मंगलवार, 13 अक्तूबर 2009

त्रिकाल-दर्शक गौरी-शिव मन्त्र

विनियोगः-

अनयोः शक्ति-शिव-मन्त्रयोः श्री दक्षिणामूर्ति ऋषिः, गायत्र्यनुष्टुभौ छन्दसी, गौरी परमेश्वरी सर्वज्ञः शिवश्च देवते, मम त्रिकाल-दर्शक-ज्योतिश्शास्त्र-ज्ञान-प्राप्तये जपे विनियोगः।

ऋष्यादि-न्यासः-

श्री दक्षिणामूर्ति ऋषये नमः शिरसि, गायत्र्यनुष्टुभौ छन्दोभ्यां नमः मुखे, गौरी परमेश्वरी सर्वज्ञः शिवश्च देवताभ्यां नमः हृदि, मम त्रिकाल-दर्शक-ज्योतिश्शास्त्र-ज्ञान-प्राप्तये जपे विनियोगाय नमः अञ्जलौ।

कर-न्यास (अंग-न्यास)ः-

ऐं अंगुष्ठभ्यां नमः (हृदयाय नमः), ऐं तर्जनीभ्यां नमः (शिरसे स्वाहा), ऐं मध्यमाभ्यां नमः (शिखायै वषट्), ऐं अनामिकाभ्यां हुं (कवचाय हुं), ऐं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् (नेत्र त्रयाय वौषट्), ऐं करतल-करपृष्ठाभ्यां फट् (अस्त्राय फट्)।

ध्यानः-
उद्यानस्यैक-वृक्षाधः, परे हैमवते द्विज-
क्रीडन्तीं भूषितां गौरीं, शुक्ल-वस्त्रां शुचि-स्मिताम्।
देव-दारु-वने तत्र, ध्यान-स्तिमित-लोचनम्।।
चतुर्भुजं त्रि-नेत्रं च, जटिलं चन्द्र-शेखरम्।
शुक्ल-वर्णं महा-देवं, ध्याये परममीश्वरम्।।

मानस पूजनः-

लं पृथिवी-तत्त्वात्मकं गन्धं समर्पयामि नमः। हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं समर्पयामि नमः। यं वायु-तत्त्वात्मकं धूपं घ्रापयामि नमः। रं अग्नि-तत्त्वात्मकं दीपं दर्शयामि नमः। वं अमृत-तत्त्वात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि नमः। शं शक्ति-तत्त्वात्मकं ताम्बूलं समर्पयामि नमः।

शक्ति-शिवात्मक मन्त्रः-

“ॐ ऐं गौरि, वद वद गिरि परमैश्वर्य-सिद्ध्यर्थं ऐं। सर्वज्ञ-नाथ, पार्वती-पते, सर्व-लोक-गुरो, शिव, शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि। पालय, ज्ञानं प्रदापय।”

इस ‘शक्ति-शिवात्मक मन्त्र’ के पुरश्चरण की आवश्यकता नहीं है। केवल जप से ही अभीष्ट सिद्धि होती है। अतः यथाशक्ति प्रतिदिन जप कर जप फल देवता को समर्पित कर देना चाहिए।

शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

शिवशंकर भोलेनाथ के अनेक रूप

गंगाधर

राजा भगीरथ ने जनकल्याण के लिए पतितपावन गंगाजी को पृथ्वी पर लाने के लिए कई वर्षों तक कठोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने राजा भगीरथ को यह वचन दिया कि सर्वकल्याणकारी गंगा पृथ्वी पर आएगी। मगर समस्या यह थी कि गंगाजी को पृथ्वी पर संभालेगा कौन?

समस्या का समाधान करते हुए ब्रह्माजी ने कहा कि गंगाजी को धारण करने की शक्ति भगवान शंकर के अतिरिक्त किसी में भी नहीं है अतः तुम्हें भगवान रुद्र की तपस्या करना चाहिए। ऐसा कहकर ब्रह्माजी अंतर्धान हो गए। ब्रह्माजी के वचन सुनकर भगीरथ ने प्रभु भोलेनाथ की कठोर तपस्या की। इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने भगीरथ से कहा- 'नरश्रेष्ठ! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ। मैं गिरिराजकुमारी गंगा को अपने मस्तक पर धारण करके संपूर्ण
प्राणियों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करूँगा।'

भगवान शंकर की स्वीकृति मिल जाने के बाद हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री गंगाजी बड़े ही प्रबल वेग से आकाश से भगवान शंकर के मस्तक पर गिरीं। उस समय गंगाजी के मन में भगवान शंकर को पराजित करने की प्रबल इच्छा थी। गंगाजी का विचार था कि मैं अपने प्रबल वेग से भगवान शंकर को लेकर पाताल में चली जाऊँगी।

गंगाजी के इस अहंकार को जान शिवजी कुपित हो उठे और उन्होंने गंगाजी को अदृश्य करने का विचार किया। पुण्यशीला गंगा जब भगवान रुद्र के मस्तक पर गिरीं, तब वे उनकी जटाओं के जाल में बुरी तरह उलझ गईं। लाख प्रयत्न करने पर भी वे बाहर न निकल सकीं। जब भगीरथ ने देखा कि गंगाजी भगवान शिव के जटामंडल में अदृश्य हो गईं, तब उन्होंने पुनः भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए तप करना प्रारंभ कर दिया। उनके तप से संतुष्ट होकर भगवान शिव ने गंगाजी को लेकर बिंदु सरोवर में छोड़ा। वहाँ से गंगाजी सात धाराएँ हो गईं।

इस प्रकार ह्लादिनी, पावनी और नलिनी नामक की धाराएँ पूर्व दिशा की ओर तथा सुचक्षु, सीता और महानदी सिंधु- ये तीन धाराएँ पश्चिम की ओर चली गईं। सातवीं धारा महाराज भगीरथ के पीछे-पीछे चली और पृथ्वी पर आई। इस प्रकार भगवान शंकर की कृपा से गंगा का धरती पर अवतरण हुआ और भगीरथ के पितरों के उद्धार के साथ पतितपावनी गंगा संसारवासियों को प्राप्त हुईं।

औढरदानी शिव

भगवान शिव और उनका नाम समस्त मंगलों का मूल है। वे कल्याण की जन्मभूमि तथा शांति के आगार हैं। वेद तथा आगमों में भगवान शिव को विशुद्ध ज्ञानस्वरूप बताया गया है। समस्त विद्याओं के मूल स्थान भी भगवान शिव ही हैं। उनका यह दिव्यज्ञान स्वतः सम्भूत है।

ज्ञान, बल, इच्छा और क्रिया-शक्ति में भगवान शिव के समान कोई नहीं है। फिर उनसे अधिक होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता। वे सबके मूल कारण, रक्षक, पालक तथा नियंता होने के कारण महेश्वर कहे जाते हैं। उनका आदि और अंत न होने से वे अनंत हैं। वे सभी पवित्रकारी पदार्थों को भी पवित्र करने वाले हैं, इसलिए वे समस्त कल्याण और मंगल के मूल कारण हैं।

भगवान शंकर दिग्वसन होते हुए भी भक्तों को अतुल ऐश्वर्य प्रदान करने वाले, अनंत राशियों के अधिपति होने पर भी भस्म-विभूषण, श्मशानवासी होने पर भी त्रैलोक्याधिपति, योगिराज होने पर भी अर्धनारीश्वर, पार्वतीजी के साथ रहने पर भी कामजित तथा सबके कारण होते हुए भी अकारण हैं। आशुतोष और औढरदानी होने के कारण वे शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों के संपूर्ण दोषों को क्षमा कर देते हैं तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, ज्ञान-विज्ञान के साथ अपने आपको भी दे देते हैं। कृपालुता का इससे बड़ा उदाहरण भला और क्या हो सकता है।

संपूर्ण विश्व में शिवमंदिर, ज्योतिर्लिंग, स्वयम्भूलिंग से लेकर छोटे-छोटे चबूतरों पर शिवलिंग स्थापित करके भगवान शंकर की सर्वाधिक पूजा उनकी लोकप्रियता का अद्भुत उदाहरण है।

हरिहर रूप

एक बार सभी देवता मिलकर संपूर्ण जगत के अशांत होने का कारण जानने के लिए विष्णुजी के पास गए। भगवान विष्णु ने कहा कि इस प्रश्न का उत्तर तो भोलेनाथ ही दे सकते हैं। अब सभी देवता विष्णुजी को लेकर शिवजी की खोजने मंदर पर्वत गए। वहाँ शंकरजी के होते हुए भी देवताओं को उनके दर्शन नहीं हो रहे थे।

पार्वतीजी का गर्भ नष्ट करने पर देवताओं को महापाप लगा था और इस कारण ही ऐसा हो रहा था। तब विष्णुजी ने कहा कि सारे देवता शिवजी को प्रसन्न करने के लिए तत्पकृच्छ्र व्रत करें। इसकी विधि भी विष्णुजी ने बताई। सारे देवताओं ने ऐसा ही किया। फलस्वरूप सारे देवता पापमुक्त हो गए। पुनः देवताओं को शंकरजी के दर्शन करने की इच्छा जागी। देवताओं की इच्छा जान प्रभु विष्णु ने उन्हें अपने हृदयकमल में विश्राम करने वाले भगवान शंकर
के लिंग के दर्शन करा दिए।

अब सभी देवता यह विचार करने लगे कि सत्वगुणी विष्णु और तमोगुणी शंकर के मध्य यह एकता किस प्रकार हुई। देवताओं का विचार जान विष्णुजी ने उन्हें अपने हरिहरात्मक रूप का दर्शन कराया। देवताओं ने एक ही शरीर में भगवान विष्णु और भोलेनाथ शंकर अर्थात हरि और हर का एकसाथ दर्शन कर उनकी स्तुति की।

पंचमुखी शिव

मुक्तापीतपयोदमौक्तिकजपावर्णैर् मुखैः पञ्चभि- स्त्र्यक्षैरंजितमीशमिंदुमुकुटं पूर्णेन्दुकोटिप्रभम्‌ ।
शूलं टंककृपाणवज्रदहनान्नागेन्द्रघंटांकुशान्‌ पाशं भीतिहरं दधानममिताकल्पोज्ज्वलं चिन्तयेत्‌ ॥

'जिन भगवान शंकर के ऊपर की ओर गजमुक्ता के समान किंचित श्वेत-पीत वर्ण, पूर्व की ओर सुवर्ण के समान पीतवर्ण, दक्षिण की ओर सजल मेघ के समान सघन नीलवर्ण, पश्चिम की ओर स्फटिक के समान शुभ्र उज्ज्वल वर्ण तथा उत्तर की ओर जपापुष्प या प्रवाल के समान रक्तवर्ण के पाँच मुख हैं।

जिनके शरीर की प्रभा करोड़ों पूर्ण चंद्रमाओं के समान है और जिनके दस हाथों में क्रमशः त्रिशूल, टंक (छेनी), तलवार, वज्र, अग्नि, नागराज, घंटा, अंकुश, पाश तथा अभयमुद्रा हैं। ऐसे भव्य, उज्ज्वल भगवान शिव का मैं ध्यान करता हूँ।'

महामृत्युंजय

हस्ताभ्यां कलशद्वयामृतरसैराप्लावयन्तं शिरो द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यां वहंतं परम्‌ ।
अंकन्यस्तकरद्वयामृतघटं कैलासकान्तं शिवं स्वच्छाम्भोजगतं नवेन्दुमुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे ॥

भगवान मृत्युंजय अपने ऊपर के दो हाथों में स्थित दो कलशों से सिर को अमृत जल से सींच रहे हैं। अपने दो हाथों में क्रमशः मृगमुद्रा और रुद्राक्ष की माला धारण किए हैं। दो हाथों में अमृत-कलश लिए हैं। दो अन्य हाथों से अमृत कलश को ढँके हैं।

इस प्रकार आठ हाथों से युक्त, कैलास पर्वत पर स्थित, स्वच्छ कमल पर विराजमान, ललाट पर बालचंद्र का मुकुट धारण किए त्रिनेत्र, मृत्युंजय महादेव का मैं ध्यान करता हूँ।

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

केदारनाथ मंदिर: वृषभ पिंड की पूजा

कहते हैं, किस्मत वालों को ही श्री केदारनाथ के दर्शन हो पाते हैं। जिस किसी ने भी बैल की पीठ के स्वरूप में विराजमान महादेव का दर्शन कर लिया, वह धन्य हो गया!

