती है। कहते हैं वहां पर धनुर्धारी अर्जुन ने शिवजी से पाशुपास्त्र पाने के लिए तपस्या की थी। लेकिन अर्जुन को अपनी धनुर्विद्या पर काफी अहंकार था। सो शिवजी ने अर्जुन की परीक्षा लेने की ठानी।

अपने एक गण को शूकर यानी जंगली सूअर का रूप धारण कर अर्जुन की तपस्या भंग करने का आदेश दिया। तपस्या भंग होने पर अर्जुन ने गुस्से में गांडिव उठाया और सूअर पर तीर छोड़ दिया। अर्जुन सूअर के पास पहुंचे तो वहां सामने खड़ा था एक भील। मारा गया सूअर किसका शिकार है - ये फैसला करने के लिए भील और अर्जुन में घनघोर युद्ध हुआ।लड़ते-लड़ते अर्जुन बेहोश हो गए। होश आया तो सामने भील को मुस्कुराते हुए पाया। अर्जुन को लगा ये कोई साधारण इंसान नहीं हो सकता। शिवजी ने अपने असली रूप में अर्जुन को दर्शन दिए और बताया कि अर्जुन के अहंकार के नाश के लिए ही उन्होंने ये लीला रची। अर्जुन की तपस्या सफल हुई और उन्हें पाशुपास्त्र मिल गया। इसके बाद अर्जुन अपने भाइयों से आ मिले।

गनगौर व्रत

यह चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है । इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियाँ व्रत रखती है । कहावत है कि इस दिन पार्वती ने भगवान शंकर से सौभाग्यवती रहने का वरदान प्राप्त किया था तथा पार्वती ने अन्य स्त्रियों के सौभाग्यवती रहने का वरदान दिया था ।

पूजन के समय रेणुकी की गौर बनाकर उस र महावर और सिन्दूर चढ़ाने का विशेष प्रावधान है । चन्दन, अक्षते, धूपबत्ती, दीप, नैवेघ से पूजन करके भोग लगाया जाता है । विवाहित स्त्रियों को गौर पर चढ़ाये सिन्दूर को अपनी माँग में लगाना चाहिये ।

कथा ः एक बार भगवान शंकर पार्वती जी एवं नारद जी के साथ भ्रमण हेतु चल दिये । वे चलते-चलते चैत्र शुक्ल तृतीया को एक गाँव में पहुँचे । उनका आना सुनकर ग्राम की निर्धन स्त्रियाँ उनके स्वागत के लिये थालियों में हल्दी अक्षत लेकर पूजन हेतु तुरन्त पहुँच गई । पार्वती जी ने उनके पूजा भाव को समझकर सारा सुहाग रस उन पर छिड़क दिया । वे अटल सुहाग प्राप्त कर लौंटी ।

धनी वर्ग की स्त्रियाँ थोड़ी देर बाद अनेक प्रकार के पकवान, सोने-चाँदी के थालों में सजाकर पहुँची । इन स्त्रियों को देखकर भगवान शंकर ने पार्वती से कहा – तुमने सारा सुहाग रस तो निर्धन वर्ग की स्त्रियों को ही दे दिया । अब इन्हें क्या दोगी ।

पार्वती जी बोली – प्राणनाथ । उन स्त्रियों को ऊपरी पदार्थों से बना रस दिया गया है । इसलिये उनका रस धोती से रहेगा । परन्तु मैं इन धनी वर्ग की स्त्रियों को अपनी अंगुली चीरकर रक्त का सुहाग रस दूंगी जो मेरे समान सौभाग्यवती हो जायेंगी । जब इन स्त्रियों ने पूजन समाप्त कर लिया तब पार्वती जी ने अपनी अंगुली चीरकर उस रक्त को उनके ऊपर छिड़क दिया । जिस पर जैसे छीटें पड़े उसने वैसा ही सुहाग पा लिया ।

इसके बाद पार्वती जी अपने पति भगवान शंकर से आज्ञा लेकर नदी में स्नान करने चली गई । स्नान करने के पश्चात् बालू की शिवजी की मूर्ति बनाकर पूजन किया । भोग लगाया तथा प्रदक्षिणा करके दो कणों का प्रसाद खाकर मस्तक पर टीका लगाया । उसी समय उस पार्थिव लिंग से शिवजी प्रकट हुए तथा पार्वती को वरदान दिया – आज के दिन जो स्त्री मेरा पूजन और तुम्हारा व्रत करेगी उसका पति चिरंजीवी रहेगा । तथा मोक्ष को प्राप्त होगा । भगवान शिव यह वरदान देकर अन्तर्धान हो गये ।