श्रीकेदारनाथका मंदिर 3593फीट की ऊंचाई पर बना हुआ एक भव्य एवं विशाल मंदिर है। इतनी ऊंचाई पर इस मंदिर को कैसे बनाया गया, इसकी कल्पना आज भी नहीं की जा सकती है! यह मंदिर एक छह फीट ऊंचे चौकोरप्लेटफार्म पर बना हुआ है। मंदिर में मुख्य भाग मंडप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। बाहर प्रांगण में नंदी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। मंदिर का निर्माण किसने कराया, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन हां ऐसा भी कहा जाता है कि इसकी स्थापना आदिगुरु शंकराचार्य ने की। मंदिर की पूजा श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगोंमें से एक माना जाता है। प्रात:काल में शिव-पिंड को प्राकृतिक रूप से स्नान कराकर उस पर घी-लेपन किया जाता है। तत्पश्चात धूप-दीप जलाकर आरती उतारी जाती है। इस समय यात्री-गण मंदिर में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं, लेकिन संध्या के समय भगवान का श्रृंगार किया जाता है। उन्हें विविध प्रकार के चित्ताकर्षक ढंग से सजाया जाता है। भक्तगण दूर से केवल इसका दर्शन ही कर सकते हैं। केदारनाथ के पुजारी मैसूर के जंगम ब्राह्मण ही होते हैं। पंचकेदारकी कथा ऐसा माना जाता है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के शाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे।

दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था। अत:भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतध्र्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का हिस्सा पकड लिया। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढसंकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजेजाते हैं।

ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतध्र्यान हुए, तो उनके धड से ऊपर का हिस्सा काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथका मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथमें, नाभि मदमदेश्वरमें और जटा कल्पेश्वरमें प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदारकहा जाता है। यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए हैं। यात्रा का संदेश

दृढसंकल्प, आत्मविश्वास और परिश्रम के अभाव में श्री केदारनाथ की दुर्गम पथरीलीराह पर चढाई संभव नहीं है। वास्तव में, यह यात्रा स्वर्गीय आनंद का स्त्रोत है। यहां न केवल मनोहर दृश्यावलियोंको सतत निहारने का आनंद मिलता है, बल्कि यह संदेश भी मिलता है कि संकट के रास्तों पर चले बिना सफलता के पुष्प नहीं खिल सकते हैं। भगवान शंकर भले ही भोलेनाथहों, लेकिन उन्होंने भ्रातृहत्या के लिए पांडवों को सहज ही क्षमा नहीं कर दिया।

भक्तों की निर्मल भक्ति के आगे भले ही भगवान झुके हों, लेकिन उन्होंने बार-बार अंतध्र्यान हो कर, यह संदेश दे दिया कि वे व्यर्थ की हिंसा को पसंद नहीं करते।

पांडव भगवान शंकर से क्षमा प्राप्त कर बदरीधामकी ओर गए, जहां से स्वर्गारोहण का मार्ग प्रशस्त हुआ। अत:हम कह सकते हैं कि हिमालय का क्षेत्र देवलोक के समान है, जहां से स्वर्गारोहण का मार्ग खुलता है। इसलिए श्री केदारनाथ की यात्रा तप और साधना के समान है, जो हमें ईश्वर की गरिमा-महिमा का दर्शन कराकर आनंद से भर देती है।

शिव खोड़ी में शंकर

पुराणों में शिव खोडीगुफाका उल्लेख किया गया है। मान्यता है कि एक भक्त ने शिव को प्रसन्न करने के लिए बडी तपस्या की। उसकी तपस्या का उद्देश्य शिव को प्रसन्न कर अपने लिए अमरत्व प्राप्त करना था।

शिव ने प्रसन्न होकर उससे वर मांगने के लिए कहा। उसने वरदान मांगा कि तीनों लोकों में मेरा कोई शत्रु न बचे। मैं जिसके सिर पर हाथ रखूं, वह तुरंत भस्म हो जाए। शिव के तथास्तु कहते ही वह शिव भक्त भस्मासुर हो गया। छिपना पडा शिव को एक कथा के अनुसार, भस्मासुर शिव की त्रिकाल शक्तियों से परिचित था, इसलिए वह सबसे पहले शिव को ही भस्म करने के लिए उनके पीछे दौडा। भस्मासुर और शिव के बीच भयंकर युद्ध हुआ। इसलिए इस जगह का नाम पड गया रनसू[रणसू]। युद्ध में शंकर जी भस्मासुर को परास्त नहीं कर पाए और अपनी जान बचाने के लिए एक पहाड की ओर दौड पडे। विशाल पहाड को खोदते [बीच में से दो फाड करते] हुए उन्होंने एक गुफाबना ली और उसमें छुप कर बैठ गए। यही गुफाआज शिव खोडी[खोड] के नाम से प्रसिद्ध है। मोहिनी बने विष्णु कथा के अनुसार, उस समय समुद्र मंथन हो रहा था। देवताओं के हित के लिए विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर लिया था। शिवजी ने उन्हें अपनी रक्षा के लिए पुकारा। मोहिनी रूप धरे विष्णु जब उस गुफाके बाहर पहुंचे, तो भस्मासुर उन पर मोहित हो गया और उनके सामने शादी का प्रस्ताव पेश कर दिया। इस पर मोहिनी बने विष्णु ने उसे अपनी ही तरह नृत्य करने के लिए कहा।

मदमस्त भस्मासुर मोहिनी के इशारों पर नाचने लगा। नाचते-नाचते उसने नृत्य की एक मुद्रा में अपना हाथ अपने सिर के ऊपर रख दिया। शिव से मिले वरदान के कारण वह तुरंत भस्म हो गया। कैसे पहुंचें रनसूपहुंचने के लिए जम्मू से 127किलोमीटर या फिर कटडा से 75किलोमीटर का सफर तय करना पडता है। इसके लिए बसें और निजी टैक्सियां आसानी से उपलब्ध होती हैं। रनसूके बाद किलोमीटर की आसान चढाई पैदल ही तय करनी होती है। यह चढाई शिव खोडीगुफाके प्रवेश द्वार पर खत्म होती है।

लगभग आधा किलोमीटर की तंग सुरंग को पार करने के बाद हम गुफाके भीतर पहुंच पाते हैं। गुफामें शिव परिवार की पिंडियांमौजूद हैं। इन सभी पर पहाड से बूंद-बूंद कर जल टपकता रहता है। उनके साथ राम-सीता, पांचों पांडवों, सप्त ऋषि भी पिंडियोंके रूप में मौजूद हैं। पहाड का आकार कटोरे की तरह है, जिसमें लगातार जल गिरता रहता है। खास बात यह है कि शिव खोडीगुफाअंतहीनहै।

मंगलवार, 22 सितंबर 2009

महर्षि भृगु ब्रह्माजी के मानस पुत्र थे। उनकी पत्नी का नाम ख्याति था जो दक्ष की पुत्री थी। महर्षि भृगु सप्तर्षिमंडल के एक ऋषि हैं। सावन और भाद्रपद में वे भगवान सूर्य के रथ पर सवार रहते हैं।

एक बार की बात है, सरस्वती नदी के तट पर ऋषि-मुनि एकत्रित होकर इस विषय पर चर्चा कर रहे थे कि ब्रह्माजी, शिवजी और श्रीकृष्ण में सबसे बड़े और श्रेष्ठ कौन है? इसका कोई निष्कर्ष न निकलता देख उन्होंने त्रिदेवों की परीक्षा लेने का निश्चय किया और ब्रह्माजी के मानस पुत्र महर्षि भृगु को इस कार्य के लिए नियुक्त किया।

महर्षि भृगु सर्वप्रथम ब्रह्माजी के पास गए। उन्होंने न तो प्रणाम किया और न ही उनकी स्तुति की। यह देख ब्रह्माजी क्रोधित हो गए। क्रोध की अधिकता से उनका मुख लाल हो गया। आँखों में अंगारे दहकने लगे। लेकिन फिर यह सोचकर कि ये उनके पुत्र हैं, उन्होंने हृदय में उठे क्रोध के आवेग को विवेक-बुद्धि में दबा लिया।
वहाँ से महर्षि भृगु कैलाश गए। देवाधिदेव भगवान महादेव ने देखा कि भृगु आ रहे हैं तो वे प्रसन्न होकर अपने आसन से उठे और उनका आलिंगन करने के लिए भुजाएँ फैला दीं। किंतु उनकी परीक्षा लेने के लिए भृगु मुनि उनका आलिंगन अस्वीकार करते हुए बोले-“महादेव! आप सदा वेदों और धर्म की मर्यादा का उल्लंघन करते हैं। दुष्टों और पापियों को आप जो वरदान देते हैं, उनसे सृष्टि पर भयंकर संकट आ जाता है। इसलिए मैं आपका आलिंगन कदापि नहीं करूँगा।”

उनकी बात सुनकर भगवान शिव क्रोध से तिलमिला उठे। उन्होंने जैसे ही त्रिशूल उठा कर उन्हें मारना चाहा, वैसे ही भगवती सती ने बहुत अनुनय-विनय कर किसी प्रकार से उनका क्रोध शांत किया। इसके बाद भृगु मुनि वैकुण्ठ लोक गए। उस समय भगवान श्रीविष्णु देवी लक्ष्मी की गोद में सिर रखकर लेटे थे।

भृगु ने जाते ही उनके वक्ष पर एक तेज लात मारी। भक्त-वत्सल भगवान विष्णु शीघ्र ही अपने आसन से उठ खड़े हुए और उन्हें प्रणाम करके उनके चरण सहलाते हुए बोले-“भगवन! आपके पैर पर चोट तो नहीं लगी? कृपया इस आसन पर विश्राम कीजिए। भगवन! मुझे आपके शुभ आगमन का ज्ञान न था। इसलिए मैं आपका स्वागत नहीं कर सका। आपके चरणों का स्पर्श तीर्थों को पवित्र करने वाला है। आपके चरणों के स्पर्श से आज मैं धन्य हो गया।”
भगवान विष्णु का यह प्रेम-व्यवहार देखकर महर्षि भृगु की आँखों से आँसू बहने लगे। उसके बाद वे ऋषि-मुनियों के पास लौट आए और ब्रह्माजी, शिवजी और श्रीविष्णु के यहाँ के सभी अनुभव विस्तार से कह बताया। उनके अनुभव सुनकर सभी ऋषि-मुनि बड़े हैरान हुए और उनके सभी संदेह दूर हो गए। तभी से वे भगवान विष्णु को सर्वश्रेष्ठ मानकर उनकी पूजा-अर्चना करने लगे।

वास्तव में उन ऋषि-मुनियों ने अपने लिए नहीं, बल्कि मनुष्यों के संदेहों को मिटाने के लिए ही ऐसी लीला रची थी।

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

शिव का स्वरूप~~~

शिव की महिमा अनंत है। उनके रूप, रंग और गुण अनन्य हैं। समस्त सृष्टि शिवमयहै। सृष्टि से पूर्व शिव हैं और सृष्टि के विनाश के बाद केवल शिव ही शेष रहते हैं। ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की, परंतु जब सृष्टि का विस्तार संभव न हुआ तब ब्रह्मा ने शिव का ध्यान किया और घोर तपस्या की। शिव अ‌र्द्धनारीश्वर रूप में प्रकट हुए। उन्होंने अपने शरीर के अ‌र्द्धभागसे शिवा (शक्ति या देवी) को अलग कर दिया। शिवा को प्रकृति, गुणमयीमाया तथा निर्विकार बुद्धि के नाम से भी जाना जाता है। इसे अंबिका, सर्वलोकेश्वरी,त्रिदेव जननी, नित्य तथा मूल प्रकृति भी कहते हैं। इनकी आठ भुजाएं तथा विचित्र मुख हैं। अचिंत्य तेजोयुक्तयह माया संयोग से अनेक रूपों वाली हो जाती है। इस प्रकार सृष्टि की रचना के लिए शिव दो भागों में विभक्त हो गए, क्योंकि दो के बिना सृष्टि की रचना असंभव है। शिव सिर पर गंगा और ललाट पर चंद्रमा धारण किए हैं। उनके पांच मुख पूर्वा, पश्चिमा, उत्तरा,दक्षिणा तथा ऊध्र्वाजो क्रमश:हरित,रक्त,धूम्र,नील और पीत वर्ण के माने जाते हैं। उनकी दस भुजाएं हैं और दसों हाथों में अभय, शूल, बज्र,टंक, पाश, अंकुश, खड्ग, घंटा, नाद और अग्नि आयुध हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वह त्रिशूल धारी, प्रसन्नचित,कर्पूर गौर भस्मासिक्तकालस्वरूपभगवान हैं। उनकी भुजाओं में तमोगुण नाशक सर्प लिपटे हैं। शिव पांच तरह के कार्य करते हैं जो ज्ञानमय हैं। सृष्टि की रचना करना, सृष्टि का भरण-पोषण करना, सृष्टि का विनाश करना, सृष्टि में परिवर्तनशीलतारखना और सृष्टि से मुक्ति प्रदान करना। कहा जाता है कि सृष्टि संचालन के लिए शिव आठ रूप धारण किए हुए हैं। चराचर विश्व को पृथ्वी रूप धारण करते हुए वह शर्वअथवा सर्व हैं। सृष्टि को संजीवन रूप प्रदान करने वाले जलमयरूप में वह भव हैं। सृष्टि के भीतर और बाहर रहकर सृष्टि स्पंदित करने वाला उनका रूप उग्र है। सबको अवकाश देने वाला, नृपोंके समूह का भेदक सर्वव्यापी उनका आकाशात्मकरूप भीम कहलाता है। संपूर्ण आत्माओं का अधिष्ठाता, संपूर्ण क्षेत्रवासी, पशुओं के पाश को काटने वाला शिव का एक रूप पशुपति है। सूर्य रूप से आकाश में व्याप्त समग्र सृष्टि में प्रकाश करने वाले शिव स्वरूप को ईशान कहते हैं। रात्रि में चंद्रमा स्वरूप में अपनी किरणों से सृष्टि पर अमृत वर्षा करता हुआ सृष्टि को प्रकाश और तृप्ति प्रदान करने वाला उनका रूप महादेव है। शिव का जीवात्मा रूप रुद्र कहलाता है। सृष्टि के आरंभ और विनाश के समय रुद्र ही शेष रहते हैं। सृष्टि और प्रलय, प्रलय और सृष्टि के मध्य नृत्य करते हैं। जब सूर्य डूब जाता है, प्रकाश समाप्त हो जाता है, छाया मिट जाती है और जल नीरव हो जाता है उस समय यह नृत्य आरंभ होता है। तब अंधकार समाप्त हो जाता है और ऐसा माना जाता है कि उस नृत्य से जो आनंद उत्पन्न होता है वही ईश्वरीय आनंद है। शिव,महेश्वर, रुद्र, पितामह, विष्णु, संसार वैद्य, सर्वज्ञ और परमात्मा उनके मुख्य आठ नाम हैं। तेईस तत्वों से बाहर प्रकृति,प्रकृति से बाहर पुरुष और पुरुष से बाहर होने से वह महेश्वर हैं। प्रकृति और पुरुष शिव के वशीभूत हैं। दु:ख तथा दु:ख के कारणों को दूर करने के कारण वह रुद्र कहलाते हैं। जगत के मूर्तिमान पितर होने के कारण वह पितामह, सर्वव्यापी होने के कारण विष्णु, मानव के भव रोग दूर करने के कारण संसार वैद्य और संसार के समस्त कार्य जानने के कारण सर्वज्ञ हैं। अपने से अलग किसी अन्य आत्मा के अभाव के कारण वह परमात्मा हैं। कहा जाता है कि सृष्टि के आदि में महाशिवरात्रि को मध्य रात्रि में शिव का ब्रह्म से रुद्र रूप में अवतरण हुआ, इसी दिन प्रलय के समय प्रदोष स्थिति में शिव ने ताण्डव नृत्य करते हुए संपूर्ण ब्रह्माण्ड अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से नष्ट कर दिया। इसीलिए महाशिवरात्रि अथवा काल रात्रि पर्व के रूप में मनाने की प्रथा का प्रचलन है।

शनिवार, 29 अगस्त 2009

शिवजी बिहाने चले

‘शिवजी बिहाने चले, पालिकी सजायके, भभूती लगायके।
हो जब शिव बाबा मंडवा गइले, होला मंगलाचार हो।
बाबा पंडित वेद विचारे, होला मंगलाचार हो।
बाबा पंडित वेद विचारे, होला बुधवा चार हो।
वजरवटी की लगी झालरी, नागिन का अधिकार हो।
बिच मंडलवा में नाऊन आइली, कर ठगनन बडियार हो।
देखो नागिन दिहलिन बिदाई, नाउन जिव लै चली पराई।
सब हंस लागै, लाल देवता खखायके।
शिवजी बिहाने चलै, पालको सजायके, भभूती लगायके’।

शिवजी का वाहन

यह उस समय की बात है, जब भगवान शिव के पास कोई वाहन न था। उन्हें पैदल ही जंगल-पर्वत की यात्रा करनी पड़ती थी। एक दिन माँ पार्वती उनसे बोलीं,‘आप तो संसार के स्वामी हैं। क्या आपको पैदल यात्रा करना शोभा देता है?’

शिव जी हँसकर बोले-‘देवी,हम तो रमते जोगी है। हमें वाहन से क्या लेना-देना? भला साधु भी कभी सवारी करते हैं?’

पार्वती ने आँखों में आँसू भरकर कहा,‘जब आप शरीर पर भस्म लगाकर, बालों की जटा बनाकर, नंगे-पाँव, काँटों-भरे पथ पर चलते हैं तो मुझे बहुत दुख होता है।’
शिव जी ने उन्हें बार-बार समझाया परंतु वह जिद पर अड़ी रही। बिना किसी सुविधा के जंगल में रहना पार्वती को स्वीकार था परंतु वह शिवजी के लिए सवारी चाहती थीं।अब भोले भंडारी चिंतित हुए। भला वाहन किसे बनाएँ। उन्होंने देवताओं को बुलवा भेजा। नारदमुनि ने सभी देवों तक उनका संदेश पहुँचाया।

सभी देवता घबरा गए। कहीं हमारे वाहन न ले लें। सभी कोई-न-कोई बहाना बनाकर अपने-अपने महलों में बैठे रहे। पार्वती उदास थीं। शिवजी ने देखा कि कोई देवता नहीं पहुँचा। उन्होंने एक हुंकार लगाई तो जंगल के सभी जंगली जानवर आ पहुँचे।

‘तुम्हारी माँ पार्वती चाहती है कि मेरे पास कोई वाहन होना चाहिए। बोलो कौन बनेगा मेरा वाहन?’

सभी जानवर खुशी से झूम उठे। छोटा-सा खरगोश फुदककर आगे बढ़ा- ‘भगवन्, मुझे अपना वाहन बना लें, मैं बहुत मुलायम हूँ।’

सभी खिलखिलाकर हँस पड़े। शेर गरजकर बोला-‘मूर्ख खरगोश,मेरे होते,तेरी जुर्रत कैसे हुई, सामने आकर बोलने की?’बेचारा खरगोश चुपचाप कोने में बैठकर गाजर खाने लगा। शेर हाथ जोड़कर बोला,‘प्रभु, मैं जंगल का राजा हूँ,शक्ति में मेरा कोई सामना नहीं कर सकता। मुझे अपनी सवारी बना लें।’

उसकी बात समाप्त होने से पहले ही हाथी बीच में बोल पड़ा-‘मेरे अलावा और कोई इस काम के लिए ठीक नहीं है। मैं गर्मी के मौसम में अपनी सूँड में पानी भरकर महादेव को नहलाऊँगा।’

जंगली सुअर कौन-सा कम था? अपनी थूथन हिलाते हुए कहने लगा-‘शिव जी, मुझे सवारी बना ले,मैं साफ-सुथरा रहने की कोशिश करूँगा।’ कहकर वह अपने शरीर की कीचड़ चाटने लगा। कस्तूरी हिरन ने नाक पर हाथ रखा और बोला-‘छिः, कितनी गंदी बदबू आ रही है, चल भाग यहाँ से, मेरी पाठ पर शिवजी सवारी करेंगे।’

उसी तरह सभी जानवर अपना-अपना दावा जताने लगे। शिवजी ने सबको शांत कराया और बोले‘कुछ ही दिनों बाद मैं सब जानवरों से एक चीज माँगूगा, जो मुझे वह ला देगा, वही मेरा वाहन होगा।’

नंदी बैल भी वहीं खड़ा था। उस दिन के बाद से वह छिप-छिपकर शिव-पार्वती की बातें सुनने लगा। घंटों भूख-प्यास की परवाह किए बिना वह छिपा रहता। एक दिन उसे पता चल गया कि शिवजी बरसात के मौसम में सूखी लकड़ियाँ माँगेंगे। उसने पहले ही सारी तैयारी कर ली। बरसात का मौसम आया। सारा जंगल पानी से भर गया। ऐसे में शिवजी ने सूखी लकड़ियों की मांग की तो सभी जानवर एक-दूसरे मुँह ताकने लगे। बैल गया और बहुत सी लकड़ियों के गट्ठर ले आया।

भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए। मन-ही-मन वे जानते थे कि बैल ने उनकी बातें सुनी हैं। फिर भी उन्होंने नंदी बैल को अपना वाहन चुन लिया। सारे जानवर उनकी और माँ पार्वती की जय-जयकार करते लौट गए।

(साभार: आसाम की लोककथाएं, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

शिवजी का वाहन

यह उस समय की बात है, जब भगवान शिव के पास कोई वाहन न था। उन्हें पैदल ही जंगल-पर्वत की यात्रा करनी पड़ती थी। एक दिन माँ पार्वती उनसे बोलीं,‘आप तो संसार के स्वामी हैं। क्या आपको पैदल यात्रा करना शोभा देता है?’

शिव जी हँसकर बोले-‘देवी,हम तो रमते जोगी है। हमें वाहन से क्या लेना-देना? भला साधु भी कभी सवारी करते हैं?’

पार्वती ने आँखों में आँसू भरकर कहा,‘जब आप शरीर पर भस्म लगाकर, बालों की जटा बनाकर, नंगे-पाँव, काँटों-भरे पथ पर चलते हैं तो मुझे बहुत दुख होता है।’
शिव जी ने उन्हें बार-बार समझाया परंतु वह जिद पर अड़ी रही। बिना किसी सुविधा के जंगल में रहना पार्वती को स्वीकार था परंतु वह शिवजी के लिए सवारी चाहती थीं।अब भोले भंडारी चिंतित हुए। भला वाहन किसे बनाएँ। उन्होंने देवताओं को बुलवा भेजा। नारदमुनि ने सभी देवों तक उनका संदेश पहुँचाया।

सभी देवता घबरा गए। कहीं हमारे वाहन न ले लें। सभी कोई-न-कोई बहाना बनाकर अपने-अपने महलों में बैठे रहे। पार्वती उदास थीं। शिवजी ने देखा कि कोई देवता नहीं पहुँचा। उन्होंने एक हुंकार लगाई तो जंगल के सभी जंगली जानवर आ पहुँचे।

‘तुम्हारी माँ पार्वती चाहती है कि मेरे पास कोई वाहन होना चाहिए। बोलो कौन बनेगा मेरा वाहन?’

सभी जानवर खुशी से झूम उठे। छोटा-सा खरगोश फुदककर आगे बढ़ा- ‘भगवन्, मुझे अपना वाहन बना लें, मैं बहुत मुलायम हूँ।’

सभी खिलखिलाकर हँस पड़े। शेर गरजकर बोला-‘मूर्ख खरगोश,मेरे होते,तेरी जुर्रत कैसे हुई, सामने आकर बोलने की?’बेचारा खरगोश चुपचाप कोने में बैठकर गाजर खाने लगा। शेर हाथ जोड़कर बोला,‘प्रभु, मैं जंगल का राजा हूँ,शक्ति में मेरा कोई सामना नहीं कर सकता। मुझे अपनी सवारी बना लें।’

उसकी बात समाप्त होने से पहले ही हाथी बीच में बोल पड़ा-‘मेरे अलावा और कोई इस काम के लिए ठीक नहीं है। मैं गर्मी के मौसम में अपनी सूँड में पानी भरकर महादेव को नहलाऊँगा।’

जंगली सुअर कौन-सा कम था? अपनी थूथन हिलाते हुए कहने लगा-‘शिव जी, मुझे सवारी बना ले,मैं साफ-सुथरा रहने की कोशिश करूँगा।’ कहकर वह अपने शरीर की कीचड़ चाटने लगा। कस्तूरी हिरन ने नाक पर हाथ रखा और बोला-‘छिः, कितनी गंदी बदबू आ रही है, चल भाग यहाँ से, मेरी पाठ पर शिवजी सवारी करेंगे।’

उसी तरह सभी जानवर अपना-अपना दावा जताने लगे। शिवजी ने सबको शांत कराया और बोले‘कुछ ही दिनों बाद मैं सब जानवरों से एक चीज माँगूगा, जो मुझे वह ला देगा, वही मेरा वाहन होगा।’

नंदी बैल भी वहीं खड़ा था। उस दिन के बाद से वह छिप-छिपकर शिव-पार्वती की बातें सुनने लगा। घंटों भूख-प्यास की परवाह किए बिना वह छिपा रहता। एक दिन उसे पता चल गया कि शिवजी बरसात के मौसम में सूखी लकड़ियाँ माँगेंगे। उसने पहले ही सारी तैयारी कर ली। बरसात का मौसम आया। सारा जंगल पानी से भर गया। ऐसे में शिवजी ने सूखी लकड़ियों की मांग की तो सभी जानवर एक-दूसरे मुँह ताकने लगे। बैल गया और बहुत सी लकड़ियों के गट्ठर ले आया।

भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए। मन-ही-मन वे जानते थे कि बैल ने उनकी बातें सुनी हैं। फिर भी उन्होंने नंदी बैल को अपना वाहन चुन लिया। सारे जानवर उनकी और माँ पार्वती की जय-जयकार करते लौट गए।

(साभार: आसाम की लोककथाएं, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

गुरुवार, 27 अगस्त 2009

कुल्लू के बिजलेश्वर महादेव, एक अनोखा शिव मन्दिर.

बिजलेश्वर महादेव , जिनके दर्शन करते ही आँखें नम हो जाती हैं, मन भावविभोर हो जाता है। जिव्हा एक ही वाक्य उच्चारण करती है - त्वं शरणम ।

हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है। तरह-तरह के धार्मिक स्थान, तरह-तरह के लोग, तरह-तरह के मौसम। यदि अपनी सारी जिंदगी भी कोई इसे समझने, घूमने में लगा दे तो भी शायद पूरे भारत को देख समझ ना पाये। यहां ऐसे स्थानों की भरमार है कि उस जगह की खासियत देख इंसान दांतों तले उंगली दबा ले।
ऐसा ही एक अद्भुत स्थल है, हिमाचल में बिजलेश्वर महादेव। जिसे बिजली महादेव या मक्खन महादेव के नाम से भी जाना जाता है। हिमाचल के कुल्लू शहर से 18कीमी दूर, 7874 फिट की ऊंचाई पर मथान नामक स्थान में स्थित है, शिवजी का यह प्राचीन मंदिर। इसे शिवजी का सर्वोत्तम तप स्थल माना जाता है। पुराणों के अनुसार जालन्धर दैत्य का वध शिवजी ने इसी स्थान पर किया था। इसे कुलांत पीठ के नाम से भी जाना जाता है।
यहां स्थापित शिवलिंग पर या मंदिर के ध्वज दंड़ पर हर दो-तीन साल में वज्रपात होता है। शिवलिंग पर वज्रपात होने के उपरांत यहां के पुजारीजी बिखरे टुकड़ों को एकत्र कर उन्हें मक्खन के लेप से जोड़ फिर शिव लिंग का आकार देते हैं। इस काम के लिये मक्खन को आस-पास नीचे बसे गांव वाले उपलब्ध करवाते हैं। कहते हैं कि पृथ्वी पर आसन्न संकट को दूर करने तथा जीवों की रक्षा के लिये सृष्टी रूपी लिंग पर यानि अपने उपर कष्ट का प्रारूप झेलते हैं भोले भंडारी। यदि बिजली गिरने से ध्वज दंड़ को क्षति पहुंचती है तो फिर पूरी शास्त्रोक्त विधि से नया ध्वज दंड़ स्थापित किया जाता है।
मंदिर तक पहुंचने के लिए कुल्लु से बस या टैक्सी उपलब्ध हैं। व्यास नदी पार कर 15किमी का सडक मार्ग चंसारी गांव तक जाता है। उसके बाद करीब तीन किलोमीटर की श्रमसाध्य, खडी चढ़ाई है जो अच्छे-अच्छों का दमखम नाप लेती है। उस समय तो हाथ में पानी की बोतल भी एक भार सा महसूस होती है।
मथान के एक तरफ़ व्यास नदी की घाटी है, जिस पर कुल्लु-मनाली इत्यादि शहर हैं तथा दूसरी ओर पार्वती नदी की घाटी है जिस पर मणीकर्ण नामक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। उंचाई पर पहुंचने में थकान और कठिनाई जरूर होती है पर जैसे ही यात्री चोटी पर स्थित वुग्याल मे पहुंचता है उसे एक दिव्य लोक के दर्शन होते हैं। एक अलौकिक शांति, शुभ्र नीला आकाश, दूर दोनों तरफ़ बहती नदियां, गिरते झरने, आकाश छूती पर्वत श्रृंखलाएं किसी और ही लोक का आभास कराती हैं। जहां आंखें नम हो जाती हैं, हाथ जुड जाते हैं, मन भावविभोर हो जाता है तथा जिव्हा एक ही वाक्य का उच्चारण करती है - त्वं शरणं।
कण-कण मे प्राचीनता दर्शाता मंदिर पूर्ण रूप से लकडी का बना हुआ है। चार सीढियां चढ़, दरवाजे से एक बडे कमरे मे प्रवेश मिलता है जिसके बाद गर्भ गृह है जहां मक्खन मे लिपटे शिवलिंग के दर्शन होते हैं। जिसका व्यास करीब ४ फ़िट तथा उंचाई २.५ फ़िट के लगभग है। ऊपर बिज़ली-पानी का इंतजाम है। आपात स्थिति मे रहने के लिये कमरे भी बने हुए हैं। परन्तु बहुत ज्यादा ठंड हो जाने के कारण रात मे यहां कोई नहीं रुकता है। सावन के महिने मे यहां हर साल मेला लगता है। दूर-दूर से ग्रामवासी अपने गावों से अपने देवताओं को लेकर शिवजी के दरबार मे हाजिरी लगाने आते हैं। वे भोले-भाले ग्रामवासी ज्यादातर अपना सामान अपने कंधों पर लाद कर ही यहां पहुंचते हैं। उनकी अटूट श्रद्धा तथा अटल विश्वास का प्रतीक है यह मंदिर जो सैकडों सालों से इन ग्रामिणों को कठिनतम परिस्थितियों मे भी उल्लासमय जीवन जीने को प्रोत्सहित करता है। कभी भी कुल्लु-मनाली जाना हो तो शिवजी के इस रूप के दर्शन जरूर करें।
कुछ सालों पहले तक चंसारी गांव के बाद मंदिर तक कोई दुकान नहीं होती थी। पर अब जैसे-जैसे इस जगह का नाम लोग जानने लगे हैं तो पर्यटकों की आवा-जाही भी बढ गयी है। उसी के फलस्वरूप अब रास्ते में दसियों दुकानें उग आयीं हैं। धार्मिक यात्रा के दौरान चायनीज और इटैलियन व्यंजनों की दुकानें कुछ अजीब सा भाव मन में उत्पन्न कर देती हैं।