इतना सब करते-करते पार्वती जी को काफी समय लग गया । पार्वती जी नदी के तट से चलकर उस स्थाने पर आईं जहाँ पर भगवान शंकर व नारदजी को छोड़कर गई थी । शिवजी ने विलम्ब से आने का कारण पूछा तो इस पर पार्वती जो बोली, मेरे भाई-भावज नदी किनारे मिल गए थे । उन्होंने मुझसे दूध-भात खाने तथा ठहरने का आग्रह किया । इसी कारण से आने में देर हो गई । ऐसा जानकर अन्तर्यामी भगवान शंकर भी दूध-भात खाने के लालच में नदी तट की ओर चल दिये । पार्वती जी ने मौन भाव से भगवान शिवजी का ही ध्यान करके प्रार्थना की, भगवान आप अपनी इस अनन्य दासी की लाज रखिये । प्रार्थना करती हुई पार्वती जी उनके पीछे-पीछे चलने लगी । उन्हें दूर नदी तट पर माया का महल दिखाई दिया । वहाँ महल के अन्दर शिवजी के साले तथा सहलज ने शिव-पार्वती का स्वागत किया ।

वे दो दिन वहाँ रहे । तीसर दिन पार्वती जी ने शिवजी से चलने के लिये कहा तो भगवान शिव चलने को तैयार न हुए । तब पार्वती जी रुठकर अकेली ही चल दी । ऐसी परिस्थिति में भगवान शिव को भी पार्वती के साथ चलना पड़ा । नारदजी भी साथ चल दिये । चलते-चलते भगवान शंकर बोले, मैं तुम्हारे मायके में अपनी माला भूल आया हूँ । माला लाने के लये पार्वती जी तैयार हुई तो भगवान ने पार्वती जी को न भेजकर नारदजी को भेजा । पर वहाँ पहुँचने पर नारदजी को कोई महल नजर नहीं आया । वहाँ दूर-दूर तक जंगल-ही-जंगल था । सहसा बिजली कौंधी । नारदजी को शिवजी की माला एक पेड़ पर टंगी दिखाई दी । नारदजी ने माला उतारी और शिवजी के पास पहुँच कर यात्रा कर कष्ट बताने लगे । शिवजी हँसकर कहने लगे – यह सब पार्वती की ही लीला है ।

इस पर पार्वती जी बोलीं – मैं किस योग्य हूँ । यह सब तो आपकी ही कृपा है । ऐसा जानकर महर्ष नारदजी ने माला पार्वती तथा उनके पतिव्रत प्रभाव से उत्पन्न घटना की मुक्त कंठ से प्रशंसा की । जहाँ तक उनके द्घारा पूजन की बात को छिपाने का प्रश्न है वह भी उचित ही जान पड़ता है क्योंकि पूजा छिपाकर ही करनी चाहिये । चूँकि पार्वती जी ने इस व्रत को छिपाकर किया था, उसी परम्परा के अनुसार आज भी पूजन के अवसर पर पुरुष उपस्थित नहीं रहते ।

नंदी के बिना महादेव

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नासिक शहर के प्रसिद्ध पंचवटी इलाके में गोदावरी तट के पास कपालेश्वर महादेव मंदिर स्थित है। भगवान शिवजी ने यहाँ निवास किया था ऐसा पुराणों में कहा गया है। यह देश में पहला मंदिर है जहाँ भगवान शिवजी के सामने नंदी नहीं है। यही इसकी विशेषतः है।

यहाँ नंदी के अभाव की कहानी बड़ी रोचक है। एक दिन भरी इंद्रसभा में ब्रह्मदेव और शंकर में विवाद उत्पन्न हो गया। उस वक्त ब्रह्मदेव को पाँच मुख थे। चार मुख वेदोच्चारण करते थे, और पाँचवाँ निंदा करता था। उस निंदा से संतप्त शिवजी ने उस मुख को काट डाला। वह मुख उन्हें चिपक के बैठ गया।