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

भव्य मंदिर जो खड़ा है बिना नींव!

यह विशाल मंदिर तंजावुर के ‘बड़े मंदिर’ के नाम से प्रसिद्ध है। 216 फीट ऊँचा यह मंदिर कावेरी नदी के तट पर शान से खड़ा हुआ है। इस मंदिर की खासियत यह है कि यह बिना नींव डाले ही बनाया गया है।

Thanjavur
यह बात सुनने में भले ही आश्चर्यजनक लगे लेकिन सच तो यही है। यह विशाल मंदिर न केवल ईश्वर के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह हमारे पूर्वजों के निर्माण कौशल की उत्कृष्टता का एक जीवन्त उदाहरण भी है।

यह मंदिर 1003 से लेकर 1009 ईसा पूर्व के बीच चोला के महाराजा राजारंजन द्वारा बनवाया गया था। पिछले 1000 सालों से यह विशालकाय मंदिर अविचल खड़ा हुआ है।

इस मंदिर में प्रवेश करते ही एक 13 फीट ऊँचे शिवलिंग के दर्शन होते है। शिवलिंग के साथ एक विशाल पंच मुखी सर्प विराजमान है जो फनों से शिवलिंग को छाया प्रदान कर रहा है। इसके दोनों तरफ दो मोटी दीवारें हैं, जिनमें लगभग 6 फीट की दूरी है। बाहरी दीवार पर एक बड़ी आकृति बनी हुई है, जिसे ‘विमान’ कहा जाता है।

यह एक के ऊपर एक लगे हुए 14 आयतों द्वारा बनाई गई है, जिन्हें बीच से खोखला रखा गया है। 14वें आयतों के ऊपर एक बड़ा और लगभग 88 टन भारी गुम्बद रखा गया है जो कि इस पूरी आकृति को बंधन शक्ति प्रदान करता है। इस गुम्बद के ऊपर एक 12 फीट का कुम्बम रखा गया है।

Thanjavur
इस आकृति में आयतों का अंदर से खोखला होना सिर्फ निर्माण कौशल ही नहीं है, इसका आध्यात्मिक महत्व भी है। हम भगवान शिव को एक लिंग के रूप में पूजते हैं जिसे भगवान का अरूप कहा जाता है।

यह सब जानने के बाद आपके मन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि क्या बगैर नींव के इस तरह का निर्माण संभव है? तो इसका जवाब है कन्याकुमारी में स्थित 133 फीट लंबी तिरुवल्लुवर की मूर्ति, जिसे इसी तरह की वास्तुशिल्प तकनीक के प्रयोग से बनाया गया है। यह मूर्ति 2004 में आए सुनामी में भी खड़ी रही।

भारत को मंदिरों और तीर्थस्थानों का देश कहा जाता है, लेकिन तंजावुर का यह मंदिर हमारी कल्पना से परे है। मंदिर में भगवान नंदी की सबसे बड़ी मूर्ति स्थापित की गई है, जो लगभग 12 फीट लंबी और 19 फीट चौड़ी है। यह मूर्ति 16वीं सदी में विजयनगर शासनकाल में बनाई गई थी।

इस मंदिर को यूनेस्को द्वारा विश्व की धरोहर घोषित किया गया है। अब इस मंदिर का रखरखाव भारत के पुरातत्व विभाग द्वारा किया जा रहा है।

कहते हैं बिना नींव का यह मंदिर भगवान शिव की कृपा के कारण ही अपनी जगह पर अडिग खड़ा है। अब आप इसे शिव की कृपा मानें या भारत की प्राचीन समृद्ध स्थापत्य कला का एक नायाब उदाहरण, जो भी हो तंजावुर के शिव मंदिर को इन सभी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह तो खड़ा है बड़ी शान से भविष्य के स्थापत्य विशेषज्ञों को भी आश्चर्यचकित करने के लिए।

कैसे पहुँचें : चेन्नई से 310 कि.मी. दूर स्थित है तंजावुर। यहाँ पहुँचने के लिए रेल या सड़क मार्ग से जाया जा सकता है। तंजावुर के नजदीक तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में स्थित है चेन्नई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा।

शनिवार, 8 अगस्त 2009

उत्तरांचल ( शिव पार्वती प्रतिमायें)

शिव :

हमें पुरतात्विक एवं ऐतिहासिक स्रोतों से यह भली भाँति ज्ञात हो चुका है कि समूचे भारत में शिवलिंगोपासना बहुत पुरातन है। शिव सृष्टि कर्ता आदि देव हैं। इसीलिए इन्हें महादेव कहा गया है। वे ही परमेश्वर हैं, वे ही रुद्र हैं तथा वे निर्विकार भी हैं। वे ही चराचर जगत की सृष्टि जगत करते हैं, अन्त में कुत्सित मनोवृतियों के बढ़ने पर उसका संहार कर डालते हैं तथा उन्हें के द्वारा पुन: सृष्टि का सृजन होता है।

शिव के इस सरल रुप को, उनके सृष्टि कर्ता स्वरुप को शक्ति प्रदान करती हैं-महादेवी। शिव-शक्ति के तात्विक मिलन को ही लिंग पुजन के माध्यम से ही व्यक्त किया गया है। लिंग वेदी महादेवी हैं, लिंग साक्षात महेश्वर हैं। सृष्टि को अपने में समाहित कर लेने से ही उनका नाम लिंग है। प्रलयकाल में सम्पूर्ण विश्व में लय हो जाएगा-लयं गच्छन्ति भूतानी संहारे निखिल यत:।

यहाँ दो प्रकार के लिंग प्राप्त हैं - पहला सादे लिंग जिन्हें निष्कल लिंग कहा जाता है और दूसरे वे जिन पर मुख सदृश आकृतियाँ बनी हों वे सकल लिंग कहे जाते हैं। सादे लिंगों को निष्कल स्थाणु भी कहा जाता है। कुमाऊँ मंडल के सभी शैव मंदिरों में निष्कल लिंगों की अभिकता है। नारायाण - काली, जोगेश्वर आदि स्थानों पर तो निष्कल लिंगों के समूह के समहू ही हैं। लिंग पुराम के मतानिसार सादे लिंगों की पूजा ही श्रेष्ठ है। यही पूजन शिव का वास्तविक पूजन है। इसी से शिव की कृपा प्राप्त होती है। इसलिए समूचे भारत में मुखलिंग की अपेक्षा निष्कल लिंग ही सर्वाधिक संख्या में पाये जाते हैं। विद्वान मुखलिंग को मिश्र लिंग की श्रेणी में भी रखते हैं क्योंकि यह दोनों प्रकार के लिंग में निष्कल और सकल (प्रतिमा) का सम्मिश्रण है।

कृति :

मुख की आकृति लिंगों कुमाऊँ मंडली में कम पाये जाते लिंगों में शिव लिंग - विग्रह और पुरुष - विग्रह का प्रतीक है। मध्य कुषाम काल में लिंग स्तम्भकार से कुछ छोटे आकार के बनाये गये तथा इन पर मुख अंकित किये गये। एक मुखी शिवलिंग को मूर्ति फलकों पर, प्राय: पीपल वृक्ष के नीचे बने चबूतरे पर, लिंग मुख सामने की ओर तथा पृष्ठ भाग वृक्ष के#े तने की ओर स्थापित किया गया है।

गुप्त काल से ही मुखलिंग का प्रचलन उत्तर भारत में मिलता है। इस काल में प्रतिमाओं के साथ ही लिंग पूजन हेतु मुखलिंगों का भी अर्चन व्यापक रुप से हुआ। उत्तर गुप्तकाल आते आते लिंग पर बनी प्रतिमा सर्पों से वेष्ठित करने की प्रक्रिया में सपंकुन्डल से अलंकृत तथा सर्पों से सज्जित करने का शिल्प में विधान किया गया। अभी तक मुख लिंगों की जो प्राचीनता सामने आयी है उससे प्रतीत होता है कि ई. पू. प्रथम शती का मुखलिंग गुउडिमल्लम आन्ध्र प्रदेश में है जबकि भीटा का पंचमुखी शिवलिंग प्राचीनतम है।

कुमाऊँ मंडल में भी अनेक एकमुखी, चतुर्मुखी तथा पंचायतन लिंग प्रकाश में आये हैं। इनमें जागेश्वर, नारायकाली, बाणेश्वर आदि ग्रामों से शिल्प की दृष्टि से महत्वपूर्ण लिंग प्रकाश में आये हैं। जागेश्वर के कादार मंदिर में स्थापित एकमुकी लिंग प्रतिमा विज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

नारयणकाली मंदिर समूह में एक लघु मंदिर में भी एक एकमुखी शिवलिंग स्थापित किया गया है। इसमें शिव मुख जटामिक कर्णकुंडल एवं एकावलि से साधारण किन्तु आकर्षक ढ़ंग से सजाया जाता है। इसके मस्तक पर तीसरा नेत्र विराजमान है।

महाभारत के आदिपर्व के अनुसार देवमंडली को देखने और उनकी प्रदक्षिणा करने वाली तिलोत्तमा का दर्शन करने के लिए शिव ने चारों दिशाओं में चार मुख प्रकट किये। शिव के ये रुप तत्पुरुष, सद्योजात वामदेव और अघोरुप हैं। पाँवा मुख ऊशान कहलाता है। नागों का मानना है कि ये चार मुख ब्रह्मा, विष्णु सीर्य और रुद्र के हैं। ईशाल मुख ब्रह्मांड का प्रतीक है।

प्राणी मात्र के अर्विभाव के लिए पृथ्वी, जल-अग्नि, वायु एवं आकाश का मुख्य योगदान माना जाता है। इन्हीं पंचभूतों को सद्योजात-पृथ्वी, वामदेव-जल, अघोर-अग्नि, तत्पुरुष-वायु तथा ईशान का आकाश के रुप में निरुपण किया गया है। इसी क्रम में नारायणकाली में पशुपतिनाथ मंदिर के सामने एक चतुर्मुखी शिवलिंग विराजमान है। यह शिवलिंग अत्यंत सुन्दर एवं कलात्मक है। अन्य परम्परागत शिवलिंगों के अनुरुप इस मुखलिंग में भी पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण दिशाओं में क्रमश: शिव के चार रुप दर्शनीय है। त्रिनेत्रधारी अघोरमुख, जटाजूट, सपंकुंडल, एकावलि से अलंकृत है। जटाजूट के मध्य मानवमुँड दर्शनीय है। अन्यमुख किरीट मुकुट, चक्रकुंडल एवं एकावली से युक्त है। लघु मंदिर के शिवलिंग पर निरुपित शिवमुख, जटा मुख, कर्णकुंडल एवं एकावली साधारण परन्तु आकर्षक ढ़ंग से सजाया गया है। मस्तक पर तीसरा नेत्र भी विराजमान है।

यहाँ से एक अन्य विलक्षण शिवलिंग की जानकारी प्राप्त होती है। यह लिंग दो भागों में विभाजित है। ऊपरी भाग तो सामान्य लिंग के अनुरुप है किन्तु निचले चौकोर भाग में चतुर्भुजी आसनस्थ गणेक का अंकन है। उनका दायाँ हाथ अभयमुद्रा में दर्शित है। अन्य हाथों में क्रमश: परशु, अंकुश: एवं मोदक मात्र सुशोभित है। लम्बोदर, एकदंत, सूपंकर्ण गणेश की सूँड वामावर्त है। लिंग के आदार पर गणेश को निर्मित किये जाने का उदाहरण अन्य जगहों से नहीं पाये जाते हैं।

गोमती नदी के तट पर बैजनाथ - बागेश्वर मार्ग पर बाणेश्वर ग्राम में कभी प्राचीन देवालयों का एक पूरा समूह अवस्थित रहा होगा जिसकी मूर्तियाँ पास के खेत से उठाकर एक नये देवालय में रख दी गयी है।

इस देवालय में एक विलक्षण पंचायतन शिवलिंग रखा हुआ है इसके पूजा भाग में द्विमुखी देवी, कार्तिकेय लकुलिश तथा शिव के घोर रुप को दर्शाया गया है।

द्विभुज देवी पद्मपीठ पर, प्रलम्ब मुद्रा में आसनस्थ है। इनके दोनों घुटनों पर योगप बंधा है। पारम्परिक आभूषणों कंठमाला, एक लड़ी का हार - एकावली तता पैरों में पायजेब से वे अलंकृत है। मणिमाला से उनका प्रभा मंडल आलोकित है। जबकि कार्तिकेय सुखासन में बैठे हुए हैं, जिनके वामहस्त में शक्ति तता दक्षिम हाथ में सनाल कमल शोभित है। वे जटामुख, वृत कुँडल, कंठहार, कंकण तता नुपूर आदि आभूषणों सं अलंकृत हैं। उनके बायें स्कन्ध पर कुंडल झूल रहा है। कुमार के दायें घुटने पर तीन धारियों से युक्त योगप बंधा हुआ है। लकुलीश योगासन में बैठे हैं। उनका उर्ध्वलिंग तथा बायें कंधे के सहारे दंड स्पष्ट दृष्टिगोचर है। ऊपर उठे वाम हस्त में अस्पष्ट वस्तु हैं। दायाँ हाथ खण्डित है। शीर्ष पर कुंचित केश तथा गले में मणियों की माला शोभायमान है। शिव के घोर रुप में ललितासन में बैठे देव के दायें घुटने पर अर्धयोगपट्ट है, इनके मुख के बाहर निकले दांत लम्बे हैं। विस्फारित नेत्र, मोटे होंठ के कारण उनकी मुखाकृति उग्र हो गची है। उठे घुटने पर अवस्थित दायें हाथ में खपंर तथा बायें हाथ में सम्भवत: दंड त्रिशूल रुपी आयुध धारण किये हैं।

कुमाऊँ क्षेत्र में पूजा

अर्चना का प्रचलन प्रारम्भ से ही हो रहा है। सादे लिंगों का पूजा आनादि काल से अर्वाचीन समय तक निरन्तर चला आ रहा है। एकमुखी, चतुरमुखी तता पंचायतन शिवलिंग के निर्माण में प्राचीन परम्परा का निर्वाह किया गया है। सादा जटामुकुट, त्रिनेत्र तथा त्रिवलय युक्त ग्रीवा सहित शिवमुख लगभग १० वीं शती तक बनते रहे। यहाँ यह भी उल्लेख करना उचित होगा कि शिव देवालयों में चतुर्मुख शिवलिंग अधिक संख्या में प्राप्त होते हैं। गुप्त काल में यद्यपि प्रतिमा पूजना का बाहुल्य था तो भी मुखलिंगों की लोकप्रियता कम नहीं हुई। अन्तर केवल इतना आया कि इनका लम्बाई कम और मोटाई अधिक हो गयी। कुषाणकाल वाला शिवत्रिनेत्र क्षैतिज के स्थान पर उर्ध्व हो गया। शिव के केश सज्जायें भी इसी समय बनायी गयीं। उत्तर गुप्त काल में सपं से सम्बन्धित कर जाने के कारण सपं कुँडल, सर्पाहार तथा लिंग पर सपं बनाये जाने लगे।

यहाँ शिव की अनेक प्रतिमायें प्राप्त होती हैं। यह प्राय: मंदिरों की शुकनास के अग्रभाग में, स्वतन्त्र, परिकर खंडों में अथवा समूचे परिवार के साथ दृष्टिगोचर होती है। विशाल शिव प्रतिमाओं की संख्या कम है। पाँचवी शती के पश्चात शिव प्रतिमाओं का व्यापक निर्देशन हुआ है।

सभी शैव केन्द्रों में शिवत्रिमुख का प्रचलन प्रमुखता से मिलता है। मंदिर की शुकनास पर शिव के इस रुप को सर्वाधिक स्थान मिला। इसके पश्चात वे मंदिर के शिखर पर स्थापित किये गये। जोगेश्वर के मृत्युंजय मंदिर की शुकनास पर शिव त्रिमुख का आकर्षण अंकन किया गया है। इन्हें शिव के रुद्र रुप से पहचान की गयी है।

नटराज शिव का अंकन यहाँ बहुत कम देखने को मिलता है। जोगेश्वर तथा कपिलेश्वर मंदिरों की शुकनास पर नटराज शिव का अंकन हुआ है। अकेले कपिलेश्वर महादेव मंदिर समूह से ही नटराज शिव की तीन प्रतिमायें प्रकाश में आ चुकी हैं। चम्पावत से भी नटराज शिव प्राप्त हुए हैं। वैसे भी शिव ही नृत्य के प्रवर्तक हैं। शिव की नटराज मुद्राओं में भारतीय काल को आद्योपांत प्रभावित किया है।

लकुलीश की प्रतिमायें यहाँ प्रचुर मात्रा में देखने को मिलता है। कत्यूरी शासक आचार्य लकुलीश के माहेश्वर सम्प्रदाय में ही दीक्षित थे। इसलिए कत्यूरी शासकों के समय लकुलीश सम्प्रदाय अत्याधिक फला-फूला। लकुलीश को शिव का अट्ठाइसवां अवतार माना जाता है। उर्ध्व लिंग, एक हाथ में लकुट (डंडा) लिये देवता का अंकन मंदिरों की शुकनास पर, रथिकाओं में अथवा स्वतंत्र रुप से किया जाता रहा। पाताल भुवनेश्वर, जोगेश्वर कपिलेश्वर से लकुलीश की प्रतिमायें मिलती हैं।

कुमाऊँ मंडल से व्याख्यान दक्षिणामूर्ति, त्रिपुरान्तक मूर्ति, भैरव आदि भी पर्याप्त संख्या में मिले हैं। लेकिन उमा-महेश की प्रतिमा सर्वाधिक संख्या में मिलती है। इन प्रतिमाओं में शिव अपना वामांगी पार्वती के साथ प्रदर्शित किये जाते हैं; शिव का बायाँ हाथ देवी के स्कन्ध या कार्ट परखा रहता है। देवा का दाहिना हाथ भी शिव के स्कन्ध पर होता है। पद्म प्रभा मंडल शोभित रहता है।

यहाँ शिव की जंघा पर आसनस्य उमा को आलिंगनबद्ध दर्शाया गया है। शिव परम्परागत अलंकरण जटाजूट से सज्जित, ग्रैवेयक (गले का चपटा कंठा), कंठ में पड़े हार, बाजू-बंध तथा कुण्डलों से सुशोभित होते हैं। नारायण काली, पावनेश्वर, नकुलेश्वर आदि अनेक स्थानों से उमा महेश की प्रतिमायें मिलती हैं।

शिव परिवार में गणेश के बाद लोकप्रियता की दृष्टि से कुमार कार्तिकेय का निर्देसन हुआ है। शिव पुत्र कुमार स्कन्द ही कार्तिकेय नाम से जाने गये। भविष्य पुराण के अनुसार देवासुर संग्राम में सूर्य की रक्षार्थ उन्हें सूर्य के निचले पा में स्थापित किया गया। वरद अथवा अभय मुद्राओं वाले कुमार को शक्ति, खड्ग, शूल, तीर, ढाल सहित दो अथवा अधिक हाथों सहित निर्देशित किया जाने की परम्परा है।

कुमाऊँ क्षेत्र में मयूरारुढ़़, शूलधारी कुमार की स्वतन्त्र प्रतिमायें प्रकाश में आ चुकी है। उनके नाम से स्वतंत्र मंदिर भी अस्तित्व में है। स्वतन्त्र प्रतिमायें नौदेवल (अल्मोड़ा), नारायणकाली आदि से प्रकाश में आयी है। जबकि उमा-महेश के साथ भी उनकी प्रतिमायें अधिक संख्या में प्राप्त होती है। बैजनाथ से उनकी चतुर्मुखी प्रतिमा मिलती है।

कुमाऊँ मंडल से रावणानुग्रह प्रतिमायें भी प्राप्त होती हैं। गरुड़ के एक मंदिर के शुकनास पर यह दृश्य उकेरा गया है। कथा है कि एक बार मदान्ध रावण अपने बाहुबल से समूचा कैलाश ही उठाकर ले चलने को तत्पर हुआ। परन्तु कैलाश पर विराजमान शिव ने अपने पैर के अंगूठे से कैलाश को तनिक सा दबाया तो व नीचे से निकल न सका। लाचार रावण ने हजारों वर्ष तक शिव कि स्तुति कर मुक्ती पायी। शिल्प में इस कथा को बहुत लोकप्रियता मिली। परवर्ती काल में मंदिरों की शुकनास पर इस कथा का अंकन बहुत विचित्र ढ़ंग से दर्शाया गया है।

पूर्व मध्यकाल में वीणाधारी शिव का पर्याप्त प्रचलन हुआ। किन्तु इसकाल में भी सर्वाधिक प्रतिमायें उमा-महेश की प्राप्त होती है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि सत्यम-शिवम-सुन्दरम का सम्पूर्ण सार कलाकार द्वारा इन्हीं प्रतिमाओं में संजोकर रख दिया गया। द्विभुजी एवं अलंकरणों से युक्त शिव एवं उमा की प्रतिमा, नदी की नंगी पीठ पर आलिंगनबद्ध मुद्रा में आसनस्थ प्रतिमायें, अपनी विकास की गति को स्वयं अभिव्यक्त करती हैं। मध्यकाल में प्रतिमा कला के ह्रास के साथ चेहरे पर भावों के अंकन में कमी तथा कामोत्तेजना के भावों में वृद्धि अधिक प्रतीत होती है। पूर्व में शिव का पार्वती के कन्धों पर रखा हाथ इस काल में उनके वक्ष पर पहुँच गया। गढ़ने में भी बारीकी के स्थान पर स्थूलता आती चली गयी। इस काल में आभूषणों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि देखने को मिलती है।


पार्वती :

पार्वती की प्रतिमायें देवी प्रतिमाओं मे सबसे अधिक प्राप्त होती हैं। बाल्यवस्था में इनका नाम गौरी था। जब ये विवाह योग्य हुई तो इन्होंने शिव को पति के रुप में पाने के लिए घोर तपस्या की। तपस्यारत देवी पार्वती कहलाने लगी। प्रतिमाओं के तीनों रुपों में उक्त देवी का अँकन प्राप्त होता है। मार्कण्डेय पुराण में देवी महात्म्य के अनुसार गौरी की प्रतिमा द्विभुजी अथवा चतुर्भुजी होनी चाहिए। द्विहस्ता देवी का दायाँ हाथ अभय मुद्रा में तथा दायें हाथ में जलपात्र (कमण्डल) बनाने का विधान है। चतुर्भुजी गौरी के हाथों में अक्षमाला, पद्म तथा कमण्डल के साथ दक्षिण अधोहस्त अभय मुद्रा में होनी चाहिए। पार्वती के बायें हाथों में अक्षमाला, कमण्डलू एवं दायें हाथ अभय तता वरद मुद्रा में होने चाहिए। सुन्दर केश विन्यास, वस्र, सर्वालमकारों से भूषित शिव के साथ द्विभुजी तथा सेवतन्त्र रुप में चतुर्भुजी उमा की प्रतिमायें प्राप्त होती हैं। उनके हाथों में प्राय: अक्षमाला, दपंण, पद्म तथा जलपत्र होता है।

बांसुलीसेरा से देवी पार्वती की मूर्ति मिली है। प्रतिमा विज्ञान के मानदण्डों के अनुसार यह गौरी की प्रतिमा है। द्विभुजी देवी की मूर्ति हरे रंग के प्रस्तर में बनाई गयी है। पुष्पकुण्डल, कण्ठहार, स्तनसूत्र, केयूर, कंकम, आपादवृत साड़ी, नुपूर आदि आभूषणों से अलंकृत देवी के अभय मुद्रा में उठे दायें हस्त में अक्षमाला शोभित है। बायें हाथ में जलपत्र (कमण्डलू) धारण किये हुए हैं। शीर्ष पर जटामुकुट से निकली अलकावलि दोनों कन्धों को स्पर्श कर रही हैं। साड़ी पर अतिसुन्दर बेलबूटे, बने हुये हैं जो देवी के कमर में कटिसूत्र से आवेष्ठित हैं। बेलबूटेदार उत्रीय कन्धों को आवृत करता हुआ दोनों बाहों पर लहरा रहा है। गौरी के दोनों पाश्वों में एक-एक कदली वृक्ष निरुपित किया गया है।

मध्यकाल में पार्वती की अनेक स्वतन्त्रप्रतिमायें मिली हैं। जिनमें जटामुकुट, सर्वालंकारों से अलंकृत देवी की पीठीका पर गोधिका अंकित है। पार्वती की उक्त प्रतिमायें लगभग ८वीं शती ई. तक प्रचुर मात्रा में निर्मित हुई हैं। इनमें अल्मोड़ा जिलान्तर्गत बैजनाथ, चमोली जिलान्तर्गत लाखामण्डल में रखी पार्वती की प्रतिमायें कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। गढ़वाल एवं कुमाऊँ में बजिंगा, देवाल, तुंगनाथ, पलेठी, नारायणकाली तथा नैनीताल जिलान्तर्गत ग्राम त्यूड़ा दियारी में रखी लगभग ९वीं शती ई. की द्विभुजी पार्वती विशे, उल्लेखनीय है।

सदाशिव मंदिर ग्राम रौलमेल में देवी पार्वती की अत्यन्त सुन्दर प्रतिमा मिली है। ग्राम रौलमेल लोहाघाट - देवीधुरा मार्ग पर बसा है। चतुर्भुजी पार्वती को समपाद मुद्रा में स्थानक खड़ा दर्शाया गया है। देवी के वाम अधोहस्त में अग्निपात्र तथा दक्षिण अधोहस्त वरद मुद्रा में दर्शाया गया है। उनके दक्षिण उर्ध्व हस्त मे दपंण है। पाश्वों में दो-दो परिचरिकाओं सहित व्याल भी अंकित किया गया है। ऊपरी भाग में मालाधार अंकित हैं। पैरों तक धोती से आवृत देवी जटा मुकुट, सर्वालंकारों से भूषित हैं। देवी वाहन रुप में गोधिका अंकित है।