इस घटना के कारण शिव जी को ब्रह्महत्या का पाप लग गया। उस पाप से मुक्ती पाने के लिए शिवजी ब्रह्मांड में घुम रहे थे। लेकिन उन्हें मुक्ती का उपाय नहीं मिल रहा था।

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एक दिन वह सोमेश्वर में बैठे थे, तब उनके सामने ही एक गाय और उसका बछड़ा एक ब्राह्मण के घर के सामने खड़ा था। वह ब्राह्मण बछड़े के नाक में रस्सी डालने वाला था। बछड़ा उसके विरोध में था। ब्राह्मण की कृती के विरोध में बछड़ा उसे मारना चाहता था। उस वक्त गाय ने उसे कहा कि बेटे, ऐसा मत करो, तुम्हे ब्रह्महत्या का पातक लग जाएगा।

बछड़े ने उत्तर दिया ि ब्रह्महत्या के पातक से मुक्ती का उपाय मुझे मालूम है। यह संवाद सुन रहे शिव जी के मन में उत्सुकता जागृत हुई। बछडे ने नाक में रस्सी डालने के लिए आए ब्राह्मण को अपने सिंग से मारा। ब्राह्मण मर गया। ब्रह्महत्या से बछड़े का अंग काला पड़ गया। उसके बाद बछड़ा निकल पड़ा। शिव जी भी उसके पिछे पिछे चलते गए। बछड़ा गोदावरी नदी के रामकुंड में आया। उस ने वहाँ स्नान किया। उस स्नान से ब्रह्म हत्या के पातक का क्षालन हो गया। बछड़े को अपना सफेद रंग पुनः मिल गया।

उसके बाद शिवजी ने भी रामकुंड में स्नान किया। उन्हे भी ब्रह्म हत्या के पातक से मुक्ती मिली। इसी गोदावरी नदी के पास एक टेकरी थी। शिवजी वहाँ चले गए। उन्हे वहाँ जाते देख गाय का बछड़ा (नंदी) भी वहाँ आया। नंदी के कारण ही शिवजी की ब्रह्म हत्या से मुक्ती हुई थी। इसलिए उन्होंने नंदी को गुरु माना और अपने सामने बैठने को मना किया।

इसी कारण इस मंदिर में नंदी नहीं है। ऐसा कहा जाता है की यह नंदी गोदावरी के रामकुंड में ही स्थित है। इस मंदिर का बड़ा महत्त्व है। बारा ज्योतिर्लिंगों के बाद इस मंदिर का महत्त्व है, ऐसे माना जाता है।

पुरातन काल में इस टेकरी पर शिवजी की पिंडी थी। लेकिन अब वहाँ एक विशाल मंदिर है। पेशवाओं के कार्यकाल में इस मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ। मंदिर की सीढि़याँ उतरते ही सामने गोदावरी नदी बहती नजर आती है। उसी में प्रसिद्ध रामकुंड है। भगवान राम में इसी कुंड में अपने पिता राजा दशरथ के श्राद्ध किए थे। इसके अलावा इस परिसर में काफी मंदिर है।

कपालेश्वर मंदिर के ठीक सामने गोदावरी नदी के पार प्राचीन सुंदर नारायण मंदिर है। साल में एक बार हरिहर महोत्सव होता है। उस वक्त कपालेश्वर और सुंदर नारायण दोनों भगवानों के मुखौटे गोदावरी नदी पर लाए जाते है, वहाँ उन्हें एक दुसरे से मिलाया जाता है। अभिषेक होता है। इसके अलावा महाशिवरात्री को कपालेश्वर मंदिर में बड़ा उत्सव होता है। सावन के सोमवार को यहाँ काफी भीड़ रहती है।

जाएँ कैसे : मुंबई से नासिक 160 किलोमीटर है। पुना से नासिक 210 किलोमीटर है। दोनों जगह से नासिक आने के लिए बहोत गाडि़याँ है।
रेल मार्ग : मुंबई से नासिक आने के लिए काफी रेल गाडि़याँ है। देश के विभिन्न नगरों से भी नासिक आने के लिए गाडि़याँ है।
हवाई मार्ग : हवाई मार्ग से आने के लिए मुंबई, पुणे और औरंगाबाद हवाई अड्डे सबसे नजदिक है।