चैकुनी गाँव में शिव मंदिर के नाम से स्थापित देवालय में पार्वती की एक सुन्दर प्रतिमा है। देवी दायाँ हाथ वरद मुद्रा में उनके दायें घुटने पर आधारित है। ललितानस्थ देवी के अधो वाम हस्त में कमण्डलु, अधो दक्षिण हस्त वरद मुद्रा तथा दोनों ऊपरी हाथों में अग्निपात्र है। शीर्ष जटामुकुट से अलंकृत है। कानों में पुष्प कुण्डल, गले में मोतियों का हार, कंठहार, वक्ष पर दो लड़ियों का हार, कमर में मेखला, घुटनों से ऊपर मोतियों की मालाओं से अलंकृत है। उनकी दायीं पैर की ओर उनका वाहन सिंह तथा बायीं ओर मृग स्थापित किया गया है।

कत्यूर घाटी के ग्राम शाली - छतिया से भी पार्वती की पूर्व मध्य कालीन एक प्रतिमा प्रकाश में आया है जिसके बायें ओर मृग तथा दायीं ओर सिंह बैठा है।

बैजनाथ से प्राप्त मध्यकालीन पार्वती प्रतिमा सर्वाधिक सुन्दर है। इस प्रतिमा में चतुर्भुजी देवी को स्थानक समपाद मुद्रा में दिखाया गया है। उनका दायाँ अधो हाथ वरद मुद्रा, बायाँ अधो हस्त जलपात्र, दाहिना उर्ध्व हस्त शिव व अक्षमाला से सुशोभित है। वाम उर्ध्व हस्त में गणेश हैं। जटामुकुट से देवी सुशोभित हैं। स्तनसूत्र, हार, एकावली, मेखला, बाजूबन्ध से मंडित देवी पद्म पीठ पर खड़ी है। उनके पैर धोती से आवप्त तथा घुटनों तक आभूषण दर्शाये गये हैं। अधो पाश्वों में दो-दो उपासिकायें हैं प्रतिमा का परिकर भी अलंकृत है। ऊपरी पार्श्व में गणेश का भी अंकन हुआ है।

पार्वती प्रतिमा निर्माण की परम्परा प्राचीन काल से लगभग १५वी. शती तक अत्यधिक वल्लवित हुई। पूर्व काल में नाभी छन्दक उनका प्रिय एवं प्रमुख आभूषण रहा जबकि उत्तर मध्य काल की प्रतिमाओं से युक्त आभूषण अधिक प्रचलित हुए।

बुधवार, 29 जुलाई 2009

सृष्टि और संहार के अधिपति भगवान शिव

सृष्टि और संहार के अधिपति भगवान शिव भगवान शिव सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से शिव को भिन्न माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदिस्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं।

प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि कहलाती है, लेकिन फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी महाशिवरात्रि कही गई है। इस दिन शिवोपासना भुक्ति एवं मुक्ति दोनों देने वाली मानी गई है, क्योंकि इसी दिन अर्धरात्रि के समय भगवान शिव लिंगरूप में प्रकट हुए थे।

माघकृष्ण चतुर्दश्यामादिदेवो महानिशि ।
शिवलिंगतयोद्रूत: कोटिसूर्यसमप्रभ: ।।

भगवान शिव अर्धरात्रि में शिवलिंग रूप में प्रकट हुए थे, इसलिए शिवरात्रि व्रत में अर्धरात्रि में रहने वाली चतुर्दशी ग्रहण करनी चाहिए। कुछ विद्वान प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी विद्धा चतुर्दशी शिवरात्रि व्रत में ग्रहण करते हैं। नारद संहिता में आया है कि जिस तिथि को अर्धरात्रि में फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी हो, उस दिन शिवरात्रि करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। जिस दिन प्रदोष व अर्धरात्रि में चतुर्दशी हो, वह अति पुण्यदायिनी कही गई है। इस बार 6 मार्च को शिवरात्रि प्रदोष व अर्धरात्रि दोनों में विद्यमान रहेगी।

ईशान संहिता के अनुसार इस दिन ज्योतिर्लिग का प्रादुर्भाव हुआ, जिससे शक्तिस्वरूपा पार्वती ने मानवी सृष्टि का मार्ग प्रशस्त किया। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि मनाने के पीछे कारण है कि इस दिन क्षीण चंद्रमा के माध्यम से पृथ्वी पर अलौकिक लयात्मक शक्तियां आती हैं, जो जीवनीशक्ति में वृद्धि करती हैं। यद्यपि चतुर्दशी का चंद्रमा क्षीण रहता है, लेकिन शिवस्वरूप महामृत्युंजय दिव्यपुंज महाकाल आसुरी शक्तियों का नाश कर देते हैं। मारक या अनिष्ट की आशंका में महामृत्युंजय शिव की आराधना ग्रहयोगों के आधार पर बताई जाती है। बारह राशियां, बारह ज्योतिर्लिगोंे की आराधना या दर्शन मात्र से सकारात्मक फलदायिनी हो जाती है।

यह काल वसंत ऋतु के वैभव के प्रकाशन का काल है। ऋतु परिवर्तन के साथ मन भी उल्लास व उमंगों से भरा होता है। यही काल कामदेव के विकास का है और कामजनित भावनाओं पर अंकुश भगवद् आराधना से ही संभव हो सकता है। भगवान शिव तो स्वयं काम निहंता हैं, अत: इस समय उनकी आराधना ही सर्वश्रेष्ठ है।

शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। वे अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। वे स्वयं द्वंद्वों से रहित सह-अस्तित्व के महान विचार का परिचायक हैं। ऐसे महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है शिवरात्रि।

शिवरात्रि व्रत की पारणा चतुर्दशी में ही करनी चाहिए। जो चतुर्दशी में पारणा करता है, वह समस्त तीर्थो के स्नान का फल प्राप्त करता है। जो मनुष्य शिवरात्रि का उपवास नहीं करता, वह जन्म-मरण के चक्र में घूमता रहता है। शिवरात्रि का व्रत करने वाले इस लोक के समस्त भोगों को भोगकर अंत में शिवलोक में जाते हैं।

शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहर में करनी चाहिए। शिव को बिल्वपत्र, धतूरे के पुष्प अति प्रिय हैं। अत: पूजन में इनका उपयोग करें। जो इस व्रत को हमेशा करने में असमर्थ है, उन्हें इसे बारह या चौबीस वर्ष करना चाहिए। शिव का त्रिशूल और डमरू की ध्वनि मंगल, गुरु से संबद्ध हैं। चंद्रमा उनके मस्तक पर विराजमान होकर अपनी कांति से अनंताकाश में जटाधारी महामृत्युंजय को प्रसन्न रखता है तो बुधादि ग्रह समभाव में सहायक बनते हैं। सप्तम भाव का कारक शुक्र शिव शक्ति के सम्मिलित प्रयास से प्रजा एवं जीव सृष्टि का कारण बनता है। महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है।

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

पार्वती तुकेश्वर महादेव मंदिर

Parvati Mahadev temple
देवाधिदेव महादेव को सबसे ज्यादा प्रिय पार्वतीजी के मंदिरों की संख्या देशभर में नहीं के बराबर है, मगर इंदौर में केशरबाग रोड पर एक अत्यंत प्राचीन मंदिर है। इसका नाम केशरबाग शिव मंदिर उत्कीर्ण है, परंतु इस स्थान का वास्तविक नाम पार्वती तुकेश्वर महादेव मंदिर है। इस मंदिर के बारे में शहर में बहुत कम लोगों को जानकारी है।

इसकी सबसे बड़ी खासियत है माँ पार्वती की बेहद सुंदर प्रतिमा, जिसके एक हाथ में कलश है और गोद में स्तनपान कर रहे बाल गणेशजी हैं जबकि ठीक सामने शिवजी लिंगस्वरूप में विद्यमान है। इस मंदिर की स्थापना कब हुई, इसका कोई प्रामाणिक इतिहास उपलब्ध नहीं है, लेकिन वहाँ पर लगे पट्ट की मानें तो करीब 400 वर्ष पहले इसका निर्माण हुआ था। बाद में लोकमाता देवी अहिल्याबाई ने इसका जीर्णोद्धार भी करवाया।

ऐतिहासिक साक्ष्य के मुताबिक 1810 से 1840 के बीच होलकर वंश की केशरबाई ने इसका निर्माण करवाया। यह मंदिर पूर्वमुखी है। पहले इसका बाहरी प्रवेशद्वार भी पूर्वमुखी ही था, जो अब सड़क निर्माण की वजह से पश्चिम मुखी हो गया है। मंदिर की ऊँचाई 75 फुट और चौड़ाई करीब 30 फुट है। पूरा मंदिर मराठा, राजपूत और आंशिक रूप से मुगल शैली में बनकर तैयार हुआ है। इसकी एक और सबसे बड़ी खासियत माँ पार्वती की अत्यंत सुंदर प्रतिमा है, जो करीब दो फुट ऊँची है। प्रतिमा वास्तव में इतनी सुंदर है, जैसे लगता है कि अभी बोल पड़ेगी।

श्वेत संगमरमर से बनी इस प्रतिमा का भाव यह है कि इसमें पुत्र व पति की सेवा का एक साथ ध्यान रखा जा रहा है। मंदिर के ही ठीक सामने कमलाकार प्राचीन फव्वारा भी है। वर्तमान में मंदिर का कुल क्षेत्रफल 150 गुणा 100 वर्गफुट ही रह गया है। हर वर्ष श्रावण मास में विद्वान पंडितों के सान्निध्य में अभिषेक, श्रृंगार, पूजा-अर्चना आदि अनुष्ठान कराए जाते हैं।

मंदिर का गर्भगृह काफी अंदर होने के बावजूद सूर्यनारायण की पहली किरण माँ पार्वती की प्रतिमा पर ही पड़ती है। मंदिर की सुंदरता में चार चाँद लगाता है यहाँ का पीपल वृक्ष। समीप ही प्राचीन बावड़ी भी है जिसे सूखते हुए आज तक किसी ने नहीं देखा। भीषण गर्मी के मौसम में भी यह लबालब रहती है।

पार्वती मंदिर से ही लगे हुए दो और मंदिर भी हैं। एक है राम मंदिर और दूसरा है हनुमान मंदिर। प्राचीन राम मंदिर से ही एक सुरंग भूगर्भ से ही दोनों मंदिरों को जोड़ती है। यह बावड़ी के अंदर भी खुलती है। बताते हैं कि किसी समय यह सुरंग लालबाग मंदिर तक जाती थी। राम मंदिर के ठीक नीचे एक तहखाना भी है। मौजूदा समय में यह स्थल देवी अहिल्याबाई होलकर खासगी ट्रस्ट में शामिल है।

होलकर शासकों द्वारा प्रसिद्ध मराठी संत नाना महाराज तराणेकर को यहाँ का परंपरागत पुजारी नियुक्ति पत्र दिया गया था। इस आशय की सनद भी उन्हें प्रदान की गई थी, तभी से उनका परिवार यहाँ सेवारत है। मंदिर के पुजारी बाड़ा महाराज (विजय कामले) हैं।

विश्व के कल्याण की कामना है कांवड़ यात्रा में


हिंदू कैलिंडर का पांचवां महीना सावन मुख्य रूप से तप और ध्यान पर केंद्रित है। सूर्य के उत्तरायण में होने पर यज्ञ, अनुष्ठान और देवपूजा करने का विधान है, तो दक्षियाणन में तप एवं साधना पर जोर दिया गया है। सावन में शिवभक्त हलाहल पान करने वाले शिव का ताप मिटाने के लिए कांवड़ से गंगा जल लाकर अपने अभीष्ट शिवधाम में जलाभिषेक करते हैं।

विषपान की घटना सावन महीने में हुई थी, तभी से यह क्रम अनवरत चलता आ रहा है। कांवड़ यात्रा को आप पदयात्रा को बढ़ावा देने के प्रतीक रूप में मान सकते हैं। पैदल यात्रा से शरीर के वायु तत्व का शमन होता है। कांवड़ यात्रा के माध्यम से व्यक्ति अपने संकल्प बल में प्रखरता लाता है। वैसे साल के सभी सोमवार शिव उपासना के माने गए हैं, लेकिन सावन में चार सोमवार, श्रावण नक्षत्र और शिव विवाह की तिथि पड़ने के कारण शिव उपासना का माहात्म्य बढ़ जाता है।

'शिव' परमात्मा के कल्याणकारी स्वरूप का नाम है। जो मार्ग नियम, व्यवहार, आचरण और विचार हमें तुच्छता से शीर्ष की ओर ले जाए, वही कल्याणकारी है। शिव लिंग को अंतर्ज्योति का प्रतीक माना गया है। यह ध्यान की अंतिम अवस्था का प्रतीक है, क्योंकि सृष्टि के संहारक शिव भय, अज्ञान, काम, क्रोध, मद और लोभ जैसी बुराइयों का भी अंत करते हैं।

शिव कर्पूर गौर अर्थात सत्वगुण के प्रतीक हैं। वे दिगंबर अर्थात माया के आवरण से पूरी तरह मुक्त हैं। उनकी जटाएं वेदों की ऋचाएं हैं। शिव त्रिनेत्रधारी हैं अर्थात भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों के ज्ञाता हैं। बाघंबर उनका आसन है और वे गज चर्म का उत्तरीय धारण करते हैं। हमारी संस्कृति में बाघ क्रूरता और संकटों का प्रतीक है, जबकि हाथी मंगलकारी माना गया है। शिव के इस स्वरूप का अर्थ यह है कि वे दूषित विचारों को दबाकर अपने भक्तों को मंगल प्रदान करते हैं।

शिव का त्रिशूल उनके भक्तों को त्रिताप से मुक्ति दिलाता है। उनके सांपों की माला धारण करने का अर्थ है कि यह संपूर्ण कालचक्र कुंडली मार कर उन्हीं के आश्रित रहता है। चिता की राख के लेपन का आशय दुनिया से वैराग्य का संदेश देना है। भगवान शिव के विष पान का अर्थ है कि वे अपनी शरण में आए हुए जनों के संपूर्ण दुखों को पी जाते हैं। शिव की सवारी नंदी यानी बैल है। यहां बैल धर्म और पुरुषार्थ का प्रतीक है।

भगवान शिव कल्याण के देव हैं और कल्याण की संस्कृति ही वास्तव में शिव की संस्कृति है। सावन का महीना, पार्वती जी का भी महीना है। शिव परमपिता परमेश्वर हैं तो मां पार्वती जगदंबा और शक्ति। सदाशिव और मां पार्वती प्रकृति के आधार हैं। चतुर्मास में जब भगवान विष्णु शयन के लिए चले जाते हैं, तब शिव रुद नहीं, वरन भोले बाबा बनकर आते हैं।

सावन में धरती पर पाताल लोक के प्राणियों का विचरण होने लगता है। वर्षायोग से राहत भी मिलती है और परेशानी भी। चतुर्मास की शुरुआत में वर्षा के कारण रास्ते आने-जाने लायक नहीं रह जाते। सावन आते-आते वर्षा की गति मंथर हो जाती है। इस काल में पैदल यात्राओं का दौर धीरे-धीरे शुरू हो जाता है।

कांवडि़यों के रूप में यह प्रार्थना सामूहिक उत्सव के रूप में देखने को मिलती है। कांवड़ यात्रा धर्म और अर्पण का प्रतीक है। सावन में काम का आवेग बढ़ता है। शंकर जी इस आवेग का शमन करते हैं। कामदेव को भस्म करने का प्रसंग भी सावन का ही है। और शिव का विवाह भी श्रावण मास की शिवरात्रि को ही संपन्न हुआ। शिव चरित में उल्लेख है कि सृष्टि चक्र की मर्यादा, परंपरा और नियमोपनियम बने रहें, इसलिए तारकासुर को मारने के लिए शिव ने विवाह किया। तभी से सावन में विवाह परंपरा का भी जन्म हुआ था। इस नाते सावन लोकोत्पत्ति का उत्सव है।

कांवडि़यों के रूप में समाज के हर वर्ग के लोग उमंग और आस्था के साथ शिव जी के इस विवाह में शामिल होने जाते हैं। कुछ वर्षों से कांवड़ यात्रा के दौरान अप्रिय घटनाएं हुई हैं और मार्ग में असामाजिक तत्व उत्पात और हंगामे की स्थिति पैदा कर देते हैं। अगर साधक भगवान शिव के समान कल्याण की कामना ले कर चलें तभी कांवड़ यात्रा का उद्देश्य सार्थक होगा।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

गंगावतरण श्रावण मास भगवान भोले शंकर का प्रिय महीना

युधिष्ठिर ने लोमश ऋषि से पूछा, "हे मुनिवर! राजा भगीरथ गंगा को किस प्रकार पृथ्वी पर ले आये? कृपया इस प्रसंग को भी सुनायें।" लोमश ऋषि ने कहा, "धर्मराज! इक्ष्वाकु वंश में सगर नामक एक बहुत ही प्रतापी राजा हुये। उनके वैदर्भी और शैव्या नामक दो रानियाँ थीं। राजा सगर ने कैलाश पर्वत पर दोनों रानियों के साथ जाकर शंकर भगवान की घोर आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उनसे कहा कि हे राजन्! तुमने पुत्र प्राप्ति की कामना से मेरी आराधना की है। अतएव मैं वरदान देता हूँ कि तुम्हारी एक रानी के साठ हजार पुत्र होंगे किन्तु दूसरी रानी से तुम्हारा वंश चलाने वाला एक ही सन्तान होगा। इतना कहकर शंकर भगवान अन्तर्ध्यान हो गये।
"समय बीतने पर शैव्या ने असमंज नामक एक अत्यन्त रूपवान पुत्र को जन्म दिया और वैदर्भी के गर्भ से एक तुम्बी उत्पन्न हुई जिसे फोड़ने पर साठ हजार पुत्र निकले। कालचक्र बीतता गया और असमंज का अंशुमान नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। असमंज अत्यन्त दुष्ट प्रकृति का था इसलिये राजा सगर ने उसे अपने देश से निष्कासित कर दिया। फिर एक बार राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ करने की दीक्षा ली। अश्वमेघ यज्ञ का श्यामकर्ण घोड़ा छोड़ दिया गया और उसके पीछे-पीछे राजा सगर के साठ हजार पुत्र अपनी विशाल सेना के साथ चलने लगे। सगर के इस अश्वमेघ यज्ञ से भयभीत होकर देवराज इन्द्र ने अवसर पाकर उस घोड़े को चुरा लिया और उसे ले जाकर कपिल मुनि के आश्रम में बाँध दिया। उस समय कपिल मुनि ध्यान में लीन थे अतः उन्हें इस बात का पता ही न चला। इधर सगर के साठ हजार पुत्रों ने घोड़े को पृथ्वी के हरेक स्थान पर ढूँढा किन्तु उसका पता न लग सका। वे घोड़े को खोजते हुये पृथ्वी को खोद कर पाताल लोक तक पहुँच गये जहाँ अपने आश्रम में कपिल मुनि तपस्या कर रहे थे और वहीं पर वह घोड़ा बँधा हुआ था। सगर के पुत्रों ने यह समझ कर कि घोड़े को कपिल मुनि ही चुरा लाये हैं, कपिल मुनि को कटुवचन सुनाना आरम्भ कर दिया।
अपने निरादर से कुपित होकर कपिल मुनि ने राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को अपने क्रोधाग्नि से भस्म कर दिया।
"जब सगर को नारद मुनि के द्वारा अपने साठ हजार पुत्रों के भस्म हो जाने का समाचार मिला तो वे अपने पौत्र अंशुमान को बुलाकर बोले कि बेटा! तुम्हारे साठ हजार दादाओं को मेरे कारण कपिल मुनि की क्रोधाग्नि में भस्म हो जाना पड़ा। अब तुम कपिल मुनि के आश्रम में जाकर उनसे क्षमाप्रार्थना करके उस घोड़े को ले आओ। अंशुमान अपने दादाओं के बनाये हुये रास्ते से चलकर कपिल मुनि के आश्रम में जा पहुँचे। वहाँ पहुँच कर उन्होंने अपनी प्रार्थना एवं मृदु व्यवहार से कपिल मुनि को प्रसन्न कर लिया। कपिल मुनि ने प्रसन्न होकर उन्हें वर माँगने के लिये कहा। अंशुमान बोले कि मुने! कृपा करके हमारा अश्व लौटा दें और हमारे दादाओं के उद्धार का कोई उपाय बतायें। कपिल मुनि ने घोड़ा लौटाते हुये कहा कि वत्स! जब तुम्हारे दादाओं का उद्धार केवल गंगा के जल से तर्पण करने पर ही हो सकता है।
"अंशुमान ने यज्ञ का अश्व लाकर सगर का अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण करा दिया। यज्ञ पूर्ण होने पर राजा सगर अंशुमान को राज्य सौंप कर गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने के उद्देश्य से तपस्या करने के लिये उत्तराखंड चले गये इस प्रकार तपस्या करते-करते उनका स्वर्गवास हो गया। अंशुमान के पुत्र का नाम दिलीप था। दिलीप के बड़े होने पर अंशुमान भी दिलीप को राज्य सौंप कर गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने के उद्देश्य से तपस्या करने के लिये उत्तराखंड चले गये किन्तु वे भी गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने में सफल न हो सके। दिलीप के पुत्र का नाम भगीरथ था। भगीरथ के बड़े होने पर दिलीप ने भी अपने पूर्वजों का अनुगमन किया किन्तु गंगा को लाने में उन्हें भी असफलता ही हाथ आई।
"अन्ततः भगीरथ की तपस्या से गंगा प्रसन्न हुईं और उनसे वरदान माँगने के लिया कहा। भगीरथ ने हाथ जोड़कर कहा कि माता! मेरे साठ हजार पुरखों के उद्धार हेतु आप पृथ्वी पर अवतरित होने की कृपा करें। इस पर गंगा ने कहा वत्स! मैं तुम्हारी बात मानकर पृथ्वी पर अवश्य आउँगी, किन्तु मेरे वेग को शंकर भगवान के अतिरिक्त और कोई सहन नहीं कर सकता। इसलिये तुम पहले शंकर भगवान को प्रसन्न करो। यह सुन कर भगीरथ ने शंकर भगवान की घोर तपस्या की और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी हिमालय के शिखर पर गंगा के वेग को रोकने के लिये खड़े हो गये। गंगा जी स्वर्ग से सीधे शिव जी की जटाओं पर जा गिरीं। इसके बाद भगीरथ गंगा जी को अपने पीछे-पीछे अपने पूर्वजों के अस्थियों तक ले आये जिससे उनका उद्धार हो गया। भगीरथ के पूर्वजों का उद्धार करके गंगा जी सागर में जा गिरीं और अगस्त्य मुनि द्वारा सोखे हुये समुद्र में फिर से जल भर गया।"

श्रावण मास भगवान भोले शंकर का प्रिय महीना

श्रावण मास भगवान शंकर को विशेष प्रिय है। अत: इस मास में आशुतोष भगवान शंकर की पूजा का विशेष महत्व है। सोमवार शंकर का प्रिय दिन है। इसलिए श्रावण सोमवार का और भी विशेष महत्व है।

गौरतलब हो कि भगवान शंकर का यह व्रत सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है। इस मास में लघुरूद्र महारूद्ध अथवा अतिरूद्र पाठ करके प्रत्येक सोमवार को शिवजी का व्रत किया जाता है। प्रात: काल गंगा या किसी पवित्र नदी सरोवर या घर पर ही विधि पूर्वक स्नान करने का विधान है। इसके बाद शिव मंदिर जाकर या घर में पार्थिव मूर्ति बना कर यथा विधि से रूद्राभिषेक करना अत्यंत ही फलदायी है। इस व्रत में श्रावण महात्म्य और विष्णु पुराण कथा सुनने का विशेष महत्व है।

विदित हो कि कैलाश के उत्तर में निषध पर्वत के शिखर पर स्वयं प्रभा नामक एक विशाल पुरी थी जिसमें धन वाहन नामक एक गनविराज रहते थे। समयानुसार उन्हे आठ पुत्र और अंत में एक कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम गंधर्व सेना था। वह अत्यन्त रूपवती थी और उसे अपने रूप का बहुत अभिमान था। वह कहा करती थी कि संसार में कोई गंधर्व या देवती मेरे रूप के करोड़वे अंश के समान भी नहीं है। एक दिन एक आकाशचरीगण नायक ने उसकी बात सुनी तो उसे शाप दे दिया 'तुम रूप के अभिमान' में गंधर्वो और देवताओं का अपमान करती हो अत: तुम्हारे शरीर में केाढ़ हो जायेगा। शाप सुन कर कन्या भयभीत हो गयी और दया की भीख मांगने लगी। उसकी बिनती सुन कर गणनायक को दया आ गयी और उन्होंने कहा हिमालय के वन में गोश्रृंग नाम के श्रेष्ठ मुनी रहते है। वे तुम्हारा उपकार करेगे। ऐसा कह कर गणनायक चला गया। गंधर्व सेना व छोड़ कर अपने पिता के पास आई और अपने कुष्ट होने के कारण तथा उससे मुक्ति का उपाय बतायी। माता पिता उसे तत्क्षण लेकर हिमालय पर्वत पर गए और गोश्रृंग का दर्शन करके स्तुति करने लगे। मुनि के पूछने पर उन्होंने कहा कि मेरे बेटी को कोढ़ हो गया है कृपया इसकी शांति का उपाय बताएं।

मुनि ने कहा कि समुद्र के समीप भगवान सोमनाथ विराजमान है। वहां जाकर सोमवार व्रत द्वारा भगवान शंकर की आराधना करो। ऐसा करने से पुत्री का रोग दूर हो जायेगा। मुनि के वचन सुन कर धनवाहन अपनी पुत्री के साथ प्रभास क्षेत्र में जाकर सोमनाथ के दर्शन किए और पूरे विधि विधान के साथ सोमवार व्रज करते हुए भगवान शंकर की आराधना किए उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शंकर भगवान ने उस कन्या के रोगों को दूर किया और उन्हे अपनी भक्ति भी दान में दिया। आज भी लोग शिव जी को प्रसन्न करने के लिए इस व्रत को पूरी निष्ठा एवं भक्ति के साथ करते है और शिव को प्राप्त करते है।

शनिवार, 18 जुलाई 2009

भगवान शिव की पूजा और पूजा विधि

भगवान शिव ने भगवती के आग्रह पर अपने लिए सोने की लंका का निर्माण किया था गृहप्रवेश से पूर्व पूजन के लिए उन्होने अपने असुर शिष्य प्रकाण्ड विद्वान रावण को आमंत्रित किया था दक्षिणा के समय रावण ने वह लंका ही दक्षिणा में मांग ली और भगवान शिव ने सहजता से लंका रावण को दान में दे दी तथा वापस कैलाश लौट आए ऐसी सहजता के कारण ही वे ÷भोलेनाथ' कहलाते हैं ऐसे भोले भंडारी की कृपा प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील होने के लिए शिवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण पर्व है।

भगवान शिव का स्वरुप अन्य देवी देवताओं से बिल्कुल अलग है।जहां अन्य देवी-देवताओं को वस्त्रालंकारों से सुसज्जित और सिंहासन पर विराजमान माना जाता है,वहां ठीक इसके विपरीत शिव पूर्ण दिगंबर हैं,अलंकारों के रुप में सर्प धारण करते हैं और श्मशान भूमि पर सहज भाव से अवस्थित हैं। उनकी मुद्रा में चिंतन है, तो निर्विकार भाव भी है!आनंद भी है और लास्य भी। भगवान शिव को सभी विद्याओं का जनक भी माना जाता है। वे तंत्र से लेकर मंत्र तक और योग से लेकर समाधि तक प्रत्येक क्षेत्र के आदि हैं और अंत भी। यही नही वे संगीत के आदिसृजनकर्ता भी हैं, और नटराज के रुप में कलाकारों के आराध्य भी हैं। वास्तव में भगवान शिव देवताओं में सबसे अद्भुत देवता हैं वे देवों के भी देव होने के कारण ÷महादेव' हैं तो, काल अर्थात समय से परे होने के कारण ÷महाकाल' भी हैं वे देवताओं के गुरू हैं तो, दानवों के भी गुरू हैं देवताओं में प्रथमाराध्य, विनों के कारक निवारणकर्ता, भगवान गणपति के पिता हैं तो, जगद्जननी मां जगदम्बा के पति भी हैं वे कामदेव को भस्म करने वाले हैं तो, ÷कामेश्वर' भी हैं तंत्र साधनाओं के जनक हैं तो संगीत के आदिगुरू भी हैं उनका स्वरुप इतना विस्तृत है कि उसके वर्णन का सामर्थ्य शब्दों में भी नही है।सिर्फ इतना कहकर ऋषि भी मौन हो जाते हैं किः-

असित गिरिसमम स्याद कज्जलम सिंधु पात्रे, सुरतरुवर शाखा लेखनी पत्रमुर्वी

लिखति यदि गृहीत्वा शारदासर्वकालम, तदपि तव गुणानाम ईश पारम याति॥

अर्थात यदि समस्त पर्वतों को, समस्त समुद्रों के जल में पीसकर उसकी स्याही बनाइ जाये, और संपूर्ण वनों के वृक्षों को काटकर उसको कलम या पेन बनाया जाये और स्वयं साक्षात, विद्या की अधिष्ठात्री, देवी सरस्वती उनके गुणों को लिखने के लिये अनंतकाल तक बैठी रहें तो भी उनके गुणों का वर्णन कर पाना संभव नही होगा। वह समस्त लेखनी घिस जायेगी! पूरी स्याही सूख जायेगी मगर उनका गुण वर्णन समाप्त नही होगा। ऐसे भगवान शिव का पूजन अर्चन करना मानव जीवन का सौभाग्य है

भगवान शिव के पूजन की अनेकानेक विधियां हैं।इनमें से प्रत्येक अपने आप में पूर्ण है और आप अपनी इच्छानुसार किसी भी विधि से पूजन या साधना कर सकते हैं।भगवान शिव क्षिप्रप्रसादी देवता हैं,अर्थात सहजता से वे प्रसन्न हो जाते हैं और अभीप्सित कामना की पूर्ति कर देते हैं। भगवान शिव के पूजन की कुछ सहज विधियां प्रस्तुत कर रहा हूं।इन विधियों से प्रत्येक आयु, लिंग, धर्म या जाति का व्यक्ति पूजन कर सकता है और भगवान शिव की यथा सामर्थ्य कृपा भी प्राप्त कर सकता है।


भगवान शिव पंचाक्षरी मंत्रः-

ऊं नमः शिवाय

यह भगवान शिव का पंचाक्षरी मंत्र है। इस मंत्र का जाप आप चलते फिरते भी कर सकते हैं। अनुष्ठान के रूप में इसका जाप ग्यारह लाख मंत्रों का किया जाता है विविध कामनाओं के लिये इस मंत्र का जाप किया जाता है।


बीजमंत्र संपुटित महामृत्युंजय शिव मंत्रः-

ऊं हौं ऊं जूं ऊं सः ऊं भूर्भुवः ऊं स्वः ऊं त्रयंबकं यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम, उर्वारुकमिव बंधनात मृत्युर्मुक्षीय मामृतात ऊं स्वः ऊं भूर्भुवः ऊं सः ऊं जूं ऊं हौं ऊं

भगवान शिव का एक अन्य नाम महामृत्युंजय भी है।जिसका अर्थ है, ऐसा देवता जो मृत्यु पर विजय प्राप्त कर चुका हो। यह मंत्र रोग और अकाल मृत्यु के निवारण के लिये सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसका जाप यदि रोगी स्वयं करे तो सर्वश्रेष्ठ होता है। यदि रोगी जप करने की सामर्थ्य से हीन हो तो, परिवार का कोई सदस्य या फिर कोई ब्राह्‌मण रोगी के नाम से मंत्र जाप कर सकता है। इसके लिये संकल्प इस प्रकार लें, ÷÷मैं(अपना नाम) महामृत्युंजय मंत्र का जाप, (रोगी का नाम) के रोग निवारण के निमित्त कर रहा हॅूं, भगवान महामृत्युंजय उसे पूर्ण स्वास्थ्य लाभ प्रदान करें'' इस मंत्र के जाप के लिये सफेद वस्त्र तथा आसन का प्रयोग ज्यादा श्रेष्ठ माना गया है।रुद्राक्ष की माला से मंत्र जाप करें।

शिवलिंग की महिमा

भगवान शिव के पूजन मे शिवलिंग का प्रयोग होता है। शिवलिंग के निर्माण के लिये स्वर्णादि विविध धातुओं, मणियों, रत्नों, तथा पत्थरों से लेकर मिटृी तक का उपयोग होता है।इसके अलावा रस अर्थात पारे को विविध क्रियाओं से ठोस बनाकर भी लिंग निर्माण किया जाता है, इसके बारे में कहा गया है कि,

मृदः कोटि गुणं स्वर्णम, स्वर्णात्कोटि गुणं मणिः, मणेः कोटि गुणं बाणो,

बाणात्कोटि गुणं रसः रसात्परतरं लिंगं भूतो भविष्यति

अर्थात मिटृी से बने शिवलिंग से करोड गुणा ज्यादा फल सोने से बने शिवलिंग के पूजन से, स्वर्ण से करोड गुणा ज्यादा फल मणि से बने शिवलिंग के पूजन से, मणि से करोड गुणा ज्यादा फल बाणलिंग से तथा बाणलिंग से करोड गुणा ज्यादा फल रस अर्थात पारे से बने शिवलिंग के पूजन से प्राप्त होता है। आज तक पारे से बने शिवलिंग से श्रेष्ठ शिवलिंग तो बना है और ही बन सकता है।

शिवलिंगों में नर्मदा नदी से प्राप्त होने वाले नर्मदेश्वर शिवलिंग भी अत्यंत लाभप्रद तथा शिवकृपा प्रदान करने वाले माने गये हैं। यदि आपके पास शिवलिंग हो तो अपने बांये हाथ के अंगूठे को शिवलिंग मानकर भी पूजन कर सकते हैं शिवलिंग कोई भी हो जब तक भक्त की भावना का संयोजन नही होता तब तक शिवकृपा नही मिल सकती।

शिवलिंग पर अभिषेक या धारा

भगवान शिव अत्यंत ही सहजता से अपने भक्तों की मनोकामना की पूर्ति करने के लिए तत्पर रहते है। भक्तों के कष्टों का निवारण करने में वे अद्वितीय हैं। समुद्र मंथन के समय सारे के सारे देवता अमृत के आकांक्षी थे लेकिन भगवान शिव के हिस्से में भयंकर हलाहल विष आया। उन्होने बडी सहजता से सारे संसार को समाप्त करने में सक्षम उस विष को अपने कण्ठ में धारण किया तथा ÷नीलकण्ठ' कहलाए। भगवान शिव को सबसे ज्यादा प्रिय मानी जाने वाली क्रिया है ÷अभिषेक' अभिषेक का शाब्दिक तात्पर्य होता है श्रृंगार करना तथा शिवपूजन के संदर्भ में इसका तात्पर्य होता है किसी पदार्थ से शिवलिंग को पूर्णतः आच्ठादित कर देना। समुद्र मंथन के समय निकला विष ग्रहण करने के कारण भगवान शिव के शरीर का दाह बढ गया। उस दाह के शमन के लिए शिवलिंग पर जल चढाने की परंपरा प्रारंभ हुयी। जो आज भी चली रही है इससे प्रसन्न होकर वे अपने भक्तों का हित करते हैं इसलिए शिवलिंग पर विविध पदार्थों का अभिषेक किया जाता है।

शिव पूजन में सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति शिवलिंग पर जल या दूध चढाता है शिवलिंग पर इस प्रकार द्रवों का अभिषेक ÷धारा' कहलाता है जल तथा दूध की धारा भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है

पंचामृतेन वा गंगोदकेन वा अभावे गोक्षीर युक्त कूपोदकेन कारयेत

अर्थात पंचामृत से या फिर गंगा जल से भगवान शिव को धारा का अर्पण किया जाना चाहिये इन दोनों के अभाव में गाय के दूध को कूंए के जल के साथ मिश्रित कर के लिंग का अभिषेक करना चाहिये

हमारे शास्त्रों तथा पौराणिक ग्रंथों में प्रत्येक पूजन क्रिया को एक विशिष्ठ मंत्र के साथ करने की व्यवस्था है, इससे पूजन का महत्व कई गुना बढ जाता है शिवलिंग पर अभिषेक या धारा के लिए जिस मंत्र का प्रयोग किया जा सकता है वह हैः-

1 ऊं हृौं हृीं जूं सः पशुपतये नमः

ऊं नमः शंभवाय मयोभवाय नमः शंकराय, मयस्कराय नमः शिवाय शिवतराय च।

इन मंत्रों का सौ बार जाप करके जल चढाना शतधारा तथा एक हजार बार जल चढाना सहस्रधारा कहलाता है जलधारा चढाने के लिए विविध मंत्रों का प्रयोग किया जा सकता है इसके अलावा आप चाहें तो भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र का प्रयोग भी कर सकते हैं पंचाक्षरी मंत्र का तात्पर्य है ÷ ऊं नमः शिवाय ' मंत्र

विविध कार्यों के लिए विविध सामग्रियों या द्रव्यों की धाराओं का शिवलिंग पर अर्पण किया जाता है तंत्र में सकाम अर्थात किसी कामना की पूर्ति की इच्ठा के साथ पूजन के लिए विशेष सामग्रियों का उपयोग करने का प्रावधान रखा गया है इनमें से कुछ का वर्णन आगे प्रस्तुत हैः-

सहस्रधाराः-

जल की सहस्रधारा सर्वसुख प्रदायक होती है
घी
की सहस्रधारा से वंश का विस्तार होता है
दूध
की सहस्रधारा गृहकलह की शांति के लिए देना चाहिए
दूध
में शक्कर मिलाकर सहस्रधारा देने से बुद्धि का विकास होता है
गंगाजल
की सहस्रधारा को पुत्रप्रदायक माना गया है
सरसों
के तेल की सहस्रधारा से शत्रु का विनाश होता है
सुगंधित
द्रव्यों यथा इत्र
, सुगंधित तेल की सहस्रधारा से विविध भोगों की प्राप्ति होती है

इसके अलावा कइ अन्य पदार्थ भी शिवलिंग पर चढाये जाते हैं, जिनमें से कुछ के विषय में निम्नानुसार मान्यतायें हैं:-

सहस्राभिषेक

एक हजार कनेर के पुष्प चढाने से रोगमुक्ति होती है
एक
हजार धतूरे के पुष्प चढाने से पुत्रप्रदायक माना गया है
एक
हजार आक या मदार के पुष्प चढाने से प्रताप या प्रसिद्धि बढती है
एक
हजार चमेली के पुष्प चढाने से वाहन सुख प्राप्त होता है
एक
हजार अलसी के पुष्प चढाने से विष्णुभक्ति विष्णुकृपा प्राप्त होती है
एक
हजार जूही के पुष्प चढाने से समृद्धि प्राप्त होती है
एक
हजार सरसों के फूल चढाने से शत्रु की पराजय होती है

लक्षाभिषेक

एक लाख बेलपत्र चढाने से कुबेरवत संपत्ति मिलती है
एक
लाख कमलपुष्प चढाने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है
एक
लाख आक या मदार के पत्ते चढाने से भोग मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है
एक
लाख अक्षत या बिना टूटे चावल चढाने से लक्ष्मी प्राप्ति होती है
एक
लाख उडद के दाने चढाने से स्वास्थ्य लाभ होता है
एक
लाख दूब चढाने से आयुवृद्धि होती है
एक
लाख तुलसीदल चढाने से भोग मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है
एक
लाख पीले सरसों के दाने चढाने से शत्रु का विनाश होता है

बेलपत्र

शिवलिंग पर अभिषेक या धारा के साथ साथ बेलपत्र चढाने का भी विशेष महत्व है। बेलपत्र तीन-तीन के समूह में लगते हैं। इन्हे एक साथ ही चढाया जाता है।अच्छे पत्तों के अभाव में टूटे फूटे पत्र भी ग्रहण योग्य माने गये हैं।इन्हे उलटकर अर्थात चिकने भाग को लिंग की ओर रखकर चढाया जाता है।इसके लिये जिस श्लोक का प्रयोग किया जाता है वह है,

त्रिदलं त्रिगुणाकारम त्रिनेत्रम त्रिधायुधम।
त्रिजन्म
पाप संहारकम एक बिल्वपत्रं शिवार्पणम॥

उपरोक्त मंत्र का उच्चारण करते हुए शिवलिंग पर बेलपत्र को समर्पित करना चाहिए

शिवपूजन में निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना चाहियेः-

पूजन स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनकर करें।
माता
पार्वती का पूजन अनिवार्य रुप से करना चाहिये अन्यथा पूजन अधूरा रह जायेगा।
रुद्राक्ष
की माला हो तो धारण करें।
भस्म
से तीन आडी लकीरों वाला तिलक लगाकर बैठें।
शिवलिंग
पर चढाया हुआ प्रसाद ग्रहण नही किया जाता
, सामने रखा गया प्रसाद अवश्य ले सकते हैं।
शिवमंदिर
की आधी परिक्रमा ही की जाती है।
केवडा
तथा चम्पा के फूल चढायें।
पूजन
काल में सात्विक आहार विचार तथा व्यवहार रखें।